तालाब जल की गुणवत्ता एवं जल-जन्य बीमारियाँ (Pond water quality and water borne diseases)

Submitted by Hindi on Sat, 05/06/2017 - 11:42
Source
रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन, (Geographical studies of ponds in the rural areas of Raipur district) शोध-प्रबंध (2006)

 

तालाब जल की गुणवत्ता


प्राचीन समय से लेकर आज तक शुद्ध जल की खोज मानव द्वारा किया जाता रहा है। मानव के स्वास्थ्य के लिये शुद्ध जल की अनिवार्यता के प्रभाव की आवश्यकता है। शुद्ध जल की गुणवत्ता के स्तर को प्रभावित करने के लिये वैज्ञानिकों एवं शासन-स्तर पर मानकों का निर्धारण किया गया है। इन मानकों में जल में बैक्टीरिया की सीमा, कीटाणुओं की मात्रा, तथा रासायनिक एवं भौतिक गुणों को शामिल किया जाता है। इन मानकों को निर्धारित करने के पीछे मनुष्य के स्वास्थ्य को अच्छा रखने तथा प्रदूषणों से बचाने के लिये प्रमुख है। यद्यपि तालाबों के पानी का पेयजल के लिये बहुत कम उपयोग होता है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में भोजन बनाने के लिये अथवा अन्य घरेलू उपयोग में कुछ न कुछ मात्रा में तालाब जल का उपयोग किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शुद्ध जल के लिये विशेष मानक निर्धारित किए हैं। यद्यपि ये मानक यूरोप के लिये है, फिर भी मानव स्वास्थ्य के लिये इन मानकों को भारतीय शासन ने भी स्वीकार किया है। भारत में मेडिकल काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने पेयजल एवं उपलब्ध जल की गुणवत्ता के लिये मानकों का निर्धारण किया है। इन मानकों को निम्नांकित सारणी 7.1 में स्पष्ट किया गया है।

 

 

 

 

 

 

सारणी 7.1

जल की गुणवत्ता के रासायनिक एवं भौतिक मानक

अपद्रव्य (substance)

उच्च निर्धारित स्तर मि.ग्रा/लीटर

कुल घुलनशील ठोस द्रव्य (Total Solids)

500 मिली. ग्राम/लिटर

कम कठोरता (Total Hardness)

2 मी. बैक्टीरिया/लीटर

पी. एच. सीमा (P.H. Range)

7.0-8.5

कैल्शियम (Calcium (ca))

75 मिग्रा. लीटर

मैग्नीशियम (Magnesium(mg) )

30 मिग्रा. लीटर

क्लोराइड

(Chloride(cl)) 200 मिग्रा. लीटर

सोडियम

(Sodium (na)) 500-1000 मिग्रा. लीटर

पोटैशियम (Potasium)

500-1000 मिग्रा. लीटर

कोलीफॉर्म बैक्टीरिया (coliform Bacteria)

10 मी./10,000 मिमी.

बी. कोलाई बैक्टीरिया (B. Coli Bacteria)

शून्य से 100 मिमी.

 

तालाब जल की गुणवत्ता को ज्ञात करने के लिये तालाबों से जल का 1 लीटर वाले प्लास्टिक डिब्बे में नमूना इकट्ठा करके विश्वविद्यालय के रसायनशास्त्र विभाग के प्रयोगशाला में परीक्षण कराया गया। इन तालाबों के जल के रंगों में अलग-अलग मौसम में परिवर्तन होता है। इन परिवर्तनों को व्यक्तिगत सर्वेक्षण के समय निरीक्षण किया गया तथा उक्त परिणामों को छत्तीसगढ़ राज्य के पर्यावरण प्रदूषण परिषद से प्राप्त आंकड़ों के द्वारा सत्यापित करने का प्रयास किया गया है। तालाबों के जल का पीने के लिये कम उपयोग जाता है, फिर भी जल के नमूने लेकर कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की गणना विश्वविद्यालय के जैविकी अध्ययनशाला के प्रयोगशाला में कराया गया। लगभग 60 तालाबों के पानी का परीक्षण किया गया।
 

तालाब जल का रासायनिक विश्लेषण


शुद्ध जल में बाह्य तत्वों के घुलनशील प्रति इकाई मात्रा के आधार पर जल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जल का पी.एच. मान का संबंध अम्लता (acidity) के साथ क्षारीयता (alkalinity) के संबंध को बतलाता है। जल के रासायनिक विश्लेषणों के मान के आधार पर निम्नलिखित विवरण प्राप्त हुए हैं।

 

 

घुलनशील ठोस तत्व (Total Dissolved Solids)


जल में घुलनशील ठोस द्रव्यों का मान जल को वाष्पीकृत करने के बाद बचे हुए तत्वों के वजन करने से प्राप्त होता है। विभिन्न प्रकार के खनिजों को पी.पी.एम. में मापा लिया जाता है। Gorell 1958, 2513 hamill and bell 1986, 128 जल में 1000 पी.पी.एम. मान को शुद्ध जल के अंतर्गत रखा जाता है। 1000 से 10,000 पी.पी.एम. मान वाले जल ब्रेकिथ वाटर के अंतर्गत रखा जाता है। Dawis and Dewst 1986, 100 ने यह स्पष्ट किया है कि अधिकांशतः घरेलू और औद्योगिक जल में 1000 पी.पी.एम. से कम घुलनशील ठोस तत्व होना चाहिए तथा कृषि-कार्यों में यह मात्रा 3000 पी.पी.एम. से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के अनुसार किसी भी प्रकार के उपयोगी जल में घुलनशील ठोस द्रव्यों की मात्रा 500 पी.पी.एम. से अधिक नहीं होना चाहिए।

रायपुर जिले में घुलनशील ठोस द्रव्यों की मात्रा 115.2 पी.पी.एम. खरोरा, गुढियारी, तिल्दा विकासखंड से लेकर 1920 पी.पी.एम. मडवा, कसडोल, विकासखंड तक उपलब्ध है। कुल 60 परिमाणों में 20 नमूनों में पी.पी.एम. की मात्रा 500 से 1000 तक तथा 11 नमूनों में 1000 पी.पी.एम. से अधिक पाये गये। अर्थात 18 प्रतिशत तालाबों का पानी पीने योग्य नहीं है। शेष नमूनों में ठोस घुलनशील द्रव्यों की मात्रा 500 पी.पी.एम. से कम है।

 

 

 

 

जल की कठोरता


जल की कठोरता से तात्पर्य साबुन के साथ पानी की प्रतिक्रिया से है। इसका प्रमुख कारण कैल्शियम और मैग्नीशियम की मात्रा है, जो अन्य क्षारीय धातुओं के साथ अम्लीय प्रतिक्रिया करती है। जल की कठोरता का माप कैल्शियम ग्राम प्रति लीटर के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। कठोरता की मात्रा निम्नांकित सारणी से ज्ञात किया जाता है।(Sawyer and Mc)

 

 

 

 

 

 

 

सारणी 7.2

जल की कठोरता

वितरण

कठोरता (मि./लीटर)

मृद जल soft

75 से कम

हल्का कठोर जल

75-150

कठोर जल

150 -300

अत्यंत कठोर जल

300 से अधिक

 

सामान्यतः घरेलू उपयोग के लिये जल की कठोरता की सीमा 100 पी.पी.एम. ग्राम/लीटर से नीचे होना चाहिए। रायपुर जिले में जल की कठोरता 40 पी.पी.एम. पर (अभनपुर विकासखंड) और निमोरा राजिम विकासखंड के नमूनों से प्राप्त हुआ है। समस्त नमूनों में से सिर्फ 8 पानी के नमूनों में से कठोरता निर्धारित सीमा 100 पी.पी.एम. के अंदर प्राप्त हुआ है, शेष नमूनों में पानी की कठोरता 100 पी.पी.एम. से अधिक है। इसका कारण रायपुर जिले के खारुन-महानदी-दोआब का अधिकांश भाग चूने के पत्थरों से निर्मित है। रायपुर उच्चभूमि में जल की कठोरता सीमा के अंदर है।
 

जल में अम्लता एवं क्षारीयता (पी.एच.)


