प्यासा है छत्तीसगढ़

Submitted by Hindi on Sat, 05/13/2017 - 16:47
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प्रथम प्रवक्ता, 16 मई 2017

छत्तीसगढ़ में गाँवों से लेकर शहरों तक जल संकट नक्सली समस्या जैसी बड़ी समस्या बन गई है। क्योंकि नदियों का पानी उद्योगों ने निचोड़ लिया। तालाबों की जान बिल्डरों ने ले ली। नतीजा पानी का हाहाकार राजधानी रायपुर से लेकर गाँवों तक है। पानी की प्राथमिकता अब रोटी, कपड़ा और मकान से अधिक है। क्योंकि एक तरफ धरती प्यासी है तो दूसरी ओर लोग प्यासे हैं।

पानी के लिये ग्रामीण महिलाओं को अब दूर तक सफर तय करना पड़ रहा हैछत्तीसगढ़ में पानी की विकट समस्या का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजधानी रायपुर में नगर निगम हर दिन सौ टैंकरों से जल की आपूर्ति कर रहा है, बावजूद इसके जल संकट है। इसलिए कि हर दिन दस करोड़ लीटर पानी कम सप्लाई किया जा रहा है। गंगरैल बाँध से सिंचाई के लिये पानी ढाई माह से दिया जा रहा है। इस अवधि में 13.626 टीएमसी पानी दिया जा चुका है। अब केवल 15 टीएमसी पानी ही बचा है। जबकि अभी पूरी गर्मी बची है। आकाश तप रहा है। पारा 45 डिग्री सेल्सियस है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की बड़ी भयावह स्थिति है। डग-डग नीर अब नहीं होने से पानी को लेकर मारपीट के हालात बन रहे हैं। रायपुर में पिछले सात साल में दस करोड़ रुपये तालाबों को जिंदा करने में खर्च हो गये, लेकिन न तालाब गहरे हुए और न ही साफ। नरैया तालाब को एक बार फिर साफ और सौन्दर्यीकरण की दिशा में पहल की जा रही है। जबकि यह तालाब कभी पानी से लबालब हुआ करता था। आज कचरे से पटा है। बिल्डरों की नजर इस तालाब पर गिद्ध की तरह गड़ी हुयी है।

रायपुर नगर निगम के आयुक्त रजत बंसल कहते हैं कि जिन तालाबों की स्थिति ज्यादा खराब है उनका प्राथमिकता के आधार पर गहरीकरण और सौन्दर्यीकरण किया जाएगा। सवाल यह है कि एक दर्जन से अधिक तालाब हमारी धरोहर के तहत पुन: गहरीकरण किये जायेंगे। आखिर कागजों पर कब तक तालाबों का सौन्दर्य निखारा जाएगा। रायपुर का करबला तालाब जिसे गहरा करने की दिशा में प्रशासन ने पहल की। इस तालाब से पानी खाली किया गया। लेकिन जो दृश्य देखने को मिला उसने पीओपी (प्लास्टर आॅफ पेरिस) मुक्त प्रतिमाओं के विसर्जन के दावे की पोल खोल दी। जबकि आठ माह पहले ही यहाँ गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया था। दरअसल यह स्थिति प्रदेश के हर तालाबों की है।

पानी नीचे की ओर भाग रहा है


इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि पानी दिनों-दिन नाचे की ओर भागता चला जा रहा है। इस समय दो सौ फुट पानी नाचे चला गया है। गाँवों के कुओं में पानी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल समस्या कितनी भयावह है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित जिला राजनांदगाव के छुई खदान ब्लॉक के ग्राम जंगलपुर घाट में 800 आदिवासी निवासरत हैं। यहाँ संचालित नल-जल योजना पिछले दिनों से ठप है। गाँवों के किनारे लौह अयस्क युक्त वाले हैण्डपंप चालू हैं। बाकी हैण्डपंप का पानी पीने लायक नहीं है घर लाने के बाद कुछ ही देर में पानी लाल हो जाता है। जंगलघाट के लोगों को पानी के लिये आधा किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। ग्रामीण टोली बनाकर खेत में स्थित कुएँ से पानी लाते हैं। जिम्मेदार अधिकारियों से शिकायत के बाद भी अब तक कोई पहल नहीं की है।

