स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

Submitted by Hindi on Tue, 04/18/2017 - 16:05
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जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

सिंगुर और नंदीग्राम से लेकर महाराष्ट्र में रिलायंस द्वारा स्थापित सेज के मामलों में राज्य और केन्द्र सरकार ने अपने जनविरोधी चरित्र को उजागर किया है। न सिर्फ इन क्षेत्रों में मजदूर अवाम का बेतहाशा शोषण-उत्पीड़न हो रहा है, बल्कि सरकारें इन क्षेत्रों में अपने उद्यमों को स्थापित करने वाले पूँजीपतियों को ढेर सारी रियायतें मुहैया करा रही हैं।

लगभग साल भर से विशेष आर्थिक क्षेत्र सेज को लेकर देश की जनता में जगह-जगह आवेग और उफान देखे गए हैं। मीडिया के बदलते सरोकारों के बीच थोड़ा ही सही, इन बुनियादी सवालों को एक अच्छी-खासी जगह दी गई है। इस वजह से सेज के मुद्दे के खिलाफ देश में एक बहस खड़ी की जा सकी है, लेकिन अब इस विषय को लेकर देश और समाज में एक किस्म का ठंडापन महसूस किया जा रहा है, लेकिन सवाल है कि सिंगुर और नंदीग्राम में जिन सवालों को लेकर देश और समाज, राज्य सरकार और आम जनता के बीच तनातनी का माहौल तैयार हुआ था, क्या अब उन सवालों के हल ढूँढ लिये गए हैं? उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर क्या अब नए सेज को मंजूरी मिलनी बन्द हो गई है? नंदीग्राम में राज्य पुलिस द्वारा हिंसा को अंजाम दिये जाने के बाद प्रधानमंत्री द्वारा ‘नई पुनर्वास नीति’ तैयार करने की घोषणा की गई थी, क्या इस दिशा में अब तक किया गया कोई सार्थक प्रयास नजर आ रहा है? ये सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। ऐसे सवालों के लिये समाज में थोड़ी सरगर्मी के बाद भयावह सन्नाटा पसर जाता है। शायद यही वजह है कि आम मुद्दे की लड़ाई विस्तार ग्रहण नहीं कर पा रही है।

मालूम हो कि देश में सेज की मंजूरी के लिये एक बोर्ड स्थापित किया गया है। इस बोर्ड ने सितम्बर की शुरुआत में ही 20 सेज की स्थापना को मंजूरी प्रदान कर दी। केन्द्र सरकार द्वारा गठित यह सेज को जल्दबाजी में मंजूरी प्रदान कर रहा है। इन सेज की स्थापना का साफ मतलब है पूँजीपतियों को लूट का सुअवसर सुलभ कराना। फिलहाल गाँधीनगर (गुजरात), दिमापुर (दादर और नगर हवेली), भड़ूच (गुजरात), कांकीनेदा और चित्तूर (आन्ध्र प्रदेश), नागपुर (महाराष्ट्र) में 20 सेज को मंजूरी प्रदान की गई है।

देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक स्थापित ऐसे अनेक सेज की असलियत से आज हर कोई वाकिफ हो रहा है।

सिंगुर और नंदीग्राम से लेकर महाराष्ट्र में रिलायंस द्वारा स्थापित सेज के मामलों में राज्य और केन्द्र सरकार ने अपने जनविरोधी चरित्र को उजागर किया है। न सिर्फ इन क्षेत्रों में मजदूर अवाम का बेतहाशा शोषण-उत्पीड़न हो रहा है, बल्कि सरकारें इन क्षेत्रों में अपने उद्यमों को स्थापित करने वाले पूँजीपतियों को ढेर सारी रियायतें मुहैया करा रही हैं। और यह इसके सिवाय कुछ नहीं, बल्कि सार्वजनिक सम्पत्ति को खुले हाथ से विकास के नाम पर पूँजीपतियों को सौंपना है। ये आर्थिक क्षेत्र ऐसी भूमि पर स्थापित किये जा रहे हैं, जो कृषि के दृष्टिकोण से उपजाऊ हैं। ये जमीनें जो राज्य सरकारों द्वारा अधिगृहीत कर पूँजीपतियों को सौपीं गई हैं, उनमें से अधिकांश धोखाधड़ी या बलपूर्वक वसूली गई हैं। जहाँ-जहाँ सेज स्थापित किये गए, अमूमन हर जगह उन्हें स्थानीय कृषक व मेहनतकश आबादी का विरोध झेलना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, इन सेज में मजदूरों की नौकरी की कोई सुरक्षा गारंटी नहीं है। दूसरी तरफ किसानों से उनकी जमीन छीनकर सरकार उन्हें आजीविका के साधनों से वंचित कर रही है। रोजगार न मिल पाने की स्थिति में उनका जीवन पहले से भी ज्यादा नारकीय हो रहा है। इस प्रकार का औद्योगिक विकास आम आदमी के विकास से बहुत दूर एकतरफा तौर पर पूँजीपतियों का ही विकास है।

वैसे भी पूँजीवाद में विकास का मतलब पूँजीपतियों की सम्पत्ति के विकास से ही समझा जाना चाहिए। बावजूद इसके यदि रोजगारपरक विकास हो तो उसका थोड़ा बहुत फायदा आबादी के एक छोटे से हिस्से को मिल जाता है और अवाम के जीवन स्तर में भी थोड़ा बहुत सुधार आता है, किन्तु हमारे देश में जो आर्थिक नीतियाँ चलाई जा रही हैं, वे एकांगी हैं। ये नीतियाँ बड़े उद्योगपतियों व धनपशुओं के ज्यादा फायदे की हैं। इस कारण से ही इन नीतियों का इतना विरोध हो रहा है और इस देश की विभिन्न सरकारें इन नीतियों को परवान चढ़ाने में किसी भी हद तक जा रही हैं। नंदीग्राम को अंजाम देने में सरकार किसान और मजदूरों के हर विरोध को बेहिचक तूल दे रही है। अतः इन सेज की स्थापना का हर सम्भव विरोध किया जाना चाहिए। विरोध इस माँग को लेकर करना होगा कि उन आर्थिक नीतियों को रद्द किया जाये, जो मानव विरोधी व रोजगार विरोधी हैं। देश के विकास का मतलब अन्तिम या हाशिए पर ठहरे लोगों के विकास से होना चाहिए।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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