बाढ़ मुक्ति अभियान के छठें प्रतिनिधि सम्मेलन की रपट

Submitted by Hindi on Mon, 05/29/2017 - 16:05
Source
बाढ़ मुक्ति अभियान, बिहार, दिसम्बर 2009

सभा स्थल: चन्द्रायण हाई स्कूल, जिला सहरसा (बिहार)
तारीख: (5 सितंबर 2009)


आज की कार्यवाही श्री गजेन्द्र प्रसाद यादव की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई और उसका संचालन श्री चन्द्रशेखर ने किया। उद्घाटन भाषण श्री गजेन्द्र प्रसाद ‘हिमांशु’, पूर्व जल-संसाधन मंत्री, बिहार सरकार ने किया।

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गजेन्द्र प्रसाद यादव


गजेन्द्र प्रसाद यादव ने अध्यक्ष पद से सभी आगंतुकों का औपचारिक रूप से स्वागत किया। उनका कहना था कि चन्द्रायण, धरहरा हमेशा से क्रांतिकारियों की धरती रही है और उन्होंने यहाँ बाहर से आये सभी विद्वानों और समाज कर्मियों का अभिनन्दन किया। श्री गजेन्द्र प्रसाद ‘हिमांशु’ को उन्होंने प्रख्यात समाजवादी बताते हुए कार्यक्रम में आने का विशेष रूप से धन्यवाद दिया।

स्वागत : महाप्रकाश ने अतिथियों का स्वागत करते हुये कहा कि उद्घाटनकर्ता समाजवादी नेता हिमांशु जी नियत समय से कुछ देर से पहुँच पाये हैं। श्री राजेन्द्र प्रसाद ‘हिमांशु’ को प्रख्यात समाजवादी बताते हुए कार्यक्रम में आने के लिये विशेष-रूप से धन्यवाद दिया। दिनेश मिश्र के बारे में उन्होंने बताया कि उनका संबंध मिथिला से वैसा ही जैसा राम का अयोध्या से। बिल्कुल वैसा नहीं लेकिन उद्धारकर्ता के रूप में बिल्कुल वैसा ही।आज की स्थिति में इस क्षेत्र के हरेक पढ़े लिखे व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं दिनेशजी। दिल्ली से आये राकेश भट्ट एवं गोपालकृष्ण जी पर्यावरणविद हैं। राहुल चौधरी, उच्चतम न्यायालय में पर्यावरण आदि विषयों पर वकालत करते हैं। तपेश्वर भाई सर्वोदय मंडल के प्रदेश अध्यक्ष हैं एवं राजेन्द्र भाई की भूमिका काफी महत्त्व है, छोटे-छोटे चीजों को जोड़ने में। मैं इन सभी व्यक्तियों का स्वागत करता हूँ एवं सम्मान करता हूँ।

चंद्र मोहन मिश्र


दिनेश मिश्र की कोसी पीड़ितों का उद्धार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पिछले वर्ष भी वह नवहट्टा में एक मीटिंग में आए थे जहाँ उनसे भेंट हुई और काफी बातचीत हुई थी। मैं लोगों से अपील करता हूँ आज जो भी बातें होती हैं उसे आज ही भूल न जाएँ। मिश्र जी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और वह हमारे दुःख से दुखी होकर सहयोग करने आते हैं लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते हैं। आप लोगों ने कोसी विकास प्राधिकार के बारे में सुना होगा। उसे बनाने वाले और बनवाने दोनों इस दुनियाँ से गुजर गए। काफी घोषणाएँ की गईं कि तटबन्धों के अन्दर और तटबन्धों के बाहर के 3 कि.मी. क्षेत्र में विकास के कार्यक्रम लिये जाएँगे। पीड़ितों का आर्थिक पुनर्वास किया जायेगा - कुछ नहीं हुआ।

1984 में 5 सितंबर की रात बारह बजे मेरे पास कोसी प्रोजेक्ट के एस.ई. का फोन आया कि आपके पास ट्रैक्टर है। कोसी में जबर्दस्त कटाव हो रहा है उसे भरा जाएगा, जल्दी सारे ट्रैक्टर लेकर आ जाइये। आज भी कटाव की स्थिति उतनी ही नाजुक है, कहीं से कोई मदद की गुहार नहीं लगाता है। यह असंभव नहीं है कि आज ही तटबंध टूट जाए। मेरा निवेदन है कि आज सारे लोग मिल कर यहाँ तटबन्ध को देख आयें। निर्माण एवं लूट के नाम पर इस तटबन्ध की मरम्मत की जाती है। अगर लूट-पाट की गुंजाइश न हो तो तटबन्ध की जो कुछ भी मरम्मत होती है वह भी न हो। बाढ़ और जल-जमाव के कारण हमारा हर साल इतना नुकसान होता है। पशु चारा एवं फसल क्षति-पूर्ति के जगह कुछ रुपये देकर हमें चुप करा दिया जाता है। हमारे प्रेस वाले भी बाढ़ पर खूब लिखते हैं। जब तक बाढ़ रहती है या बरसात रहती है तब 3 माह तक अखबारों में खूब लिखते हैं फिर उसके बाद तुरन्त समस्या को भूल जाते हैं। माँ 9 माह बच्चे को पेट में रखती है लेकिन बच्चे को तब तक दूध नहीं मिलता है जब तक रोता नहीं है तो आपको कैसे मिलेगा। हम सबको आंदोलन करना पड़ेगा और तभी हमारी बात सुनी जायेगी वरना कभी कुछ नहीं होगा।

कोसी के भीतर वाले लोग 3 माह ही दिक्कत में रहते हैं। बाहर के लोग पूरे साल घुट-घुट कर जीते हैं हर शाम मिल कर बैठक कीजिए कि बाँध टूटने वाला है और ऐसी हालत में क्या किया जाय फिर 3 माह बाद अपने-अपने काम में लग जाएँ तो फिर क्या फायदा? फिर इस बैठक से क्या फायदा होगा? हमें इनका साथ देना होगा। हमें मिश्र जी का साथ देना है उनके अनुभव का फायदा उठाया जाय।

रामदेव शर्मा


सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि दिनेश मिश्र जी कोसी क्षेत्र में 1984 में आए तटबन्ध टूटने के बाद और यहाँ की स्थिति से द्रवित होकर इसी में रम गए। मिश्र जी ने समूचे तटबन्ध के बीच के क्षेत्र का दौरा किया। बराह क्षेत्र से कोपड़िया तक की यात्रा न जाने कितनी बार की। मैं कहना चाहता हूँ कि 6 सितम्बर 1984 को जब तटबन्ध टूटा तो मैं यात्रा पर था और कोसी की धार में था। वहीं लोगों ने बताया कि तटबन्ध टूट गया है। आधे घंटे के अंदर नदी में पानी घट कर कम हो गया। अब तक आठ बार कोसी नदी का तटबन्ध टूटा है। 18 अगस्त 2008 को अंतिम बार तटबन्ध टूटा। जिन पर इस तरह की विपत्ति पड़ती है वह लोग अपने पराये का भेद भुला कर सभी को छोड़कर भाग जाते हैं यह क्षेत्र पशुधन एवं कृषि का क्षेत्र था जो कोसी परियोजना के कारण छीन लिया गया। इस क्षेत्र के काफी भाग में मक्का होता था लेकिन सीपेज से, बाढ़ से, जल-जमाव से यहाँ की कृषि एवं जानवरों की अपूरणीय क्षति होने लगी। तटबन्ध के बीच के लोगों के घर-बार का कोई ठिकाना नहीं है। एक-एक गाँव कई-कई बार कटा है प्रसव से कराहती महिला को खटिया पर टांग कर लाना पड़ता है एवं कई महिलाएँ तो रास्ते में ही दम तोड़ती हैं कई लोग पानी में डूब कर मर जाते हैं और मुआवजा मांगने पर सरकार शव माँगती है तब कहीं 50,000 रुपये का मुआवजा देने की बात करती है। अतः हमें जागना पड़ेगा, सरकार बहरी है। हमें आवाज उठाना पड़ेगा, हमें मिला है - दिल्ली, पंजाब, भदोही में, भीख माँगने के लिये कटोरा और उसके अलावा बीमारी और भुखमरी।

प्रमोद कुमार सिंह


हमें अपने आत्मबल पर खेद हो रहा है कि हमने 1984 में इतनी पीड़ा झेली और सरकार ने सारे संसाधन होते हुए भी आज हमें फिर उसी खतरे में डाल दिया। हमें खुशी इस बात की है कि हम तो उस पीड़ों को याद रखे हुए हैं मगर वह लोग जिन्हें इस घटना से कोई नुकसान नहीं पहुँचा वह भी हमारे साथ हैं और इतने लोग यहाँ इतनी ऊर्जा से इकट्ठे हुए। यहाँ के कलेक्टर मदनमोहन झा भी ने अपनी कर्मठता और निष्ठा के बल पर 1983 में तटबन्ध को टूटने से बचा लिया था। तटबन्ध तो 1979 में भी टूटने वाला ही था। आज समय बहस कर उसे बिताने का नहीं है बल्कि कम से कम समय में निर्णायक लड़ाई लड़ने का निर्णय लेने का है। कुसहा में कितने बह गये या नवहट्टा में कितनों का सफाया हो गया उसकी सूची भी सरकार के पास नहीं है। नवहट्टा एवं महिषी क्षेत्र की जमीन (50,000) एकड़ सीपेज के कारण बंजर हो गई है। हम अगहनी का फसल नहीं करवाते हैं, सरकार हमें सिर्फ मुआवजा/रिलीफ खाने के लायक ही समझती है। हमारी जमीन और उसकी उर्वरता हमें लौटा दीजिये और अपनी रिलीफ अपने साथ ले जाइये। हमें मिश्र जी एवं अन्य मित्रों के साथ मिलकर ऐसा ही निर्णय लेना पड़ेगा।

राजेन्द्र झा


सबका अभिनंदन करते हुए उन्होंने कहा कि लोग बाढ़ की पीड़ा को चुप-चाप झेलते आ रहे हैं। 1984 की घटना का स्मरण करता हूँ उस साल पाँच प्रखंड प्रभावित हुआ था। हमलोगों ने लम्बी लड़ाई लड़ी पर थक कर शान्त हो गये। अपनी रक्षा के लिये हमें संगठित होना पड़ेगा। 2008 में कुसहा में टूट हुई और इस बार 35 प्रखंड प्रभावित हुए। 1984 के मुकाबले सात गुना। लापरवाही इस तटबन्ध की टूट का कारण है। भविष्य में यह फिर टूटेगा और भविष्य में नुकसान को कम करने के लिये हमें फिर से विचार करना होगा और सरकार को इस तरह की घटनाओं के लिये ज़िम्मेवार बनाने के लिये संगठन बनाना होगा। तटबन्ध टूटने के बाद बिना स्थानीय लोगों की इच्छा जो उसे बाँध दिया जाता है उसे रोकना पड़ेगा। 1984 में तटबन्ध टूटने के बाद हम लोगों ने क्षतिपूर्ति आंदोलन भी लड़ा था। उच्चतम न्यायालय से निर्णय भाी हमारे पक्ष में आया था लेकिन फिर हम निश्चिंत हो गये। हमें आवाज उठानी होगी। उसकी लड़ाई लड़नी होगी। हमारे सर पर टाइम बम रखा हुआ है। जिला सर्वोदय मंडल, कोसी कमिशनरी की ओर से नदी को बाँधने का हम विरोध करते हैं।