पी.एच. मान जल में अम्लता एवं क्षारीयता की मात्रा को प्रदर्शित करता है। अगर. पी.एच. मान 7 से नीचे है, तो अम्लता की अधिकता एवं पी.एच. मान में कमी को स्पष्ट करता है तथा अगर पी.एच. मान 7 से अधिक है, तो जल में क्षारीयता की अधिकता का द्योतक होता है। गर्ग 1982, 249 पेयजल उपयोग के लिये जल का पी.एच. मान 7 से 8.5 के मध्य होना चाहिए। सिंचाई उपयोग के लिये जल का पीएच मान 5.5 से 9 तक हो सकता है।

रायपुर जिले में जल का पी.एच. मान 7 से 9.4 के मध्य है। 8.5 पी. एच. मान वाले नमूनों की मात्रा 12 है। इनमें से सिर्फ 2 नमूनों की पी.एच. मान 9 है। उक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि जिले में तालाबों का पानी सिंचाई के लिये उपयुक्त है तथा कहीं-कहीं पेयजल के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

 

 

घुलनशील यौगिक (Substance)


जल में घुले हुए विभिन्न प्रकार के खनिजों की मात्रा जल के विभिन्न उपयोगों को निर्धारित करते हैं। जल में खनिजों की मात्रा एक निश्चित अनुपात में मिलती है डेविस डी वेस्ट 1966, महत्त्वपूर्ण खनिज का विवरण निर्माणाधीन है।

 

 

 

 

कैल्शियम और मैग्नीशियम


पेयजल उपयोग के लिये जल में कैल्शियम 10 से 100 पी.पी.एम. के मध्य होना चाहिए। इस सीमा तक कैल्शियम की मात्रा मानव एवं पशुओं के स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं पहुँचाती है, डेविस डी. वेस्ट के अनुसार (1966-103)। लेकिन बहुसंख्यक लोगों की मान्यता है कि कैल्शियम की अधिक मात्रा किडनी को तथा मनुष्य के पाचन तंत्र को प्रभावित करती है। यद्यपि इस तथ्य का कोई सत्यापित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। रायपुर जिले के जल में कैल्शियम की मात्रा 20 से 96 पी.पी.एम. तक मिलती है। यह नियंत्रित सीमा के अंतर्गत है।

मैग्नीशियम आग्नेय चट्टानों के मध्य उपलब्ध होने वाला यौगिक है। कैल्शियम के साथ मिलकर मैग्नीशियम जल की कठोरता का कारक बनता है। (गर्ग 1982-251)। जल में मैग्नीशियम की निर्धारित मात्रा 0 से 150 पी.पी.एम. तक सही मानी गयी है। रायपुर जिले में जल के नमूनों की विश्लेषण में मैग्नीशियम की मात्रा 9 से 107 पी.पी.एम. तक पायी गयी है, जोकि निर्धारित मात्रा के भीतर है।

क्लोराइड - रायपुर जिले में क्लोराइड की निर्धारित मात्रा 200 पी.पी.एम. से कम ही पायी गयी है। विभिन्न स्थानिक विश्लेषण में 15 पी.पी.एम. से लेकर 185 पी.पी.एम तक क्लोराइड जल में पायी गयी है।

 

 

 

 

सोडियम एवं पोटेशियम


सोडियम एवं पोटैशियम क्षारीय तत्व होते हैं, जोकि जल के साथ मिलते हैं। जिले में उपलब्ध शैल संस्तरों में ये दोनों ही तत्व निर्धारित सीमा के अंतर्गत पाए जाते हैं।

 

 

 

 

तालाब जल का (बैक्टीरिया) विश्लेषण


रायपुर जिले में तालाबों के जल का बैक्टीरिया-विश्लेषण जल-जन्य बीमारियों के संदर्भ में किया गया है। जिले में तालाब जल का पेयजल के रूप में कम उपयोग किया जाता है। लगभग 89 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जल का उपयोग हैण्डपंप के द्वारा किया जा रहा है। चूँकि तालाब जल का अन्य घरेलू उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाता है। इसलिये किसी न किसी रूप में तालाब जल के उपयोग के फलस्वरूप ग्रामीण स्वास्थ्य प्रभावित होता है। ग्रामीण जल में मिलने वाले बैक्टीरिया में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया सबसे मध्य पहचाना बैक्टीरिया है तथा यह जल-जन्य रोगों का सबसे बड़ा वाहक है। कोलीफॉर्म जीवाणु तंत्र को जल जन्य बीमारियों के पहचान के लिये एक मानक के तौर पर रखा गया है क्योंकि यह जब संक्रमण का कारक चाहे वह पानी के प्रदूषण के साथ ही क्यों न हो (राव एवं व्ही. प्रहालद 1968, 21)। उक्त कारकों को निम्नांकित वाक्यों से स्पष्ट किया जा सकता है।

(1) कोलीफॉर्म जीवाणु-तंत्र मनुष्य के पाचन-संस्थान में असंख्य मात्रा में पाये जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य के पाचन-संस्थान में इनकी संख्या 200 से 400 करोड़ प्रतिदिन निष्कासित करता है। यह पेयजल के साथ मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होता है। अतः इसे जल प्रदूषण का प्रमुख कारक माना जाता है।

(2) इस जीवाणु को प्रयोगशाला में आसानी से पहचाना जा सकता है, यद्यपि इन जीवाणुओं की संख्या को ज्ञात करने की विधि में समय अधिक लगता है।

(3) ये अन्य जीवाणु की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहते हैं।

(4) ये अन्य जीवाणुओं की तुलना में जल में शुद्धिकरण के पश्चात भी इनका अस्तित्व मिलता है।

कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के पहचान के लिये तालाबों में जल के 49 नमूने लेकर जीवविज्ञान प्रयोगशाला में परीक्षण किया गया। ये नमूने उन तालाबों में से लिये गए जोकि निस्तार के उपयोग के लिये ग्राम पंचायतों द्वारा चिन्हांकित किए गए हैं तथा प्रत्येक 100 मिली. जल में इनकी अधिकतम मानक संख्या को ज्ञात किया गया है।

ग्रामीण तालाबों में कोलीफॉर्म जीवाणु की न्यूनतम संख्या 228/100 मि.ली. ग्राम पुन्दा विकासखंड धरसीवां से लेकर 634/100 मि.ली. पेन्ड्रावन विकासखंड बिलाईगढ़ तक पाये गये हैं। तालाब के जल में कोलीफॉर्म्ड जीवाणु में विकासखंड के अनुसार विश्लेषण में न्यूनतम कोलीफॉर्म की मात्रा देवभोग एवं मैनपुर विकासखंड के तालाबों में उपलब्ध हुआ है। इन विकासखंडों में 278/100 मि.ली. कोलीफॉर्म की अधिकतम संख्या है। द्वितीय उच्च कोटि क्रम में छुरा एवं आरंग विकासखंड आते हैं। यहाँ कुल जल के नमूनों में 334/100 मिली. कोलीफॉर्म की उपलब्धता मिट्टी है। तृतीय उच्च कोटिक्रम में कसडोल, बलौदाबाजार, पलारी एवं अभनपुर विकासखण्ड में हैं जहाँ 399/100 मिली. कोलीफॉर्म की मात्रा है। चतुर्थ उच्चकोटि क्रम के अन्तर्गत आरंग एवं भाटापारा विकासखंड है। जहाँ कोलीफॉर्म की गिनती अधिकतम 550/100 मि.ली. संख्या तथा उच्चतम कोलीफॉर्म-जीवाणु बिलाईगढ़ विकासखंड में 634/100 मि.ली. प्राप्त हुई है।

उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जिले में किसी भी तालाब का पानी कोलीफॉर्म मुक्त नहीं है। कोलीफॉर्म जीवाणुओं की कम या अधिक मात्रा स्थानीय पारिस्थितिकी पर निर्भर है। सामान्यतः ग्रीष्मकाल के अंतिम चरण में कोलीफॉर्म तथा अन्य जीवाणुओं के परिणामस्वरूप जल-जन्य बीमारियाँ अधिक होती हैं।

 

 

 

 

तालाब के जल की गुणवत्ता में सामयिक परिवर्तन


व्यक्तिगत सर्वेक्षण से तालाबों के जल में मौसम अनुसार परिवर्तन दृष्टिगत हुआ है। वर्षा के मौसम में तालाबों का जल मृदा युक्त होता है तथा मृदा के रंग के अनुसार ही जल का रंग भी दृष्टिगत होता है। शीत ऋतु में घुलनशील तत्वों के तलछटी में बैठ जाने से जल का प्राकृतिक रंग दृष्टिगत होता है। तथा पुनः ग्रीष्म में वाष्पीकरण, मानव उपयोग और दूषित पदार्थों की मात्रा अधिक होने के कारण जल के रंगों में पुनः परिवर्तन दिखाई देता है। यद्यपि तालाब-जल के रासायनिक परीक्षण के आंकड़े प्रस्तुत हैं, तथापि व्यक्तिगत सर्वेक्षण से प्राप्त तथा ग्रामीणों से वार्तालाप के पश्चात तालाबों में जल की गुणवत्ता ग्रामीण दृष्टिकोण से प्राप्त की गयी है, जो निम्नांकित सारणी से स्पष्ट है।

 

 

 

 

 

 

 

सारणी 7.3

चयनित तालाबों में जल की गुणवत्ता

क्र.

विकासखंड

चयनित ग्रामों की संख्या

चयनित तालाबों की संख्या

तालाब जल की गुणवत्ता

अच्छा

प्रतिशत

साधारण

प्रतिशत

खराब

प्रतिशत

1.

आरंग

05

29

04

1.40

21

7.37

04

1.40

2.

अभनपुर

05

24

03

1.05

20

7.02

01

0.35

3.

बलौदाबाजार

04

21

12

4.21

10

3.51

02

0.70

4.

भाटापारा

04

33

10

3.51

20

7.02

03

1.05

5.

बिलाईगढ़

04

24

02

0.70

18

6.31

04

1.40

6.

छुरा

04

21

08

2.81

12

4.21

01

0.35

7.

देवभोग

04

18

10

3.51

06

2.10

02

0.70

8.

धरसीवां

04

20

12

4.21

07

2.46

01

0.35

9.

गरियाबंद

04

21

09

3.16

10

3.51

02

0.70

10.

कसडोल

04

17

04

1.40

11

3.86

01

0.30

11.

मैनपुर

04

20

05

1.75

15

5.26

-

-

12.

पलारी

04

14

05

1.75

08

2.80

01

0.35

13.

राजिम

02

06

01

0.35

03

1.05

02

0.70

14.

सिमगा

02

06

02

0.70

03

1.05

-

-

15.

तिल्दा

03

11

03

1.05

05

1.75

02

0.70

योग

57

285

90

31.58

169

59.30

26

9.12

स्रोत: व्यक्तिगत सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त आंकड़ा।

 

उपरोक्त सारणी 7.3 से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित 57 ग्रामों में से चयनित 285 तालाबों में जल की गुणवत्ता क्रमानुसार है, जिसमें साधारण जल वाले तालाबों की संख्या चयनित तालाबों में से 169 (59.30 प्रतिशत), अच्छा जल वाले तालाबों की संख्या 90 (31.58 प्रतिशत) एवं खराब जल वाले तालाबों की संख्या 26 (9.12 प्रतिशत) पाये गये हैं। जिनमें सर्वाधिक मात्रा में साधारण (+) जल वाले तालाब एवं न्यूनतम खराब (-) जल वाले तालाब हैं। साथ ही उत्तम (+++) जल वाले तालाब अध्ययन क्षेत्र में एक भी नहीं पाये गये। जिले में अलग-अलग गुणवत्ता वाले तालाबों को इस प्रकार विश्लेषित किया जा सकता है। चयनित 285 तालाबों में से अच्छा जल वाले तालाबों की संख्या 90 (31.58 प्रतिशत) पाये गये हैं। अच्छा जल वाले तालाबों में चट्टानी क्षेत्रों में निर्मित तालाब एवं मटासी कन्हार में निर्मित तालाबों का जल इस गुणवत्ता के अंर्तगत लिया गया है। इस गुणवत्ता के सर्वाधिक तालाब बलौदाबाजार, भाटापारा, छुरा, देवभोग, धरसीवां, गरियाबंद, विकासखंड अंतर्गत तालाबों की संख्या 61 (21.40 प्रतिशत) आरंग, अभनपुर, कसडोल, मैनपुर, पलारी, तिल्दा विकासखंड अंतर्गत 24 (8.42 प्रतिशत), एवं न्यूनतम बिलाईगढ़, राजिम, एवं सिमगा विकासखंड अंतर्गत 05 (1.75 प्रतिशत) तालाब है।

पूनर्भरणाने भूजलात वाढसाधारण (+) जल वाले तालाबों में उन तालाबों को लिया गया है, जिनमें तालाबों के जल का रंग हल्का मटमैला है, लेकिन उपयोगीपूर्ण है, साथ ही धरातलीय मिट्टी मटासी एवं भाठा दोनों तरह से हैं। अध्ययन क्षेत्र में इस गुणवत्ता के अंतर्गत सर्वाधिक तालाब आरंग, अभनपुर, भाटापारा एवं बिलाईगढ़ विकासखंड अंतर्गत चयनित तालाबों में से 79 (27.72 प्रतिशत) मध्यम बलौदाबाजार, देवभोग, धरसीवां, गरियाबंद, कसडोल, मैनपुर, पलारी, राजिम, सिमगा, तिल्दा विकासखंड अंतर्गत 63 (22.10 प्रतिशत) एवं न्यूनतम छुरा, मैनपुर विकासखंड अंतर्गत 27 (9.47 प्रतिशत) तालाबों के जल की गुणवत्ता साधारण है।

इसके अंतर्गत उन तालाबों को लिया गया है, जिन तालाबों में जल का रंग काई रंग के समान होते हैं। तथा ये मानव उपयोगी नहीं होते, साथ ही उन तालाबों को भी लिया गया है, जिन तालाबों में जल पूर्णतः मटमैला होता है, साथ ही इनके उपयोग से विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जैसे- खुजली, फोड़ा आदि होते हैं। इस प्रकार के तालाब अध्ययन क्षेत्र के आरंग, अभनपुर, बलौदाबाजार, भाटापारा, बिलाईगढ़, छुरा, देवभोग, धरसीवां, गरियाबंद, कसडोल, पलारी, राजिम, तिल्दा, अंतर्गत पाये गये हैं एवं मैनपुर सिमगा, विकासखंड अंतर्गत इस गुणवत्ता के एक भी तालाब नहीं हैं अध्ययन क्षेत्र में चयनित तालाबों में उत्तम गुणवत्ता के अंतर्गत एक भी तालाब नहीं पाये गये हैं, क्योंकि वर्तमान में तालाब जल मानव जीवन के लिये उपयोगीपूर्ण तो हैं, लेकिन जल पूर्णतः प्रदूषण युक्त हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इन जल का उपयोग नहाने-धोने एवं अन्य कार्यों में करते हैं। अतः इस गुणवत्ता के अंतर्गत एक भी तालाब नहीं है। अतः व्यक्तिगत निरीक्षण से तालाबों के जल की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

