गढ़वाल और कुमाऊं मंडल (Garhwal and Kumaon Division)

Submitted by Hindi on Mon, 05/15/2017 - 16:16
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Source
उत्तराखंड उदय, 2015, अमर उजाला

गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में बंटे उत्तराखण्ड में कुल 13 जिले हैं। सात जिले- देहरादून, हरिद्वार, चमोली, उत्तरकाशी, पौड़ी गढ़वाल, टिहरी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग गढ़वाल मंडल के तहत आते हैं। जबकि शेष छह जिले- नैनीताल, अल्मोड़ा, ऊधमसिंह नगर, पिथौरागढ़, चम्पावत और बागेश्वर कुमाऊं मंडल के तहत आते हैं। उत्तराखण्ड में विधानसभा की 70 लोकसभा की पांच और राज्य सभा की तीन सीटें हैं। देहरादून राज्य की अस्थायी राजधानी है, जबकि उत्तराखण्ड का उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थित है।

गढ़वाल मंडल

गढ़वाल मंडल -


देहरादून

देहरादून उत्तराखण्ड की अस्थायी राजधानी है। इसके पूर्व में गंगा और पश्चिम में यमुना है। यह उत्तर में हिमालय और दक्षिण में शिवालिक पर्वत मालाओं से घिरा है। बासमती चावल, चाय और लीची यहाँ के मुख्य उत्पाद हैं। देहरादून अपनी प्राकृतिक सुन्दरता एवं शैक्षणिक संस्थानों के लिए प्रसिद्द है। यहाँ उत्तर भारत में सर्वाधिक वर्षा होती है। वन अनुसन्धान संस्थान, दून स्कूल और भारतीय सैन्य अकादमी जैसे संस्थान इसे शैक्षणिक रूप से उर्वर बनाते हैं। वैसे इस जिले का उल्लेख पौराणिक सन्दर्भों में भी मिलता है। माना जाता है कि यह महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु आचार्य द्रोण का नगर था। द्रोणाचार्य ने यहाँ तपस्या भी की थी। इतना ही नहीं स्कन्द पुराण में दून को केदारखंड (शिव का आवास) नामक क्षेत्र का हिस्सा बताया है। कहा यह भी जाता है कि 17वीं शताब्दी में गुरु रामराय जी और उनके अनुयायियों द्वारा यहाँ डेरा डालने की वजह से इसका नाम डेरादून पड़ा जो बाद में देहरादून हो गया।

हरिद्वार


हरिद्वार की गिनती धार्मिक नगरों में होती है। यह हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। 3139 मीटर की ऊँचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख से करीब 250 किलोमीटर यात्रा तय करके जब गंगा मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है, तो पहला जिला हरिद्वार ही है। इसलिए इस जिले को गंगा द्वार के नाम से भी जाना जाता है। वैसे इसका शाब्दिक अर्थ हरि का द्वार है यानि ईश्वर का द्वार है। यह उन स्थानों में से है जहाँ पवित्र कुम्भ का आयोजन होता है। हर की पौड़ी को हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट मन जाता है। हरिद्वार, सहारनपुर डिवीजन कमिश्नरी के हिस्से के रूप में अस्तित्व में आया, जो उत्तराखण्ड के गठन के बाद राज्य का हिस्सा बन गया। इसके पश्चिम में सहारनपुर, उत्तर पूर्व में देहरादून, पूर्व में पौड़ी गढ़वाल और दक्षिण में रुड़की, मुज्जफरनगर और बिजनौर हैं। पूरे जिले को मिलाकर एक संसदीय क्षेत्र है। राष्ट्रीय जलमार्ग 58 के जरिये हरिद्वार सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। जबकि हरिद्वार रेलवे स्टेशन चहल-पहल वाला स्टेशन माना जाता है। यहाँ से देश के सभी प्रमुख नगरों के लिए आवागमन की सुविधा है। इसके अलावा निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट, देहरादून में है। धार्मिक स्थल के रूप में पहचान रखने वाले जिले में राज्य गठन के बाद औद्योगिक गतिविधियों में खासी तेजी आई है। उत्तराखण्ड राज्य ढांचागत और औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड एस्टेट (सिडकुल) में जिले ने एकीकृत औद्योगिक एस्टेट (आईआईई) की स्थापना की। आईआईई में कई प्रमुख कंपनियों ने अपनी औद्योगिक इकाइयों की स्थापना की है। जिले के रानीपुर में स्थित भारत हैवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड (भेल) का परिसर करीब 12 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है।