लक्ष्मीश्वर चौधरी


आज वह दिन है जब हमारे सैंकड़ों भाई, बहन इसी मानव निर्मित कोसी तटबन्ध के टूट से मरे थे। सभी आगन्तुकों को लाख-लाख धन्यवाद दे रहा हूँ कि इस अवसर यहाँ आकर उन्होंने हमारा उत्साह बढ़ाया है।

दिनेश कुमार मिश्र


मैं इस क्षेत्र के लिये बाहरी आदमी हूँ। बाहरी आदमी द्वारा आज त्रासदी की घटना के बारे में बताना अच्छा नहीं लगता है 8 अक्टूबर 1984 को मैं पहले-पहले इस क्षेत्र में आया था और नवहट्टा के पास नाव पर सुबह चढ़ा तब दिन भर नाव में तटबन्ध और गाँवों में घूमने के बाद मैं बनगाँव में उतरा। किसी भी दुर्घटना के एक महीने बाद मैंने जिंदगी में इतना पानी देखा ही नहीं था। मैं पेशे से इंजीनियर हूँ और मैंने सोचा था कि यहाँ कुछ घर बसाने होंगे, बाढ़ वाले क्षेत्र में पहले मैंने ऐसा ही काम किया था। यहाँ आने के बाद पता लगा कि जब तक पानी नहीं हटता है तब तक किसी इंजीनियर को काम करने के लिये कुछ था ही नहीं। मैं जब तटबन्ध पर शरण लिये हुये लोगों के घरो में घुस-घुस कर देखता था कि घर में, झोपड़ी में खाने को क्या है? कहीं भी कुछ नहीं दिखाई पड़ता था। मुझे लगा कि मैं एक इंजीनियर की हैसियत से लोगों की मदद के लिये कुछ नहीं कर सकता। नदी के सामने हमारी औकात कुछ भी नहीं थी। उस दिन रात में वापस होटल में आकर हमें अपने मित्र विकास भाई को यहाँ की हालत के बारे में टेलीग्राम भेजना था जिनके कहने पर मैं सहरसा आया था और मैं अचंभित था कि यहाँ की परिस्थिति के बारे में उन्हें क्या लिखूँ। मैंने लिखा - कि सहरसा में अभूतपूर्व तबाही हुई है और अगर आप समाजकर्मी होने का दम भरते हैं तो मेहरबानी करके यहाँ लोगों की मदद की कोशिश करें वरना यह कहना छोड़ दें कि आपका समाज से कोई सरोकार है। दूसरे दिन स्थानीय लोगों ने मुझे बताया कि दक्षिण में सिमरी बख्तियारपुर और सलखुआ में हालत और भी ज्यादा खराब है। मैंने बलवा हाट और चपराम जाना चाहा मगर बेलही बरसम के पास पानी का प्रवाह इतना ज्यादा था कि वहीं से लौट आना पड़ा। मैं बनारस गया विकास भाई से मिलने और उनका मुझसे कहना था कि इंजीनियर साहब! आपको शर्म आती है कि आप लोगों ने 4.50 लाख लोगों को बेघर कर दिया? मेरा कहना था कि मुझे शर्म क्यों आयेगी, इस दुर्घटना में मेरी कोई भूमिका ही नहीं थी? उनका मानना था कि जिनकी वजह से इतनी बड़ी तबाही हुई वह मेरे हमपेशा थे। अतः मुझे शर्म आनी चाहिए। उनकी योजना थी कि बाढ़ पीड़ितों के लिये 1000 रू. में सस्ते घर बनाये जायें और इंजीनियरिंग में बहते पानी पर सस्ते घर बनाने के लिये लकीर खींचना नहीं सिखाया गया था और घर बनाने के लिये चार लकीर खींचना जरूरी था। जमीन पर पानी होने के कारण मालिकाना तय करना भी मुश्किल था। मुझे कोसी ने इंजीनियरिंग का पहला पाठ पढ़ा दिया था। बाद में हम लोगों ने बाढ़ समस्या पर अध्ययन शुरू किया और इस क्षेत्र से सम्पर्क बना रहा।

.अब तक 8 बार कोसी का तटबन्ध टूटा है। 1963 में डलवा, 1968 में जमालपुर, 1971 में भटनियां, 1980 में बहुअरवा, 1984 में नौहट्टा, 1987 में गण्डौल और समानी, 1991 में जोगिनियाँ और 2008 में कुसहा में टूटा। जोगिनियाँ की कहानी काफी दिलचस्प है। 1991 में बिहार के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री ने कहा था कि अगर राज्य में कहीं भी तटबंध टूटा तो वह अपने पद से इस्तीफा दे देंगे और जुलाई 1991 में जोगिनियाँ में तटबन्ध टूट गया लेकिन गनीमत इतनी ही थी कि नदी तटबन्ध काटने के बाद पीछे खिसक गई और तबाही टल गई। मगर पिछले साल जनता को तबाही से नहीं बचाया जा सका। पिछले साल कोसी की बाढ़ में 527 लोग मारे गये जो अब तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक साल में कोसी क्षेत्र में मौतों के लिये सर्वाधिक है। नदी तैयार है अब 9वीं, 10वीं और 11वीं बार तटबन्ध तोड़ने के लिये जिस दिन कुसहा तटबंध को बाँधा गया उसी दिन से। 1937 की बात है जब पटना में बाढ़ सम्मेलन में कोसी पर बाराह क्षेत्र बाँध का पहली बार प्रस्ताव किया गया था और कहा गया था कि यही बाढ़ का स्थाई समाधान है। बिहार के तत्कालीन चीफ इंजीनियर कैप्टन हॉल ने बताया कि नेपाल को इस समाधान में कोई दिलचस्पी नहीं है और नेपाल बिहार के फायदे के लिये कभी कोई दिक्कत नहीं उठायेगा। यदि यह बाँध बनता है तो नेपाल के 60,000 लोग विस्थापित होंगे और हमारे यहाँ विस्थापितों के साथ क्या सलूक किया गया वह नेपाल से छिपा नहीं है।

नेपाल प्रस्तावित बाराह क्षेत्र में बाँध में क्यों नहीं दिलचस्पी ले रहा है। यह आम आदमी को क्यों नहीं बताया जा रहा है? 22 अक्टूबर 1954 में अनुग्रह बाबू ने विधान सभा में कहा था कि बाराह क्षेत्र बाँध की सुरक्षा को किसी कारणवश खतरा होता है तो भागलपुर तक के क्षेत्र को खतरा रहेगा। इसलिये यह बाँध नहीं बनेगा। नुनथर में बागमती पर सरकार की तरफ से कई रिपोर्ट तैयार हुई हैं जिसमें बार-बार लिखा गया है कि इस बाँध में बाढ़ नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है। 2004 में पटना विश्वविद्यालय के बाहर रिसोर्स डवलपमेन्ट सेन्टर की बैठक में बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के सचिव ने साफ तौर पर बताया कि सरकार की जो वित्तीय स्थिति है उसके अनुसार 60 वर्ष तक यह बाँध नहीं बनेगा क्योंकि सरकार की अपनी हालत अच्छी नहीं है। अगर 60 साल बाद यह बाँध बनना शुरू हो भी जाय तो भी उसे बनने में 20 साल का समय लगेगा। यानी बाराह क्षेत्र बाँध अगर बनता भी है तो कम से कम 80 साल और लगेगा। क्या सरकार के पास इन 80 वर्षों के लिये कोई योजना है? उनके पास कोई जवाब नहीं था। सरकार के अनुसार कोसी नदी की पेटी हर साल 5 इंच की रफ्तार से महिषी से कोपड़िया के बीच ऊपर उठ रही है। 45 वर्षों में नदी 225 इंच ऊपर उठ चुकी होगी। इस लिहाज से तटबन्ध को कितना ऊँचा उठाना चाहिए था और अगर यह इतना ऊँचा कर भी दिया जाता है तो नदी स्थिर रह पायेगी क्या? इतना ऊँचा तटबन्ध अगर टूटेगा तो सुरक्षित क्षेत्र में रहने वालों का क्या होगा?

परमाने से लगुनियां धार तक 15 धारा में कोसी बहती थी। उन्होंने 14 धाराओं को छोड़ दिया एवं लगुनियां पर तटबन्ध बाँध दिया और लोगों को कहा, आप सुरक्षित हैं। लगुनियां (कोसी) सिर्फ पानी नहीं जाती है साथ में मिट्टी भी जाती है। इस हिसाब से नदी की पेटी 15 से 20 फीट ऊपर उठ चुकी है और तटबन्ध अगर टूटा तो नदी कहाँ जाएगी। हमें सोचना पड़ेगा कि ऐसी परिस्थिति से कैसे निपटेंगे? हमें 15 धाराओं में नदी को लौटा देना चाहिए जिससे कि पानी के साथ गाद भी बड़े इलाके पर फैलेगी और बाढ़ का असर कम होगा। इतना अगर कर लिया जाता है तो बिजली पैदा करने के लिये फिर बाराह क्षेत्र बनाना भी पड़े तो बनाएँ, उसकी ऊँचाई कम होगी क्योंकि अब बाढ़ के पानी को नियंत्रित करने की जरूरत नहीं है। अगर हम बाढ़ नियंत्रण का काम अपने जमीन पर कर लेते हैं तो यह देशहित में होगा, समाज हित में होगा।

सरकार ने कहा कि हम नदी जोड़ करेंगे तो क्या यह नेपाल के बिना होना संभव है? क्या नेपाल इसके लिये राजी होगा? सरकार दक्षिण बिहार में नदी की बात करती है और यह भी कहती है कि वहाँ की नदियों में पानी ही नहीं है फिर अगर शौक पूरा करने के लिये ही नदियों को जोड़ना है तब तो ठीक है पर उससे फायदा क्या होगा? अब बात करते हैं कि तटबन्धों की बीच बसे लोगों के बारे में जब तटबन्ध बन रहा था उस वक्त उनसे कहा गया कि देश और समाज के हित में आप लोग सहयोग करें। मगर पुनर्वास के नाम पर उनके साथ धोखा किया गया। जो नर्मदा से विस्थापितों को मिल सकता है वह हमें क्यों नहीं मिलेगा? नर्मदा के लोगों को जमीन एवं मकान सब मिला क्योंकि वह लोग लड़ सकते थे। हमारे लोगों ने लड़ाई नहीं की। वह दिल्ली, पंजाब, मुम्बई एवं अन्य जगह चले गये। वह सब अगर वापस आ जाएँ तो यहाँ गृह युद्ध हो जाएगा। उन्होंने आसान रास्ता चुन लिया और जो बचे उनमें लड़ने की क्षमता नहीं है।

