परम्परागत कृषि से लघु उद्योग तक का सफर

Submitted by Hindi on Sun, 04/30/2017 - 15:58
Source
जल चेतना, जनवरी 2016


भूमिगत पानी की कमी के चलते उन्होंने बागवानी करना एवं आवश्यकता अनुसार फसल को पानी देने के लिये ड्रिप सिंचाई योजना को अपनाया। अपने लगभग सभी खेतों में ड्रिप सिंचाई योजना का प्रयोग किया हुआ है। चूँकि कई बार फसल में कीड़े आदि का प्रकोप आ जाता है और पानी में किसी दवा का छिड़काव करने की जरूरत होती है, ऐसे में सीधी पाइप लाइनों के साथ दवा मिक्चर यंत्र लगवा रखे हैं। पाइपों से बहते पानी में ही दवा मिला दी जाती है जो पूरे खेत तक पहुँच जाती है।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगयदि दिल में जोश एवं कुछ कर दिखाने की क्षमता हो तो संसाधनों का अभाव कभी आड़े नहीं आता है अपितु इंसान जिस किसी कार्य के लिये प्रयास करता है तो उसका वह काम सफल हो जाता है। इंसान अगर अपनी सोच को विस्तृत रूप दे तो वह बेरोजगार रह ही नहीं सकता, अपितु दूसरों को भी रोजगार देकर नाम कमा सकता है। एक किसान भी पढ़े लिखों को रोजगार देने में सक्षम है यह सुनने में अटपटा जरूर लगता है किन्तु इसे हकीकत में बदलने का काम एक ऐसे ही सामान्य किसान अजीत सिंह ने किया है। जिन्होंने परम्परागत कृषि के काम से लघु उद्योग तक का सफर तय कर लिया है और आज वह प्रदेश के एक अग्रणी किसान बन गए हैं।

हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के कनीना उप-मंडल के गाँव ढाणा के राज्य स्तर पर पुरस्कृत किसान अजीत सिंह को राज्य में अपनी बुद्धि के बल पर जाना जाता है। वह कभी एक साधारण किसान थे और आज अपनी मेहनत एवं लगन के बल पर दूसरे किसानों के लिये प्रेरणा के स्रोत बन गए हैं। एक दर्जन के करीब किसानों ने उनका अनुकरण करते हुए अपनी माली हालत को सुधार लिया है।

कनीना से आठ किमी दूर ढाणा गाँव के किसान अजीत सिंह एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने न केवल बेरोजगारों के लिये एक प्रेरणा का काम किया है अपितु स्वयं रोजगार का उदाहरण भी पेश किया है। वे कृषि पर नए-नए प्रयोग करके जहाँ पहली बार सफेद मूसली उगाकर नाम कमा चुके हैं वहीं बायो गैस संयंत्र लगाकर न केवल जनरेटर को चलाया है अपितु पूरे घर में बायो गैस से प्रकाश व्यवस्था और यहाँ तक कि ए.सी. चलाकर विभाग को चकित कर दिया है। अजीत सिंह ने अपने कुएँ पर डेयरी के लिये विदेशी नस्ल की गायें पालकर न केवल दूध के विभिन्न उत्पाद बनाकर विवाह शादियों एवं पार्टियों में पहुँचाने शुरू किए हैं अपितु कई लोगों को रोजगार प्रदान किया है।

किसान अजीत सिंह से सुंदर मानपुरा, सुंदर रामबास, शुक्रम, ढाणा, रामौतार ढाणा, गजराज रामबास ने प्रेरणा लेकर डेयरी का काम शुरू किया है वहीं नरेंद्र भोजावास, नवल कनीना ने अजीत सिंह से प्रेरणा लेकर रसगुल्लों का काम शुरू कर दिया है। आज किसान भी प्रसन्न हैं और अजीत सिंह का धन्यवाद कर रहे हैं।

