गंगा और उसकी सहायक नदियों को एक नागरिक का दर्जा: व्यवस्था या अव्यवस्था

Submitted by Hindi on Mon, 05/15/2017 - 10:40
Source
डाउन टू अर्थ, मई 2017

अदालत के आदेश की व्याख्या करती विशेषज्ञों की राय


.उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और उसकी सहायक नदियों को एक नागरिक का दर्जा दिए जाने के अपने फैसले के पक्ष में गंगा से जुड़ी लाखों हिन्दुओं की आस्था का हवाला दिया। यूँ तो उन लोगों ने यह भी कहा कि नदी न केवल हिन्दू बल्कि लाखों भारतीयों की आजीविका में अहम भूमिका अदा करती है। पर न्यायाधीश नदी के पवित्र व्यक्तित्व से अधिक प्रभावित दिखे। मजे की बात यह है कि इस मामले में याचिकाकर्ता एक मुस्लिम है।

यह फैसला उस विचार से प्रभावित दिखता है जिसमें प्रकृति के बचाव के लिये इसे कुछ अधिकार देने की बात की जाती है, ताकि मानव समाज के मूर्खतापूर्ण अभिमान से इसे बचाया जा सके। वर्ष 2008 में इक्वाडोर विश्व का पहला देश बना जिसने प्रकृति को अधिकार दिए। साथ ही देश के नागरिकों को इसके लिये मुकद्मा करने की आजादी और ताकत भी दी। उसके ठीक अगले साल बोलीविया ने ‘धरती माँ का कानून’ से इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। वर्ष 2010 में न्यूजीलैंड ने वांगनुई नदी को कानूनी तौर पर एक व्यक्ति का दर्जा दिया।

अमेरिका के एक कानूनविद क्रिस्टोफर स्टोन ने सबसे पहले इस तरह के विचार दिए। उन्होंने वर्ष 1972 में अपने मशहूर लेख ‘शुड ट्रीज हैव स्टैंडिंग’ प्रकाशित किया। इसमें इनका तर्क था कि मनुष्य को केंद्र मानने वाले अतार्किक विचार ने एक अलग दुनिया बनाई है। इस दुनिया में प्रकृति के होने का उद्देश्य मानव जाति को लाभ या आनंद पहुँचाना भर है। अपने लेख में वह आगे कहते हैं कि इसके पहले कि हम प्रकृति का क्षरण उस स्तर तक कर दें जहा से वापसी सम्भव ही न हो, हमें प्रकृति को कानूनी तौर पर अधिकार देने के बारे में गम्भीरता से विचार करना चाहिए। इसमें स्टोन वनों को कानूनी अधिकार, समुद्र, नदियों और तमाम प्राकृतिक चीजों के लिये समग्रता में अधिकार की बात करते हैं।

स्टोन के इस विचार के आलोचकों का तर्क है कि सम्पूर्ण प्रकृति को कानूनी अधिकार देने के पीछे कोई पुख्ता दार्शनिक आधार नहीं है। इनके विचार में, पृथ्वी पर कुछ जीव ही हैं जो किसी तरह के नैतिकता का दावा कर सकते हैं। जैसे मनुष्य और कुछ बड़े जीव जैसे बन्दर, हाथी और डॉलफिन-ऐसे स्तनधारी जीव जिनके पास स्वयं के होने को लेकर कोई चेतना मौजूद है।

पर उस तरह के जीव जो तकलीफ होने पर इसको व्यक्त करते तो हैं पर उनकी स्वयं की कोई चेतना नहीं होती-जैसे चूहे। इस तरह के जीवों को खाया जा सकता है या इन पर किसी तरह का प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि उन्हें किसी ‘अन्याय’ से पीड़ित होने का एहसास नहीं है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि ये परिभाषाएँ मानव निर्मित और विवादास्पद हैं।