मेरी बात-चीत पूर्व मंत्री गणेश प्रसाद यादव (सीतामढ़ी) से हो रही थी मैंने उनसे पूछा कि आप लोगों जैसे प्रबुद्ध एवं समाज सुधारक लोगों के रहते बागमती पर तटबन्ध कैसे बन रहा है तो उन्होंने मुझसे कहा कि मुर्दों की बस्ती में आप किसे आवाज देंगे? बिना संघर्ष किये हम। कुछ भी हासिल नहीं कर पायेंगे।

राकेश भट्ट


मैं दिनेश जी की बात को आगे बढ़ाना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि यहाँ का संघर्ष आप का है और इसमें बाहर वाला कोई खास मदद नहीं कर सकता। यह ध्यान देने की बात है कि वह खुद बाहर के हैं और किसी परिस्थिति वश यहाँ आ गये थे और करीब-करीब यहीं के हो कर रह गये। मैं कहना चाहता हूँ कि कहीं भी शासक और शासित के बीच में कर (टैक्स) का एक रिश्ता होता है। शासक शासित से कर वसूल करता है और बदले में वह कुछ सेवाएँ देने का वायदा करता है। इसका दूसरा रूप यह है कि जब हम बाढ़ से परेशान होते हैं तब शासक का यह कर्तव्य बनता है कि वह हमारी कुशलता की व्यवस्था करें। इसे राहत कहना शासितों की यानी हमारी बेइज्जती है। हुकूमत को यह चाहिए कि जो कर हम उसे देते हैं, वही कर वह हमें वापस लोटाये क्योंकि हम उसके गुनाहों की वजह से इस हालत में पहुँचे हैं। उनके गुनाहों के बदले यह कर हमारा हक बनता है और यह हमें हर उस दिन तक मिलना चाहिए जब तक हम परेशान हाल रहते हैं।

दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ कि वह यह कि मिश्र जी ने जो कुछ भी कहा या लिखा है वह सब आप से ही सीखा हुआ है, उसमें आप के लिहाज से क्या कुछ नहीं लिखा है यह देखना आपका कर्तव्य बनता है। उनका योगदान इतना ही है कि उन्होंने आपकी बात को इस तरह से लिपिबद्ध किया है कि वह शासकों की समझ में आ सके। अब आपका यह फर्ज बनता है कि उन सारी चीजों को एक बार फिर पढ़ें और देखें कि वहाँ क्या वही कुछ लिखा है जो आप कहना चाहते हैं। यहाँ बहुत से साथियों ने आन्दोलन की बात कही है आप अगर इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तो इसमें हमारी जो भी छोटी-मोटी भूमिका हो सकती है उसके लिये लोग हमेशा उपलब्ध रहेंगे।

गोपाल कृष्ण


कोसी के संकट पर डाॅ. मिश्र ने लम्बे समय से बहुत कुछ लिखा है। वह सब पढ़ने तथा इलाके में घूमने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि कोसी का संकट एशिया के पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट है। देश में जितने भी पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें कोसी को जो महत्त्व मिलना चाहिए था वह अभी तक मिला नहीं है। पर्यावरण के साथ-साथ यह जन-स्वास्थ्य के लिये भी बड़ा भीषण संकट है। इस संकट को इसी रूप में परिभाषित और चिन्हित करना चाहिए। मिश्र जी की किताब में जो तटबन्धों की दास्तान शुरू होती है वह कब खत्म होगी इसका कुछ पता नहीं लगता। 1984 में जब तटबन्ध टूटा था तब सरकार द्वारा यह कहा गया था कि इनका जीवन काल 25 साल का था और वह पूरा हो चुका है इसलिये उनका रख-रखाव नहीं हो सकता और वह टूट सकते हैं। अब अगर 25 साल पूरे ही हो चुके हैं तब उस तर्क के आधार पर कोसी का कोई भी तटबन्ध सुरक्षित नहीं है। यह तटबन्ध सुरक्षा देने के लिये बनाया भी नहीं गया था। बिहार विधान सभा में जो इस मुद्दे को लेकर बहस हुई उसमें बार-बार यही कहा जाता रहा कि यह एक अस्थाई समाधान है। वास्तव में जिस साल यह तटबन्ध और बराज बन कर तैयार हुये थे 1963 में उसी साल उनकी खामियों का पर्दाफाश हो गया था। उसी साल कोसी का तटबन्ध पहली बार टूटा था।

हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ में आदिवासियों ने अपने गाँव घर उजाड़ने के खिलाफ जो आन्दोलन किया उसमें उन्होंने एक नारा दिया था ‘कि अपने गाँव में हम ही सरकार-रायपुर दिल्ली में हमारी सरकार’। आप कोसी क्षेत्र के वासी हैं और वास्तव में आप ही यहाँ की सरकार हैं और पटना तथा दिल्ली में आपकी सरकार है। जब तक यह भावना यहाँ के जन-जन में नहीं आयेगी तब तक यह समस्या बनी रहेगी। इस इलाके से जो लोग विधानसभा या लोक सभा में चुन कर जाते हैं उन्होंने इस क्षेत्र के लिये अब तक कुछ नहीं किया और भविष्य में वह ऐसा करेंगे यह मान लेना भयंकर भूल होगी। कोसी तटबन्धों का निर्माण कोसी संधि के अधीन किया गया था पर उसके जो दुष्परिणाम आये उसके प्रति हमारी विधानसभा और संसद मौन है तो पहला काम तो यह होना चाहिए कि इस संधि को ही खारिज किया जाय। अब जिन्हें हम चुनकर भेजते हैं हमारी बात रखने के लिये, समस्याओं के समाधान के लिये- अगर वही लोग अपना काम नहीं करते तो आन्दोलन होता है। आन्दोलन होता है तो सरकार उसको हिंसा से दबाने की कोशिश करती है। सरकारी हिंसा के विरोध में उसका प्रतिकार करने के लिये कभी-कभी आन्दोलन हिंसक हो जाता है। आन्दोलन अगर हिंसक होने लगे तो बात हाथ से निकल जायेगी। बहुत जगहों पर ऐसा होने भी लगा है। मिश्र जी ने लिखा है बहुत कुछ और बार-बार कहा भी है। यह बार-बार कहने की जरूरत इसलिये पड़ती है कि जिसे यह सब बातें सुननी चाहिए वह कान बन्द किये बैठा है। उन्होंने कहा कि मुर्दों की बस्ती में आवाज देने का क्या फायदा? मगर आप यहाँ आज संकल्प लें कि अगर कोई आवाज देता है तो यहाँ मुर्दों के भी हाथ हिलने लगेंगे। यह तटबन्धों के टूटने का सिलसिला उस समय तक जारी रहेगा जब तक आप की खामोशी नहीं टूटेगी और इस संधि को खारिज नहीं किया जायेगा।

राहुल चौधरी


गोपाल कृष्ण जी ने अभी बताया कि कोसी का संकट एक बहुत बड़ा पर्यावरणीय मुद्दा है। पिछले दिनों पटना में एक मीटिंग हुई थी जिसका उद्देश्य था कि बाढ़ नियंत्रण की योजनाओं का सरकार की तरफ से पर्यावरणीय अध्ययन नहीं किया जाता। इन योजनाओं से होने वाले हानि-लाभ की चर्चा या उनका निराकरण नहीं होता जो कि योजना को हाथ में लेने के पहले किया जाना चाहिए। तभी मेरा कोसी से पहला परिचय हुआ। बाद मैं मिश्र जी की कई किताबें अपने साथ ले गया और तब मेरी समझ में यह विषय कुछ-कुछ आने लगा है। पिछले तीन-चार दिनों से मैं, राकेश भट्ट जी और गोपाल कृष्ण उत्तर बिहार के क्षेत्र में पर्यावरण के मुद्दे को समझने के लिये घूम रहे थे। तटबन्धों का निर्माण के पहले या बाद में भी कोई आकलन नहीं होता है। 1994 में पर्यावरण आकलन की जो नीति बनी थी उसमें तटबन्धों से होने वाले दुष्प्रभाव के अध्ययन का प्रावधान था। तब तक पता लग सकता था कि कितने लोग तटबन्धों के बीच फसेंगे, जल-जमाव कितना और कहाँ होगा, तटबन्ध टूटने की स्थिति में क्या-क्या क्षति होगी और उससे कैसे निबटा जा सकेगा आदि-आदि। 2006 में जो नई नीति बनी उसमें सरकार ने बाढ़ नियंत्रण की योजनाओं को पर्यावरणीय आकलन के दायरे से बाहर कर दिया। ऐसा करने के पीछे उसके क्या तर्क थे, यह अभी तक हमें मालूम नहीं है, हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं। अब अगर आपके क्षेत्र में कोई तटबन्ध बनता है तो उसका पर्यावरणीय आकलन नहीं होगा तब तक जब तक इसका कानूनन प्रावधान फिर से न किया जाये। हो सकता है इस आकलन को वहाँ से हटाने के पीछे राजनैतिक कारण हो या फिर निहित स्वार्थ वाले तत्वों का हाथ हो। यह इसलिये कहना पड़ रहा है कि मान लीजिये कोई बाँध बनने का प्रस्ताव कहीं पर हो वहाँ बाहर से इंजीनियर आयेंगे, मजदूर आयेंगे, स्थानीय संपत्ति का मूल्य बढ़ेगा, जिस मकान का 500 रुपया मासिक किराया भी न मिलता हो उसकी कीमत 5,000 रुपये मासिक हो जायेगी। गाड़ियाँ चाहिये तो लोग भाड़े पर देना शुरू करेंगे। छोटी-मोटी सड़कें बनेंगी तो स्थानीय ठेकेदारों को काम मिलना शुरू हो जाता है- इन सब क्रियाकलापों के बीच इस योजना का उस क्षेत्र पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, यह प्रश्न गौण हो जाता है। अब अगर कोई व्यक्ति इन सवालों को उठायेगा तो उसे समझाने वाले भी पैदा हो जाते हैं। अब यह काम आपका है कि पूरी बात को समझने का प्रयास करें कि अमुक योजना से छोटे या बड़े ठेकेदारों को फायदा हो रहा है, नेताओं को फायदा हो रहा है, निहित स्वार्थी तत्वों को फायदा हो रहा है या फिर आम आदमी को और वह भी दीर्घावधि में।