ढ़ाणा गाँव में अजीत सिंह नामक किसान मोड़ी गाँव को जाने वाले कुएँ पर रहते हैं जिन्होंने एक नहीं अपितु कई मिसाल कायम करके विभिन्न विभागों को चकित कर दिया है। निजी कम्पनियों ने तो उन्हें पुरस्कृत भी किया है। वह अपने नलकूप पर आठ एकड़ जमीन पर रहते हैं और यहीं पर उन्होंने डेयरी का काम शुरू किया। अपना पेट पालने के लिये दो वर्ष पूर्व उन्होंने दस गायों से डेयरी फार्म बनाया था और दूध को डेयरी में देना शुरू किया था किंतु बीच में दूध के भाव क्या गिरे उन्होंने गाय के दूध से रसगुल्ले बनाने का निश्चय किया और देखते ही देखते बेहतर रसगुल्ले बनाकर नाम कमाया।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगनिर्मल गाँव ढ़ाणा में अपने ट्यूबवेल पर रह रहे किसान अजीत कुमार ने अब तक तीन पड़ाव देखे हैं और तीनों में ही भारी सफलता हासिल की है। परम्परागत खेती के बाद लघु डेयरी, फिर विशाल डेयरी तत्पश्चात लघु उद्योग और अब बागवानी की ओर बढ़ने जा रहे हैं।किसान अजीत सिंह ने पूरे एक वर्ष तक परम्परागत खेती की। इस खेती में उन्होंने हर प्रकार की फसल एवं सब्जी उगाकर प्रयोग किया। खेती करते वक्त सफेद मूसली, लहसुन जैसी बेहतर पैदावर ली किंतु इस खेती से मन ऊब गया क्योंकि मजदूरी अधिक महँगी पड़ने के कारण उस काम को छोड़कर डेयरी का काम अपनाया। यद्यपि सफेद मूसली के साथ-साथ अन्य फसलें उगाते हुए उन्होंने बेहतर लाभ कमाया है किन्तु मजदूर न मिलने व मजदूरी महँगी होने के कारण डेयरी व्यवसाय को अपनाया। अजीत का कहना है कि कृषि प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है जिन पर काबू पाना सरल कार्य नहीं है जबकि लघु उद्योग में प्राकृतिक संसाधनों पर काबू पाया जा सकता है और उनका प्रभाव गौण होता है। कृषि के उत्पाद जैसे आलू, सब्जी एवं फलों को उचित मूल्य नहीं मिलता है जबकि उनके उत्पाद बना लिये जाएँ तो उचित मूल्य प्राप्त हो सकते हैं।

एक वर्ष तक परम्परागत खेती का काम करने के बाद तीन वर्षों तक डेयरी का काम किया। डेयरी व्यवसाय में भी उन्होंने नाम कमाया किंतु उसे भी आंशिक रूप से छोड़ दिया गया। हालाँकि डेयरी काम में उन्होंने अच्छी आय प्राप्त की किंतु जिनका मन कुछ कर गुजरने को होता है वो अपनी बुद्धि बल का प्रयोग करता ही रहता है।

कनीना खंड स्तर पर सर्वेश्रेष्ठ किसान का सम्मान पाने के बाद जिला स्तर पर सर्वश्रेष्ठ किसान का पुरस्कार हासिल किया और तत्पश्चात हरियाणा राज्य स्तरीय पुरस्कार 51 हजार रुपये एवं प्रशस्ति पत्र प्राप्त किया। अकेले कनीना के ही दस किसान उनका अनुकरण करके बेहतर जीवन जी रहे हैं।

खाद्य सुरक्षा मानक 2006 के तहत लाइसेंस प्राप्त किसान अजीत सिंह ढ़ाणा यूँ तो ‘लॉ’ स्नातक हैं किंतु उनकी बुद्धि बल को देखा जाए तो पुस्तैनी धंधे की दीवारों को तोड़कर कर गुजरने में किसी शोध विद्यार्थी से कम नहीं है।