नदियाँ सूखने लगी


छुई खदान में हैण्ड पंप से लाल पानी निकलता हैआसमान तप रहा है। पारा 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है। ऐसी स्थिति में मोहरा और शिवनाथ नदियों का पानी सूखने लगा है। इन नदियों के पानी पर निर्भर जंगलेसर, धामनसरा, भरेगांव, कुटेरी ईरा और मोखला के ग्रामीणों का कहना है कि छह गाँवों के सात हजार ग्रामीणों के सामने जल संकट गहरा गया है। नदी सूख गई है यदि पानी नहीं छोड़ा गया तो हाहाकार मच जाएगा। महापौर मधुसूदन ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया है कि जल्द पानी मिलेगा लेकिन उनके सामने भी समस्या है कि पानी कहाँ से दिया जायेगा। तिल्दा नेवरा के किसानों को कुम्हारी टैंक जलाशय से सिंचाई के लिये पानी मिलता था लेकिन, इस बार पानी नहीं मिलने से 400 एकड़ से ज्यादा रकबे में रबी धान की फसल सूख गई। टोहड़ा के किसानों ने परेशान होकर 140 एकड़ रबी की फसल मवेशियों के हवाले कर दी। ग्रामीण छत्तीसगढ़ में पानी के लिये त्राहि-त्राहि मची हुई है। जाहिर सी बात है कि जैसे-जैसे नदियाँ और तालाब सूख रहे हैं, प्रदेश की खेती का खतरा मँडराने लगा है। बैकुंठपुर जिले में 11167 हैण्डपंप में से 40 फीसदी खराब पड़े हैं। हैण्डपंपो से पानी नहीं निकल रहा है। जिसमें से निकल भी रहा है वह फ्लोराइड युक्त पानी है। विवश होकर ग्रामीण नदी, कुएँ के पानी के लिये भोर से पहले घर से निकलते हैं।

पानी के लिये लंबा सफर


जशपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम जरहापाठ में पहाड़ी पर बसे 41 परिवारों के करीब 200 लोग यहाँ निवास करते हैं। इनके बीच एक हैण्डपंप है। ग्रामीणोंं का कहना है कि सड़क और पेयजल की समस्या के निदान के लिये कई बार सरपंच से कहा गया लेकिन समाधान नहीं हुआ। एक हैण्डपंप है, बिगड़ने की स्थिति में पहाड़ी से नीचे उतरकर दो किलोमीटर चलने के बाद पानी मिलता है। जाहिर सी बात है कि जहाँ आबादी है वहाँ अब भी पीने के पानी की समस्या बनी हुई है। कबीरधाम जिला जोकि मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का गृह जिला है। यहाँ पंडरिया ब्लॉक में बांसाटोला गाँव है। यहाँ पहाड़ से एक किलोमीटर नीचे चट्टानों से पानी रिसकर कोसों दूर पेड़ की जड़ों में जमा होता है। यहाँ बैगा महिलाएँ रोज जान जोखिम में डालकर दो वक्त का पानी जुटाती हैं। वह भी प्रदूषित। बैगा बाहुल गाँवों में पानी की स्थिति भयावह है। समस्या के निराकरण के लिये लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने 12.45 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाया है। इसे सरकार को भेजा गया है। लेकिन अभी तक बजट नहीं मिला है।

गड्ढ़ों में रिस कर एकत्र होने वाले पानी का इस्तेमाल कांकेर के लोग करते हैंजिला पंचायत सी.ई.ओ. सर्वेश्वर नरेन्द्र भूरे कहते हैं कि हर पंचायत को 4 से 5 लाख रुपए उपलब्ध कराया जा रहा है। आदिवासी क्षेत्र में हैण्डपंप और दीगर जलस्रोतों की समीक्षा की जा रही है। लेकिन स्थिति इसके ठीक उलट है। कवर्धा, बोडला, पंडरिया और सहसपुर, लोहारा ब्लॉक के 461 पंचायतों में 10920 हैण्डपंप लगे हैं। 400 हैंडपम्प खराब हैं। 93 हैंडपम्प का पानी नीचे चले जाने से बंद है। पंडरिया ब्लॉक के अंतिम छोर पर बंसटोला और चाउरडोंगरी गाँव है। दोनो गाँव की आबादी 400 के करीब है। पीने का पानी के लिये यहाँ बैगा महिला- पुरुषों को रोज पहाड़ से डेढ़ किलोमीटर नीचे उतरकर पेड़ की जड़ों से रिस-रिस कर जो पानी एकत्र होता है, गाँव वाले इसी पानी को ले जाते हैं। पिछले तीन दशकों से इसे ही पी रहे हैं। बांसटोला में सात स्थानों पर बोर किया गया लेकिन पानी नहीं निकला।

पानी पीता भ्रष्टाचार


दरअसल नदियों का पानी उद्योग घराने साल दर साल पीते जा रहे हैं। इन पर करोड़ो रुपए जल कर बकाया है। सिंचाई विभाग के अनुसार आधा दर्जन उद्योग 6 मिलियन घन मीटर पानी एनीकट से लेते हैं। उन्हें हर साल जल कर भुगतान के लिये तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया जाता है। कार्यपालन अभियंता जलसंभाग ए.के.श्रीवास्तव कहते हैं कि जनवरी और मार्च में जल कर नहीं देने वाले उद्योगों को नोटिस दिया गया था। 1 करोड़ 24 लाख 37 हजार रुपये जमा किया गया है। जबकि 22 करोड़ 15 लाख 83 हजार रुपये अभी बकाया है। मेसर्स जायसवाल निको लि. पर 59.44 लाख, मेसर्स मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लि. पर 8 करोड़ 45 लाख, सी.एस.आई.डी.सी. पर 8 करोड़ 61 लाख, एस के एस इस्पात एंड पावर लि. पर 8 करोड़ 72 लाख, मेसर्स सारडा एनर्जी एंड मिनरल लि. पर 1 करोड़ 8 लाख बकाया है।