मैं अभी यह सब समझने की कोशिश में लगा हूँ क्योंकि मामला गंभीर लगता है और इसके निराकरण के लिये क्या कानूनी कार्यवाही की जा सकती है वह हमें तय करना होगा।

गजेन्द्र प्रसाद ‘हिमांशु’


नवहट्टा त्रासदी की 25वीं वर्षगांठ पर आप ने इस सम्मेलन का आयोजन किया है उसके लिये आप सभी लोग धन्यवाद के पात्र हैं। आप ने इस अवसर पर मुझे संबोधन के लिये बुलाया, मैं उसके लिये आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। कोसी बड़ी चंचल नदी है। कोसी को अगर वैसे ही छोड़ देंगे तो वह विध्वंस करेगी और अगर नियंत्रित कर के भी बिना रख-रखाव और मरम्मत के छोड़ देंगे तब भी वह बर्बादी करेगी। हमारा शरीर जवानी से बुढ़ापे की ओर जाता है तब उसमें बहुत सी बीमारियाँ पैदा होती हैं। उस समय हम सावधानी बरतते हैं और डॉक्टर के पास इस उम्मीद से जाते हैं कि वह हमें निरोग कर देगा। अगर हम किसी गलत या अयोग्य डॉक्टर के पास चले गये तो उससे हमारा सही इलाज नहीं हो पायेगा। हमें सही डॉक्टर चुनना पड़ेगा। यही हाल नदी का है, वह अगर बीमार पड़ती है तो उसके इलाज का निर्णय कौन करेगा? यह काम सरकार का है, सरकार अगर मजबूत है, तो संभव है वह सही डॉक्टर के पास इलाज के लिये जायेगी। हमलोग जब बचपन में भूगोल पढ़ते थे तब बताया जाता था कि हांग हो नदी चीन का शोक है। उसी तरह कोसी को बिहार का शोक बताया जाता था। पिछले चालीस-पचास वर्षों से अब यह नहीं पढ़ाया जाता कि कोसी बिहार का शोक है और न ही परीक्षा में इस तरह के सवाल ही पूछे जाते हैं। ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि 1955-56 में इस नदी को बाँध दिया गया। अब यह शोक की नदी नहीं है। इस नदी का तटबन्ध 1984 में टूटा था और जो क्षति हुई थी उसका विवरण मिश्र जी ने अपने आधार पत्र में दिया है, मगर पिछली साल कुसहा में जो कुछ हुआ उसके बाद नदी फिर अपने उसी शोक के रूप में वापस आ गई। अब आप इसे शोक कहिये, जानलेवा या कुछ और जो चाहे कह लें। अब हो सकता है कि फिर परीक्षा में पूछा जाने लगे कि इस नदी को बिहार का शोक क्यों कहते हैं। आप अगर बाघ पालेंगे और उस पर नियंत्रण नहीं करेंगे तो वह आप को खायेगा ही। इसी तरह आग भी है। नदी नियंत्रित रहने पर आपके उपयोग में आती है मगर अनियंत्रित हो जाये तो गाँव के गाँव खाक कर दे।

कोसी मामूली नदी नहीं है। यह नासूर है, नासूर आपको कहाँ ले जाकर मारेगा पता नहीं लगेगा। यह कब अप्रेन को काटेगी, कब स्पर को काटेगी और कब तटबन्ध को काटेगी किसी को पता नहीं चलता। मैं जब सिंचाई मंत्री था तब इस इलाके में घूमता था। हमारे इंजीनियर बताते थे कि इस नदी का व्यवहार एकदम विचित्र है, कब यह कहीं बालू डाल देगी, कब यह किसी गाँव को काट देगी, कब यह जल जमाव पैदा कर देगी, कब यह किसी बड़े नाव को अपने प्रवाह में पलट देगी, कह पाना मुश्किल है। ऐसी नदी के उपद्रव को हमारी इस समय की सरकार राहत बाँट कर मुकाबला करने का दम भरती है और खुद अपनी पीठ थपथपाती है। मैंने आप को चोट पहुँचाई और खून निकाल दिया और मैं ही मरहम लेकर आपको राहत पहुँचाने के लिये आ गया। सवाल यह उठता है कि बाँध टूटा क्यों? वह इस लिये टूटा कि वह कमजोर था। वह इसलिये टूटा कि सरकार कमजोर थी। तटबन्ध की उम्र बढ़ती गई और उसकी देख-भाल नहीं हुई। उसमें चूहे सियार आदि छेद करते रहे, उन पर लोग बसते गये, उनकी मरम्मत नहीं हुई और सरकार को पता ही नहीं लगा। नदी की पेटी ऊपर चली गई, सरकार को पता नहीं लगा। तटबन्ध पर मिट्टी पड़नी चाहिए थी, उसे ऊँचा किया जाना था, मजबूत किया जाना था, नहीं किया गया। मैं जब सिंचाई मंत्री था तब मैंने प्रायः सभी तटबन्धों पर पाँच फुट ऊँची मिट्टी भरवाई थी। उसके बाद कभी किसी तटबन्ध पर मिट्टी नहीं पड़ी। ऐसे में बाँध टूटेगा नहीं तो क्या होगा? सरकार ने इस साल बयान दिया कि अब कोई बाँध नहीं टूटेगा, यही बात पिछले साल क्यों नहीं कही गई? इस साल तो आपने बचा लिया पर पिछले साल बाँध इसलिये टूटा कि आप उस समय सोये हुये थे। कोई चिन्ता ही नहीं थी। मैं जब सिंचाई मंत्री था तब यहाँ के चीफ इंजीनियर नीलेन्दु सान्याल साहब हुआ करते थे। बहुत ही काबिल इंजीनियर थे। पिछले साल जब कुसहा में बाँध टूटा तो सरकार ने उनको खोजा। उनके अधीन समितियाँ बनी। समाधान खोजा गया मगर इतने समय में सरकार क्यों उनके जैसा कोई सक्षम दूसरा इंजीनियर तैयार नहीं कर पाई? सरकार कहती है कि हम योजना बना रहे हैं, बजट बना रहे हैं आदि-आदि। सवाल है कि यह सब तो चलता ही रहता है, दिखा सकने वाला काम बताइये जो आपने किया हो। गोपाल कृष्ण ने कहा कि सरकार काम नहीं कर रही है। पार्लियामेन्ट को जो करना चाहिए वह नहीं कर पा रही है। यह सच है। हमें यह लड़ाई सड़क से लेकर लोकसभा तक लड़नी पड़ेगी। मिश्र जी ने लिखा है कि तटबन्ध बनने के पहले कोसी क्षेत्र के लोगों की क्या दुर्दशा थी। यही बातें अलग-अलग तरीके से परमेश्वर कुंअर, लहटन चौधरी और हरिनाथ मिश्र ने भी कही थी। तकलीफें बाँध बनने के पहले भी थीं और आज भी हम उनका रोना रोते हैं मगर बाँध बनने क बाद बीच के समय में जो खुशहाली आई इस इलाके में उसके बारे में कोई भी बात नहीं करता। कोसी परियोजना पर कभी बहस हो तो उसके लिये बहुत सी सामग्री हमारे दिनेश कुमार मिश्र जी ने एक जगह इक्टठी कर एक किताब के रूप में हमारे सामने रख दी है। मुझे आश्चर्य हुआ यह जान कर कि वह बिहार के रहने वाले भी नहीं हैं, उत्तर प्रदेश के हैं और अभी झारखंड में रहते हैं, वह आज आपके गाँव में बैठे हैं हमारे बीच बहुत से विद्वान बैठे हैं जो दिल्ली से आये हैं। दिल्ली में अक्सर सभा सेमिनार होते रहते हैं, मावलंकर हॉल से लेकर संविधान क्लब तक। वहाँ चर्चें होते हैं कि भारत से गरीबी कैसे हटाई जाये। मगर वह सभा-सेमिनार कभी वहाँ नहीं होता जहाँ गरीबी है। यह काम आप लोगों ने, दिनेश कुमार मिश्र ने यहाँ गाँव में आयोजित किया है इसके लिये हम सभी लोगों को इनका आभारी होना चाहिए। दिल्ली से जो लोग यहाँ आये हैं उन्हें कितना कष्ट हुआ होगा इसका मैं अंदाजा लगा सकता हूँ। दिल्ली, या फिर पटना तक की बात तो मेरे समझ में आती है मगर इन लोगों का चन्द्रायन या मुरादपुर तक लाया जा सकता है यह मैंने सोचा भी नहीं था। यहाँ कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। थोड़ा और अन्दर चलिये तटबन्धों के बीच तो वहाँ न कोई रास्ता है न बिजली, न स्कूल कॉलेज और न ही अस्पताल आदि। वहाँ का जीवन तो और भी जघन्य है। वहाँ कौन सी पढ़ाई हो पायेगी, किसका इलाज हो पायेगा, क्या रोजगार मिल सकेगा- यह सब हमें सोचना होगा।