1. मनुष्यों द्वारा तालाब किनारे और आस-पास मल-मूत्र त्याग करना। बारिश होते ही ये दूषित पदार्थ घुलकर तालाब जल को संदूषित कर देते हैं।

2. पालतू पशुओं को इन तालाबों में नहलाना, नाहते समय ये पशु तालाब में ही मल-मूत्र त्याग कर देते हैं, जिसमें जल दूषित होता है।

3. तालाब जल में कपड़ों को धोना।

4. मनुष्यों द्वारा तालाब जल में स्नान करना तथा बर्तन धोना।

5. शौच क्रिया के पश्चात तालाब जल से शरीर साफ करना।

6. गाँव के गंदा पानी का तालाब जल में मिलना।

7. आस-पास के वृक्षों के पत्तों का तालाब जल में मिलकर सड़ना गलना तथा प्रदूषित करना।

8. पूजा एवं त्योहारों के फूल एवं मूर्तियों का विसर्जन, इत्यादि तालाब जल को प्रदूषित कर जाती है।
 

जल के अन्य स्रोत


तालाबों के अतिरिक्त स्वच्छ जल आपूर्ति हेतु विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा हैंडपम्पों का निर्माण किया गया है। उपलब्ध कुँओं के पानी का संवर्द्धन किया जाता है अर्थात भूमिगत जल का उपयोग बढ़ाया गया है। छत्तीसगढ़ शासन में इंदिरा गंगा गाँव जल योजना के तहत तालाबों को ग्रीष्म कालीन जल आपूर्ति हेतु नलकूप के माध्यम से करने का कार्य प्रारंभ किया है। उक्त योजनाओं के तहत अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध जल-स्रोतों का विवरण निम्नानुसार है जिसे सारणी 7.4 में प्रस्तुत किया गया है-

 

 

 

 

 

सारणी 7.4

चयनित ग्रामीण क्षेत्रों के जलस्रोत

क्र.

विकासखंड

चयनित ग्रामों की संख्या

तालाबों की संख्या

चयनित ग्रामीण क्षेत्रों के जलस्रोत

कुआँ

प्रतिशत

हैंडपम्प

प्रतिशत

टयूबबेल

प्रतिशत

1.

आरंग

05

29

80

11.14

20

6.04

15

6.33

2.

अभनपुर

05

24

60

8.36

18

5.44

18

7.59

3.

बलौदाबाजार

04

21

55

7.66

15

4.53

20

8.44

4.

भाटापारा

04

33

63

8.77

33

9.97

28

11.81

5.

बिलाईगढ़

04

24

47

6.54

31

9.36

12

5.06

6.

छुरा

04

21

55

7.66

25

7.55

15

6.33

7.

देवभोग

04

18

30

4.18

23

6.95

22

9.28

8.

धरसीवां

04

20

62

8.63

28

8.46

17

7.17

9.

गरियाबंद

04

21

52

7.24

20

6.04

13

5.48

10.

कसडोल

04

17

43

5.99

25

7.55

12

5.06

11.

मैनपुर

04

20

33

4.60

18

5.44

10

4.22

12.

पलारी

04

14

53

7.38

20

6.04

19

8.02

13.

राजिम

02

06

31

4.32

18

5.44

10

4.22

14.

सिमगा

02

06

25

3.48

20

6.04

12

5.06

15.

तिल्दा

03

11

29

4.04

17

5.13

14

5.91

 

योग

57

285

718

100%

331

100%

237

100%

स्रोत: पटवारी द्वारा प्राप्त आंकड़ा।

 

उपर्युक्त सारणी 7.4 से स्पष्ट है कि सर्वेक्षित जिले में विकासखंडानुसार चयनित 57 ग्रामों में चयनित 285 तालाबों के अध्ययन पश्चात ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध जलस्रोतों की संख्या क्रमानुसार है, जिनमे कुँओं की संख्या 718, हैण्डपम्प 331 एवं ट्यूबवेल 237 पाये गये।
 

कुआँ (Well)


अध्ययन क्षेत्र में तालाब जल का विशाल स्रोत है, जबकि कुआँ जल का सूक्ष्म एवं छोटा स्रोत होता है कुओं के माध्यम से वर्षाजल का संचयन किया जाता है। भूगर्भ से भी जल की प्राप्ति होती है, जिनका उपयोग करके मानव अपने दैनिक जीवन में जल संबंधी उत्पन्न समस्याओं को दूर करता है। इसे कच्चा एवं पक्का दोनों तरह से निर्मित किया जाता है। साथ ही इसके निर्माण कार्य शासकीय तथा निजी दोनों तरह से किया जाता है। जल के ये स्रोत प्रायः निजी भूस्वामी द्वारा निर्मित पाये गये हैं, जिनका उपयोग मुख्य रूप से स्वयं के द्वारा किया जाता है। शासकीय कुँओं की तुलना में निजी कुँओं की संख्या अधिक है। जिले में विकासखंडानुसार सर्वाधिक कुँओं की संख्या अभनपुर, बलौदाबाजार, भाटापारा, बिलाईगढ, छुरा, धरसीवां, गरियाबंद, पलारी अंतर्गत 447 (62.26 प्रतिशत), देवभोग, कसडोल, मैनपुर, राजिम, सिमगा, तिल्दा में 191 (26.60 प्रतिशत) एंव आरंग विकासखंड अंतर्गत 80 (11.14 प्रतिशत) पाये गये हैं जो अन्य विकासखंडों में चयनित ग्रामों की अपेक्षा सर्वाधिक है।

 

 

हैण्डपंप (Hand Pump)


विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शुद्ध पेयजल की आपूर्ति के लिये हैण्डपंप के माध्यम से भूमिगत शुद्ध जल के उपयोग को बढ़ावा दिया है। हैण्डपंपों का विकास तीन चरणों में हुआ है- प्रथम स्तर पर प्रत्येक ग्रामीण अधिवास में न्यूनतम एक हैण्डपम्प का निर्माण किया गया- द्वितीय स्तर पर प्रत्येक 250 ग्रामीण जनसंख्या पर एक हैण्डपम्प का निर्माण किया गया है। वर्तमान में प्रत्येक घरों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिये ओवर हेड टैंक व नल के द्वारा पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।

हैण्डपम्प का उपयोग मुख्य रूप से पीने, भोजन बनाने के लिये एवं साथ ही नहाने-धोने में किया जाता है। अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध हैण्डपम्प शासकीय एवं निजी दोनों तरह से है, जिनका उपयोग भी सार्वजनिक एवं निजी रूप में किया जाता है। यह पूर्णतः हस्तचलित एवं सर्वसुविधा युक्त होता है। अतः अध्ययन क्षेत्र में विकासखंडानुसार सर्वाधिक हैण्डपम्प की संख्या आरंग, अभनपुर, बलौदाबाजार, छुरा, देवभोग, गरियाबंद, कसडोल, मैनपुर, पलारी, राजिम, सिमगा, तिल्दा अंतर्गत 239 (72.20 प्रतिशत) एवं भाटापारा, बिलाईगढ़, धरसीवां विकासखंड अंतर्गत इनकी संख्या 92 (27.79 प्रतिशत) पाये गये, जोकि अन्य विकासखंडों की तुलना में सर्वाधिक है।

