समाज का प्रकृति एजेंडा - वन

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मौजूदा कायदे-कानूनों के बन्धनों के कारण आम आदमी जंगल में जाकर वृक्षारोपण नहीं कर सकता पर अपने घर के आस-पास तो वृक्ष लगाने का काम कर सकता है। उनकी रक्षा कर सकता है। अपने मित्रों, सगे सम्बन्धियों तथा परिचितों को पेड़ लगाने के लिये प्रेरित कर सकता है। अनेक नगरीय निकाय तथा पंचायतें स्मृति-वनों को प्रोत्साहित करते हैं। हम अपने आस-पास प्राण वायु बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को सफल बनाने में अपना योगदान दे सकते हैं। सूखते पेड़ों को पानी देकर उन्हें बचा सकते हैं।समाज को वनों और उनकी जैवविविधता की चिन्ता करनी चाहिए। इसके बिना समाज का प्रकृति एजेन्डा अधूरा है। यदि हम अतीत में देखें तो पता चलता है कि आज से लगभग 4000 साल पहले से वनों की रक्षा के उल्लेख मिलने लगते हैं। गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों में कहा था कि हर व्यक्ति को हर पाँच साल में एक वृक्ष लगाना चाहिए। सम्राट अशोक ने वनों, वन्य जीवों के संरक्षण और उनकी सुरक्षा के बारे में आदेश दिये थे। भारतीय संस्कृति में मानव, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, जल-जीव, पेड़-पौधे-लताएँ, नदी-तालाब-झरने, मिट्टी-पहाड़ इन सबका परस्पर-निर्भर संबंध खोजा गया था। उस पर शोध किया गया और प्रामाणिकता के साथ अच्छी-अच्छी बातों को आचरण में ढाला गया है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है -

दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः।
दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः।


मत्स्यपुराण में ऋषि मनीषा कहती हैं - “एक बावड़ी दस कुओं के बराबर होती है। एक तालाब दस बावड़ियों के बराबर होता है। एक पुत्र दस तालाबों के बराबर होता है। एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है। यह उल्लेख वृक्षों की महत्ता और उपयोगिता को प्रतिपादित करता है।”

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है - “हे धरती माँ! जो कुछ मैं तुझसे लूँगा वह उतना ही होगा जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरी जीवनी शक्ति पर कभी आघात नहीं करूँगा। हे माता! एक पार्थिव गंध हम सबको एक सूत्र में बाँधे हुए है। यह सूत्र, यह नाता मनुष्य के साथ ही नहीं है, वरन पशु-पक्षी-नदी-पर्वत, जड़-चेतन, संपूर्ण जगत के साथ है। यह स्नेह बंधन इसी प्रकार बना रहे।”

एक बात और, जब कभी हम पानी और प्रकृति की चिंता तथा चर्चा करेंगे तो उसके साथ-साथ अनिवार्य रूप से पेड़, पहाड़, जीव-जन्तुओं, हवा, जैवविविधता की चिन्ता और चर्चा भी करनी पड़ेगी। प्राकृतिक घटकों को खंड-खंड में नहीं अपितु एक दूसरे के पूरक के रूप मान्यता देकर समाज के एजेन्डे पर लाना होगा। प्राकृतिक घटकों पर समग्रता में विचार करना होगा। वही समाज का एजेन्डा है। वही समाज की अपेक्षाओं का आईना है। वही हमारा भविष्य है। वही असली सरोकार है। वह चिन्ता, पर्यावरण चेतना है। उसी चेतना के कारण, अनेक बार, समाज मुख्य धारा में आया है।