कोसी परियोजना पर काई भी चर्चा परमेश्वर कुंअर जी की चर्चा किये बगैर पूरी नहीं हो सकती। विधान सभा में जब भी इस विषय पर बात होती थी तो वह हमेशा तटबन्धों के बीच रह रहे लोगों और जल जमाव के बारे में जरूर कहते थे और इसका सारा दोष परियोजना और उसके अधिकारियों को देते थे। वह कहते थे कि कोसी योजना से जितना फायदा हुआ होगा उतना ही नुकसान भी हुआ। जल जमाव हटाने का काम सरकार को करना था, मगर वह काम नहीं हुआ। यह सरकार की कमजोरी थी। उसके साथ ही तटबन्धों के अन्दर रहने वाले लोगों के विकास के लिये एक बोर्ड बनना चाहिए जो उनकी सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों और रोजी-रोटी के प्रश्न को हल कर सकें। यह काम अगर सरकार नहीं कर सकती तो एक बार फिर जमीन का अधिग्रहण करके उनका दोबारा पुनर्वास करना चाहिए और इस कष्टमय जीवन से उन्हें मुक्ति दिलाना चाहिए। यह येाजना मूलतः बाढ़ नियंत्रण के लिये बनी थी मगर इसका क्रियान्वयन ठीक नहीं होने की वजह से यह जनता के लिये अभिशाप बनी गई। इस अभिशाप को वरदान में बदलना होगा। कुछ लोग कहते हैं कि तटबन्धों के कारण बहुत नुकसान हो रहा है और हुआ है अतः इसे तोड़ देना चाहिए या सिल्ट बहुत बड़ी मात्रा में तटबन्धों के बीच जमा हो गई है। अतः उसे हटा देना चाहिये। यह सिल्ट तो नदी में हमेशा से आ रही है, यह कोई नई बात तो है नहीं। इसमें करोड़ों रुपया खर्च होगा। फिर बात होती है कि नेपाल में बराहक्षेत्र में बाँध बनाया जाये। इस निर्माण का राजनैतिक और स्थानीय प्रभाव क्या होगा, कहना मुश्किल है। हम लोग अक्सर सुना करते हैं इस बाँध के बारे में और कमला पर प्रस्तावित शीसापानी बाँध की और बागमती पर प्रस्तावित नुनथर बाँध की। अभी किसी वक्ता ने इन बाँधों के बारे में कहा कि ‘दिल के बहलाने को गालिब यह ख्याल अच्छा है।’ इन बाँधों के बारे में हर साल कम से कम चार बात तो भारत और नेपाल के बीच वार्ता होती ही है मगर उसका नतीजा क्या निकलता है? वह देश हमारा भाई है, हमारी संस्कृति एक है मगर वह हमारे लिये कैसे-कैसे सवाल पैदा करता है। अभी कुछ दिन पहले वहाँ के उप-राष्ट्रपति ने अपने पद और गोपनीयता की शपथ मैथिली में ले ली उसको लेकर कितना बड़ा विवाद खड़ा हुआ कि यह शपथ नेपाली में क्यों नहीं ली गई? इस पृष्ठभूमि में अगर हम बाराहक्षेत्र में, कमला पर शीसापानी में और बागमती पर नुनथर में बाँध बना दें और उसकी सुरक्षा की खतरा हो जाय तब हमारा क्या होगा? अगर इन बाँधों को किसी कारणवश कुछ हो गया तो पूरा बिहार ही डूब जायेगा। यहाँ तो प्रलय ही हो जायेगी। इसलिये इन बाँधों का निर्माण कोई बहुत आसान काम नहीं है। इसके अलावा आपके फायदे के लिये नेपाल कभी भी अपने गाँवों को नहीं डुबायेगा। कोसी बराज जहाँ बना है उसके चयन में भी हमसे गलती हुई है। बराज की एक इंच जमीन भी हमारी नहीं है। बराज पूरा का पूरा नेपाल में है। जब तक हमारे उनके संबंध ठीक रहते हैं तब तक तो आना जाना ठीक रहता है मगर जैसे ही कोई बात हुई नहीं कि हमारे सामानों की वहाँ चेकिंग चालू हो जाती है। हम लोग तो यहीं बगल के हैं, सारी चीजें देखते रहते हैं।

डॉ. दिनेश कुमार मिश्र


हम लोगों ने अपने हालात से समझौता कर लिया है और यथास्थिति को स्वीकार कर लिया है मगर क्या हमारा अपनी अगली पीढ़ी के प्रति कोई दायित्व नहीं बनता? अभी हमारे एक मित्र यहाँ कह रहे थे कि तटबन्ध के बाहर का तीन किलोमीटर तक का इलाका एकदम जल जमाव से ग्रस्त है और इस में सुधार किया जाना चाहिये। मुझे याद है कि एक बार बिहार विधान सभा में बहस हो रही थी कि कोसी नदी पर तटबन्ध का निर्माण होने की वजह से पूरे इलाके को लाभ पहुँचा है अतः जिन क्षेत्रों की बाढ़ से रक्षा हुई है वहाँ के बाशिन्दों पर सुधार के नाम पर टैक्स लगाया जाय। बहस में भाग लेते हुए लहटन चौधरी का कहना था कि पूरे इलाके को लाभ नहीं पहुँचा है अगर कोई लाभ हुआ है तो वह तटबन्धों के बाहर के तीन मील इलाके का हुआ है और अगर कोई टैक्स लगाना है तो उन्हीं क्षेत्रों के बाशिन्दों पर लगना चाहिए। यह 1959 की बात है। यानी जिस जमीन पर 1959 में टैक्स लगाने की बात उठती थी उसी जमीन से जल जमाव हटाने की अब बात की जा रही है। इसका निदान क्या होगा और इसका जिम्मेवार कौन है। मैं बिहार के जल संसाधन विभाग की वार्षिक रिपोर्टों को देखता हूँ तो वहाँ लिखा हुआ है कि पूर्वी तटबन्ध के पूरब में 1.82 लाख हेक्टेयर जमीन पर जल जमाव है। यह बात 1980 से अब तक लगातार कही जा रही है और 2009 में भी कही जाती है। इस बीच में सरकार ने इस जमीन को बचाने के लिये क्या किया? उसके बारे में हर जगह खामोशी है। इतनी ज्यादा तो अब नहर से सिंचाई भी नहीं होती। यहाँ सिंचाई से ज्यादा जल जमाव है। पिछले साल पूर्वी मुख्य नहर की धज्जियाँ उड़ गई कुसहा में बाँध टूटने के बाद। अब सिंचाई कब शुरू होगी यह तो किसी को पता है और न किसी को परवाह। इस नहर से 7 लाख 12 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई करने की बात थी। जैसा चन्द्र मोहन जी ने कहा था कि जब तक आप चिल्लाकर आसमान सिर पर नहीं उठायेंगे तब तक सरकार को अपने फर्ज का भी एहसास नहीं होगा। मुझे लगता है कि इन सब बातों से अगर हम कहीं न कहीं आहत होते हैं या भविष्य में आहत होने की कोई संभावना है तो अब समय आ गया है कि अपनी बात सरकार को सुनाने की शुरुआत की जाय। इस काम के लिये आप में से कोई भी आगे आता है तो हम उसकी यथासंभव मदद जरूर करेंगे। यह पीड़ा आपकी है, संघर्ष आप का है तो लड़ाई भी आप को ही करनी पड़ेगी।

तपेश्वर भाई


आपने अभी दिनेश जी से कोसी के तटबन्धों के टूटने की पूरी गाथा सुनी कि तटबन्ध टूटने या बने रहने से दोनों ही परिस्थतियों में अलग-अलग लोग किस तरह से प्रभावित होते हैं। मैं इस क्षेत्र से 1955 से जुड़ा हुआ हूँ जब यह सहरसा संयुक्त जिला हुआ करता था। मैंने यहाँ काफी समय ग्रामदान/भूदान आन्दोलन में बिताया। मैं इस क्षेत्र और कोसी नदी के चप्पे-चप्पे से परिचित हूँ और यहाँ जमीन के वितरण का गवाह रहा हूँ। इस जिले के लोगों ने बहुत कष्ट भोगा है और एक तरह से उन्हें ठगा गया है। उन्हें बताया गया था कि कोसी नदी पर तटबन्ध और बैराज के निर्माण से उनके सारे कष्टों का निवारण हो जायेगा, बाढ़ रुक जायेगी, खेती का भविष्य उज्जवल हो जायेगा, क्षति-पूर्ति दी जायेगी, उनके बच्चों को नौकरी दी जायेगी, इत्यादि इत्यादि। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ और इस बीच दसों साल बीत गये। बराज का निर्माण कार्य 1963 में पूरा हुआ। आजादी के संदर्भ में देखें तो 60 साल से अधिक का समय हुआ और हमारे गाँवों की जो स्थिति जो पहले थी वही आज भी है। सरकारें चाहे वह केन्द्र की हों या राज्य की हों या फिर किसी भी राजनैतिक पार्टी की क्यों न हो, किसी ने भी गाँवों की तरफ वह दृष्टि नहीं की जिसकी उनसे अपेक्षा की गई थी। देश की बीस प्रतिशत आबादी पर संसाधनों का अस्सी प्रतिशत खर्च किया जाता है जबकि अस्सी प्रतिशत आबादी के हिस्से में मात्र बीस प्रतिशत संसाधन आते हैं। 1984 में आपके क्षेत्र में जो तबाही हुई उसका वर्णन संभव नहीं है। न जाने कितने लोग काल के गाल में समा गये। हमलोग तभी से संघर्ष में लगे हैं। दिनेश मिश्र जी भी उसी समय यहाँ आये थे मगर उस समय उनका चिन्तन और प्राथमिकताएँ दूसरी थीं। वह यहाँ राहत कार्य के लिये आये थे दूसरी और हमलोग यहाँ संघर्ष में लगे थे। सहरसा प्रशासन को घेरने के लिये कभी 5 हजार, कभी 7 हजार तो कभी 10 से 20 हजार लोग घरों से बाहर निकल आये। इनमें से अधिकांश महिलाएँ थी। उनकी हालत देखकर प्रशासन एक ओर द्रवित होता था तो दूसरी ओर आंदोलन स्थगित करने के लिये दबाव भी डालता था। लेकिन सत्याग्रह हमेशा शांतिपूर्ण रहा। हमलोग मिल कर स्वर्गीय लहटन चौधरी से मिलने उनके आवास में पटना तक गये और उनसे दो टूक शब्दों में कहा कि यह जो नवहट्टा में बाँध टूटा है वह आपकी सरकार की लापरवाही से टूटा है और इसके रख-रखाव तथा मरम्मत का जो काम विभाग को करना चाहिए था वह उसने नहीं किया। और क्योंकि इस काम में लापरवाही बरती गई इसलिये जनता को हुई क्षति की उसे क्षति-पूर्ति मिलनी चाहिए। लहटन चौधरी को हमारी यह बात निश्चित रूप से अच्छी नहीं लगी होगी।

इसी क्षेत्र में स्वर्गीय परमेश्वर कुंअर भी थे जिन्होंने न केवल बाँध के विरोध में लड़ाई लड़ी थी वरन आजादी की लड़ाई भी लड़ी थी। इस तरह के न जाने कितने लोग इस लड़ाई में शामिल थे सरकार लेकिन अपनी जिद पर अड़ी थी कि यह सारा पानी नेपाल से आता है और जब तक नेपाल सहयोग नहीं करेगा तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यह 1984-85 की बात है। नेपाल अगर सहयोग नहीं करता था तब 25 साल तक सरकार क्या करती रही कि 2008 में कुसहा में तटबंध टूट गया जिसमें लाखों लोग आहत हुए और हजारों की तादाद में लोग मारे गये और सरकार तमाशा देखती रही।

पिछली साल लोग बाढ़ से मारे गये तो इस साल सूखे से उनकी हालत खराब है। कुल मिलाकर समस्या पानी की ही है। कभी ज्यादा कभी कम। ऐसे में परिवार चलाना, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का क्या होगा? उनके शादी विवाह का क्या होगा? कौन हमारे लड़के लड़कियों से शादी करेगा? हमारे गजेन्द्र प्रसाद ‘हिमांशु’ जी कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में सिंचाई मंत्री थे। उसी समय के आस-पास बीरपुर में एक सम्मेलन हुआ था जिसमें बहुत से नेता इकट्ठा हुये थे। काफी झगड़ा-झंझट हुआ, मारपीट भी हुई। कई नेताओं को चोटें आई और सम्मेलन स्थगित करना पड़ गया था मगर वही सम्मेलन कालान्तर में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।