 

 

 

 

ट्यूबवेल (Tubewell)


ट्यूबवेल से सिंचाई के कार्य में भूमिगत जल का उपयोग होता है। सिंचाई के अन्य साधनों की तुलना में ट्यूबवेल से सिंचाई के द्वारा जल का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाता है तथा जल के दुरुपयोग एवं नुकसान से बचा जा सकता है। शासकीय स्तर पर आर्थिक सहयोग मिलने के फलस्वरूप ट्यूबवेल की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

ग्रामीण क्षेत्रों में विकासखंडानुसार सर्वाधिक ट्यूबवेल की संख्या आरंग, अभनपुर, बलौदाबाजार, बिलाईगढ़, छुरा, देवभोग, गरियाबंद, कसडोल, पलारी, सिमगा, तिल्दा अंतर्गत इनकी संख्या 189 (79.75 प्रतिशत) भाटापारा अंतर्गत 28 (11.81 प्रतिशत) एवं मैनपुर, राजिम, विकासखंड अंतर्गत 20 (8.84 प्रतिशत) पाये गये, जबकि भाटापारा में अन्य विकासखंड की अपेक्षा सर्वाधिक ट्यूबवेल पाये गये हैं। इसका कारण यह है कि सिंचाई की अन्य सुविधा उपलब्ध नहीं है।

 

 

 

 

जल-जनित बीमारियाँ


जल जन्य बीमारियों का अध्ययन जल की गुणवत्ता के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण तत्व है। जिले में यद्यपि 89 प्रतिशत जनसंख्या को शासकीय स्तर पर शुद्ध पेयजल उपलब्ध है, फिर भी जल जन्य बीमारियों से संक्रमण प्रतिवर्ष ग्रामीण क्षेत्रों में दृष्टिगत होता है। पानी की गुणवत्ता अगर अच्छी है, तो जल जन्य बीमारियों को एक सीमा तक रोका जा सकता है। पानी के साथ स्थानीय निवासियों की खान पान की आदतें तथा खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता भी जल-जन्य बीमारियों में वृद्धि के कारक होते हैं। प्रस्तुत अध्याय में प्रयास किया गया है कि जल जन्य बीमारियों का स्थानिक प्रतिरूप किस प्रकार है तथा इस प्रतिरूप का स्थानीय पर्यावरण के साथ संबंध किस प्रकार बनते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में लगभग 80 प्रतिशत बीमारियाँ जल के साथ संबंधित होती हैं। इस संबंध में प्रथम तो यह कि अगर संदूषित पेयजल का उपयोग किया जाता है, तो इससे टायफाइड, अतिसार (गेस्ट्रोइटीज) हैजा, की बीमारियाँ हो सकती हैं। द्वितीय, संदूषित जल के उपयोग से संक्रमण संबंधी बीमारियाँ, जैसे-स्केपिस एवं ट्राकोमा हो सकती है। तृतीय, अगर जल में विभिन्न प्रकार के परजीवी हों या भोजन के साथ ये परजीवी मनुष्य के शरीर में प्रवेश करे, तो कृमि से संबंधित बीमारियाँ हो सकती हैं।

रायपुर जिले में जल-जन्य बीमारियों से संबंधित सूचनाओं को जिला स्वास्थ्य अधिकारी के स्वास्थ्य संबंधी रजिस्टर से प्राप्त किया गया है। ये आंकड़े शासकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार के लिये आये मरीजों की संख्या तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उपस्वास्थ्य केंद्रों से उपचारित मरीजों की संख्या के आधार पर प्राप्त किए गए हैं। स्पष्ट है कि जिले में बहुसंख्यक निजी चिकित्सकों से चिकित्सा करा करके लोग स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं। यद्यपि शासकीय जिला स्वास्थ्य अधिकारी से प्राप्त आंकड़े जल-जन्य बीमारियों की सही संख्या स्पष्ट नहीं करती फिर भी बीमारियों के स्थानीय वितरण के लिये ये आंकड़े आधार के रूप में उपयोग में लायी जा सकती है। जिले में जल-जन्य बीमारियों को क्रमानुसार विश्लेषित किया गया है।

 

 

 

 

पीलीया (Hepatitis)


जिगर के संक्रमण से उत्पन्न रोग को पीलिया कहा जाता है। संदूषित जल भोजन से उत्पन्न पीलिया को हेपेटाइटिस कहा जाता है। इसका विश्व स्तर पर फैलाव मिलता है। भारत में पीलिया के मरीज वर्षभर संक्रमित होते रहते है। अधिकांश अध्ययनों में यह पाया गया है कि निम्न सामाजिक, आर्थिक स्थिति वाले समूहों में पीलिया के मरीज अधिक मिलते हैं। विशेषकर जहाँ व्यक्तिगत स्वच्छता का अभाव तथा वातावरण संदूषित होता है। अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या इस बीमारी के फैलाव को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2002 में पीलिया से संक्रमित होने वाले मरीज 2818, वर्ष 2003 में 3392 तथा 2004 में 3870 थी। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी मरीजों की संख्या अधिक पायी गयी है। ग्रामीण वातावरण में गरीब वर्ग के मरीजों की संख्या अधिक मिली है। वर्ष 2004 में 3 ग्रामों में पीलिया के संक्रमण से लोग प्रभावित हुए थे। पीलिया से होने वाली मृत्यु 2002 में 17, 2003 में 22 तथा, 2004 में 16 थी। कभी-कभी यह बीमारी महामारी के रूप में फैलती है।

 

 

 

 

टायफाइड


यह बीमारी एम.टाइफी नामक वायरस से संक्रमण से होती है। यह वायरस संदूषित जल में पैदा होते हैं। अथवा सड़े गले फलों या सब्जियों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। (पार्क जे.ई. 1985, 327) इस बीमारी का फैलाव वर्षभर दृष्टिगत होता है। इसका संक्रमण जुलाई, अगस्त एवं सितंबर के माह में अधिक होता है। (मंगल एच.एम. 1967, 289) अर्थात वर्षा के मौसम में जीवाणुओं के विकास के लिये उपयुक्त वातावरण का निर्माण होता है। भारत में टायफाइड ज्वर का एक प्रमुख स्वास्थ्यगत समस्या है।

रायपुर जिले में 2002-2004 के मध्य टायफाइड ज्वर के 4830 मामले दर्ज किए गए। इनमें वर्ष 2002 में 31 ग्रामों में यह ज्वर संक्रमण के स्तर पर मिला, वर्ष 2003 में इनकी संख्या 27 तथा वर्ष 2004 में 23 ग्रामों में टायफाइड का संक्रमण पाया गया। इन वर्षों में टायफाइड से 75 व्यक्तियों की मृत्यु हुई। टायफाइड की अधिकतम संख्या (1112) रायपुर जिला अस्पताल में दर्ज की गयी, इसके पश्चात बलौदाबाजार (340), भाटपारा 330 तथा बिलाईगढ़ अस्पताल में इनकी संख्या 431 थी।

 

 

 

 