प्रकृति को एक कानूनी इंसान के तौर पर देखना भी व्यावहारिक समस्याओं का पिटारा खोलता है। जैसे नदी से जुड़े फैसले को ही देख लें। यह फैसला नदियों के अधिकार के बारे में नहीं बताता। इस तरह के फैसले जितने जवाब ढूँढते हैं उससे कहीं अधिक सवाल पैदा करते हैं। मसलन, क्या एक नदी पर बाँध बनाना उचित है? क्या एक नदी की बेसिन ऐसी ही एक दूसरी नदी के बेसिन से जोड़ी जा सकती है, जो कि नदियों को आपस में जोड़ने की परियोजना का मुख्य उद्देश्य है? क्या इस तरह के निर्णय सभी उद्योग और नगरपालिकाओं को अपना कूड़ा इसमें डालने का दोषी मानते हैं? क्या हम न्यायालय द्वारा नियुक्त नदी के संरक्षक पर भरोसा कर सकते हैं?

-राकेश कलशियान जाने माने विज्ञान लेखक हैं।

‘नदियों के रख-रखाव की दिशा में पहला कदम’


एरिन ओ’ डोनेल और जूलिया टैलबोट-जोंस

पिछले दिनों, विश्व मानव बिरादरी को कानूनी तौर पर तीन नए और अनूठे नागरिक मिले हैं-न्यूजीलैंड में वांगनुई नदी, भारत में गंगा और यमुना नदी। न्यूजीलैंड सरकार ने कानून बनाकर वांगनुई नदी क्षेत्र को एक ‘मानव’ का दर्जा प्रदान किया है। वर्षों से लम्बित ‘वातंगी-समझौते’ के फलस्वरूप यह महत्त्वपूर्ण कानूनी सुधार किया गया।

भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ जब उत्तराखंड उच्च-न्यायालय ने गंगा और यमुना नदी को वे सारे अधिकार दिए जो संविधान द्वारा एक सामान्य नागरिक को मिलते हैं। कानूनी की दृष्टि में वैधानिक-अधिकार और मानवाधिकार एकसमान नहीं हैं। एक ‘वैधानिक-व्यक्ति’ जरूरी नहीं कि एक मनुष्य ही हो। उदाहरण के लिये निगम को ही देख लें। कानूनी तौर पर इन्हें भी एक ‘वैधानिक- व्यक्ति’ के अधिकार प्राप्त हैं और इसके तहत कई कम्पनियों को खास वैधानिक-अधिकार दिए जाते हैं। इस तरह कम्पनी को वैधानिक-तौर पर उसके मालिक और शेयर धारक से अलग किया जाता है।

प्रकृति को वैधानिक अधिकार देने का मतलब है कानून, ‘प्रकृति’ को एक वैधानिक व्यक्ति के तौर पर देखें। जिसके तहत ‘प्रकृति’ को किसी आम नागरिक की ही तरह मुकद्मा चलाने का अधिकार होता है। केवल यही नहीं, इसमें किसी के साथ कानूनी समझौता करने और सम्पत्ति रखने का अधिकार भी दिया जाता है।

हालांकि केवल ये अधिकार दिया जाना ही काफी नहीं है। एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या इस तरह के कानूनी अधिकार प्रकृति के लिये किसी मतलब का है भी या नहीं? इतिहास तो कम-से-कम इसी ओर इशारा करता है कि अगर इसे सही ढंग से लागू नहीं किया गया तो यह बेमतलब साबित होगा।

एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि एक निर्जीव वस्तु के रूप में नदी को वैधानिक रूप से एक नागरिक का दर्जा कैसे मिल सकता है? सबसे पहले तो इसके लिये एक व्यक्ति या संरक्षक का चुनाव करना होगा जो उस नदी का प्रतिनिधित्व करे। अगला कदम इस संरक्षक को उक्त संसाधन यानि नदी का उपयोग करने वाले को अपने अधिकार, कर्तव्य और जिम्मेदारियों की सटीक जानकारी रखना है, ताकि नदी को दिए गए अधिकारों को लागू किया जा सके। केवल कानूनी अधिकार होना ही काफी नहीं होता बल्कि उस अधिकार की रक्षा का अधिकार होना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इसलिये अगर प्रकृति के अधिकार को लागू करना है तो इसके लिये पर्याप्त धन और कानूनी विशेषज्ञता की जरूरत पड़ेगी।

