प्रदूषण के भिन्न पहलू (Different aspects of pollution)

Submitted by Hindi on Tue, 05/23/2017 - 11:49
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पर्यावरण प्रदूषण : एक अध्ययन, हिंद-युग्म, नई दिल्ली, अप्रैल 2016

पर्यावरण-प्रदूषण से छुटकारा पाने के लिये हमें नए वैज्ञानिक तरीके ढूँढने होंगे। पूर्वी वर्जिनिया के खूबसूरत पहाड़ों पर चट्टानों की खुदाई से पहाड़ों की चोटियाँ खिसकने लगी हैं। इन पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन और चट्टानों की खुदाई बड़े स्तर पर हो रही है। जिससे कोयले की खानें ऊपर आ रही हैं और ऑक्सीजन की बड़ी तादाद चट्टानों और जमीन के ढाँचे को खराब कर रही है। जिससे समस्त घाटी पर भार पड़ रहा है।हम ‘प्रदूषण’ शब्द को भिन्न-भिन्न अवसर और समय के अनुसार उपयोग करते हैं। लेकिन वो हर सूरत में हमारे रहन-सहन के पर्यावरण की गन्दगी और हमारे बाह्य मेल-मिलाप और व्यवहार में खराबी की तरफ इशारा करता है। यहाँ तक किसी जुर्म में किसी के दोषी करार होने पर उसे गलत तरीके से बचाना या किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से सजा दिलवाना भी एक किस्म का प्रदूषण है।

किसी और की जमीन और जायदाद पर गैरकानूनी ढंग से कब्जा जमाना या उसमें गन्दगी फैलाना, उस तहस-नहस करना भी एक किस्म का पर्यावरण प्रदूषण है।

औद्योगिक इकाइयों, शहरी बस्तियों और घूमने-फिरने की सार्वजनिक जगहों पर आवाज के प्रदूषण (शोर, गड़गड़ाहट, गैर-इन्सानी आवाजें वगैरह), गर्मी से प्रदूषण (जैसे तापमान में बढ़ोत्तरी से प्रदूषण), कूड़ा-करकट, गन्दगी, टूटी-फूटी कारों, मशीनों और पुर्जों के ढेर से दृष्टि प्रदूषण के उदाहरण रोज-ब-रोज आम होते जा रहे हैं।

इसी तरह मरे हुए जानवर, बेजान पौधे जैसी चीजें जमीन, समुद्र, झील, नदियों के आवश्यक सन्तुलन में विक्षोभ पैदा करती हैं और प्रदूषण फैलाने में मदद करती हैं। वनस्पति-जगत में कुछ ऐसे नमकीन किस्म के पौधे और जड़ी-बूटियाँ भी प्रदूषण फैलाने में मदद करते हैं। कारण अप्राकृतिक चीजें, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होती हैं, उगने लगती हैं। उदाहरण के तौर पर वह घास जिस पर कीटाणुओं को मारने के लिये दवाएँ डाली गई हैं, मीलों दूर अच्छी-भली घास को प्रभावित कर देती हैं और वहाँ ऐसे झाड़-झंखाड़ उगने लगते हैं जिन पर उखाड़ने वाली दवाओं का कोई असर नहीं होता। खेतों और फसलों के लिये इनको अच्छा नहीं माना जाता।

इन तमाम बातों से यह पता चलता है कि पर्यावरण में तरह-तरह का प्रदूषण फैलने से हमारी दुनिया में, प्राकृतिक चीजों, जैसे रासायनिक, जैविक, जमीन की सतह से ताल्लुक रखने वाली चीजों में बदलाव आ रहा है, जिनका प्रभाव मानव जीवन पर पड़ रहा है।

प्रदूषण प्राकृतिक आपदाओं और घटनाओं (जंगल में आग लगना, आग के पहाड़ों का फटना, पत्तियों और कलियों का खिलना, जलाशयों के किनारों पर पसन्द न होने वाले हालात पैदा होना, जैसे वो किसी नदी का किनारा हो या समुद्र का, वगैरह) से भी फैलता है। इनके अतिरिक्त लड़ाई के हथियारों में यूरेनियम का उपयोग, टैंकर, मोटरकारों, बसों वगैरह से तेल गिरने, औद्योगिक अवशिष्ट के उपयोग और गलत तकनीक के उपयोग के कारण भी पर्यावरण में प्रदूषण पैदा होता है। और यह बढ़ता ही रहता है (खासतौर पर जबकि ये सारी चीजें तेजी से फैल और बढ़ रही हैं, इससे बढ़कर अफसोस की बात यह है कि खुद इंसान इस प्रदूषण को बढ़ा रहा है)। एक तरफ तो गैरजरूरी खराब अपशिष्ट की पैदावार बढ़ रही है और वहीं दूसरी तरफ तरक्की के नाम पर बनने वाली चीजों का उत्पादन भी बढ़ रहा है। इसलिये हम पर्यावरण-प्रदूषण को कम करने के तरीकों को ईजाद कर लेने के बावजूद भी इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं।