डायरिया


वर्तमान विश्व में डायरिया से मरने वालों की संख्या सर्वाधिक है। शरीर में उपलब्ध जल की कमी, पेट दर्द इत्यादि लक्षणों से युक्त डायरिया संदूषित जल से होने वाली प्रमुख बीमारी है। रायपुर जिले में 8682 डायरिया संक्रमित लोगों की संख्या वर्ष 2002 से 2004 के मध्य दर्ज की गयी थी। जिले में 128 ग्राम डायरिया संक्रमित पाए गए तथा 108 लोगों की मृत्यु हुई। विकासखंड अनुसार दर्ज डायरिया मरीजों की संख्या में गरियाबंद, तहसील में डायरिया से मरने वाले व्यक्ति की सेख्या 39 थी। बलौदाबाजार विकासखंड में 132 व्यक्ति डायरिया से संक्रमित हुए तथा कसडोल विकासखंड में 265 व्यक्ति संक्रमित मिले। जिले में डायरिया मुक्त कोई भी विकासखंड नहीं है।

 

 

 

 

कालरा (हैजा)


हैजा संदूषित जल से फैलने वाली संक्रमण की बीमारी है। भारत वर्ष में यह ऐतिहासिक सत्य है कि पश्चिम बंगाल को हैजा बीमारी का घर कहा जाता है। इसके अतिरिक्त राजस्थान, अंडमान, निकोबार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आसाम, आंध्र प्रदेश में इस बीमारी का अस्तित्व मिलता है। (श्रीवास्तव जे.वी. 1970, अरोरा, आर.आर. 1975)। छत्तीसगढ़ में हैजा बीमारी का विवरण पी.पी. एडमिनीस्ट्रेशन रिपोर्ट 1808, 692 में दर्ज है तथा यह भी दर्ज है कि किस प्रकार तालाबों का संदूषित जल लोगों के द्वारा उपयोग किया जाता है तथा उनको स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिये क्या उपाय किए जायें। वर्ष 2002 से 2004 के मध्य कुल संक्रमित लोगों की संख्या 1968 दर्ज थी इनमें 743 2002 में 443 वर्ष 2003 में तथा 540 वर्ष 2004 में दर्ज की गयी। इन तीन वर्षों में हैजा से मरने वालों की संख्या 109 दर्ज है। इनमें वर्ष 2002 में 39, वर्ष 2003 में 43 तथा वर्ष 2004 में 27 लोगों की मृत्यु का विवरण है। यह उल्लेखनीय है कि लगभग 47 ग्राम हैजा से संक्रमित हुए तथा बलौदाबाजार विकासखंड के लवण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के आस-पास ग्रामों में यह फैलाव हुआ था।

 

 

 

 

आंत्रशोध (Gastro enteritis)


यह जहरयुक्त भोज्य पदार्थों के कारण होता है। किसी न किसी रूप में अगर भोजन, संदूषित जल अथवा सब्जियों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया अथवा संदूषित रसायनों का प्रभाव हो रहा हो, तो यह बीमारी होती है। यह एक प्रकार से डायरिया के समान ही होता है। वर्ष 2002 से 2004 के मध्य 6.374 रोगियों की संख्या दर्ज हुई है। इनमें 2,126 रोगी वर्ष 2002 में, 2820 रोगी वर्ष 2003 में तथा 1,428 रोगी वर्ष 2004 में दर्ज हुए। कुल 67 ग्रामों को इन बीमारी से संक्रमित पाये गये। इनमें वर्ष 2002 में 21, वर्ष 2003 में 29 तथा 2004 में 17 ग्राम प्रभावित हुए। इन 3 वर्षों में इस बीमारी में 59 लोगों की मृत्यु हुई।

 

 

 

 

पेचिस (Dysentry)


इन्टेमीबा हिस्टोबिटिका नामक जीवाणु से यह रोग होता है। यह वनस्पति के सदृश्य एक कोशिकीय जीव माना जाता है, जो सिस्ट होता है। जल के साथ निस्तारित सिस्ट ही संक्रामक होता है। यह किसी तरह अगर भोजन प्रणाली के साथ ग्रहण हो जाए तो पाचन संस्थान में पहुँचकर पेचिस पैदा करता है। इससे बचने का एक मात्र उपाय है कि जलाशयों की जल के संसर्ग से दूर रखना चाहिए। शुद्ध पेयजल की उपलब्धता तथा डिसेन्ट्री के मरीजों के मध्य एक धनात्मक सहसंबंध पाया गया है। जिले के उच्च भूमि क्षेत्र एवं ट्रांस महानदी क्षेत्रों में डिसेन्ट्री से संक्रमित व्यक्तियों की संख्या महानदी-खारून-दोआब की तुलना में अधिक है। कुल 3,762 व्यक्तियों को विगत 3 वर्षों में उपचार प्रदान किया गया। इससे मरने वालों की संख्या गरियाबंद विकासखंड अंतर्गत 23 एवं मैनपुर विकासखंड अंतर्गत 18 थी तथा कसडोल एवं बिलाईगढ़ विकासखंड के 13 एवं 19 व्यक्तियों की मृत्यु डिसेन्ट्री के कारण हुई।

 

 

 

 

एमोबियासीस (Amoebiasis)


विश्व में 10 प्रतिशत जनसंख्या इस बीमारी से आहत है तथा यह जनसंख्या के लिये एक प्रमुख समस्या है। यह पर्यावरणीय स्वच्छता तथा लोगों की खराब परंपराओं के कारण उत्पन्न होने वाली समस्या है। ग्रामीण रायपुर जिले में शौच के लिये खुले खेतों में एवं मैदानों का उपयोग किया जाता है। यह मल विसर्जन वर्षाऋतु में अथवा वायु के संगर्भ में पेयजल के स्रोतों को संदूषित करने में सहायक होता है। यही संदूषण भोजन के साथ पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। जल में शुद्धीकरण की उचित व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं होने के कारण इस बीमारी का प्रतिशत अधिक है। यद्यपि इससे प्रकाशित आंकड़े उपलब्ध नहीं है, फिर भी अनुमान है कि लगभग रायपुर जिले में 50 से 75 प्रतिशत जनसंख्या इस बीमारी से संक्रमित है।

 

 

 

 

कृमि (Hook Worm)


भारत वर्ष में लगभग 33 प्रतिशत जनसंख्या कृृमि संबंधी बीमारियों से संक्रमित है। इनके अण्डे दूषित मनुष्य के मल में रहते हैं, मिट्टी में कुछ समय रहने के बाद छूत फैलाने वाले लार्वा के रूप में बदल जाते हैं। यह एक प्रकार का लार्वा है जोकि मिट्टी के ऊपरी सतह में विकसित होता है। धान के खेतों तथा चारागाहों में इन्हें विकसित होने में उचित वातावरण उपलब्ध होता है। ग्राम्य जीवन में नंगे पैरों चलने वाले लोगों की संख्या अधिक है। यही लार्वा मिट्टी से पैरों में होते हुए व्यक्तियों को संक्रमित करती है। यद्यपि इस बीमारी से मृत्यु की आशंका नहीं होती। लेकिन जनसंख्या का सामान्य स्वरूप् कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है।

 

 

 

 

