बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

Submitted by Hindi on Tue, 04/18/2017 - 09:25
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

उड़ीसा दमन के दौर से गुजर रहा है और वहाँ 21 लोगों की हत्या उनके संघर्ष की कहानी कहती है। पॉस्को के खिलाफ चल रहे संघर्ष को करीब से देखने का मौका मिला था। उड़ीसा के हर तबके में इस आत्मघाती औद्योगिक विकास के प्रति रोष व्याप्त है। वहाँ के नौजवान ‘आमि संग्रामी आमि संग्रामी’ और ‘लाल उड़ीसा माटी रे’ गीत गाकर अपनी आवाज बुलन्द कर रहे हैं।

जब देश नए साल के जश्न में डूबा हुआ था, तब उड़ीसा के कलिंग नगर में अपने खेत छिन जाने के विरोध में स्थानीय आदिवासी एक बड़ी स्टील परियोजना द्वारा भूमि पूजन के विरोध में गोलबन्द हो रहे थे। उन्हें सबक सिखाने के लिये उड़ीसा सरकार ने पुलिस की 12 टुकड़ियाँ तैनात की थीं। विरोध का स्वर मुखर न हो, इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये शाश्वत मिश्र को जाजपुर जिले का कलेक्टर नियुक्त किया गया। गौरतलब है कि यह वही कलेक्टर हैं, जिन्होंने आदिवासी सुरक्षा नियमावली को ताक पर रखकर कालाहांडी में ‘वेदांत एलुमिना शोधक’ संयंत्र लगाने में सरकार की मदद की थी। दो जनवरी को 12 आदिवासियों की हत्या उनके ही नेतृत्व में हुई थी। ऐसा तो होना ही था, क्योंकि उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का कहना है कि तेज गति से हो रहे औद्योगिक विकास का जो भी विरोध करेगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री द्वारा यह बयान काशीपुर, उड़ीसा में पुलिस दमनचक्र के बाद जारी किया गया था। मुख्यमंत्री का यह रुख सुनिश्चित करता है कि उड़ीसा की धरती पर ऐसी घटनाएँ भविष्य में भी घट सकती हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री ने औद्योगिक विकास के नाम पर अपनी संवेदना देशी और विदेशी उद्योगपतियों के पास गिरवी रख दी है।

अभी हाल में वहाँ दक्षिण कोरिया की एक बड़ी स्टील कम्पनी ‘पॉस्को’ को लौह अयस्क खनन और प्लांट लगाने की इजाजत दी गई है। इससे तीन प्रखण्डों के लगभग एक लाख लोगों का विस्थापन होगा। काशीपुर, चिल्का और लाजीगंढा में पहले भी ऐसा हो चुका है, परन्तु आदिवासी और दलित जनता भ्रमित करने वाले झूठे विकास का सच समझने लगी है। ऐसी घटना से दक्षिण के राज्य भी अछूते नहीं हैं। आन्ध्र प्रदेश की ‘पोलवरम परियोजना’ के खिलाफ बरगामपाडू गाँव (कुंकनूर जिला) के लोगों ने अपने गाँव के बाहर एक स्पष्ट चेतावनी लगा दी है, ‘कोई अधिकारी गाँव में प्रवेश नहीं कर सकता। अगर ऐसा दुस्साहस कोई करता है, तो वह निश्चित रूप से दंडित होगा।’

दिसम्बर, 2004 में ‘उत्कल एलुमिना इंडस्ट्रीज लिमिटेड’ के विरुद्ध काशीपुर की आदिवासी और दलित जनता ने एक शान्तिपूर्ण बैठक आयोजित की थी, जिसमें लगभग 300 लोग शामिल हुए थे। वहाँ महिलाओं को बुरी तरह पीटा गया। लोगों के गाँव से बाहर निकलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा वामपंथी और कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। पत्रकारों को भी पीटा गया एवं उनके कैमरे छीन लिये गए थे। 11 वर्षीय एक आदिवासी बच्चे के लापता होने के पीछे भी प्रशासन का ही हाथ था, ऐसा वहाँ के स्थानीय लोगों का आरोप है। इस संयंत्र से लगभग 60 हजार लोगों के विस्थापन का अनुमान लगाया गया था। छह जनवरी को नई दिल्ली स्थित उड़ीसा निवास पर लगभग 26 जनसंगठनों के नेतृत्व में उस नृशंस हत्या के विरोध में प्रदर्शन किया गया। सभी जनसंगठनों का एक-एक प्रतिनिधि उड़ीसा के स्थानीय आयुक्त से मिलने गया। बातचीत के दौरान आयुक्त ने उस हत्या के जवाब में सूचना दी कि वर्ष 1991 में जिन आदिवासियों से जमीन ली गई थी, उन्हें मुआवजे के तौर पर 32 हजार रुपए दे दिये गए थे।

आयुक्त का यह जवाब सरकार द्वारा घटना को जायज ठहराने जैसा ही है। खेती पर आश्रित आदिवासी किसानों की हत्या के कारणों में ऐसे कारण जुड़वाना प्रजातांत्रिक व्यवस्था में कितना जरूरी है, इस पर भारत के तमाम जनसंगठनों और आम नागरिकों को चिन्ता करनी होगी। कलिंग नगर औद्योगिक कॉम्प्लेक्स के लिये खेतिहर मजदूरों की 12 हजार हेक्टेयर जमीन उनके जीने के लिये बुनियादी साधन मुहैया कराए बगैर ले ली गई है।

विकास के लिये जब बाजार को आमंत्रण दिया जाता है, तब बाजार की शर्त केवल उद्योगपतियों की सुविधा के आधार पर ही क्यों तय की जाती है?