.आज देश की स्थिति उस समय से बदतर हुई है। पिछले दस वर्षों में देश में पौने दो लाख किसानों ने आत्म हत्याएँ की हैं। यह आंकड़ा कृषि मंत्री शरद पवार का है। यह दौर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश से शुरू हुआ और अब दूसरे प्रांतों में भी फैल रहा है यहाँ तक कि पंजाब जैसा समृद्ध प्रांत भी इसका शिकार हो रहा है। हमारे बिहार का किसान आत्महत्या तो नहीं कर रहा है पर आजीविका के लिये बिना पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम गये बिना उसका परिवार भी नहीं चल सकता। तब क्या विनोबा-जयप्रकाश का ग्रामदान, भूदान अधूरा रह जायेगा? हम इस दिशा में एक बार फिर प्रयास करेंगे। जिला/प्रखंड स्तर पर कार्यकर्ता तैयार करेंगे। संघर्ष को आगे बढ़ायेंगे। अभी 18 अगस्त को हमने बीरपुर में कुसहा दरार की बरखी मनाई। साल भर हो गया कुसहा को टूटे मगर जो वायदे सरकार ने उस समय किये थे उस पर भी अमल नहीं हुआ। बिहार और केन्द्र सरकार एक दूसरे पर जिम्मेवारी ठेल देते हैं।

इसके अलावा जो सब से अहम सवाल है वह है सरकारी भ्रष्टाचार से निबटने का। हर सरकार इसे हटाने का दावा करती है मगर फिर उसी में आकण्ठ डूबती है। इसका निवारण भी आरजू मिन्नत से नहीं होगा इसके लिये भी संघर्ष करना पड़ेगा और युवकों को आगे आना पड़ेगा।

पिछले साल कुसहा के कारण मधेपुरा, अररिया और पूर्वी सुपौल के हिस्से में जो तबाही हुई उतनी तबाही तो आपके यहाँ हर साल होती है मगर हमारे साथ बहुत से वैज्ञानिक इंजीनियर और पर्यावरणविद हैं जो हमें रास्ता दिखाने के लिये प्रस्तुत हैं, हमें उनका फायदा उठाना चाहिए। आप लोग मिल बैठकर कोई ठोस कार्यक्रम सोचें। संघर्ष के रास्ते पर हम आपके साथ हैं हमें अगर जेल जाना पड़ा तो हम जायेंगे। कहा भी है - ‘‘जहाँ पर चाह होती है, वहाँ पर राह होती है। लगन सच्ची अगर हो, वह नहीं गुमराह होती है।’’

रमेश चन्द्र झा


पिछले साल कुसहा में 1,68,000 क्यूसेक के प्रवाह पर तटबन्ध टूट गया था। इस साल जब हमलोग कुसहा दरार की बरखी मना रहे थे उस दिन सुनने में आया था कि नदी का प्रवाह 2,38,000 क्यूसेक था। पता लगते ही रातों की नींद उड़ गई। इस प्रवाह पर भी अगर तटबन्ध टूटे तो जहाँ टूटेगा वहाँ के लोग कहाँ चले जायेंगे किसी को पता भी नहीं लगेगा। गांधीजी ने देश की आजादी के लिये लड़ाई लड़ी। वह लड़ाई अभी अधूरी है। मैं युवक-युवतियों का आवाहन करता हूँ कि वह भगत सिंह, चन्द्रशेखर बन कर इस लड़ाई को अंजाम दें। हमें अपनी दुर्दशा से मुक्ति चाहिए। यहाँ बहुत से बुजुर्ग लोग भी बैठे हैं जिन्होंने 1954 की बाढ़ भी देखी होगी और उसके बाद 1968, 1974, 1984, 1987 और अब कुसहा को भी देखा होगा। क्या फर्क पड़ा 1954 से 2008 के बीच?

नीता कुमारी


हमारे क्षेत्र के जो जन प्रतिनिधि हैं, जो एम.पी. या एम.एल.ए. है उन्हें इस क्षेत्र की समस्या को उन सभी मंचों से उठाना चाहिए जिसके लिये इस क्षेत्र की जनता ने उन्हें चुनकर भेजा है। बाहर से आये हमारे मित्रों ने कहा कि इन क्षेत्र के लोगों ने यथास्थिति को स्वीकार कर लिया है और यह प्रायः निर्जीव हो गये हैं। यह सच है कि जो आवाजें यहाँ से उठनी चाहिए थीं वह नहीं उठ रही हैं। इसके लिये हम सभी को सामूहिक प्रयास करना पड़ेगा।

दीना नाथ पटेल


बाढ़ की समस्या हमारी सारी समस्याओं के मूल में है और हम इसे बचपन से देखते आ रहे हैं। 6 सितम्बर 1984 के दिन जो तटबन्ध टूटा था उसकी त्रासदी भी हमने देखी है मगर हमारा गाँव कबीरा धाप तटबन्धों के अन्दर है इसलिये बाँध टूटने का वह झटका हमें नहीं लगा। यह बात अलग है कि कोसी का पानी हर साल हमारे गाँव के ऊपर से होकर गुजरता है। पिछले साल कुसहा में तटबन्ध टूट गया तो हमारे यहाँ कुछ राहत हो गई थी। कुसहा में जब तटबन्ध टूटा तो उसका संचार माध्यमों से खूब प्रचार-प्रसार किया गया मगर जब 1984 में नवहट्टा में तटबन्ध टूटा तो हमलोगों को पूछने वाला कोई नहीं था। हमारी समस्या यह है कि तटबन्धों के भीतर रहने वाले लोगों की समस्या को केाई सुनने या मानने के लिये तैयार ही नहीं है और तटबन्धों के बाहर हमेशा जल जमाव की समस्या से जूझने वाले लोगों की जो दुर्गति हर साल होती है उसको भी वह तवज्जो नहीं मिल पाती जिसका वह इलाका हकदार है। हमारे शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, कटाव, नदी का इधर-उधर भागना आदि कितनी समस्याएँ जिसे देखे बिना विश्वास नहीं किया जा सकता। अन्दर एक समस्या और है। नदी जिस जमीन को काट देती है उसे सरकार गैर-मजरुआ घोषित कर देती है और उस जमीन का कागज सरकारी कर्मचारी गैर कानूनी तरीके से, पिछले दरवाजे से, दूसरों के नाम बन्दोबस्ती कर देते हैं। यह समस्या तटबन्धों के अन्दर की है जो आगे चल कर जमीन के मालिकाना हक को लेकर विकराल रूप धारण करेगी।

यह सारी समस्यायें हम देख तो रहे हैं मगर हमारा आक्रोश एक नपुंसक आक्रोश है, यह संगठित आक्रोश का रूप नहीं ले पाता है। इसका समाधान आन्दोलन से ही निकलेगा। मिश्र जी ने सुझाव दिया है कि कोसी को फिर से उसकी पुरानी धाराओं में बहाने का प्रयास करना चाहिए इससे समस्या कम हो पायेगी, यह तो समझ में आता है। फिर मिश्र जी और अन्य साथियों ने कहा कि वह बाहर के हैं अतः मदद नहीं कर पायेंगे। हमारा आग्रह उन सभी समाजवादी साथियों से है जो देश के हर कोने में फैले हुये हैं कि हमारी ओर मदद का हाथ बढ़ायें, संघर्ष हम करेंगे। हमें आप की जरूरत है, यहाँ का कोई नेता हमारी मदद के लिये आगे नहीं आयेगा। हमारा विश्वास उन पर से उठता जा रहा है। हमारे साथ हमेशा से धोखा ही होता रहा है। जवाहर लाल नेहरू या राजेन्द्र बाबू ने जो कुछ आश्वासन हमें दिया वह पूरा नहीं हुआ। फिर कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार बना और उसके भी आश्वासन मिले- वहाँ भी कुछ नहीं हुआ। पिछले साल राष्ट्रीय आपदा घोषित हुई जब कुसहा में बाँध टूटा, वह आश्वासन भी पूरा नहीं हुआ। जब तक हम सरकार पर दबाव बना सकने की स्थिति में नहीं आयेंगे तब तक हमारी न तो कोई सुनेगा और न ही हमारी समस्याओं का कोई समाधान होगा।

शंभुनाथ झा


1955 में कोसी पर तटबन्ध बना कर सरकार ने भूल की क्योंकि इस तटबन्ध से कोई भी खुश नहीं है, न तटबन्ध के अन्दर के लोग और न ही तटबन्ध के बाहर बसे लोग। इस समस्याओं के प्रति सरकार संवदेनहीन है और उसकी संवेदना जगाने का केवल एक ही रास्ता है कि आन्दोलन किया जाय और पूरे प्रशासन को ठप कर दिया जाय।

मैं इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिये प्रो. विद्यानन्द मिश्र, रामदेव शर्मा, गजेन्द्र प्रसाद यादव, अनवर आजाद जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ जिनके अथक प्रयास से हमलोग यहाँ बातचीत के लिये एकत्रित हो पाये।

छठे प्रतिनिधि सम्मेलन (6 सितंबर 2009) की कार्यवाही रिपोर्ट सभा स्थल:

विवाह भवन, शंकर चौक, जिला सहरसा (बिहार) आज की कार्यवाही श्री शिवानन्द भाई की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई और सभा का संचालन प्रो. विद्यान्नद मिश्र और अनवर आजाद ने किया। उद्घाटन भाषण बी.एन. मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के उप कुलपति प्रो. आर.पी. श्रीवास्तव ने किया।

प्रो. आर.पी. श्रीवास्तव


मैं कुछ दिनों से मधेपुरा में विश्वविद्यालय के उप कुलपति पद पर कार्यरत हूँ और कोसी से मेरा पहला संवाद फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की पुस्तकों से हुआ था। मधेपुरा आने के बाद पिछले साल मैंने यहाँ के लोगों की पीड़ा देखी। लोगों का कहना था कि पिछले पचास वर्षों में ऐसी तबाही नहीं हुई। पिछले दो तीन दिनों में दिनेश मिश्र जी की किताबों को पढ़ा और मुझे लगता है नदी के बारे में अब किसी जानकारी का अभाव नहीं है। प्रो. विद्यानन्द जी ने यह किताबें मुझे दीं, समयाभाव के कारण अभी पूरा नहीं पढ़ पाया हूँ। दिनकर का कहना था कि नदियों का मूल जानना बहुत गूढ़ है। इस गूढ़ रहस्य तक दिनेश मिश्र जी आपको ले जाते हैं। उनकी उपस्थिति का आप पूरा लाभ लें।

पूरी धरती पर भारत एक अकेला देश है जहाँ नदियों को देवत्व प्राप्त है और उन सभी का कहीं न कहीं देवताओं से सम्बन्ध है। कोसी विश्वामित्र की बड़ी बहन है यह मैं नहीं जानता था। मिश्र जी की पुस्तक से मुझे यह जानकारी मिली। विश्वामित्र अपना परिचय कैसे देते हैं। उन्होंने वशिष्ठ के पुत्रों के जंगल का खात्मा कर दिया, चाण्डाल का यज्ञ करवाया, त्रिशंकु को बिना मृत्यु का वरण किये सीधे स्वर्ग में भेजने की कोशिश की। यह सारे क्रान्तिकारी काम विश्वामित्र ने किये तब उनकी बड़ी बहन कोसी शान्त रहेगी, यह कल्पना ही व्यर्थ है। वह उपद्रव नहीं करेगी तो क्या करेगी।

