बाढ़ का शहरीकरण

Submitted by Hindi on Mon, 04/17/2017 - 13:20
Source
जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

 

पर्यावरणविद अनुपम मिश्र के अनुसार विकास के आधुनिक तरीके अपनाने में हम प्रकृति की दिनचर्या और उसके तौर-तरीकों को नजरअन्दाज कर देते हैं और जब उसका कहर हमारे अपने कारणों से हम पर बरपता है, तब सारा दोष हम प्रकृति पर मढ़ने में देर नहीं लगाते हैं।

मानसून की पहली फुहार ने ही मुम्बई की चकाचौंध भरी दुनिया को पानी-पानी कर दिया। पूरे महाराष्ट्र में 19 लोगों की जान चली गई। सभी मौतें शहरों में ही हुई हैं। 13 घंटे की लगातार बारिश में कुल 118 मिलीमीटर बारिश हुई। जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया। पिछले साल बारिश से आई बाढ़ और उसके फलस्वरूप महामारी ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली थी। वृहन्न मुम्बई नगरपालिका ने पिछली परेशानियों से लड़ने के कुछ रास्ते तैयार करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, बल्कि मीठी नदी के बेसिन पर बन चुकीं झोपड़ियों को उखाड़ने में नगरपालिका ने ज्यादा रुचि ली। बाढ़ के कारण के रूप में मीठी नदी सहित कई नदियों के बेसिन के संकुचन को चिन्हित किया गया था।

बारिश के बाद की तबाही ने कई बातें उजागर कीं। उसमें जो एक सबसे महत्त्वपूर्ण बात सामने आई, वो यह थी कि मीठी नदी के बहुत बड़े भाग का अधिग्रहण करके उसमें हवाई अड्डा बना दिया गया है। इससे साफ होता है कि हमारे जो विकास के नियामक हैं, वे कभी भी बहुत व्यावहारिक नहीं रहे हैं, अन्यथा 2001 की जनगणना के अनुसार अकेले महाराष्ट्र के सात ऐसे शहर हैं जो 10 लाख से बहुत ज्यादा आबादी वाले हैं। वृहन्न मुम्बई की आबादी 2001 के अनुसार 11,914,398 है। यह आबादी भारत के किसी भी शहर से ज्यादा है। वस्तुतः विकास के केन्द्रीकरण से आबादी का संकुचन भी उन्हीं शहरों के इर्द-गिर्द होता चला गया। आबादी का बहुत ज्यादा भार महानगरों या उपनगरों या नए नगरों पर गुणात्मक रूप से बढ़ने लगा। इस बढ़ते दबाव के लिये जो इन्तजामात सरकारी हुक्मरानों को करने थे, वे नहीं कर पाये। बसाव और ज्यादा मुनाफे के चक्कर में नदी, तालाबों पर जबरन अधिकार जमाकर उन पर कंक्रीट के जंगल उगा दिये गए।

एक तथ्य यह है कि 1950 के आसपास अकेले दिल्ली में कुल 350 तालाब है। आज मुश्किल से पाँच भी नहीं बचे हैं। नतीजा यह हुआ कि एक तरफ पानी की दिक्कतें बढ़ती चली गईं तो दूसरी तरफ बरसात के बाद पानी के उतरने की कोई जगह नहीं बची। यही कारण है कि थोड़ी सी बारिश भी राज्य सरकार और प्रशासन के लिये सिरदर्द साबित होने लगी है। कमोबेश यह बात पिछले साल की सभी ऐसी जगहों पर आई बाढ़, जहाँ बाढ़ कभी नहीं आती थी, वहाँ के लिये लागू होती है। पहले धीरे-धीरे, लेकिन अब तो तेजी से इस नए पैटर्न के होते विकास की वास्तविकता को समझाया जाना जरूरी हो गया है।

नदियों पर जगह-जगह बने बाँध ने भी बाढ़ की विकरालता को बढ़ाया है। फरक्का बैराज बनने से पहले साहेबगंज में गंगा की चौड़ाई एक किनारे से दूसरे किनारे तक खुली आँखों से देखना मुश्किल होता था, परन्तु इसकी चौड़ाई अब वहाँ डेढ़ किलोमीटर भी नहीं रह गई है। जगह की कमी और लाचारीवश लोग इसकी गोद में बसने लगे। गंगा के तट पर बसे शहरों, मालदा, साहेबगंज, भागलपुर, पटना, इलाहाबाद और कानपुर सभी जगहों पर बारिश गिरने के बाद बहुत लम्बे समय तक पानी सड़कों और घरों में ठहर जाता है। अब हाईवे बनाने के खेल में गुजरात की बाढ़ को इसी सन्दर्भ में समझा जाना जरूरी है। अभी वहाँ अहमदाबाद से बड़ौदा हाईवे तैयार हुआ है। इन दोनों शहरों के बीच की दूरी अब बहुत कम हो गई है, परन्तु इस हाईवे को बनाने में खाली जगहों पर कई मीटर मिट्टी डालकर बहुत सारी लेन वाली सड़कें तैयार की गई हैं।

बरसात के पानी को निकलने की जगह को कम कर दिया है। निश्चित तौर पर आने वाले समय में गुजरात में बाढ़ की घटनाएँ और बढ़ेंगी। इसका कारण यह है कि वहाँ नदियों से खूब सारी नहरें निकाली जा रही हैं। सिद्धान्ततः नहरें पानी लाने का काम करती हैं और नदियाँ पानी ले जाने का। नदियों से नहर निकालने के कारण नदी की गति कम हो जाती है। इससे नदियों में अवसादीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। अवसादीकरण से नदियों का तल उथला हो जाता है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र के अनुसार विकास के आधुनिक तरीके अपनाने में हम प्रकृति की दिनचर्या और उसके तौर-तरीकों को नजरअन्दाज कर देते हैं और जब उसका कहर हमारे अपने कारणों से हम पर बरपता है, तब सारा दोष हम प्रकृति पर मढ़ने में देर नहीं लगाते हैं।

 

 

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 

 

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