सरकार सिर्फ विकास का ढोल पीटती है, ताकि उसकी गूँज से भ्रम का जाल फैलाया जा सके। वास्तव में विकास की जमीन कुछ धनिकों के लिये तैयार की जाती है। यह देश में घटने वाली पहली घटना नहीं है। हर बड़े निर्माण के साथ उजाड़ने की प्रक्रिया दोहराई गई है। कभी बड़े बाँध, कभी विद्युत परियोजना, तो कभी औद्योगिक इकाई स्थापित करने के नाम पर ऐसा हुआ है। अगर मामले पर गौर करें, तो विस्थापन की यह प्रक्रिया सत्ता की निर्ममता की कहानी कहती है। आजादी के बाद से कभी भी विस्थापित आबादी के पुनर्वास की तैयारी ढंग से नहीं की गई और यह भी सच है कि पिछले आँकड़ों के अनुसार, 3.5 करोड़ विस्थापित लोगों में आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है। पुनर्वास सही मायने में इतना आसान काम भी नहीं है। केवल घर और रोजगार देने से पुनर्वास पूरा नहीं होता। उन्हें उनकी अपनी आबोहवा कैसे लौटाई जाये, इस पर कभी विचार ही नहीं किया गया। यह अदम्य राजनीतिक इच्छाशक्ति की माँग करता है, जो कम-से-कम इन निर्मम सरकारों में नहीं है।

उड़ीसा से सटे खनिज सम्पदा से भरपूर झारखण्ड के नेतरहाट और कोयलकारो में आदिवासी जनता ने अपनी जीत इतिहास के पन्नों में दर्ज कराई है। वहाँ तापकारा में फरवरी, 2001 में आठ लोगों की हत्या कर दी गई थी। खनिज सम्पदा से भरपूर जो भी राज्य हैं, वहाँ आदिवासी और दलितों की संख्या अपेक्षाकृत अन्य राज्यों से ज्यादा है। दीगर बात यह है कि उन राज्यों में शोषण का प्रतिशत ज्यादा है और विकास का दायरा सीमित चंद लोगों तक ही है। यह हमारे विकास के अन्तर्विरोध हैं, परन्तु इन अन्तर्विरोधों से लड़ने की राजनीतिक चेतना भी उन्हीं राज्यों में ज्यादा दिखती है।

उड़ीसा दमन के दौर से गुजर रहा है और वहाँ 21 लोगों की हत्या उनके संघर्ष की कहानी कहती है। पॉस्को के खिलाफ चल रहे संघर्ष को करीब से देखने का मौका मिला था। उड़ीसा के हर तबके में इस आत्मघाती औद्योगिक विकास के प्रति रोष व्याप्त है। वहाँ के नौजवान ‘आमि संग्रामी आमि संग्रामी’ और ‘लाल उड़ीसा माटी रे’ गीत गाकर अपनी आवाज बुलन्द कर रहे हैं। बॉक्साइट और लोहे से सनी धरती पर वे अपना लहू बहाने को तैयार हैं। वे मानते हैं कि उनके लिये उनकी छोटी खेती ही पर्याप्त है। जल, जंगल और जमीन के साथ अपनी जिन्दगी से वे बहुत खुश हैं। उन पर विकास थोपना और फिर यह बताना कि सब कुछ उनके विकास के लिये हो रहा है, संविधान में दर्ज जीने के अधिकार को छीनने जैसा है।

अचरज की बात यह है कि नवीन पटनायक के साथ उड़ीसा सरकार में शामिल भाजपा के आधे से ज्यादा विधायक आदिवासी हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर उनके ढीले-ढाले बयान जमीन से उनके रिश्ते टूटने की बात कहते हैं। सच तो यह है कि ऐसे प्रतिनिधि आन्दोलन को दिग्भ्रमित करते हैं। दुखद यह भी है कि जनसंगठनों की दूरियाँ भी जनता से बढ़ी हैं। इस बात का प्रमाण यह है कि देश की राजधानी में आयोजित होने वाले प्रदर्शन, धरने और सेमिनार में शामिल होने वाले लोगों की संख्या दिन-ब-दिन घटती जा रही है। नई दिल्ली में कलिंग नगर में पुलिस बर्बरता के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में 26 जनसंगठन शामिल थे और वहाँ सिर्फ 50-55 लोग ही मौजूद थे। पिछले दिनों ध्रुवीकरण पर गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में 150 संगठन शामिल थे, लेकिन उद्घाटन के दिन मात्र 60 लोग उपस्थित थे। यह केवल आश्चर्य ही नहीं, चिन्ता की भी बात है। ईमानदारी से काम कर रहे जनसंगठनों, कार्यकर्ताओं और नेताओं को इस विचारशून्यता के कारण ढूँढने होंगे। कलिंगनगर, काशीपुर और पॉस्को की दुर्घटना से उजड़ते लोगों को बचाने के लिये संघर्ष की बुनियादी बातों पर ध्यान देना जरूरी होगा।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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