चमोली


हेमकुंड साहेब, बदरीनाथ जैसे तीर्थस्थल और फूलों की घाटी, ओली जैसे पर्यटन के लिए मशहूर चमोली वन सम्पदा को बचाने के लिए हुए चिपको आन्दोलन के लिए भी मशहूर है। यहीं इस आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। वैसे यह जिला खनिज-सम्पदा के मामले में भी धनी है। अभ्रक, लोहा, तांबा, ग्रेफाईट, शीशा, जिप्सम, सल्फर जैसे खनिज तत्व यहाँ पूर्व में पाए गये हैं। यह राज्य का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। इसकी सीमा उत्तरी तिब्बत में लगी हुई है। इसके पूर्व में पिथौरागढ़ और बागेश्वर, दक्षिण में अल्मोड़ा, दक्षिण पूर्व में गढ़वाल, पश्चिम में रुद्रप्रयाग और दक्षिण पश्चिम में उत्तरकाशी जिले हैं। राजजात यात्रा जिन तीन जिलों से होकर गुजरती है, उसमें एक चमोली भी है। यहाँ की जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा भोटिया जनजाति का है। इस जिले का प्रशासनिक मुख्यालय गोपेश्वर में है।

उत्तरकाशी


भागीरथी के किनारे बसे इस शहर के खास आकर्षण की वजह विश्वनाथ का मंदिर है। इसे आश्रमों का शहर भी कहा जाता है। यहाँ पर हर चार कदम पर कोई आश्रम मिल जाता है। 24 फरवरी 1960 में उत्तरकाशी जिले की स्थापना हुई। इससे पहले यह चमोली, पौड़ी और टिहरी क्षेत्रों का हिस्सा था। नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ माउन्टेनियरिंग भी इसे जिले में है जिसकी गिनती देश के बेहतरीन पर्वतारोहण संस्थानों में होती है। इसे सौम्य काशी भी कहा जाता है। यहाँ छोटी बड़ी कई नदियाँ है। गोमुख और यमुनोत्री की वजह से यह महत्त्वपूर्ण पर्यटन व धार्मिक स्थल है।

पौड़ी गढ़वाल


पौड़ी गढ़वाल जिला हरिद्वार, देहरादून, टिहरी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, चमोली, अल्मोड़ा और नैतीताल जिलों से घिरा है। इसका दक्षिणी हिस्सा उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले को भी छूता है। इसका मुख्यालय पौड़ी है, जो समुद्र तल से 1650 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। पौड़ी गढ़वाल सर्दियों में बहुत सर्द हो जाता है। यहाँ के कई इलाके बर्फ से घिर जाते हैं। इसीलिए गर्मी यहाँ का सुहावना मौसम माना जाता है। हालांकि कोटद्वार और आसपास के भाबर क्षेत्रों का तापमान गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। पौड़ी, कोटद्वार, लैंसडाउन और श्रीनगर यहाँ के प्रमुख केंद्र हैं।

टिहरी गढ़वाल


टिहरी बांध से बिजली बनाने की वजह से उत्तराखण्ड के आर्थिक विकास में इस जिले का खासा योगदान है। टिहरी गढ़वाल का प्रशासनिक मुख्यालय नई टिहरी में स्थित है। यह जिला पूर्व में रुद्रप्रयाग से, पश्चिम में देहरादून से, उत्तर में उत्तरकाशी से और दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल से घिरा है।

माना यह भी जाता है कि टिहरी मन, वचन और कर्म यानि सोच, शब्द और कार्य से पैदा हुए पापों को धोने का स्थल है। मन, वचन और कर्म के सहयोग से ही टिहरी शब्द गढ़ा गया है। टिहरी गढ़वाल के कुछ हिस्से को पौड़ी गढ़वाल और चमोली से मिलाकर रुद्रप्रयाग जिला बनाया गया है।

रुद्रप्रयाग


अलकनंदा और मन्दाकिनी के संगम पर बसा पंचप्रयागों में से एक रुद्रप्रयाग की धार्मिक मान्यता बहुत ज्यादा है। अलकनंदा यहीं से आगे बढ़कर भागीरथी से मिलती हुई गंगा की ओर बढ़ती है। विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर रुद्रप्रयाग से 86 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वर्ष 1997 में रुद्रप्रयाग जिला अस्तित्व में आया। इसके उत्तर में उत्तरकाशी, पूर्व में चमोली, दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल और पश्चिम में टिहरी गढ़वाल है। इसका प्रशासनिक मुख्यालय रुद्रप्रयाग में ही है। उल्लेखनीय है कि रुद्रप्रयाग में प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 1120 है, इसलिए इसकी गिनती देश के छंठे सबसे ज्यादा लिंगानुपात वाले जिले में होती है।