पर्यावरण चेतना - इतिहास के पन्नों में


भारतवर्ष में पर्यावरण चेतना और अनुकूल विकास के प्रमाण वैदिककाल से मिलने लगते हैं। इसी कारण, हमारे प्राचीन ग्रन्थों में प्रकृति एवं उसके घटकों (वन, जल, वृक्ष, पर्वत, जीव-जन्तुओं इत्यादि) के प्रति विशेष सम्मान भाव तथा पूजा का उल्लेख मिलता है। द्वापर युग में कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत की पूजा को प्रकृति की पूजा माना जाता है। इस पूजा के पक्ष में तर्क देते हुये कृष्ण ने कहा था कि गोकुल ग्राम के पशुपालक समाज की आजीविका का आधार, गोवर्धन पर्वत की जैव-विविधता है।

भारतीय समाज ने स्थानीय पर्यावरण और मौसम-तंत्र के सम्बन्ध को अच्छी तरह समझकर नगर बसाना, खेती तथा पशुपालन करना एवं आजीविका को निरापद बनाना संभव बनाया था। उनके सम्बन्ध के विश्लेषण से पता चलता है कि अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बसे भारतीय ग्रामों ने खेत, खलिहान, चारागाह, जंगल और बाग-बगीचों की एक-दूसरे पर निर्भर तथा मद्दगार प्रणाली विकसित कर ली थी। यह प्रणाली स्थानीय जरूरतों की पूर्ति के साथ-साथ जलवायु के अनुकूल थी। यह प्रणाली बाह्य मदद से पूरी तरह मुक्त थी। निरापद थी। साईड-इफेक्ट से मुक्त थी। उसकी चर्चा खेती वाले हिस्से में विस्तार से की गई है।

भारत के अलावा, अरब देशों के चिकित्सा शास्त्रों में वायु, जल, मृदा प्रदूषण तथा ठोस अपशिष्टों की व्यवस्था करने का उल्लेख है। इसी प्रकार, जब लन्दन में कोयले के धुएँ के कारण प्रदूषण बढ़ गया तो सन 1272 में, ब्रिटेन के शासक किंग एडर्वड प्रथम ने कोयला जलाना प्रतिबंधित किया। औद्योगिक इकाईयों द्वारा छोड़े धुएँ के कारण जब वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ा तो ब्रिटेन ने सन 1863 में ब्रिटिश एल्कली एक्ट (पर्यावरण कानून) पारित किया। इस कानून की मदद से हानिकारक गैसों द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण को रोका गया। महारानी विक्टोरिया के शासन काल में चलो प्रकृति की ओर लौटें (Back to Nature) आंदोलन हुआ, जनचेतना बढ़ी तथा प्राकृतिक संरक्षण के लिये अनेक सोसायटियों का गठन हुआ। सन 1739 में बैंजामिन फ्रेंकलिन तथा अन्य बुद्धिजीवियों ने चमड़ा उद्योग को हटाने तथा कचरे के विरुद्ध, अमेरिका की पेन्सिलवानिया एसेम्बली में, पिटीशन दायर की। 20 वीं शताब्दी में, पर्यावरण आंदोलन का विस्तार हुआ तथा वन्य जीवों के संरक्षण की दिशा में प्रयास हुये।

सन 1962 में, अमेरिकी जीवशास्त्री रचेल कार्सन की पुस्तक (साइलेन्ट स्प्रिंग) प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में डी.डी.टी. तथा अनेक जहरीले रसायनों के कुप्रभावों के बारे में जानकारी दी गई थी। जानकारी से पता चला कि डी.डी.टी. तथा अन्य कीटनाशियों के उपयोग से लोगों में कैन्सर पनप रहा है। पक्षियों की संख्या में कमी आ रही है। इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद, अमेरिका में पर्यावरण के प्रति जनचेतना बढ़ी। सन 1970 में एन्वायरन्मेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी का गठन हुआ। सन 1972 में डी.डी.टी. के उपयोग पर रोक लगी। इसी दौरान, अनेक नये पर्यावरण समूह जैसे ग्रीनपीस तथा पृथ्वी मित्र (Friends of the Earth) अस्तित्व में आये।

