वन प्रबंधन से चमकेगी ग्रामीण भारत की सूरत

Submitted by Hindi on Sun, 05/28/2017 - 13:40
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Source
दैनिक जागरण, 28 मई 2017

वृक्षारोपण का मतलब सिर्फ गड्ढे खोदने से नहीं है। इसके लिये एक संस्थागत ढाँचा बनाने की जरूरत है, जो लोगों को पेड़ों पर मालिकाना हक और उनके प्रबंधन में हिस्सेदारी दे। आखिरी बार हमारे देश ने गंभीरता से वृक्षारोपण करने की कोशिश 1980 के अंतिम वर्षों में की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने घोषणा की थी कि वे वृक्षारोपण को लोगों के आंदोलन में बदलना चाहते हैं। तब वेस्टलैंड डवलमेंट बोर्ड का गठन हुआ और सामाजिक वानिकी सबसे प्रचलित शब्द बन गया। हालाँकि यह जल्द ही समझ में आ गया कि वृक्षारोपण का मतलब सिर्फ गड्ढे खोदने से नहीं है। इसके लिये ऐसा संस्थागत ढाँचा बनाने की जरूरत है, जो लोगों को उन पेड़ों पर मालिकाना हक और उनके प्रबंधन में हिस्सेदारी दे।

इन सब बातों में समझ आया कि पौधरोपण से लोगों को जोड़ने की जरूरत है। हमने सुझाव दिया कि सरकारी वन भूमि को ग्रामीण समुदायों के अधिकार में देना चाहिए जिससे वे यहाँ अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ और लाभ पा सकें। इस विचार का जमकर विरोध हुआ। ऐसे में ज्वाइंट फॉरेस्ट मैनेजमेंट नाम से एक योजना शुरू की गई। इसके तहत वन भूमि पर पेड़ लगाए जाएँगे, लोग वक्षारोपम करने के साथ उनकी देख-रेख भी करेंगे और स्वेच्छा से अपने पशुओं को बाहर रख सकेंगे। इसके बदले उन्हें घास के इस्तेमाल का अधिकार मिलेगा और लकड़ी बेचकर हुए मुनाफे में हिस्सेदारी भी मिलेगी। इस योजना के तहत बनाई गई ग्रामीण समितियों के जरिये वन विभाग वनों पर नियंत्रण बनाये रखेगा।

इस योजना के अंतर्गत कई मुश्किलें आईं, लेकिन नतीजे तब सामने आए जब पेड़ फल देने व कटाई के लिये तैयार हो गए। उन गाँवों में, जहाँ लोगों ने कई वर्षों तक मुफ्त में पेड़ों को बड़ा करने में अथक परिश्रम किया, वहाँ भुगतान राई बराबर किया गया। ऐसे में लोगों ने अपना भरोसा खोया और देश ने वृक्षारोपण के लिये बेहतर साझेदारी का अवसर खो दिया। 1980 में हमारा ध्येय जंगलों से मुनाफा कमाने का था, वहीं 2010 के बाद हम पेड़ काटने में डरने लगे क्योंकि हमें जंगलों के खत्म होने का डर है। इस डर के कारण वन नीति बनाई गई, जो पेड़ों पर लोगों के अधिकार को नकारती है। इसके चलते वृक्षारोपण में साझेदारी नहीं हो पाती और स्थानीय अर्थव्यवस्था नहीं बन पाती। अब हम विदेश से लकड़ी आयात करते हैं। जंगलों की उत्पादकता से किसी को कोई लेना-देना नहीं है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जंगलों के बचाव के लिये (प्रबंधन के लिये नहीं) सख्त निर्देश जारी किए। अब बिना कार्यकारी योजना के जंगलों में पेड़ काटने की मनाही है और ऐसी योजनाएँ या तो बनाईं नहीं जाती हैं अथवा उत्पादकता पर जोर नहीं देती हैं। वन्य क्षेत्र के आस-पास लकड़ी काटने की मिल नहीं लगाई जा सकती है, ऐसे में वनों में अर्थव्यवस्था बनाने की योजना भी कारगर नहीं हो सकती। और आखिर में यह नियम बना दिया गया कि जिस भी जमीन पर पेड़ लगे हैं, उसे जंगल माना जाएगा। इसके चलते वन विभाग इन सभी क्षेत्रों को अपने अधिकार में ले लेता है, भले ही वह उसकी देख-रेख कर सके या नहीं।

आज, भारत के सबसे गरीब लोग उसके सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में रहते हैं। इसलिये यह जरूरी है कि हम वनों के संरक्षण से हटकर इस प्राकृतिक संसाधन के टिकाऊ प्रबंधन पर ध्यान दें। हालाँकि यह तभी मुमकिन है जब हम पेड़ लगाएँ, उन्हें काटें और दोबारा पेड़ लगाएँ। इसके लिये लोगों के साथ साझेदारी की जरूरत होगी। लोगों को इस विषय पर चर्चा करने और काम करने की जरूरत है। अब यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि पर्यावरण भारत के विकास एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बने।

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सुनीता नारायणसुनीता नारायण

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