उन्होंने 24 नवम्बर 2008 को दस गायों से अपने नलकूप पर डेयरी का काम शुरू किया और फिर विदेशी नस्ल की 16 गायों से डेयरी कार्य प्रारम्भ किया जिससे प्रतिदिन डेढ़ क्विंटल दूध प्राप्त हुआ जबकि उन्हें पाँच क्विंटल दूध की प्रतिदिन आवश्यकता होती है ऐसे में वे बाहर से दूध मँगवा रहे हैं। उन्होंने बताया कि भिवानी, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी तथा हरियाणा से सटे राजस्थान के कुछ भागों में वे रसगुल्ले सप्लाई कर रहे हैं। न केवल अपना अपितु अपने साथ रखे हुए राजपुरोहित एवं मजदूरों का भी भरण पोषण कर रहे हैं। यह काम भी तीन वर्ष तक चलाया और फिर छोड़ दिया।सबसे बड़ा सराहनीय कार्य उस वक्त किया जब उन्होंने रसगुल्लों के लिये बिजली की आपूर्ति की जरूरत समझी। गाँवों में बिजली कम आने के कारण और रसगुल्लों को फ्रिज में रखने के लिये उन्हें ऊर्जा की जरूरत पड़ी ऐसे में उन्होंने इस आवश्यकता को पूरा करने के लिये दो बायोगैस संयंत्र लगवा दिए। अजीत सिंह ने अपने जनरेटर को दिखाते हुए बताया कि इस साढ़े सात किलोवाट के जनरेटर की एयर क्लीनर की नली में एक नलकी द्वारा बायो गैस की सप्लाई जोड़ दी है जिसके चलते जनरेटर करीब 80 फीसदी गैस का प्रयोग करते हुए अनवरत बिजली प्रदान करता है। प्रतिदिन चार से छह घंटों तक गैस से जनरेटर चलता है। कृषि विभाग की सहायता से लगाए गए बायो गैस प्लांट ने उनकी जिंदगी में नई रोशनी ही ला दी। उन्होंने बायो गैस संयंत्र से प्राप्त गैस से साढ़े सात किलोवाट का जनरेटर ही लगा दिया जो घर की बिजली की आपूर्ति के साथ-साथ फ्रिज को भी चलाता है वहीं ए.सी. तक भी काम करता है। उन्होंने बताया कि इस जनरेटर में 80 फीसदी गैस और 20 फीसदी डीजल प्रयोग होता है।

उन्होंने आवश्यकताओं को देखते हुए दो और बायो गैस संयंत्र लगवाने में विभाग से मदद ली और अब तीन क्यूबिक मीटर के बायो गैस हैं, जो गैस प्रदान कर रहे हैं। विभिन्न विभागों के लोग उनके इस कार्य को देखने के लिये जाते हैं वे सभी प्रसन्न होते हैं। उनकी सकारात्मक सोच ने उन्हें आज इस मुकाम तक पहुँचा दिया है।

किसान अजीत सिंह ने अपने खेत पर सफेद मूसली उगाकर वह प्रयोग कर दिखाया जो सामान्य किसान के लिये अति दुष्कर होता है। उन्होंने महँगे दामों पर धर (मध्य प्रदेश) से सफेद मूसली लाकर अपने खेत पर उगाई और आशातीत सफलता प्राप्त की किंतु जब उसे बेचने की तैयारी की तो निराशा हाथ लगी कि बेशकीमती वस्तु कौड़ियों के भाव दिल्ली बेचनी पड़ी। आधुनिक कृषि के उपकरणों से खेती करने वाले किसान के खेत गर्मी में भी हरे भरे हैं। उनके यहाँ हैरो, ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, गेहूँ की कटाई मशीन, बीजाई की मशीन आदि उपलब्ध हैं। वे इनका उपयोग करके अपने खेत में बेहतर पैदावार ले रहे हैं। उन्होंने अपने खेत में 15 किलोवाट का एल्टीनेटर भी लगवा रखा है। विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उनके खेत में उगाई जाती हैं।

वह अपने खेत की जाटी नामक पौधों के फल सांगर का उपयोग भी पशु चारे के रूप में करते हैं। खेत में चौलाई जैसी हरी पत्तों वाली सब्जियाँ भी उगाते हैं। उन्होंने अपने खेत में कई प्रजाति के फलदार पौधे भी लगा रखे हैं जिनमें आँवला, नींबू, शहतूत, जामुन कचनार, पपीता बेरी एवं अमरूद प्रमुख हैं।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगलघु उद्योग-वर्तमान में किसान अजीत सिंह ने अपने कृषि के उत्पादों से विभिन्न उत्पाद बनाकर गाँव-गाँव प्रचार करके बेचने का काम शुरू किया है और अति प्रसिद्धि पा रहे हैं। उनका कहना है कि किसान आलू, कच्चा आम, चना, दूध एवं कई प्रकार के मसाले पैदा तो कर लेता है किंतु उन्हें लोगों तक पहुँचाने में असफल होता है या फिर अपने को कायल महसूस करता है। उनका विचार है कि अपने उत्पाद को हर जन तक बखूबी से पहुँचाया जाए तो न केवल किसान को मुनाफा होगा अपितु आम जन को बेहतर उत्पाद घर पर ही उपलब्ध हो जाएँगे।

अपने खेत पर उत्पन्न तथा दूसरे किसानों के खेतों पर पैदा होने वाले कच्चे पदार्थों को वे अब प्रोडक्ट्स में बदल रहे हैं और दो विभिन्न प्रदर्शित वाहनों द्वारा उत्पादों को प्रदर्शित करते हुए तैयार माल आम जन तक उस विधि द्वारा पहुँचा रहे हैं जिस पैटर्न पर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ चल रही हैं।

