इंदौर में कुओं को फिर मिलेगा सम्मान

Submitted by Hindi on Thu, 05/25/2017 - 13:56


.इंदौर देश का शायद पहला ऐसा शहर बनने जा रहा है, जहाँ परम्परागत जलस्रोत कुओं को उनका खोया सम्मान लौटाने के लिये कवायद की जा रही है। इसके लिये साढ़े पाँच करोड़ की लागत से शहर के 329 कुओं को पहले चरण में चिन्हित कर उनकी साफ़–सफाई और उन्हें पानीदार बनाने की मुहिम प्रारंभ हो चुकी है। पर्यावरण विशेषज्ञों का दावा है कि तेजी से बढ़ते हुए इंदौर शहर की पानी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ जलस्तर बढ़ाने में भी ये कुएँ बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

मध्यप्रदेश में 25 लाख की आबादी वाले इस शहर में सन 2016 में एक सर्वे करवाते हुए यह जानने की कोशिश की थी कि यहाँ कितने कुएँ हैं और वे किस हालत में हैं। इस सर्वे की पड़ताल में जो मुख्य बातें सामने आई, उनसे पानी के परम्परागत जलस्रोतों के प्रति एक बार फिर विश्वास जगा है। इस सर्वे के मुताबिक शहर में कुल 629 कुएँ हैं और इनमें ज्यादातर घोर उपेक्षा के बाद भी ऐसी स्थिति में हैं कि थोड़ी साफ़–सफाई या गाद निकालकर उन्हें उपयोगी बनाया जा सकता है। इससे दो फायदे होंगे। एक तो पानी के लिये नल–जल योजना पर निर्भरता घटेगी वहीं दूसरी तरफ जमीन में पानी यथोचित रूप से रिसता रहकर जलस्तर में बढ़ोतरी करेगा।

सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक इनमें कुछ कुएँ तो डेढ़ सौ से दो सौ साल पुराने भी हैं और फिलहाल इन सबकी कुल कीमत करीब 200 करोड़ रूपये आंकी जा रही है। भू-वैज्ञानिक इन्हें तकनीकी तौर पर अभियांत्रिकी कौशल की बानगी मानते हैं। उनके मुताबिक यहाँ उस दौरान जो कुएँ बनाए गए हैं, वे भू-आकारिकी और चट्टानों के अनुरूप बनाए गए हैं। यही वजह है कि वे गर्मी के मौसम में भी भरपूर पानी दे पाते हैं, जबकि उनके आस-पास के उनसे करीब बीस गुना गहरे ट्यूबवेल सूख जाया करते हैं। ऐसे कुँओं में 15 से 20 फीट पर पानी है लेकिन 300 से 600 फीट के ट्यूबवेल में पानी नहीं है।

कुआँयह सर्वे बहुत उपयोगी है। इसमें 629 चिन्हित कुओं में अधिकांश उपयोगी बनाए जा सकते हैं। बड़ी बात है कि इन्हें स्थानीय भूवैज्ञानिक स्थितियों के मुताबिक बनाया गया है और कई तो अब भी पानी दे रहे हैं। तत्कालीन राज और समाज ने शहर को विरासत में करीब 200 करोड़ से ज़्यादा की लागत के कुएँ दिए हैं, इन्हें सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है। राजेन्द्र नगर और प्रगत परमाणु केंद्र इलाके में जहाँ ट्यूबवेल में 600 से हजार फीट तक पानी नहीं मिल रहा है, वहीं यहाँ के कुओं में 15 से 20 फीट पर पानी उपलब्ध है। इससे साफ़ है कि जमीनी पानी के लिये कुएँ ट्यूबवेल से बेहतर और पर्यावरण के हित में हैं। जलस्तर के लगातार गहरे होते जाने और परम्परागत जल संसाधनों की उपेक्षा ने यहाँ जल संकट को भयावह बना दिया है। हालात इतने बुरे हैं कि यहाँ के 30 हजार ट्यूबवेल गर्मी में दम तोड़ने लगते हैं।

हालाँकि बीते 30-40 सालों में इनकी जमकर उपेक्षा हुई है। शहर के कई कुएँ पाट दिए गए हैं और उनकी जगह समतल कर बहुमंजिला इमारतें बना ली गई हैं तो कुछ जगह इन्हें कचरा भरने या सीवरेज का गंदा पानी डालने के काम में लिया जा रहा है। नल जल योजनाओं से लोगों को ये 'बेकाम' लगने लगे। इन्हें पाटकर इनकी जमीनों पर अतिक्रमण कर लिया गया। कुएँ से ज़्यादा समाज ने जमीन को कीमती समझा और कुओं–बावड़ियों के प्रति समाज के दृष्टिकोण में अंतर आ गया। इसी घनघोर उपेक्षा के कारण इंदौर के लोगों को पानी के भयावह संकट का सामना करना पड़ रहा है।