राजधानी रायपुर स्थित करबला तालाब बिन पानी के सूख गयारायगढ़ जिले के पाँच उद्योगों पर पचास करोड़ रुपये का जलवकर बकाया है। इनमें इंड सिनर्जी लिमिटेड कोटमार पर 43 करोड़ 37 लाख, एमएसटी पावर पर 15 लाख 73 हजार, रुक्मणी पावर पर तीन लाख 55 हजार, जिंदल पावर तमनार पर एक करोड़ 41 लाख रुपए और अंजनी स्टील पर पाँच करोड़ 51 लाख रुपए की राशि बकाया है। कोरबा के बाल्को नगर में स्थित वेदांता कंपनी लिमिटेड के 540 मेगावाट पावर प्लांट करीब 6 करोड़ का पानी मुफ्त पी गया। मामला उजागर होने पर दिसम्बर 2013 से मार्च 2015 तक कुल जल कर 23 करोड़ 23 लाख 85 हजार 795 रुपए की जगह कंपनी ने मात्र 17 करोड़ 25 लाख 1 हजार 465 रुपए का ही भुगतान किया। बकाया राशि के लिये नोटिस दिया गया है। कुछ उद्योगों का मामला ट्रिब्यूनल में चल रहा है। जाहिर सी बात है कि करोड़ों का पानी जनता के हिस्से का उद्योग पी जाते हैं, इसलिए जल संकट की स्थिति निर्मित होती है।

धरती के पेट में पानी नहीं


भूजल का दोहन जरूरत से अधिक होने की वजह से जल संकट की स्थिति निर्मित तो हुई है साथ ही धरती में पानी कम होने की वजह से कई स्थानों का पानी पीने योग्य नहीं है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड के मुताबिक बारिश का 70 फीसदी से अधिक भूजल नहीं निकलना चाहिए। लेकिन प्रदेश के कई ब्लॉकों में इसका पालन नहीं हो रहा है। सर्वे में 70 से 90 फीसदी तक अर्थ संकट और 90 से 100 फीसदी को संकटपूर्ण और 100 फीसदी से भी अधिक पानी लेने वाले ब्लॉक को पानी की अधिक खपत करने वाला माना गया है। प्रदेश में लगभग 1200 मि.मी बारिश होती है। इसमें 10 से 20 फीसदी ही पानी जमीन में जाता है। जमीन के पेट में पानी कम जाता है, लेकिन निकाला अधिक जा रहा है। गुरूर में 102 फीसदी भूगर्भ से पानी निकाला जा रहा है। बोर्ड ने संकटपूर्ण स्थिति में रखा है। इसी तरह रायपुर जिले का धरसींवा और फिंगेश्वर में स्थिति चिंताजनक है। यहाँ पर भूगर्भ से 70 फीसदी से अधिक पानी निकाला जा रहा है। धरसींवा में 71.03 और फिंगेश्वर में 70.07 फीसदी पानी निकाला जा रहा है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड ने इसे अर्ध संकट की स्थिति में रखा है। भूजल वैज्ञानिकों के मुताबिक 60 फीसदी से अधिक भूजल का दोहन नहीं किया जाना चाहिये। प्रदेश में 781 कुएँ हैं। जिनमें अाधे से अधिक सूख गए हैं।

तालाब सूख गए


नरैया तालाब जो पानी से लबालब रहता था अब कचरे से पटा पड़ा हैदुर्ग जिले के गाँवों में पेयजल व्यवस्था दुरुस्त करने के लिये लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने एक साल में 14 करोड़ से भी अधिक राशि खर्च कर दी है, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं है। कई गाँवों में नल जल योजना के तहत भी पानी नहीं मिल रहा। पानी दो सौ फुट नीचे चला गया है। दुर्ग जिले के चंदखुरी, धनोरा, खम्हरिया, पुरई, हनोदा, पतोरा, अंडा, रिसामा, कोटनी, नगपुरा, मचांदुर, बोरई, रसमड़ा, खुरसुल, अंजोरा, मालूद, बेलौदी, सहित दर्जनों गाँवों में पानी की समस्या बढ़ गई है। इन गाँवों में तालाब का पानी सूख गया है। दुर्भाग्य की बात है कि प्रदेश के कई जिलों में भूजल का सर्वेक्षण करने के लिये पीजोमाटर नहीं है। इससे भूजल की सही-सही जानकारी नहीं मिल पाती है। बस्तर संभाग में एक भी पीजोमीटर नहीं लगा है। जाहिर सी बात है जल संपदा के दोहन के साथ ही जल संचय के संदर्भ में सोचना होगा। जनता और राज्य सरकार दोनों को। अन्यथा आने वाले कुछ सालों में शुद्ध जल मिलना दूभर हो जायेगा, साथ ही जल संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।

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