वे अपने खेत पर उगाए गए मसालों को तैयार करके गाँव-गाँव पहुँचा रहे हैं और उन किसानों को भी लाभ पहुँचा रहे हैं जो कच्चा माल अपने खेतों पर तैयार कर रहे हैं। वे हल्दी, मिर्च, जीरा, कच्चे आम, नींबू, आँवला आदि से मुरब्बा, अचार, सरसों से तेल, बेशन से नमकीन, आलू से चिप्स, दूध से पनीर, गुलाब जामुन, रसगुल्ला, मावा एवं अन्य मिठाई बनाने लगे हैं। इन उत्पादों के लिये वे 20 व्यक्तियों को अपने ट्यूबवेल पर रोजगार दिए हुए हैं और उनके प्रोडक्ट्स हाथों हाथ बिक रहे हैं। उनकी प्रतिमाह आय करीब 60 हजार रुपये के करीब है जिसमें वे प्रसन्न हैं और दूसरों को भी खेती के साथ-साथ खेत के कच्चे पदार्थों को तैयार माल बनाकर बेचने की सलाह दे रहे हैं। अजीत सिंह बताते हैं कि उनके खेतों में मसालों वाली फसलें जिनमें जीरा, धनिया, मिर्च, हल्दी आदि उगाई जा सकती हैं, उन्होंने ये उगाकर उन्हीं की मदद से अचार बनाया है। कच्चे आम शहर रेवाड़ी से लाकर मसाले अपने खेत के प्रयोग करते हैं। उन्होंने अचार बनाने की विधि भी बताई और तेल वाले अचार को लोगों का पसंदीदा खाद्य पदार्थ बताया। उन्होंने बताया कि हल्दी, मिर्च अगर उनके खेत में नहीं पैदा हुई तो दूसरे किसानों द्वारा पैदा किए हुए ये पदार्थ खरीदकर लाते हैं और उनके संयुक्त उपक्रम जो ढ़ाणा गाँव के पास बोहका है वहाँ से पिसवा लेते हैं।

किसान का कहना है कि दुर्भाग्य है कि आलू पर्याप्त मात्रा में पैदा होता है किंतु आलू की चिप्स बनाना किसान नहीं जानते जिसके चलते उनके आलू औने पौने दामों पर ही बिक पाते हैं। वे उन किसानों से आँवला लाते हैं जो पैदा करते हैं और उसे लाकर मुरब्बा बना रहे हैं। इस प्रकार मुरब्बा की भारी माँग हो रही है। एक वक्त था जब उनके पास डेयरी होती थी किंतु अब वे आस-पास के लोगों से दूध ला रहे हैं और उससे दूध से बनने वाले पदार्थ आधुनिक मशीनों से तैयार कर रहे हैं जिनमें रसगुल्ला, गुलाब जामुन, देशी घी, पनीर, मिठाइयाँ आदि बना रहे हैं। बेसन की सेल एक मिठाई भी बना रहे हैं जिसको लोग भूलते जा रहे हैं। वे प्रतिदिन पाँच क्विंटल दूध के विभिन्न पदार्थ बना रहे हैं।

मशीनें एवं यंत्र-उन्होंने रसगुल्ला, गुलाब जामुन, मावा तथा मिठाइयाँ बनाने वाली आधुनिक मशीनें भी खरीद ली हैं जिसको भाप के बायलर से चलाकर विभिन्न उत्पाद कम खर्च में तथा मानव के हाथों से बने पदार्थों की तुलना में अति बेहतर बनाकर नाम कमाया है। पाँच घंटों में उनकी मशीन एक क्विंटल दूध के रसगुल्ले वो भी एक व्यक्ति द्वारा ही तैयार कर लिये जाते हैं। बायलर भी महज मामूली ईंधन से अति दाब वाली भाप बना देता है जिससे सभी भट्टियाँ चलती हैं। अब तो किसान अजीत सिंह सभी उत्पाद बायलर की भाप से ही बना रहे हैं। रसगुल्ला बनाने की मशीन पंजाब से बनवाकर प्रयोग कर रहे हैं जो सफाई से काम करती है।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगपरंपरागत कृषि से लघु उद्योगपूरे हरियाणा के किसान उनके कृषि पर आधारित बेहतर कार्यों को देखने के लिये आते हैं। उनके पास कृषि अधिकारी आकर गदगद हो जाते हैं। यही कारण है कि अब प्रदेश स्तर से उनकी, ख्याति देशभर में जाने के लिये हिलोरे ले रही है।

