बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

Submitted by Hindi on Tue, 04/18/2017 - 16:40
Source
जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

बड़े बाँध की योजना से बड़ी आबादी को बहुत लाभ मिलने की सम्भावनाएँ दर्शाई जाती हैं, परन्तु विडम्बना यह है कि निर्माण की इस लम्बी प्रक्रिया में उनकी भूमिका नहीं के बराबर होती है। ऐसी योजनाओं का लाभ भी दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई जैसे महानगरों की एक खास आबादी के सुपुर्द कर दिया जाता है।

ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से पूरी दुनिया में एक किस्म के भय का माहौल तैयार हो रहा है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बढ़ाने में बड़े बाँध जिम्मेदार हैं। ब्राजील की एक संस्था नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका के अनुसार भारत की वजह से हो रही ग्लोबल वार्मिंग में बड़ा हिस्सा 19 बड़े बाँधों का है। इवान लिमा और उनके सहयोगियों के मुताबिक भारत के बाँध प्रतिवर्ष 3.35 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के बड़े बाँधों से प्रतिवर्ष 12 करोड़ टन मीथेन उत्सर्जित होता है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे में बाँध की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत है। भारत की हिस्सेदारी किसी अन्य देश की तुलना में सबसे ज्यादा है। यहाँ कुछ बातें समझ लेनी जरूरी होंगी। पहली यह कि बड़े बाँधों का मतलब क्या होता है? दूसरी यह कि बाँध ग्लोबल वार्मिंग में या पर्यावरण खतरा उत्पन्न करने में किस तरह अहम भूमिका निभा रहे हैं। बड़े बाँधों के निर्माण के उद्देश्य कहाँ तक पूरे हो पा रहे हैं? समाज के हित में बड़े बाँधों के निर्माण होने चाहिए या नहीं?

विश्व बाँध आयोग के अनुसार बड़ा बाँध वह है, जिसकी नींव से ऊँचाई 15 मीटर या उससे अधिक हो। यदि बाँध की ऊँचाई 5-15 मीटर के बीच हो और उसके जलाशय की क्षमता 30 लाख घन मीटर से अधिक हो तो उसे भी बड़ा बाँध कहा जाएगा। इस परिभाषा के अनुसार बड़े बाँधों की संख्या लगभग 52 हजार है, जबकि भारत में बड़े बाँधों की संख्या लगभग चार हजार है। एक अन्य तथ्य के अनुसार दुनिया में लगभग प्रत्येक नदी पर कम-से-कम एक बड़ा बाँध निश्चित तौर पर है। हकीकत यह है कि ये बाँध किसी भी झील की तरह ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न करते हैं। ये गैसें जलाशय में वनस्पति तथा जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले अन्य कार्बनिक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न होती हैं। यह सर्वविदित है कि नदियों और बाँधों में औद्योगिक कचरे पूरी दुनिया में धड़ल्ले से बहाए जाते रहे हैं। औद्योगिक कचरे पानी में पनपने वाली वनस्पतियों और जलचरों के लिये बहुत हानिकारक होते हैं।