भारत के प्रमुख वृक्ष बचाओ आंदोलन


पर्यावर्णीय ह्रास का सबसे अधिक प्रभाव गरीब लोगों पर पड़ता है इसलिये जब असहायता की स्थिति निर्मित होती है तो प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण खोता समाज मुखर होने लगता है और उम्मीद की टूटती डोर की कोख से पर्यावर्णीय आंदोलन प्रारम्भ होते हैं। भारत के प्रमुख वृक्ष बचाओ आंदोलन निम्नानुसार हैं-

विश्नोई समाज का वृक्ष बचाओ आन्दोलन


सन 1737 में जोधपुर रियासत में वृक्षों की रक्षा के लिये आन्दोलन हुआ था। जोधपुर के महाराजा अभय सिंह किले का निर्माण कराना चाहते थे। उन्होंने अपने सैनिकों को चूना बनाने के लिये बड़ी मात्रा में खेजड़ी के वृक्षों को काटने के आदेश दिये। विश्नोई समाज की अमृतादेवी तथा उनकी तीन पुत्रियों ने राजाज्ञा का विरोध किया। उन्होंने वृक्षों को बचाने के प्रयास में अपने प्राणों की आहुति दी। उनके बलिदान की सूचना विश्नोई समाज में फैल गयी। सूचना पाकर 83 गाँवों के विश्नोईयों ने आंदोलन किया। इस आन्दोलन में 363 व्यक्तियों की जान गई। इस बलिदान के बाद, जोधपुर नरेश ने विश्नोई ग्रामों के समीप के वनों तथा वन्य जीवों के संरक्षण के लिये आदेश जारी किया। इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य वृक्षों की रक्षा था। विश्नोई समाज में शवदाह की प्रथा नहीं है। यह प्रथा वृक्षों के प्रति उनकी आदर भावना की प्रतीक है।

चमोली का चिपको आन्दोलन


यह आन्दोलन उत्तरांचल के हिमालय क्षेत्र में सन 1973 में प्रारंभ हुआ था। चमोली जिले की स्वयं सेवी संस्था (दशौली ग्राम स्वराज मंडल) ने ग्रामीण समाज के सहयोग से वन संवर्धन का उल्लेखनीय कार्य किया है। चंडीप्रसाद भट्ट ने इसे जन आन्दोलन बनाया तथा ख्याति दिलाई।

चमोली जिले का स्थानीय समाज, खासकर रेनी, गोपेश्वर तथा डूंगरी-पायटोली गाँवों की ग्रामीण महिलायें अपनी आजीविका तथा चारा, ईंधन इत्यादि की आवश्यकता के लिये स्थानीय वनों पर आश्रित थीं। जंगल कटने से उनकी आजीविका पर संकट संभव था इसलिये जंगल काटने आये ठेकेदारों के लोगों को रोकने के लिये वे अपने बाल-बच्चों सहित आगे आईं। उन्होंने वृक्षों से चिपक कर, वृक्षों को बचाने का प्रयास किया था। धीरे-धीरे यह जन आन्दोलन आस-पास के क्षेत्रों में फैला, सर्वत्र उसकी चर्चा हुई, सबने आन्दोलन की आवश्यकता से सहमति जताई तथा पूरे देश-विदेश में उसका संदेश गया। चिपको आन्दोलन, वन संरक्षण का पर्याय बना और उसकी अलग पहचान बनी। कुछ लोग, इसे वन संरक्षण और पुनर्जीवन का सत्याग्रह मानते हैं। इस आंदोलन का एक और पक्ष है जो बताता है कि वन तथा सार्वजनिक भूमि भले ही सरकार की हो पर वह नैतिक रूप से, उस समाज की है जो अपनी आजीविका के लिये उससे जुड़ा है।