भावी योजनाएँ-अजीत सिंह भविष्य में अपने आठ एकड़ भू-भाग पर अंगूर एवं अनार उगाना चाहते हैं। इसके लिये पूरी योजना बनकर तैयार हो चुकी है। उन्होंने बताया कि अंगूर के लिये लोहे के पोल लगाकर तार लगा दिए जाएँगे जिन पर अंगूर की बेल चढ़ पाएँगी और उनके नीचे कुकरबिटेसी कुल की सब्जियाँ जिनमें तोरई, लौकी आदि उगाई जा सकेंगी। काला गुलाब उगाया जाएगा जो अति महँगे एवं इत्र बनाने के काम आता है। ये लोहे के पोल व तार पौली हाउस का काम करेंगे।

वे दूसरे किसानों के लिये उदाहरण बन गए हैं जो कृषि से ही चिपके रहते हैं और आगे कोई विकास नहीं करते हैं। एलएलबी की पढ़ाई कर चुके अजीत सिंह के पिता चुरू में ‘लॉ’ के प्राचार्य थे जो अब स्वर्ग सिधार गए हैं। वहीं माता अनपढ़ हैं। उनकी पत्नी पोस्ट ग्रेजुएट और परिवार का पालन पोषण ढंग से कर रही हैं।

 

 

अल्प संसाधनों के चलते किसान गजराज ने कृषि को दी नई दिशा


कई बार अल्प संसाधन होते हुए भी कोई किसान अपनी मेहनत के बल पर ऐसा करिश्मा कर दिखलाता है जिसके चलते उनके पदचिन्हों पर अन्य किसान भी चलने को मजबूर हो जाते हैं। जिला महेंद्रगढ़ के यूँ तो कई किसान अपने अद्भुत मेहनत के बल पर नाम कमा चुके हैं किंतु कनीना उप-मंडल के गाँव मोड़ी का एक साधारण सा किसान अल्प संसाधनों के चलते न केवल जल संरक्षण में अहम भूमिका निभा रहा है अपितु आधुनिक खेती, जैविक कृषि, बागवानी, पशु पालन एवं सोलर ऊर्जा का उपयोग करके किसानों को अपनी बनाई राह पर चलने को मजबूर कर रहा है।दक्षिणी हरियाणा के जिला महेंद्रगढ़ में पानी की कमी होती जा रही है। विशेषकर भूमिगत जल कम-से-कम होता जा रहा है। नारनौल एवं नांगल चौधरी क्षेत्रों में जल इतना कम हो चला है कि डार्क जोन घोषित कर दिया गया है। कनीना क्षेत्र में किसानों का कहना है कि प्रतिवर्ष भूमिगत जल दस फुट नीचे जा रहा है। इस समस्या को कम करने के लिये किसान गजराज सिंह अपने पूरे आस-पास के क्षेत्र में जल संरक्षण, जल रिचार्ज, वर्षा का जल संरक्षण करके न केवल सिंचाई के लिये अपितु पेड़ पौधों के लिये पानी का प्रयोग करना सिखा रहे हैं। अपने स्तर पर जल स्टोर बना लिये हैं। गजराज सिंह ने बताया कि एक कृषि अधिकारी ने उनको यह विचार दिया। जब भूमिगत जल की कमी के विषय पर चर्चा हो रही थी तो उन्होंने भूमिगत जल को रिचार्ज करने की बात कही। गजराज सिंह ने उस दिन से ही जल को रिचार्ज करने की न केवल सोची अपितु अपनी ढाणी के लोगों को भी प्रेरित किया।

समस्त क्षेत्र के लोगों ने वर्षा के जल को संरक्षित रखने के लिये छत से पाइप धरती तक लगाकर उस जल को दो बड़े कुंडों में डालने की योजना को अमली जामा पहनाया। चार वर्षों से वर्षा के जल को संरक्षित कर रहे हैं। इस जल का उपयोग कृषि कार्यों में किया जा रहा है वहीं अधिक जल होने पर रिचार्ज बोर में पहुँचा दिया जाता है जिससे भूमिगत जल की आपूर्ति हो रही है।