कुमाऊं मंडल


अल्मोड़ा

यहाँ महात्मा गाँधी ने कुछ दिन प्रवास किया था। यहां आकर उनके शब्द थे- मैं यह सोचकर हैरान हूँ कि भारत के लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप क्यों जाते हैं? पहाड़ों की गोद में बसे अल्मोड़ा चीड़ और देवदार के घने जंगलों से घिरा है। यह सुयाल और कोसी नदी के बीच स्थित है, और इसका आकर घोड़े की काठी की तरह है। यह कुमाऊं क्षेत्र का बेहद चर्चित हिल स्टेशन है। वैसे अल्मोड़ा सिर्फ प्राकृतिक सुन्दरता का ही धनी नहीं है, बल्कि कुमाऊं मंडल का सांस्कृतिक केंद्र भी है। इसे मंदिरों का शहर भी कहते हैं। कसार देवी, नंदा देवी, डोली दाना, अष्ट भैरव, रघुनाथ मंदिर जैसे कई धार्मिक स्थल इस जिले की शोभा हैं। कसार देवी मंदिर में तो स्वामी विवेकानंद भी शीश नवा चुके हैं। इतिहासकारों की मान्यता है कि सन 1563 में चंद वंश के राजा बालो कल्याणचंद ने आलमनगर के नाम से इसे बसाया था। चंद वंश की राजधानी पहले चम्पावत में थी। कल्यानचंद ने आलमनगर (अल्मोड़ा) के महत्त्व को समझते हुए इसे अपनी राजधानी बनाया। चंद वंश के बाद यहां कत्यूरी वंश का शासन रहा। 18वीं शताब्दी में यहाँ गोरखा आये, और फिर 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश हुकूमत का झंडा फहराने लगा। कुमाऊनी संस्कृति की असली छाप अल्मोड़ा में ही दिखायी देती है। यहां की मुख्य फसलें चावल, चाय, मक्का और गेहूं है, जबकि यहां के बाग सेब, अनानास, नाशपाती जैसे फलों से भी पटे रहते हैं। अल्मोड़ा मैग्नेटाइट और ताम्बे के खदानों के लिए भी विशेष तौर पर जाना जाता है। अल्मोड़ा जिले का मुख्यालय अल्मोड़ा में ही है।

ऊधमसिंह नगर



ऊधमसिंह नगर जिला 1995 में अस्तित्व में आया है। पहले यह नैनीताल का हिस्सा था, मगर 30 सितम्बर 1995 को तराई क्षेत्र को अलग करके ऊधमसिंह नगर जिला बना दिया गया। इस जिले के उत्तर में नैनीताल है, तो पूर्वोत्तर में चम्पावत। इसकी सीमा नेपाल से भी लगती है, जो इसके पूर्व में स्थित है। इसकी दक्षिण और पश्चिम सीमा उत्तर प्रदेश से मिलती है। इस जिले का नाम स्वतंत्रता सेनानी ऊधमसिंह के नाम पर रखा गया है। ऊधमसिंह ही वह सेनानी थे, जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड का बदला जनरल डायर की हत्या करके लिया था। यह नगर कुमाऊं के औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यहां मुख्यतः हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी भाषा बोली जाती है। रुद्रपुर इस जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है। यहाँ काशीपुर में लगने वाला चैती मेला काफी प्रसिद्ध है। इसी तरह नवरात्र में लगने वाला अटरिया मेला भी हजारों श्रद्धालुओं का गवाह बनता है। जिले के पन्त नगर में गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय है, जो देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय है।

सिडकुल ने इस जिले में दो आईआईई (पंतनगर और सितारगंज) स्थापित किये हैं। टाटा, बजाज, नेस्ले, डाबर जैसी कई बड़ी कंपनियों ने दोनों आईआईई में अपनी औद्योगिक इकाईयां स्थापित की हैं।

पिथौरागढ़


पिथौरागढ़ जिला 1960 में अस्तित्व में आया है। यह सोर घाटी के मध्य में है। यहां की हरी-भरी वादियों में हर वो चीज मिलती है, जो कश्मीर में मिल सकती है। जोलिंगकांग और अंछेरीताल जैसे झील यहां के आकर्षण तो हैं ही, यहां होने वाली सीढ़ीनुमा खेती भी पर्यटकों का मन मोह लेती है। नदी-घाटियाँ तो इतनी है कि इसे नदी-घाटियों का जनपद भी कहा जाता है। इन्ही चंद वजहों के कारण पिथौरागढ़ ‘लिटिल कश्मीर’ के नाम से चर्चित है। यह अल्मोड़ा, चम्पावत, बागेश्वर और चमोली जिले से घिरा हुआ है। प्राकृतिक सुन्दरता के अतिरिक्त लोहाघाट में स्थित रीठा साहब, अबूत पर्वत, बलेश्वर, देवीधार का वराशी मंदिर, बाणासुर का किला जैसे आकर्षण इस जिले को खास बनाते हैं।

