यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

Submitted by Hindi on Tue, 04/18/2017 - 12:32
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

राजस्थान के जयपुर जिले के लापोड़िया गाँव ने भी 6 साल लगातार अकाल से लड़ते रहने के सिलसिले में पानी कैसे हासिल किया, यह जानने की कोशिश जरूर होनी चाहिए। अकाल से पूरी तरह टूट चुके लापोड़िया को राजस्थान में पानी के पारम्परिक साधनों को जीवित करने में लगी संस्था ‘ग्राम विकास नवयुवक मण्डल’ के उपायों ने फिर से हरा-भरा कर दिया है।

सूखे से बचाव के लिये सरकारें अपनी क्षमता और संसाधन का उपयोग सही तरीके से नीतियाँ बनाने तथा उसे लागू करने की बजाय अन्धविश्वासों को बढ़ावा देने वाले कामों में लग गई हैं। अब वे पानी के लिये मेघों को यज्ञों के माध्यम से मनाने में करोड़ों रुपए फूँक रही हैं। हाल ही में आन्ध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने मानसून को आमंत्रित करने में 12 करोड़ रुपए खर्च कर दिये। वहाँ बारिश कराने के लिये कृत्रिम बादल भी साथ-ही-साथ तैयार कराए गए हैं। सरकार द्वारा प्रायोजित यह कोई पहली घटना नहीं है। यह कई राज्यों में पहले ही आकार ले चुकी है। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने 2004 में बारिश कराने के लिये राजकीय तंत्रों का बहुत बड़े पैमाने पर सहारा लिया था। विभिन्न सम्प्रदायों के धार्मिक स्थलों में अनुष्ठान कराए गए थे। वसुंधरा ने इस मुहिम में अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह, अजमेर के ही एक चर्च, श्रीगंगानगर के एक गुरुद्वारा और जयपुर के झूलेलाल मन्दिर को शामिल किया था। इन धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रियों की ड्यूटी लगाई गई थी। तब लोग इसे भाजपा की सरकार के होने से जोड़ रहे थे। आन्ध्र की कांग्रेस सरकार भी इन्हीं उपायों पर सहारा ले रही है। पहली बात तो यह है कि किसी भी दल की सरकार अपनी खामियों पर पर्दा डालने के लिये जनता में गहरे पैठ चुके ऐसे अन्धविश्वासों का सहारा लेती है।

दूसरी बात यह है कि जो हमारे प्राकृतिक संसाधन हैं, उसे बचाने के लिये केन्द्र और राज्य सरकारों के पास इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव है। यह इच्छाशक्ति हमारे समाज में भी कमजोर होती दिखाई दे रही है। परिणामस्वरूप अब जब हमारे प्राकृतिक स्रोत सूखने लगे हैं, वे हमारी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, तब सही उपाय ढूँढने की बजाय अपनी कमजोरियों को ढँकने के लिये ऐसी अतार्किक बातें सरकारी और सामाजिक स्तर पर भी परवान चढ़ने लगी हैं। इन बेतुकी बातों का सहारा लेकर क्या हम अपनी जरूरतों की भरपाई कर पाएँगे? अतीत में हासिल कुछ सकारात्मक परिणामों से सीखने की कोशिश अगर हम कर सकते तो हमारा भला निश्चित तौर पर हो जाता। पानी पाने की अन्धविश्वासी कवायद में लगे तंत्र को उन जन-प्रयासों की परम्परा को समझना और सीखना जरूरी होगा, जिसके बूते पानी के संकट को समाज ने दूर किया है। सम्भव है कि हम इसी खोज से अपने समाज को तरल बना पाएँगे।

ऐसा नहीं है कि अकेले भारत ही पानी की समस्या से दो-चार हो रहा है, पूरे विश्व की कमोबेश यही स्थिति है। दिल्ली में पानी के टैंकरों की प्रतीक्षा में लोगों का रात भर जागना तो उनकी नियति बन गई है। ऐसे में राजस्थान के चुरू जिले की सुजागढ़ तहसील के आधा गाँव के लोगों के लिये किये गए उपाय कुछ रोशनी दिखाते हैं। यहाँ के ग्रामीणों ने अदम्य इच्छाशक्ति की बदौलत सूखे तालाबों को जल से भर दिया। 1999 में यहाँ का पारम्परिक तालाब पूरी तरह से सूख गया था। इससे निजात पाने के लिये ग्रामीणों ने कम नमी में आसानी से पनपने वाले ‘खेजड़ी’ के वृक्षों को तालाब के आसपास भरपूर मात्रा में लगाया। मात्र तीन साल बाद 2002 में जब भारत का बहुत बड़ा हिस्सा और खुद राजस्थान सूखे की दिक्कत झेल रहा था, तब यहाँ जमकर बारिश हुई। पूरे साल तालाब से लोगों की जरूरतें पूरी होने के बावजूद तालाब में पानी बचा रहा था।

राजस्थान के जयपुर जिले के लापोड़िया गाँव ने भी 6 साल लगातार अकाल से लड़ते रहने के सिलसिले में पानी कैसे हासिल किया, यह जानने की कोशिश जरूर होनी चाहिए। अकाल से पूरी तरह टूट चुके लापोड़िया को राजस्थान में पानी के पारम्परिक साधनों को जीवित करने में लगी संस्था ‘ग्राम विकास नवयुवक मण्डल’ के उपायों ने फिर से हरा-भरा कर दिया है। मध्य प्रदेश का मालवा हर साल सूखे की चपेट में आता है, क्योंकि उसने पानी सहेजने की पारम्परिक व्यवस्था ‘पाटपानी’ को भुला दिया है। वहीं राजस्थान के कई हिस्से फिर से हरे-भरे हो उठे हैं, क्योंकि उसने बावड़ियों में पानी सहेजने की पुरानी व्यवस्था की ओर फिर से लौटने का मन बना लिया है। सरकार को यज्ञ नहीं, समाज द्वारा यत्न से वापिस पानी पाने के उपायों का सहारा लेना चाहिए था।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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