कई बार कृषि क्षेत्र में सम्मान प्राप्त गजराज सिंह ने तत्पश्चात घरों से निकलने वाले जल को तथा पशुओं के लिये प्रयोग करते वक्त बहने वाले जल को नालियों द्वारा रिचार्ज बोर में पहुँचाया। इस प्रकार जल संरक्षण में एक समुदाय की स्थापना कर डाली है।किसान गजराज सिंह ने बताया कि जब उनके मन में वर्षा का जल तथा व्यर्थ बहने वाले जल का संरक्षण करने की योजना बनाई तो अपनी ढ़ाणी में करीब एक दर्जन परिवारों को बुलाकर उनकी सलाह ली। उन्होंने सभी को समझाया कि जब गंदा पानी अनावश्यक रूप से बहता रहता है तो रास्ता भी खराब हो जाता है और भूमिगत जल की भी कमी आ जाती है। उनकी बात को सभी ने स्वीकार कर लिया और अपने घरों की छतों से पाइप अपने-अपने खर्चे पर लगाकर एक बड़े नाले में डालकर उस जल को दो कुंडों तक ले जाया गया। इन दो कुंडों का निर्माण करीब सात हजार रुपये से कम की लागत से हो गया जिसमें एक बोर भी करवाना पड़ा है। सारा वर्षा का पानी एवं घरों से निकलने वाला गंदा जल भी इन्हीं कुंडों में चला जाता है। कुछ को भूमि सोख लेती है तो कुछ को पाइपों द्वारा खेतों तक ले जाया गया है। अधिक पानी रिचार्ज बोर से भूमि में चला जाता है।

गजराज सिंह किसान ने बताया कि इस रिचार्ज बोर से कई लाभ प्राप्त हुए हैं। इस बोर के पास ही एक डीप बोर करवाया गया जिसका पानी अधिक ऊँचाई पर होने के अलावा अन्य ट्यूबवेलों की अपेक्षा अलग ही प्रकृति का है। कुंडों का जल पौधों एवं सब्जी के लिये भी उत्तम है यही कारण है कि वे लगाए जाने वाले पौधों में वर्षा का स्टोर किया हुआ जल ही प्रयोग करते हैं। इससे पौधों की बढ़ोत्तरी अधिक होती है।इस प्रकार एक पूरा परिवार ही नहीं अपितु एक ढ़ाणी के सभी लोग बारिश का पानी न केवल फसल की सिंचाई में काम ले रहे हैं अपितु वाटर रिचार्ज करके भी जनहित के काम में लगे हुए हैं।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगइस ढ़ाणी के लोगों को यह नेक सलाह कृषि विभाग के एक अधिकारी ने दी और इस ढ़ाणी के एक जन ने सभी को पानी की बचत करने की सलाह देकर न केवल घरों का गंदा जल रिचार्ज करने का मन बनाया अपितु बारिश का समस्त छतों का जल सिंचाई के काम में लेने तथा उसे स्टोर करने का मन बनाया। यह कहानी मोड़ी गाँव की एक ढ़ाणी धौला कुआँ के लोगों की है।

इस ढ़ाणी के पूर्व सरपंच गजराज सिंह को करीब चार वर्ष पूर्व कृषि अधिकारी एएससीओ से भेंट हुई थी जिन्होंने बताया कि पानी का दोहन यूँ ही होता रहा तो आने वाले समय में पानी की भयंकर किल्लत खड़ी हो जाएगी। इसके लिये उन्होंने रेन वाटर स्टोरेज एवं उस जल से सिंचाई करने तथा घरों से निकलने वाले गंदे जल से भूमिगत जल को रिचार्ज करने की सलाह दी। यह सलाह किसान एवं पूर्व सरपंच गजराज सिंह को इतनी अधिक प्रभावित कर गई कि उन्होंने समस्त ढ़ाणी के लोगों को मिल बैठकर छतों का बारिश से बहने वाला जल दो कुंडों में इकट्ठा करने की सलाह दी और सभी प्रसन्न हुए।