पर्यावरण-प्रदूषण से छुटकारा पाने के लिये हमें नए वैज्ञानिक तरीके ढूँढने होंगे। पूर्वी वर्जिनिया के खूबसूरत पहाड़ों पर चट्टानों की खुदाई से पहाड़ों की चोटियाँ खिसकने लगी हैं। इन पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन और चट्टानों की खुदाई बड़े स्तर पर हो रही है। जिससे कोयले की खानें ऊपर आ रही हैं और ऑक्सीजन की बड़ी तादाद चट्टानों और जमीन के ढाँचे को खराब कर रही है। जिससे समस्त घाटी पर भार पड़ रहा है। अन्दाजा लगाया गया है कि 467 मील की लम्बाई घेरे हुए पानी के सोत वादी के अन्दर दफ्न हो चुके हैं। खानों की खुदाई के लिये गड्ढे खोदने से खनिज पदार्थ निकल आते हैं (खासकर कम गन्धक वाला कोयला या अयस्क जो लोहा और इस्पात बनाने के काम में आता है) जिससे आस-पास की जमीन की सतह पर दबाव बढ़ जाता है। ये गड्ढे कई किलोमीटर लम्बे और 500 मीटर तक गहरे होते हैं। जिन खानों से खास लोहा निकाला जाता है, उनमें गन्धक पैदा करने वाले तेजाब और भारी खनिज बाकी रह जाते हैं, जो जमीन में प्रदूषण करते रहते हैं। कोयले के कण फेफड़ों को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं। जो लोग काफी समय तक इन कणों के पास रहते हैं, उन्हें साँस से सम्बन्धित कई सारी बीमारियाँ हो जाती हैं।

जब से खानों की खुदाई में मशीनों का उपयोग शुरु हुआ है, इन कणों की मात्रा और इसके बुरे प्रभावों में कई गुना बढ़ोत्तरी हो गई है। जिसकी वजह से काम करने वाले मजदूरों के फेफड़े प्रभावित होते रहते हैं। और काले पड़ गए हैं। कुछ समय के बाद उनके फेफड़ों में सूजन आ जाती है। हवा की गुणवत्ता बनाए रखने वाले विभाग ने लोगों के स्वास्थ्य को ठीक रखने या पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिये अलग-अलग कानून बनाए हैं। हवा संबंधी कई कानून ने सल्फर डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइ़ड और ताँबा के बुरे प्रभाव, साफ हवा को साफ रखने के मानक निर्धारित किए हैं। और खानों की खुदाई के ऊपर कड़ी नजर रखी जा रही है।

नेशनल पॉल्यूटेंट डिस्चार्ज एलिमिनेशन सिस्टम के तहत नदियों और जलाशयों को कोयला और खानों के बुरे प्रभाव से बचाया जाता है।

इतना सब होने के बावजूद प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। अभी इस दिशा में और अधिक काम करने की जरूरत है।

 

पर्यावरण प्रदूषण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पर्यावरण प्रदूषण : आपबीती

2

प्रदूषण के भिन्न पहलू (Different aspects of pollution)

3

जल प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य (Water pollution and human health)

4

वायु प्रदूषण और मानव जीवन (Air pollution and human life)

5

ध्वनि प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य (Sound pollution and human health)

6

आर्सेनिक से पर्यावरण में प्रदूषण (Pollution in the environment from Arsenic)

7

प्रकाश से प्रदूषण (Pollution from light)

8

वातावरण में नमक की वजह से प्रदूषण (Road Salt Contamination)

9

सीसा जनित प्रदूषण (lead pollution in the environment)

10

रेडियोएक्टिव पदार्थों के कारण प्रदूषण (Radioactive Pollution)

11

आतिशबाजी के खेल से पर्यावरण में प्रदूषण (Pollution in the environment by fireworks)

12

लेखक परिचय - डॉ. रवीन्द्र कुमार

 

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About the author


.29 वर्ष से अधिक समय तक वैज्ञानिक की हैसियत से काम। 20 साल CSIR-NISCAIR के प्रकाशन ‘Indian Science Abstracts’ में एसोसिएट एडिटर और लगभग 10 साल ‘साइन्स की दुनिया’ (उर्दू) में सम्पादक की हैसियत से काम। अभी भी सलाहकार (Consultant) की हैसियत से ‘साइन्स की दुनिया’ से सम्बद्ध।

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