मगर यह मिथक है, इतिहास नहीं है। कुछ चिन्तक मिथकों की व्याख्या कर रहे हैं - मिथक का अर्थ क्या है? हमारे घरों में अक्सर सत्य नारायण भगवान की कथा होती है, उसमें कलावती, लीलावती, साधु, राजा आदि सबके बारे में लिखा है कि उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी मगर वह कथा क्या है उसकी चर्चा उस पोथी में नहीं है। कथाएँ शायद इसलिये कहीं जाती है कि उनके माध्यम से किसी बात को समझाना आसान हो जाता है। रजनीश भी अपनी बात कथा के माध्यम से कहते थे। कथा अन्तर में शीघ्र और सरलता से प्रवेश करती है। नदी के प्रति श्रद्धा रखो- यह कहने से नहीं होता, कथा से होता है। पीपल की रक्षा करो- किए लिये? उससे बहुत ज्यादा आॅक्सीजन मिलती है तो शायद लोगों की समझ में न आये मगर कहा जाय कि उस पर वासुदेव बसते है तो पूरा सन्दर्भ बदल जाता है।

नदी-नदी नहीं होती तो आदमी-आदमी नहीं होता। हम आप सब कोसी की विनाश लीला को जानते हैं मगर उसका सकारात्मक पक्ष भी है। अपने ही देश में इन्दौर में जमीन से 600 फीट नीचे भी पानी नहीं है- वहाँ लोग पानी के लिये तरसते हैं और इसलिये पानी के बिना मरते भी हैं। यहाँ पानी की अधिकता से परेशानी है मगर पानी है और इसलिये नदी पूज्य हो गई है। कोसी विश्वामित्र की बड़ी बहन है, देवी है, उससे जुड़े हुए अनेक गीत हैं। माँ है नदी। नदी नहीं होती तो जीवन नहीं होता। उसके किनारे लोग बसे हैं- ऐसा प्रायः सभी देशों में है। इंग्लैण्ड में टेम्स और चीन में हुआई नदी के किनारे भी लोग बसे हैं। अन्तर बस इतना है कि उन नदियों को देवत्व प्राप्त नहीं है।

.माँ नाराज क्यों होती है कि अपने सैंकड़ों हजारों, पुत्र-पुत्रियों को निगल जाये। कहते हैं कि पुत्र कुपुत्र होता है मगर माता कुमाता नहीं होती। मिश्र जी आप को बतायेंगे कि मनुष्यों का प्रकृति के साथ सम्बन्ध होता है और इस सम्बन्ध को मनुष्यों ने तोड़ दिया। वृक्षों को काट डाला, नदियों को रोक दिया, पहाड़ों को खोदकर तहस नहस कर दिया और समुद्र को भी चैन से नहीं रहने दिया। अब बताते हैं कि समुद्र मुंबई की ओर बढ़ रहा है। समुद्र को इतना छेड़ रहे हैं कि उसकी कुछ तो प्रतिक्रिया होगी। पहाड़ भी कब तक चुप बैठेगा-कुछ तो करेगा?

डॉ. के.ए. राव का बड़ा नाम था एक इंजीनियर की हैसियत से और वह जो कहते थे जवाहर लाल नेहरू वही करते थे। अगर मैं इस देश का प्रधानमंत्री बन जाऊँ तो दिनेश मिश्र जो कहेंगे वह मैं कर दूँगा। उनका प्रभाव है मेरे ऊपर। अब पानी को बाँधेंगे तो वह एक न एक दिन अपना रास्ता खोजेगा। बंधेगा तो बाँध को तोड़ेगा। हमने जो बाँध बनाया उसका फायदा हुआ तो किसे हुआ? प्रजातंत्र संख्या से चलता है। आप यहाँ 100 लोग बैठे हैं, बाहर ज्यादा हैं। तटबन्ध तोड़ेंगे तो बवाल मचेगा। अगर नदी की गाद निकाल देंगे तो समाधान होगा क्या? अगर होगा तो कैसे होगा और नहीं होगा तो क्यों? इन सब विषयों पर आप लोग चिन्तन करेंगे।

मैं पिछले साल कोसी क्षेत्र में बहुत घूमा। गाँव के गाँव नहीं रहे। घोंसले उजड़ गए। एक बार के बिखराव से सब कुछ उजड़ गया- यह बार-बार हो तो कैसा रहेगा। हम क्या कर सकते हैं इस पर आप चिन्तन करें। अपनी बात सरकार तक पहुँचायें। मेरी शुभकामनाएं आप के साथ हैं।

डॉ. दिनेश कुमार मिश्र


कोसी के तटबन्धों के बारे में कल चन्द्रायण में हमलोगों ने विस्तार से चर्चा की थी। इन तटबन्धों के टूटने का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। पहली बार यह तटबन्ध 1963 में डलवा (नेपाल) में टूटा जब प्रान्त में कांग्रेस पार्टी की बिनोदा नन्द झा की सरकार थी। बराज बनाने का काम इसी साल मार्च में पूरा किया गया था। दूसरी बार यह तटबन्ध 1968 में जमालपुर के पास पाँच जगहों पर दरभंगा में टूटा तब यहाँ राष्ट्रपति शासन था। 1971 में भटनियां के पास अप्रोच बाँध टूटा तब भोला पासवान शास्त्री सत्ता में थे। 1980 में सलखुआ प्रखण्ड में बहुअरवा के पास जब तटबन्ध टूटा तो कांग्रेस पार्टी की जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री थे 1984 में जब यहाँ केदली पुनर्वास के पास तटबन्ध टूटा तब कांग्रेस के ही चन्द्रशेखर सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे। 1987 में पश्चिमी तटबन्ध एक बार फिर जमालपुर के दक्षिण गण्डौल और समानी में टूटा। उस समय बिन्ध्येश्वरी दुबे का शासन था। 1991 में जब नेपाल में जोगिनियाँ के पास तटबन्ध कट गया तब राज्य में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे। और अब 2008 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री काल में कुसहा में यह तटबन्ध धराशायी हो गया। यह सरकार जद(यू) और भारतीय जनता पार्टी की थी। इस तरह से राष्ट्रपति शासन समेत कोई भी ऐसी व्यवस्था या पार्टी नहीं है जिसके शासन काल में यह तटबन्ध टूटे न हो। कोई भी पार्टी नहीं बची है जो तटबन्ध टूटने का या उसके रख-रखाव में कमी का अभियोग दूसरे पर न लगाती हो। इस नौटंकी को हमें समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। इस फरेब और इस झूठ पर जब तक सवाल नहीं उठाये जायेंगे तब तक यह राजनीति के खिलाड़ी हमें बेवकूफ बनाते रहेंगे। हमारी कमजोर याददाश्त इन लोगों के काम आती है।

मैं यहाँ 1984 में पहली बार आया था और जो बदहाली मैंने यहाँ देखी उसका कुछ ऐसा प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा कि लगभग यहीं का होकर रह गया। तटबन्ध के बचाव या मरम्मत या फिर किसी विकल्प की तलाश करने में हमें कहीं न कहीं इंजीनियरों की मदद लेनी पड़ती है। मैं अगर यह कहूँ कि कोसी की सारी पुरानी धाराओं को चालू करके उसका पानी उन सभी में से होकर बहा देना चाहिए- तब भी हमें इंजीनियरों की जरूरत पड़ेगी। अगर हमें इस इंजीनियर नाम के शब्द से परहेज है तो जिस किसी को भी यह जिम्मा सौंपा जायेगा वह कुछ न कुछ इंजीनियरिंग उसमें लगायेगा। इस इंजीनियर या कर्मी के साथ वार्तालाप जरूरी है जो कि होता नहीं है। आज अगर हम उससे जाकर कहें कि तटबन्ध काम नहीं कर रहा है कुछ और रास्ता बताइये। वह कह सकता है कि हम नदी को छोड़ देते हैं और गाँव को बाँध देते हैं। यह एक विकल्प हो सकता है मगर हमारे यहाँ निर्मली, महादेव मठ, बैरगनियाँ जैसी कितनी मिसालें हैं जहाँ गाँव को घेरना स्थानीय समाज पर भारी पड़ा। निर्मली वालों से उनका हाल पूछिये। बरसात शुरू होते ही वहाँ रेल चालन बन्द हो जाता है और निचले इलाकों में नावें चलने लगती हैं। और तो और निर्मली रिंगबाँध के अन्दर के क्षेत्र को सुरक्षित मान कर बाहर वालों को वहाँ पुर्नवास दिया गया है। सब का सब डूब गया। वह बाहर ज्यादा सुरक्षित थे।

फिर नदी की उड़ाही का प्रश्न है। नरसिम्हा राव 1993 में बिहार आकर बोल गये कि हमने नदियों की उड़ाही के बारे में कभी गंभीरता से नहीं सोचा इसलिये अब इस दिशा में प्रयास करेंगे। हमारे बहुत से मित्र हैं जल संसाधन विभाग में और उनसे हमने पूछा कि नरसिम्हाराव को पता था कि वह क्या कह रहे हैं नदियों की उड़ाही के बारे में? उन्होंने ऐसा कहा है तो निश्चित रूप से आप में से ही किसी इंजीनियर ने उन्हें ऐसा कहने के लिये प्रेरित किया होगा क्योंकि वह तो ले मैन है इस मसले पर। प्रधानमंत्री हुए तो क्या हुआ। मुझे कोई जवाब नहीं मिला। मेरे पास कुछ सरकारी आंकड़े थे जिनसे कोसी में हर साल आने वाली गाद का अन्दाजा लगता है। महिषी से लेकर कोपड़िया के बीच 33 किलोमीटर की दूरी में नदी का तल हर साल पाँच इंच की रफ्तार से ऊपर उठ रहा है। मैंने हिसाब किया तो पता लगा कि इतनी मिट्टी निकालने के लिये हर साल दिसम्बर से मई महीने के बीच लगातार पाँच महीने तक 37,800 ट्रक रोज मिट्टी लेकर कहीं जायेंगे। यह जगह गंगा सागर के पहले दिखाई नहीं पड़ती। मिट्टी से भरे इतने ट्रक ले जाने के लिये कम से कम 6 लेन का एक एक्सप्रेस हाइवे बनाने का काम करना पड़ेगा। इस सड़क पर खाली मिट्टी ढोने वाले ट्रक चलेंगे। इन ट्रकों के चालन के लिये डीजल चाहिये, गैरेज चाहिए, ढाबे चाहिए, नये पुल चाहिए। पता नहीं राव साहब को इन सब बातों का अन्दाजा था या नहीं? इतनी मिट्टी भी सिर्फ 33 किलोमीटर लम्बाई से निकलेगी। नदी की पूरी लम्बाई 250 किलोमीटर के आस-पास होगी, इसके अलावा 7 और बड़ी नदियाँ हैं बिहार में। सबकी उड़ाही अगर करनी हो तो फिर पूरा देश मिट्टी ही खोदेगा। नेताओं को कुछ भी बोलने से पहले सोचना चाहिए। इससे जनता में अपेक्षाएँ जगती हैं।