कुआँ1970 के दशक से अब तक इंदौर की बढ़ती आबादी के अनुसार पानी की किल्लत भी उसी अनुपात में बढ़ती रही। शहर के लोगों के आन्दोलन के बाद प्रदेश में पहली बार नर्मदा नदी से करीब 70 किमी का सफ़र पाइपलाइन के जरिए तय करते हुए यहाँ पानी पहुँचाया गया, लेकिन जल्दी ही यह पानी भी यहाँ की जनसंख्या के मद्देनजर बहुत कम लगने लगा तो नर्मदा के द्वितीय चरण की बात चली और इसे सरकार ने माना भी। बावजूद इसके शहर की प्यास बढती रही। सन 2015 में नर्मदा तृतीय चरण भी पूरा कर लिया गया लेकिन पानी की आपूर्ति अब भी अपेक्षित मात्रा में संभव नहीं हो पा रही है। नदी से पानी लाने के इन तीन चरणों पर मोटे अनुमान के तहत करीब 750 करोड़ का खर्च हुआ है।

इंदौर नगर निगम ने तय किया है कि परम्परागत जलस्रोतों कुएँ–बावड़ियों को अतिक्रमण और गंदगी से मुक्त कर उन्हें ऐसा बनाएँ कि उनमें फिर से पानी रूक सके और लोग इसका इस्तेमाल कर सकें। यहाँ साढ़े छह सौ कुओं को बढ़ते हुए शहर के दबाव में भूला दिया गया या वे अतिक्रमण और कचरा कूड़ा भरने के गड्ढे की तरह उपयोग में लाए जाने लगे। लोगों को अपने घरों में नलों से पानी आपूर्ति हो जाती है, लिहाजा उन्होंने कभी इन्हें साफ़ रखने की कोशिश नहीं की। जब पानी की किल्लत हुई तो नर्मदा से पानी लाने की महँगी योजनाओं के प्रस्ताव बनाये और अमल भी किया लेकिन इससे भी पानी नहीं मिल पा रहा है।

यहाँ एक औसत परिवार को महीने में 15 घन मीटर पानी की ज़रूरत होती है। नर्मदा से करीब 360 एमएलडी पानी मिल रहा है। वर्ष 2001 की जनसंख्या के मान से शहर को 311 एमएलडी पानी की ज़रूरत थी, 2011 में यह 444 एमएलडी तक पहुँच गई है। 2021 में 638 एमएलडी तक पहुँच जाएगी। अभी जनसंख्या 25 लाख है, जो 2024 तक बढ़कर 35 लाख के आंकड़े को छू सकती है, ऐसे में अभी किये जा रहे तमाम जतन भी छोटे पड़ सकते हैं। साफ़ है कि इंदौर को जलापूर्ति के लिये अपने संसाधन दोगुने करने पड़ेंगे।

कुआँ

इंदौर नगर निगम में जल संसाधन प्रभारी बलराम वर्मा कहते हैं– 'अभी 329 कुएँ सहेजने की कार्य योजना बना ली गई है इप्को से साढ़े पाँच करोड़ रूपये मिले हैं और काम शुरू कर रहे हैं। निगम यह भी देख रहा है कि कुएँ–बावड़ियों तक उसी क्षेत्र का बारिश का पानी पहुँच सके और कॉलोनियों की ज़रूरत भी कुछ हद तक इसके पानी से पूरी हो सके। इसका फायदा यह भी होगा कि उस इलाके में भूजलस्तर बना रहेगा ताकि इस क्षेत्र के बोरिंग से भी पानी मिलता रहे। जलस्तर सुधारने के लिये यह बहुत ज़रूरी है केवल वाटर रिचार्जिंग के भरोसे नहीं रुक सकते। इससे बहुत कम पानी ही रोक पाते हैं जबकि हम प्राकृतिक तरीके से ज़्यादा मात्रा में बरसाती पानी को भूजल भंडारों तक भेज सकेंगे।'

इंदौर में पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर लगातार काम करती रही दीपा पंडित बताती हैं– 'हमने बीते बीस–तीस सालों में पानी को लेकर जो लापरवाही और उपेक्षा भाव दिखाया है, आज का जल संकट उसी की अवश्यम्भावी और अनिवार्य परिणिति है। इंदौर में नगर निगम ने अच्छा निर्णय लिया है। इसे दूसरे स्थानों पर भी अमल में लाया जाना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने देश के सभी हिस्सों में पर्याप्त जल संरचनाएँ निर्मित की हैं। अब इन्हें सहेजने का समय है, नहीं तो पानी के संकट से हमें कोई नहीं बचा सकता। लगातार नदियों के पानी और भूजल का दोहन किसी भी दशा में इसका विकल्प नहीं हो सकता।'

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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