जलचर और वनस्पतियाँ पानी को स्वच्छ रखने में जहाँ सहायक सिद्ध होती थीं, अब उनका ही अस्तित्व संकट में है। उद्योग में इस्तेमाल होने वाला पानी बगैर परिशोधन के ही नदियों में छोड़ दिया जाता है। पूरी दुनिया में लगभग एक-सा आलम है। इंग्लैंड की टेम्स, संयुक्त राज्य अमेरिका की मिसीसिपी और मिसौरी या फिर भारत में गंगा, यमुना और गोदावरी सहित सारी नदियाँ प्रदूषण से त्रस्त हैं। बाँध में प्रदूषण का स्तर इसलिये बढ़ जाता है, क्योंकि वहाँ पानी के बहने की गति और प्रकृति में बदलाव आ जाता है। भारत के सन्दर्भ में अगर औद्योगिक कचरों से नदियों के प्रदूषित होने की वजह को आधार बनाया जाये तो महाराष्ट्र का स्थान पहला है और उत्तर प्रदेश का दूसरा। सत्य तो यह है कि औद्योगिक विकास के संकुचन का प्रतिशत इन दो राज्यों में सबसे ज्यादा है। भारत के सन्दर्भ में एक नदी गंगा को लेकर अगर बात करें तो आप पाएँगे कि उसके किनारे बहुत सारे औद्योगिक उपक्रम चलाए जा रहे हैं और इनका कचरा भी गंगा या उनकी सहायक नदियों में ही बहाया जा रहा है। गंगा में वीरभद्र के पास आईडीपीएल की रासायनिक गन्दगी, हरिद्वार में भेल का मलबा, बुलन्दशहर के पास नरौरा तापघर का कचरा, कानपुर में चमड़ा उद्योग व अन्य उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक कचरा, वाराणसी में कपड़ा रंगाई व छपाई से निकलने वाला रासायनिक कचरा तथा इसके अलावा खाद्य और कीटनाशक कारखानों से निकलने वाले गन्दे पानी को बगैर उपचारित किये ही मुनाफे की होड़ में बहाया जा रहा है। उद्योग लगाने की एक महत्त्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त यह होती है कि वे अपने उद्योग से निकलने वाले गन्दे पानी को वाटर ट्रीटमेंट की व्यवस्था से साफ कर नदी में गिराएँ। न तो इतनी नैतिकता कल-कारखानों के मालिकों में बची है और न ही इतनी हिम्मत हमारे योजनाकारों में है कि वे उद्योगपतियों पर दबाव बनाकर उनसे नदियों का खयाल रखवा सकें। भूमण्डलीकरण के इस दौर में निजीकरण को बहुत बढ़ावा मिला है। निजीकरण में निजत्व का बोध अहम हो गया है।

इसके अलावा बड़े बाँधों ने हमारे पर्यावरण तंत्र को भारी नुकसान पहुँचाया है। जलाशय क्षेत्र में डूब की वजह से भी वनों व वन्य-जीव के आवासों व प्रजातियों का विनाश हुआ है। जिन नदियों पर कई बाँध बने हैं, वहाँ पानी की गुणवत्ता पर तथा कुदरती बाढ़ों या अन्य प्राकृतिक आपदाओं पर गुणात्मक असर पड़े हैं। बड़े बाँधों के कारण दिन-ब-दिन बाढ़ की संख्या और उसके प्रभाव में बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है। हास्यास्पद तो यह है कि 75 से ज्यादा देशों में बड़े बाँध, बाढ़ नियंत्रण उपाय के तौर पर बनाए गए हैं। एक पुराने आँकड़े के अनुसार इन बड़े जलाशयों ने पूरी दुनिया के 6-8 करोड़ लोगों को विस्थापित किया है। विश्व बाँध आयोग ने दुनिया में कुछ बड़े बाँध के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों को लेकर एक सर्वेक्षण आयोजित करवाया था। उस सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि बड़े बाँध अक्सर राजनेताओं, प्रमुख केन्द्रीकृत सरकारी संस्थाओं, अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बाँध निर्माता उद्योग के अपने निजी हितों की भेंट चढ़ जाते हैं।

बड़े बाँध की योजना से बड़ी आबादी को बहुत लाभ मिलने की सम्भावनाएँ दर्शाई जाती हैं, परन्तु विडम्बना यह है कि निर्माण की इस लम्बी प्रक्रिया में उनकी भूमिका नहीं के बराबर होती है। ऐसी योजनाओं का लाभ भी दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई जैसे महानगरों की एक खास आबादी के सुपुर्द कर दिया जाता है। इसके कारण उजड़ने वाली आबादी को न पीने का पानी मिलता है और न ही उससे तैयार होने वाली बिजली। सवाल है कि बाँध निर्माताओं की सारी घोषणाओं का लाभ सम्पन्न लोगों तक क्यों सिमट कर रह जाता है?

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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