कुल मिलाकर इस तरह के अधिकार को लागू करने के लिये न केवल केंद्र और राज्य सरकार से विधायी स्वतंत्रता की जरूरत पड़ेगी, बल्कि कानून के अन्तर्गत कोई कार्यवाही करनी हो तो वास्तविक ताकत भी चाहिए। खासकर जब इस तरह की कार्यवाही राजनीतिक तौर पर विवादास्पद हो।

न्यूजीलैंड और भारत को नदियों के वैधानिक अधिकार को लागू करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। इन मुश्किलों से निपटने के लिये न्यूजीलैंड अभी भारत से बेहतर स्थिति में है। न्यूजीलैंड में इस नए कानून का पालन करवाने के लिये कोई नई संस्था नहीं बनानी पड़ेगी। जबकि भारत को जल्द ही इसके लिये एक नई संस्था बनानी पड़ेगी।

न्यूजीलैंड के वांगनुई नदी क्षेत्र को किसी आम नागरिक जैसा कानूनी अधिकार मिलना पिछले आठ साल के प्रयास से हुए समझौते का परिणाम है। राष्ट्रीय स्तर पर लागू इस कानून के मुताबिक वांगनुई नदी क्षेत्र का स्वामित्व अब से एक वांगनुई नदी नामक एक जीवित सत्ता को दिया गया है, जिसे स्थानीय भाषा में ते-अवा-तुपुआ भी कहते हैं। इसी के साथ वांगनुई नदी के संरक्षक को इस नदी के हितों की निगरानी की जिम्मेदारी भी दे दी गई है।

संरक्षक की जिम्मेदारी दो लोगों को दी गई है। एक का चुनाव स्थानीय माओरी समाज करेगा और दूसरे का चुनाव न्यूजीलैंड सरकार करेगी। नदी की देखभाल और कानूनी रूपरेखा लागू करने के लिये कोष भी बनाया गया है।

इसके विपरीत, भारत में एक उच्च-न्यायालय ने रातों रात यह फैसला सुना दिया कि गंगा-यमुना को कानूनन नाबालिक माना जाएगा और इनके संरक्षक के तौर पर तीन लोगों का चुनाव किया। इसमें नमामि गंगे परियोजना के महानिदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को शामिल किया गया है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि आठ सप्ताह के अन्दर नया बोर्ड बन जाना चाहिए जो नदियों की सफाई और देखभाल सुनिश्चित करेगा।

भारत के संदर्भ में अभी भी कुछ बड़े सवाल हैं, जैसे इन नदियों के संरक्षकों की भूमिका और जिम्मेदारियाँ क्या होंगी? किस अधिकार को कब लागू करना है और इसका फैसला ये कैसे करेंगे? इन लोगों की जवाबदेही कौन तय करेगा इत्यादि। न्यूजीलैंड में वांगनुई नदी के मामले में भी जल-अधिकार और इसको लागू करने का सवाल अभी अनसुलझा है। उदाहरण के लिये तोंगारिरो पावर स्कीम के तहत जल निकासी एक बड़े विवाद का विषय रहा है, लेकिन नए कानून में इसको नजरअंदाज कर दिया गया है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘प्रकृति’ को वैधानिक अधिकार देना दरअसल एक लम्बी कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत भर है। बेशक वैधानिक अधिकार और उससे जुड़े कानून रातोंरात बनाए जा सकते हैं, लेकिन इन अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिये जरूरी सांगठनिक ढाँचा बनाने में समय और धन लगता है।

एरिन ओ डोनेल, मेलबोर्न विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर रिसोर्सेज, एनर्जी एनवायरन्मेंट लॉ में सीनियर फेलो हैं। जूलिया टैलबोट-जोंस, ऑस्ट्रेलिया राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एनवायरन्मेंटल/इंस्टीट्यूशनल इकोनॉमिक्स में, पीएचडी कैंडिडेट हैं। यह लेख मूलतः द कन्वर्सेशन में छपा था।

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