जलसंचय क्षमता में वृद्धि


रायपुर जिले के तालाबों की जल-संचयन क्षमता मेंडों की ऊँचाई या तालाबों की गहराई पर निर्भर है। अधिकांश तालाबों में मेंडों की ऊँचाई 2 से 3 मीटर के मध्य पायी गयी है। तालाबों की उपर्युक्त गहराई 50 वर्ष पूर्व की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सही रही होगी। 50 वर्ष पूर्व निरा फसल का क्षेत्रफल ग्रामों के भौगोलिक क्षेत्रफल का 35 प्रतिशत तथा जनसंख्या का घनत्व 100 से 125 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. था। वर्तमान समय में जनसंख्या का घनत्व 175 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. तथा फसल का निरा क्षेत्रफल कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 65 प्रतिशत है। स्पष्ट है कि जनसंख्या लगभग दोगुनी एवं निरा फसल का क्षेत्रफल भी लगभग दोगुनी हो चुकी है। दोनों ही संदर्भ में जल की आवश्यकता में भी दोगुनी से अधिक वृद्धि हुई है। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु तालाबों की गहराई में वृद्धि करना समीचीन होगा। शासन के स्तर पर तालाबों की गहराई राहत कार्यों के माध्यम से बढ़ाई जा सकती है अथवा ग्राम पंचायतों को जल संरक्षण योजना के अंतर्गत अतिरिक्त राशि उपलब्ध होती है। अनुमानतः 1 मीटर गहराई वृद्धि से तालाबों में जल संचयन की मात्रा में वर्तमान क्षमता में दोगुनी वृद्धि होती है। तालाबों के संरक्षण के लिये गहराई में वृद्धि करनी होगी। तालाबों में गहराई वृद्धि का विकल्प यह भी है कि जल के साथ तलहटी में जमा होने वाले सिल्ट को प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु में तालाब से बाहर कर दिया जाए। परम्परानुसार तालाबों से निकलने वाले सिल्ट को धान के खेतों में डाला जाता है अगर यह कन्हार या डोरसा मिट्टी वाले तालाबों का है। मटासी एवं मुरुम युक्त तालाबों के सिल्ट का उपयोग सड़कों एवं गृह निर्माण में किया जा सकता है।

 

 

 

 

तालाबों के जलाधिक्य को नियमित करना


अध्ययन क्षेत्र में प्रत्येक ग्रामीण अधिवास में कम से कम 2 से लेकर 7 तालाब पाए गए हैं। तालाबों की संख्या गाँवों के कुल क्षेत्रफल कृषि भूमि एवं उपलब्ध सूक्ष्म ढाल पर निर्भर होती है। अधिकांशतः प्रत्येक तालाब में मुही से या उलट के अतिरिक्त जल प्रवाहित होकर नालों या नदियों के जल प्रवाह से मिल जाते हैं।

इसके अतिरिक्त जल को संचय करने के लिये तालाबों को भूमिगत पाइप या भूमि में ढाल के अनुरूप छोटी नालियों के द्वारा जोड़ा जा सकता है तथा एक तालाब के अतिरिक्त जल दूसरे तालाब में संग्रहित किया जा सकता है। 50 वर्ष पूर्व धरसा के माध्यम से अतिरिक्त जल का प्रबंधन किया जाता था। वर्तमान में अधिकांश धरसा ग्रामीण सड़कों में परिवर्तित हो चुका है। अतः धरसा का विकल्प भूमिगत नाली हो सकता है। इस माध्यम से प्रत्येक तालाब को वर्षाजल में पूर्ण क्षमता के साथ भरा जा सकता है।

मेंडों का संरक्षण: मेंड़ों का संरक्षण निम्नलिखित विधियों से किया गया है-

 

 

 

 

अतिक्रमण रोकना:


जल संग्रहण मेंड़ों की ऊँचाई एवं मजबूती पर निर्भर होता है। अध्ययन क्षेत्र में लगभग 17 प्रतिशत तालाब की मेंड़ मानव के अतिक्रमण से बाधित हुए हैं। अतिक्रमण का सीधा स्वरूप है कि ग्राम से लगे तालाब की मेंड़ों पर मानव द्वारा मकान निर्माण करना। ये अतिक्रमण कहीं-कहीं मजबूरी में गरीब वर्ग के लोगों द्वारा किया जाता है। दूसरे प्रकार का अतिक्रमण तालाबों से लगे खेतों के मालिकों के द्वारा किया जाता है। इनमें अपने खेत को बड़ा करने के लिये तालाब मेंड़ (पार) को काटकर किया जाता है। कारण कुछ फसल के उत्पादन में वृद्धि एवं जल के महत्त्व को न समझना है। यह आवश्यक है कि इस अतिक्रमण को रोकने के लिये जन-जागरूकता पैदा किया जाए।

 

 

 

 

वृक्षारोपण


तालाब की मेंड़ों पर वृक्षारोपण की अनेकानेक संभावनाएं हैं। प्राचीन तालाबों की मेंड़ों पर वृक्षारोपण का उद्देश्य जलाऊ लकड़ी की आपूर्ति, फलों (आम, इमली, नीम, बेल, आंवला, जामुन) की आपूर्ति तथा मेंड़ों की मिट्टी को रोककर रखने की होती थी। समय अंतराल में आत्म केन्द्रित मनुष्यों ने तथा शासन की गलत नीतियों ने तालाबों के वृक्षों का विनास हो चुका है। धर्मशील मानव सिर्फ उन पेड़ों पर रहम किया है, जिन पर धार्मिक आस्था निहित है। मेंड़ों की मजबूती के लिये पुनः वृक्षारोपण अति आवश्यक है ताकि मेंड़ों को टूटने से बचाया जा सके। शासन-स्तर पर सामाजिक वानिकी के तहत उपलब्ध सुविधाओं एवं जन चेतना के माध्यम से तालाबों पर वृक्षारोपण कर मेंड़ों को संरक्षित किया जा सकता है।

 

 

 

 

नए तालाबों का निर्माण


वर्षाजल संग्रहण एवं संरक्षण के लिये उपलब्ध तालाबों की संख्या में वृद्धि की जा सकती है। अध्ययन क्षेत्र में धान की कृषि प्रमुख फसल है तथा सस्य प्रतिरूप में प्रथम स्थान प्राप्त है। धान खरीफ की फसल है, यहाँ परम्परागत खरीफ एवं रबी के फसलों के अंतर्सबंध है। धान के खेतों में भरा हुआ पानी फसल पकने के समय रबी की फसल जिनमें तिवरा, दलहन बोया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में खेतफोरी कहते हैं। यह निष्कासित जल नालों एवं नदियों के माध्यम से समुद्र में चला जाता है।

यहाँ इस बात की आवश्यकता है कि खेतफोरी से निकले जल को धान की कृषि की सीमावर्ती भूमि में पुनः संग्रहित कर लिया जाए, ताकि यह संग्रहित जल ग्रीष्मकालीन उपयोग में लाया जा सके अथवा रबी की फसल को अतिरिक्त आर्द्रता प्रदान करने के लिये उपयोग किया जाए। ज्ञातव्य है कि धान के खेतों की सीमा में घास वाली भूमि लगभग प्रत्येक ग्रामों में होती है अथवा ऊपर या अन्य अनुपजाऊ भूमि होती है। इस भूमि में तालाबों का निर्माण किया जा सकता है।

 

 

 

 

तालाब संरक्षण एवं भूमिगत जल संरक्षण


तालाबों का संरक्षण एवं भूमिगत जल-संरक्षण के मध्य सीधा संबंध है। तालाबों का जल रिसकर अंतर्भौम जल में वृद्धि करता है अर्थात जितनी संख्या में तालाबों को संरक्षित किया जा सकता है, उतनी ही भूमिगत जल संभरण के बढ़ाया जा सकता है। अध्ययन क्षेत्र में तालाबों के आस-पास उपलब्ध नलकूपों में जल की उपलब्धता पर्याप्त पायी गयी है। अवलोकन में यह भी प्राप्त हुआ है कि तालाब के पास खोदे गए कुँओं में भी जल की पर्याप्त मात्रा होती है, जो सिंचाई के अतिरिक्त अन्य उपयोग के लिये पर्याप्त जल प्रदान करता है।