केरल राज्य की शान्त घाटी का आन्दोलन


केरल राज्य के पालघाट जिले में शान्त घाटी (Silent Valley) स्थित है। इस घाटी में शोर मचाने वाले कीड़ों (साइक्रेड) के नहीं मिलने के कारण उसे शान्त घाटी के नाम से जाना जाता है। इस घाटी में उष्णकटिबन्धीय वर्षा-वन पाये जाते हैं। ये जंगल अब विलुप्ति की कगार पर हैं। इस घाटी के जंगलों में मनुष्यों का बहुत कम हस्तक्षेप हुआ है। इस घाटी को पाँच लाख साल पुराने जैविक पालने (Biological Cradle) की भी संज्ञा दी जाती है। इन वनों में दुर्लभ जीव-जन्तु तथा पश्चिमी घाट में मिलने वाली कुछ दुर्लभ वनस्पतियाँ पाई जाती हैं।

कुछ साल पहले केरल सरकार ने इस क्षेत्र में जलविद्युत परियोजना के निर्माण का निर्णय लिया था। इस योजना से 60 मेगावाट बिजली और मलावार क्षेत्र की 10,000 हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई प्रस्तावित थी। सरकार ने इस योजना के प्रारंभिक कार्यों पर लगभग दो करोड़ खर्च भी किये हैं। इस योजना से शान्त घाटी के पर्यावरण तथा जैव विविधता को गंभीर खतरा संभावित था इसलिये कुछ पर्यावरणविदों तथा अनेक स्वयं सेवी संस्थानों ने योजना से असहमति जाहिर की। इसके बाद 30 अगस्त, 1979 को फ्रेन्डस ऑफ दी ट्रीज सोसाइटी (Friends of the trees Society) द्वारा दायर की याचिका पर केरल उच्च न्यायालय ने स्थगन आदेश दिया। भारत सरकार ने बढ़ते आन्दोलनों तथा बौद्धिक दबाव के कारण शान्त घाटी में जलविद्युत योजना को रोक दिया। इस आन्दोलन का उद्देश्य जैवविविधता तथा वर्षा-वनों की रक्षा था। यह जागरुकता और सामाजिक पहल का परिणाम भी है।

ऐपीको आंदोलन


उत्तरी कर्नाटक के समुद्र तट के समीप पश्चिमी घाट पर्वत श्रंखला है। यहाँ की जैवविविधता बहुत सम्पन्न है। इस क्षेत्र से बहुमूल्य औषधियाँ, चारा, फल तथा ईंधन प्राप्त होता है। इस क्षेत्र में सदाबहार वन पाए जाते हैं। चिपको आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए यहाँ के स्थानीय निवासियों ने वृक्षों की कटाई का विरोध किया था। सन 1983 में कालासेकुडरगोड के जंगलों में 150 महिलाओं तथा 30 पुरुषों ने वृक्षों से चिपक कर वृक्षों की रक्षा की थी। यह विरोध 38 दिन तक जारी रहा था। आन्दोलन के 38 दिन बाद, वृक्षों की कटाई पर रोक लगी। बेनगाँव, हर्से तथा निडिगोड के जंगल बचे। आम लोगों को सफलता मिली। इस आंदोलन से सारे दक्षिण भारत में जंगलों तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी। इस आन्दोलन का उद्देश्य सदाबहार वनों के वृक्षों के साथ-साथ जैवविविधता की रक्षा था।

वनों की आवश्यकता


वनों की आवश्यकता निर्विवाद है क्योंकि वे अपनी प्राकृतिक शुद्धिकरण व्यवस्था को सक्रिय रख ऑक्सीजन (प्राणवायु) का सन्तुलन बनाने तथा उसे संरक्षित करने में योगदान देते हैं। वनों के कम होने का मतलब है ऑक्सीजन की कमी। ऑक्सीजन की कमी का मतलब है जीवन पर संकट। इस आवश्यकता के कारण वे अपरिहार्य हैं। इसके अलावा, नदियों को पानी उपलब्ध कराने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मनुष्यों के लिये औषधियाँ, भोजन, उद्योगों के लिये कच्चा माल प्रदान करते हैं। तापमान नियंत्रण में योगदान देते हैं। मांसाहारी जानवरों से समाज को सुरक्षित रखते हैं।