किसान गजराज के रिचार्ज बोर से करीब एक हजार लीटर जल प्रतिदिन भूमि में चला जाता है। सभी ढ़ाणी के किसानों ने अपने घरों की छतों को साफ करवा रखा है जिसके चलते वर्षा का समस्त जल पाइपों से होकर कुंडों में चला जाता है जो या तो फसल के काम आता है या फिर रिचार्ज बोर से जल संरक्षण का कारण बनता है। पानी को बचाने के लिये तथा कम खर्च में बेहतर पैदावार लेने के लिये गजराज सिंह ने जीरो टिलेज बिजाई करना सीखा। इस विधि को तपड़ बिजाई नाम से भी जाना जाता है 15 एकड़ के मालिक गजराज सिंह ने पूरे खेत में हल न चलाकर सीधी ही एक फसल कटाई के बाद दूसरी फसल उगा डाली। इस प्रकार उन्होंने बेहतर पैदावार लेकर विशेषकर कपास की फसल पर सीधे ही गेहूँ की फसल लेने का रिकॉर्ड कायम किया है किसान ने बताया कि इस विधि से करीब दो हजार रुपए प्रति एकड़ की बचत कर दिखाई है।

कृषि अधिकारी तपड़ सिंचाई के बारे में बताते हैं कि जब एक फसल खेत में खड़ी है और दूसरी फसल तुरंत लेनी है तो इसी विधि का उपयोग किया जाता है। एक सामान्य खेत में एक फसल हटाने के बाद खेत की अच्छे ढंग से जुताई की जाती है और बार-बार जुताई के बाद ही खेत में बीज बोया जाता है किंतु तपड़ सिंचाई में सीधे ही एक फसल काटकर दूसरी फसल के बीज बो दिए जाते हैं। देखने एवं सोचने में तो फसल पैदावार कम होती नजर आती है किंतु ज्यों-ज्यों फसल बड़ी होती है खेत में बेहतर पैदावार के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। अंत में रिजल्ट बहुत बेहतर आता है। इससे मेहनत एवं धन के अलावा समय की भी बचत होती है।

भूमिगत पानी की कमी के चलते उन्होंने बागवानी करना एवं आवश्यकता अनुसार फसल को पानी देने के लिये ड्रिप सिंचाई योजना को अपनाया। अपने लगभग सभी खेतों में ड्रिप सिंचाई योजना का प्रयोग किया हुआ है। चूँकि कई बार फसल में कीड़े आदि का प्रकोप आ जाता है और पानी में किसी दवा का छिड़काव करने की जरूरत होती है, ऐसे में सीधी पाइप लाइनों के साथ दवा मिक्चर यंत्र लगवा रखे हैं। पाइपों से बहते पानी में ही दवा मिला दी जाती है जो पूरे खेत तक पहुँच जाती है।

कृषि के साथ-साथ बागवानी क्षेत्र को भी अपनाया है। किसान गजराज सिंह ने अपने एक एकड़ खेत में किन्नू तथा आधा एकड़ भू भाग पर अमरूद का बाग लगा रखा है जो अगले वर्ष तक पैदावार देने लग जाएँगे। खेतों में पपीता की बेहतर फसल लगाकर नाम कमाया है। खेतों में जहाँ समय-समय पर सब्जी उगाकर न केवल अपने आस-पास को बेहतर दर्जे के बिना खाद एवं दवाओं की सब्जी दी है अपितु टमाटर, भिंडी, बैंगन, मिर्च, पेठा, लौकी, पपीता, प्याज एवं कई अन्य सब्जियों की नर्सरी बनाकर उनको बेचकर 30 से 40 हजार रुपए प्रति वर्ष आय प्राप्त की है। सब्जियों को बाजार में बेचकर एक लाख रुपए तक आय प्राप्त की है। किसान गजराज सिंह बरसीम, जौ, जई, कासनी आदि के बीज बनाकर भी बेच देते हैं। जिससे उन्हें आय मिल रही है। गर्मी एवं सर्दी दोनों ही ऋतुओं में पशु चारे के बीच बनाकर आय करते आ रहे हैं। गजराज सिंह ने एक एकड़ भू भाग पर जैविक खेती की है। इस खेती के तहत बिना उर्वरक के केवल कम्पोस्ट खाद डालकर तथा रासायनिक जहरीली दवाओं के स्थान पर स्वयं पेड़-पौधों से तैयार दवा अमृत रस का छिड़काव कर नाम कमाया है। खेतों पर मेथी, लहसुन, प्याज, फूलदार, पौधे, दलहन जाति के पौधे तथा बेर आदि की काश्त की हुई है।