चंपावत


कुमाऊं मंडल में बसे इस पौराणिक शहर का एक छोर बेहद गर्म है, तो दूसरा बेहद ठंडा। इसकी वजह यह है कि इसके एक ओर टिहरी है, तो दूसरी ओर विशाल पर्वत हैं। विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और पेड़-पौधों की होने की वजह से यहाँ वन क्षेत्र की अधिकता है। आंवला, युकेलिप्टस, बबूल, मदार, सागौन और जामुन के वृक्ष यहां पर बहुतायत में पाए जाते हैं। वर्ष 1997 में 15 सितम्बर को चंपावत नए जिले के रूप में अस्तित्व में आया। यह पहले अल्मोड़ा का हिस्सा था, जिसे 1972 में पिथौरागढ़ का हिस्सा बना दिया गया। इसका नामकरण राजा अर्जुन देव की पुत्री चंपावती के नाम पर किया गया है।

सामरिक दृष्टि से भी चंपावत उत्तराखण्ड का एक बेहद महत्वपूर्ण जिला है। यहां से गुजरने वाली काली नदी भारत और नेपाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा है। हर साल रक्षाबंधन के अवसर पर श्रावणी पूर्णिमा को वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में देवीधुरा मेला लगता है, जिसमें भक्त एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं।

बागेश्वर


सरयू, गोमती और लुप्त भागीरथी के संगम पर बसे इस शहर को शिव की नगरी कहा जाता है। यह बागनाथ मंदिर, जागेश्वर में शिव के ज्योतिर्लिंग जैसे कई तीर्थस्थलों की धरती है। पुराणों के अनुसार, बागेश्वर की भूमि मानव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाती है। पूर्व में भीलेश्वर और पश्चिम में नीलेश्वर पर्वतों से घिरे बागेश्वर के उत्तर में सूरजकुंड और दक्षिण में अग्नि कुंड है।

यही वजह है कि यह जिला धार्मिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। भारत का स्विटजरलैंड कहा जाने वाला कौसानी भी बागेश्वर में है, जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी कुछ समय गुजारा था। और उन्होंने इस स्थान की जमकर तारीफ भी की थी।

बागेश्वर का प्रशासनिक मुख्यालय बागेश्वर में ही है। इस जिले के पश्चिम और उत्तर-पश्चिम में चमोली, पूर्वोत्तर तथा पूर्व में पिथौरागढ़ और पश्चिम में अल्मोड़ा है।

मकर संक्राति के अवसर पर यहां लगने वाले उत्तरायण मेला की चर्चा देश-दुनिया में होती है।

नैनीताल


नैनीताल झीलों का शहर है। नैनी यहाँ की प्रमुख झील है, जिसके नाम पर इसका नाम नैनीताल पड़ा। नैनीताल को पहचान दिलाने का श्रेय पी. बेरून नमक चीनी व्यापारी को जाता है। अपने दोस्त के साथ वह यहां जब शिकार कर रहे थे, तो अचानक ही नैनी झील के किनारे पहुंच गये। यहां की खूबसूरती देखने के बाद उन्होंने अपना कारोबार छोड़ दिया और इस झील के किनारे यूरोपीय कालोनी बसाई। वर्ष 1841 में इंग्लिशमैन कलकत्ता नामक पत्रिका ने जब इस कालोनी और झील के बारे में बताया, तो नैनीताल सुर्ख़ियों में आ गया। पत्रिका ने अल्मोड़ा के आसपास नैनीताल नामक, एक खूबसूरत झील की खोज की बात कही थी। नतीजतन 1847 तक आते-आते नैनीताल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया। यह कुमाऊं मंडल का मुख्यालय भी है। यहां का सबसे बड़ा शहर हल्द्वानी है।

मुख्य आकर्षणों में नैनादेवी मंदिर, हनुमान गढ़ी, मालरोड, एरियल रोपवे और नैना पीक जैसे स्थल गिने जाते हैं। नैनीताल को हिमालय का खूबसूरत गहना भी कहा जाता है।

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