पर्यावरण सन्तुलन एवं संरक्षण में उनका योगदान बहुआयामी और विविध है। वे पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) का सन्तुलन कायम रखने वाले प्रमुख एवं अनिवार्य घटक हैं।

जैवविविधता की आवश्यकता


इकोसिस्टम सेवाओं के लिये जैवविविधता अनिवार्य है। उसके घटने से गरीबी बढ़ती है। यह आश्चर्यजनक है कि आदिवासियों ने अपनी परम्परात व्यवस्थाओं और रीति-रिवाजों द्वारा जंगलों के पर्यावरण को काफी हद तक ठीक स्थिति में रखा है। इसके उलट, जैव विविधता का विकृत रूप, सामान्यतः उन इलाकों में देखा गया है जहाँ वन और जीवन के रिश्तों की अनदेखी करने वाला समाज निवास करता है। सभी सम्बन्धितों को इस हकीकत को अच्छी तरह समझने की आवश्यकता है।

वन संरक्षण - वन विभाग की भूमिका


कई लोग मानते हैं कि वन संरक्षण की जिम्मेदारी केवल वन विभाग की है। यह पूरी तरह सही नहीं है। यह सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक दायित्व भी है। उद्योगों की भी भूमिका है। कानून बनाने वालों की भी भूमिका है।

भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव आयेगा। तापमान में वृद्धि होगी तथा वाष्पीकरण बढ़ेगा। वनों और वन्य प्राणियों पर पानी का संकट बढ़ेगा। वनों और वन्य प्राणियों को जलाभाव के संकट से बचाने के लिये पानी की माकूल व्यवस्था करना आवश्यक होगा। उस व्यवस्था का लक्ष्य जल-स्वावलम्बन होना चाहिए ताकि वन अपनी प्राकृतिक जिम्मेदारी का निर्वाह कर सकें। जल स्वावलम्बन से ही जीव-जन्तुओं के लिये वन में भोजन और पानी का इन्तजाम सुनिश्चित होगा। फुड-चेन पर पड़ने वाले संभावित असर की कमियों को दूर करने के लिये परिणाममूलक प्रयास करने होंगे।

वन संरक्षण - आम आदमी की भूमिका


नागरिक जिम्मेदारी के अन्तर्गत समाज द्वारा वन विभाग को कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं। पहला सुझाव मौजूदा प्रयासों की समीक्षा हो सकता है। दूसरा सुझाव हो सकता है जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव को कम कर वनों की सेहत तथा दायित्वों को बरकरार रखना। अर्थात वन और जैवविविधता को सुरक्षित रखने के लिये प्रत्येक वन समूह (Forest Grid) को जलवायु की प्रतिकूलता से निपटने योग्य बनाना। इसके लिये वन विभाग को अपनी कार्ययोजना में दो प्रमुख सुधार करने की आवश्यकता होगी। पहले सुधार के अन्तर्गत वनों में पानी के भंडार, नदियों में अविरल प्रवाह के लिये योगदान, नमी की उपलब्धता, जैवविविधता और फुड-चेन जैसे अनेक बिन्दुओं को यथेष्ट रूप से समाहित करना होगा। दूसरे सुधार के अन्तर्गत भूमि कटाव और जल संरक्षण के कामों की तकनीकी दक्षता को और बेहतर बनाना होगा।