परंपरागत कृषि से लघु उद्योगपरंपरागत कृषि से लघु उद्योगगजराज सिंह ने इसके बाद महसूस किया कि खेती के साथ-साथ पशुधन का भी अहम योगदान होता है। ऐसे में गजराज सिंह ने अपने घर के लिये तथा दूध बेचने के लिये न केवल मुर्रा नस्ल की भैंसें खरीद ली अपितु साहिवाल नस्ल की गायें भी खरीद ली जिनके दूध को भी बेचा गया। दूध से किसान ने करीब 70 हजार रुपये सालाना लाभ कमाया है। पशुओं से एक नहीं अपितु कई लाभ कमाए हैं। पशुओं के गोबर को जहाँ खाद में बदला गया वहीं गोबर गैस प्लांट पूरे क्षेत्र में स्थापित करवा दिए गए। गोबर की सहायता से गोबर गैस प्लांट में गोबर गैस बनाई गई जिससे घर में पाँच सदस्यों के लिये खाना आदि आसानी से बनाया जाने लगा। गोबर गैस प्लांट से निकली स्लरी का उपयोग न केवल केंचुआ खाद बनाने में अपितु उत्तम खाद बनाने में प्रयोग किया जाने लगा। किसान गजराज सिंह बताते हैं कि उन्होंने गोबर गैस प्लांट लगाया है तभी से बेहतर गैस, बेहतर खाद एवं स्वास्थ्य रक्षा प्राप्त हुई है। कुकिंग गैस सिलेंडर पर जो धन खर्च होना था वो बचने लगा है। आपातकाल के लिये ही कुकिंग सिलेंडर ला रखा है। उन्होंने बताया कि गोबर गैस प्लांट की स्लरी से जो गोबर बाहर निकलता है उसमें केंचुआ बेहतर तरीके से पनपता है और उत्तम कम्पोस्ट खाद का निर्माण करता है।

खेतों में बेहतर कम्पोस्ट खाद से पशु चारा उगाकर पशुओं के लिये हरे चारे की पूर्ति की गई। विभिन्न समय में विभिन्न पशुचारा उगाकर पशुओं का पेट भी भरने लगे। चरी, बरसीम कासनी आदि हरे चारे किसान गजराज सिंह अपने खेतों में उगा रहे हैं। गजराज सिंह ने अपने खेतों में दलहन जाति के पौधे उगाकर फसल चक्रण विधि का उपयोग किया है वहीं फूलों की बेहतर खेती की है किंतु उन्होंने ये फूल बाजार तक नहीं बेचे हैं। उनके घर के आस-पास गुलाब के बहुत सुंदर फूल खिले हुए हैं।

आज के दिन परम्परागत ऊर्जा के स्थान पर आधुनिक ऊर्जा के स्रोत अपनाए जाने लगे हैं। किसान गजराज सिंह भी इस मसले में अग्रणी रहे हैं। सभी परिवारों को सोलर प्लेट दिलवा दी हैं जिनसे घर की सीएफएल तक जलाकर परम्परागत बिजली स्रोतों की माँग को कम किया है।

किसान गजराज सिंह का कहना है कि बागवानी से दो वर्षों के बाद अच्छी आय प्राप्त होगी वहीं पशुधन भी अच्छी आय के स्रोत बने हुए हैं। किसान गजराज सिंह द्वारा जो परिपाटी चलाई गई है उसका दूसरे किसान भी प्रयोग करने लगे हैं। किसान गजराज सिंह न केवल कृषि विभाग से हर प्रकार की सलाह ले रहे हैं अपितु किसानों के लिये आयोजित की जाने वाली हर प्रकार की किसान गोष्ठियों में जाकर ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। खेती करने के लिये परम्परागत यंत्रों के स्थान पर ट्रैक्टर से ही बिजाई की जाती है।

किसान गजराज सिंह ने अपने खेत को प्रयोगशाला का रूप दे दिया है और जल संरक्षण पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। उनका कहना है कि जल ही जीवन है और जल की बचत नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ी जल के अभाव में दम तोड़ने को मजबूर हो जाएगी।

किसान गजराज सिंह वर्ष 1990 से लगातार खेती करते आ रहे हैं और नए प्रयोग करने के लिये उतावले नजर आते हैं। घर में पढ़ा लिखा परिवार होने के कारण परिवार को समझाना आसान रहता है। उनका मानना है कि हर घर एवं हर किसान को इस विधि से जल का संरक्षण करना चाहिए ताकि पानी की कमी एवं अनावश्यक खर्च को बचाया जा सके। किसान उनकी योजना से प्रसन्न हैं।

सम्पर्क करें :
होशियार सिंह
मोहल्ला-मोदीका, कनीना-123027, जिला-महेंद्रगढ़ (हरियाणा), मो.नं.-9416348400

 

 

 

 

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