 

 

 

 

तालाब संरक्षण एवं जन-जागरूकता


ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों के अतिरिक्त जलापूर्ति के अन्य साधनों (नहर, नलकूप एवं कुएँ) की उपलब्धता के परिणामस्वरूप तालाबों की संधारण व्यवस्था में कमी आयी है। क्षेत्र अवलोकन के समय 50 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों द्वारा साक्षात्कार लेते समय इस बात की जानकारी मिली है कि उनके बाल्यावस्था एवं युवावस्था में तालाबों की सफाई एवं संधारण की ठोस व्यवस्था में प्रत्येक परिवार की सक्रिय भागीदारी रहती थी। तालाबों की सफाई एवं संधारण की व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक सप्ताह घाटों की सफाई एवं जल के नजदीक उग आए खरपतवारों की सफाई के दिन एवं परिवार बच्चे। उक्त दिवस में निर्धारित परिवार के पुरुष एवं महिलाएँ सफाई के कार्य पूर्ण करता था। पुरुष एवं महिला घाटों की जिम्मेदारी निर्धारित हुआ करती थी। साक्षात्कार के समय यह जानकारी भी उपलब्ध हुई कि अगर निस्तारी तालाब के पानी का उपयोग सिंचाई कार्य में किया जाना है, तो ग्राम में होने वाली बैठक में यह बात तय होती थी कि पानी का बहाव कृषि क्षेत्रों में किस तरह होगा, इसका भी विनियत एवं वैधानिक नियम था। उक्त नियमों में इस बात का दृष्टिकोण निहित था कि मृदा अपरदन कम से कम हो।

वर्तमान में उक्त सहभागिता समाप्त हो गयी है तथा तालाबों के संधारण की भावना में कमी आयी है। चूँकि तालाब छत्तीसगढ़ में उपलब्ध जलवायु के अनुकूलनन के तत्व हैं, अतः जल के महत्त्व को समझाते हुए पुनः जनजागरण बढ़ाना होगा तथा तालाबों के स्थायित्व के लिये प्रयास करना होगा। तालाबों को सुव्यवस्थित रखने के लिये निम्नानुसार व्यवस्था की गई है।

(1) जल के नजदीक एवं तालाबों की मेड़ पर उगने वाले खरपतवारों की प्रति सप्ताह सफाई होनी चाहिए।

(2) तालाबों की मेंड़ पर एवं अंदर शौच नहीं करना चाहिए।

(3) घाटों को स्वच्छ रखना चाहिए।

(4) वृक्षों से झड़ने वाले पत्तों को इकट्ठा कर जलाना चाहिए।

(5) यदि आवश्यक है तो जल शुद्धिकरण के लिये दवाइयों का उपयोग किया जाना चाहिए।

(6) तालाबों को गंदे जलस्रोतों से बचाना चाहिए।

(7) निस्तारी एवं पशुओं के उपयोग के तालाबों को अलग-अलग होना चाहिए।

 

 

 

 

वृक्षारोपण


उपलब्ध तालाबों में वाष्पीकरण की समस्या अधिक है। वाष्पीकरण रोकने के लिये सहज उपाय के तौर पर तालाब की मेंड़ पर घनी छायादार वनस्पतियों का रोपण आवश्यक है। इन वनस्पतियों के द्वारा जल का संचय प्राकृतिक रूप से होता है। एवं इनके प्रभाव में वाष्पीकरण की वर्तमान दर को कम किया जा सकता है। वृक्षारोपण के उद्देश्य ग्रामीणों की आवश्यकतानुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

 

 

 

 

जल प्रबंधन


अध्ययन क्षेत्र में उपलब्ध तालाब मानवीय आवश्यकताओं एवं पर्यावरणीय दशाओं के मध्य अनुकूलन के परिणाम है। ये जल-प्रबंधन के सहज साधन हैं, जिसे यहाँ के निवासियों ने विकसित किया है। जल प्रबंधन के लिये तीन आवश्यक तत्वों को लिया जाना चाहिए। प्रथम वे तालाब जो अधिवासों के निकट हैं उनमें वर्षाजल छप्परों एवं गलियों के माध्यम से बहता है, इस जल को नियोजित विधि से तालाबों में संग्रहित किया जाना चाहिए। यद्यपि अधिसंख्यक अधिवासों में यह व्यवस्था उपलब्ध है, फिर भी भूमि की ढाल तथा जल प्रवाह की दिशा के अनुकूल इसे पुनः व्यवस्थित किया जाना आवश्यक है। द्वितीय सिंचाई की व्यवस्था आनुभाविक स्तर पर ही की जा रही है। इसमें नवीन तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि जल से अधिकतम लाभ मिल सके। विभिन्न प्रकार के तकनीक उपलब्ध है। इनमें नालियों के द्वारा सिंचाई, टपक सिंचाई, स्प्रींकलर सिंचाई इत्यादि प्रमुख हैं। चूँकि धान की कृषि में अधिक पानी की आवश्यकता होती है, इसलिये खेतों के मध्य की स्थल चयन करके नवीन तालाबों का निर्माण किया जा सकता है, जो सिंचाई के अतिरिक्त जल को संग्रहित करने में उपयोगी है। तृतीय जल प्रबंधन एवं मृदा आर्द्रता में वृद्धि करक जल-प्रबंधन के कार्य को पूर्ण किया जा सकता है।

जल-प्रबंधन में तालाब सतही जल के संग्रहण के लिये उपयोग में लाये जाते हैं। तालाब भूमिगत जल को बढ़ाने में उपयोगी है फिर भी यदि तालाबों के मध्य छोटे कम गोलाई के कच्चे कुएँ निर्मित कर दिये जाएँ, तो भूमिगत जल संभ्रण की गति तेज होगी और इसका अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। इस दिशा में अगर कम गहराई वाले नलकूप - खनन करके छोड़ दिया जाए, तो भूमिगत जल संभ्रण की गति और भी तेज होगी।

 

 

 

 

नवीन प्रवृत्तियाँ


नवीन प्रवृत्तियों के अंतर्गत राज्य शासन ने जिले में विकासखंडानुसार जल की समस्याओं को देखते हुए जल प्रबंध की अनेक विधियाँ अपनाई है, जिसके तहत डिबरी-निर्माण, राजीव गाँधी-जल संग्रहण, इंदिरा गाँव गंगा एवं नया तालाब निर्माण कर जल संबंधी समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही इस प्रकार के कार्यों से लोगों को राहत कार्य भी उपलब्ध हो जाते हैं, जिससे उनकी दयनीय स्थिति में सुधार आ जाता है। जिले के प्रत्येक विकासखंड में इस प्रकार के कार्य किये जा रहे हैं। जिससे आवश्यकता से अधिक जल की प्राप्ति किया जा सके ताकि जीवन में जलाभाव की समस्या उत्पन्न न हो।

 

 

 

 

 

 

 

शोधगंगा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन (A Geographical Study of Tank in Rural Raipur District)

2

रायपुर जिले में तालाब (Ponds in Raipur District)

3

तालाबों का आकारिकीय स्वरूप एवं जल-ग्रहण क्षमता (Morphology and Water-catchment capacity of the Ponds)

4

तालाब जल का उपयोग (Use of pond water)

5

तालाबों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष (Social and cultural aspects of ponds)

6

तालाब जल में जैव विविधता (Biodiversity in pond water)

7

तालाब जल कीतालाब जल की गुणवत्ता एवं जल-जन्य बीमारियाँ (Pond water quality and water borne diseases)

8

रायपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का भौगोलिक अध्ययन : सारांश

 

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