समाज द्वारा कार्य योजना में दोहन और उत्पादन के सन्तुलन एवं जैवविविधता को आदर्श बनाने तथा मिश्रित वनों को विकसित करने हेतु अनुरोध किया जा सकता है। समाज की अपेक्षा होगी कि सामुदायिक वनों के विकास में ग्रामीण समाज की जिम्मेदारी बढ़े। विभाग इस हेतु पहल करे। समाज चाहेगा कि वन सम्पदा का दोहन प्रकृति से तालमेल और वनों की कुदरती भूमिका को ध्यान में रखकर हो। वातावरण में ऑक्सीजन की कमी नहीं हो पाए। ऑक्सीजन की कमी के कारण जीवन पर संकट नहीं पनपे। समाज की यह भी अपेक्षा है कि सरकार की भूमिका संरक्षक तथा वन विभाग की भूमिका सहयोगी और उत्प्रेरक की हो। वनों की सुरक्षा करने वाले समाज को उसका ट्रष्टी और लाभार्थी बनाया जाना चाहिए। इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 में उल्लेखित ग्राम वन (Village Forest) की अवधारणा को लागू करना चाहिए।

मौजूदा कायदे-कानूनों के बन्धनों के कारण आम आदमी जंगल में जाकर वृक्षारोपण नहीं कर सकता पर अपने घर के आस-पास तो वृक्ष लगाने का काम कर सकता है। उनकी रक्षा कर सकता है। अपने मित्रों, सगे सम्बन्धियों तथा परिचितों को पेड़ लगाने के लिये प्रेरित कर सकता है। अनेक नगरीय निकाय तथा पंचायतें स्मृति-वनों को प्रोत्साहित करते हैं। हम अपने आस-पास प्राण वायु बढ़ाने वाले कार्यक्रमों को सफल बनाने में अपना योगदान दे सकते हैं। सूखते पेड़ों को पानी देकर उन्हें बचा सकते हैं।

हरियाली से जुड़ा हर प्रयास हकीकत में योगदान होता है। उस नागरिक दायित्व को पूरा करने के लिये अपने घर में किचिन गार्डन, फूल वाले वृक्ष तथा सब्जियाँ लगायें। संभव हो तो टैरेस-गार्डन विकसित करें। बड़े नगरों में कई मंजिला बिल्डिंग बनने लगे हैं। इनमें बहुत से लोग निवास करते हैं। उनकी ऑक्सीजन आवश्यकता को पूरा करने के लिये कई मंजिला बिल्डिंगों के आस-पास सघन वृक्षारोपण होना चाहिए। हर बसाहट के आस-पास ढ़ेर सारे पार्क होना चाहिए। ढ़ेर सारी हरियाली होना चाहिए।

लकड़ी के फर्नीचर का कम से कम उपयोग करें। कागज के इस्तेमाल में संयम बरतें। कागज के दोनों ओर लिखें। इससे लगभग 50 प्रतिशत कागज तो बचेगा ही वन भी बचेंगे। रीसाईक्ल्डि कागज का उपयोग बढ़ायें। उसी से बने लिफाफे, बधाई कार्ड और कम्पूटर संदेश का उपयोग करें। रेल टिकिट की हार्ड कापी के स्थान पर मोबाइल पर दर्ज टिकिट संदेश को बढ़ावा दें। अधिक से अधिक कैशलेस ट्रांजैक्शन करें। और भी अनेक तरीके हैं जिन्हें अपनाने से जंगल बचाये जा सकते है। सामाजिक दायित्व पूरा किया जा सकता है।

 

समाज, प्रकृति और विज्ञान


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पुस्तक परिचय : समाज, प्रकृति और विज्ञान

2

आओ, बनाएँ पानीदार समाज

3

रसायनों की मारी, खेती हमारी (Chemical farming in India)

4

I. पानी समस्या - हमारे प्रेरक

II. पानी समस्या : समाज की पहल

III. समाज का प्रकृति एजेंडा - वन

5

धरती का बुखार (Global warming in India)

6

अस्तित्व के आधार वन (Forest in India)

लेखक परिचय

1

श्री चण्डी प्रसाद भट्ट

2

श्री राजेन्द्र हरदेनिया

3

श्री कृष्ण गोपाल व्यास

4

डॉ. कपूरमल जैन

5

श्री विजयदत्त श्रीधर

 

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About the author

.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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