बाराह क्षेत्र बाँध की वार्ता नेपाल के साथ पिछले 72 वर्षों से चल रही है और कोई समझौता अभी तक नहीं हुआ। कितनी बातचीत करेंगे आप? कहते हैं कि इससे बाढ़ समस्या का समाधान होगा। पिछले पाँच वर्षों में सरकार की चार अलग-अलग रिपोर्टें आई हैं जिनमें लिखा हुआ है कि बाराहक्षेत्र बाँध के योजना प्रस्ताव में बाढ़ नियंत्रण का कोई प्रावधान नहीं है। अगर यह भी सच है तो फिर क्या जरूरत है बाराह क्षेत्र बाँध बनाने की? कहते हैं कि इससे 12 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई होगी। तो क्या कोसी परियोजना में 7 लाख 12 हजार हेक्टेयर जमीन सींचने की योजना नहीं थी? वहाँ क्यों सवा लाख हेक्टेयर तक पहुँचते-पहुँचते आप का दम फूलने लगता है? अगर बाराह क्षेत्र बाँध से इतनी सिंचाई होगी तो कोसी परियोजना वाली सिंचाई पहले पूरी कर लीजिये। फिर आती है 3300 मेगावाट बिजली के उत्पादन की बात। कटैया जल-विद्युत केन्द्र 20 मेगावाट क्षमता का है और आप उसे सफलता पूर्वक चला नहीं पाते हैं तो 3300 मेगावाट वाले संयंत्र की गति आपके हाथ में पड़ कर क्या होगी?

यह बाँध जब भी बनेगा उसका निर्णय नेपाल करेगा क्योंकि वह जमीन उनकी है। उनके गाँव वहाँ बसे हुये हैं। उस पर हमारा कोई अख्तियार नहीं है मगर हमारे केन्द्रीय राज्य जल संसाधन मंत्री ने 2004 में एक बयान दिया जो अखबारों में भी छपा था कि सरकार ने नेपाल में बाराहक्षेत्र बाँध बनाने की स्वीकृति दे दी है और इसके लिये 29 करोड़ रुपये भी स्वीकृति कर दिये हैं। अब 29 करोड़ रुपये में वह बाँध कैसे बनेगा जिसकी लागत 47,000 करोड़ बताई जाती है? वास्तव में यह स्वीकृति मात्र विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बनाने के लिये मिली थी जिस पर 69 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और यह काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है क्योंकि नेपाल में स्थानीय प्रतिरोध के कारण सारे दफ्तर बन्द कर देने पड़े थे। उन दफ्तरों में रोज पटाखे फूटते थे और उसमें काम करने वाले इंजीनियर काम छोड़कर वापस चले गये।

बिहार में बाढ़कभी-कभी नदीजोड़ योजना के लिये भी दम भरा जाता है। यह योजना भी नेपाल के सहयोग के बिना नहीं बनने वाली और हमारे सरकार ने औपचारिक रूप से नदी जोड़ योजना के बारे में अभी तक नेपाल सरकार को बताया तक नहीं है। हमें एक तो इस तरह के सरकारी तंत्र के झूठ का पर्दाफाश करना पड़ेगा और दूसरी तरफ तकनीक की मर्यादा भी तय करनी पड़ेगी। कुसहा में जब तटबन्ध टूटा तो सरकार वहाँ दस दिन बाद पहुँची। तब तक समाज ने अकेले उस विपत्ति का सामना किया मगर हजारों की तादाद में लोग मरे। इंजीनियर और राजनीतिज्ञ हमें तबाही के एक स्तर पर ले जाकर छोड़ देते हैं कि जनता अब खुद समझे। फिर वह तटबंध और बाँध भी बनाते हैं हमारे लिये। कोसी का तटबन्ध कुसहा में ज्यादा से ज्यादा 20 फुट ऊँचा रहा होगा और इतना कुछ अपने साथ ले गया। अब वही लोग बाराह क्षेत्र में 880 फुट ऊँचा बाँध बनायेंगे जिसके बारे में 1954 में बिहार विधान सभा में अनुग्रह नारायण सिंह ने कहा था कि सरकार यह बाँध इसलिये नहीं बनाना चाहेगी क्योंकि उसे निचले क्षेत्रों में रहने वालों की चिन्ता है। वह चिन्ता अब समाप्त हो गई क्या? कुसहा में तटबन्ध टूटने के बाद तो ऐसा ही लगा।

फिर तटबन्ध के अन्दर और उसके बाहर वालों का प्रश्न उठता है। उनके बीच में तटबन्ध की रेखा पड़ती है। कबड्डी खेलते समय भी हम दो पार्टियोंं के बीच एक लाइन खींच देते हैं और यह लाइन ही उनके हितों को अलग कर देती है। तटबन्ध के अन्दर रहने वाले चाहते हैं कि तटबन्ध हटा दिया जाय या फिर उनका समुचित पुनर्वास कहीं दूसरी जगह कर दिया जाय। तटबन्ध के बाहर वाले चाहते हैं कि तटबन्ध को और भी ऊँचा और मजबूत कर दिया जाय ताकि वह कभी टूटे नहीं और वह यह भी कहते हैं कि अन्दर वाले तो रिलीफखोर हैं, उन्हें तो रिलीफ खाने की आदत है। वहाँ कबड्डी लम्बे समय से खेली जा रही है। ऐसे में नेता जी के लिये यह कहना बहुत आसान हो जाता है कि आप लोग आपस में मिल बैठ कर तय कर लीजिये कि क्या करना है सरकार वह कर देगी। नेताजी अच्छी तरह जानते हैं कि दोनों समूह कभी एक मत होंगे या नहीं। तब वह लोग मरें चाहें जीयें, नेताजी का काम चलता रहेगा। हमारे उप मुख्यमंत्री जी जब विपक्ष में थे तब खूब कोसी तटबन्धों के बीच जाकर भाषण दिया करते थे। सत्ता में आने के बाद उन्होंने कभी उधर का रूख नहीं किया।

परमेश्वर कुंअर जी से मेरी बातें होती थीं। वह कहते थे कि तटबन्ध को काट कर खत्म कर देना चाहिये और उसके बाद नदी पूर्णियाँ चली जाती है तो जाये। वैसे भी वह एक न एक दिन पूर्णियाँ जायेगी सो पिछले साल चली गई। कुंअरजी हमारे बीच नहीं हैं मगर उनकी बात नदी ने रख ली। वह यह भी कहते थे और 1984 तक तो वह जरूर कहते थे कि तटबन्धों को काट दिया जाय। मगर 1984 की तबाही ने उन्हें विचलित कर दिया था, उन्होंने अपनी बात में थोड़ा सुधार किया था कि तटबन्ध काटने का काम गर्मी के मौसम में होना चाहिए और पूरी लम्बाई में होना चाहिए। इससे तटबन्ध टूटने वाली तबाही से बचा जा सकेगा-पानी धीरे-धीरे चारों तरफ फैलेगा।

समस्या इन सारी बातों को सरकार और उसके लोगों को समझाने की है। इतना तो तय है कि सरकार का एक अदना सा चपरासी जोकि भले ही दैनिक मजदूरी पर रखा गया हो, वह समाज के दूसरे किसी आदमी, भले ही वह नोबल पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति ही क्यों न हो, से ज्यादा ताकतवर होता है। सरकार अपने चपरासी की बात तो सुनती है मगर बाहर का नोबेल लारेट भी उसे डिगा नहीं सकता। सरकार के लोग बहस से बच कर भी निकलना बखूबी जानते हैं। मेरी कुछ एक बार मंत्रियों से बात हई है, वह यह मानते भी हैं कि जो कुछ हो रहा है सब ठीक नहीं हो रहा है मगर विकल्प मानने या सुनने को वह कभी तैयार नहीं होते। चारों तरफ से घिर जाने के बाद वह यह कह कर बच निकलते हैं कि जब आज जैसे चिन्तक या विचारक समाज के बारे में सोचने लगे हैं तो वहाँ से समाधान जरूर निकल जायेगा। सुनने वाला फूल कर कुप्पा हो जाता है कि मंत्री जी ने उनका संज्ञान लिया और इतनी इज्जत की और उधर मंत्री जी दूसरी किसी मीटिंग का बहाना करके वहाँ से चुप चाप खिसक लेते हैं।

1956 में समस्तीपुर में एक बाढ़ संगोष्ठी हो रही थी। उसमें एक इंजीनियर ने सुझाव दिया था कि अगर भारत के पूर्वी तट पर बंगाल के खाड़ी में एक बहुत ऊँचा पहाड़ बना दिया जाय और दूसरा वैसा ही पहाड़ मध्य भारत में विन्ध्य पर्वत माला में बना दिया जाय तो न तो वर्षा पूर्वी हवाओं से हो पायेगी और न ही अरब सागर की ओर से आने वाले बादलों से कोई नुकसान हो पायेगा। न पानी बरसेगा और न बाढ़ ही आ पायेगी। उस बेवकूफ आदमी को यह पता नहीं था कि वह कह क्या रहा है? सौभाग्य से वहाँ कोई ऐसा नेता मौजूद नहीं था जो यह कहता कि आपका सुझाव बहुत अच्छा लग रहा है, आइये इस पर विस्तार से चर्चा करें और क्रियान्वित करें।

इसके साथ ही नदीजोड़ योजना की बात है। सरकार ने एक लड़की खोजी है कावेरी और एक लड़का उसे मिला ब्रह्मपुत्र नाम का असम में। दोनों की शादी करवा देंगे। 5,60,000 करोड़ रुपये की योजना है। शादी में सबको नेग, दक्षिण या उपहार मिलता है। इस योजना में परामर्शी सेवाओं की फीस अगर 6 प्रतिशत भी मान ली जाय तो 30,000 करोड़ रुपये के आस-पास होती है। इतना पैसा देश के बुद्धिजीवियों को नेग देने के लिये कम नहीं है। शादी में ढोल बजाने वाले से लेकर नाई, माली, बाजा वाले, तम्बू-कनात वाले, डोली वाली आदि सभी का नेग है। सभी चाहते हैं कि विवाह हो क्योंकि इसमें सब का फायदा है। विवाह के बाद कन्या पक्ष और वर पक्ष में लाठी चले या गोली बन्दूक चले, समाज इसकी परवाह नहीं करता। पति पत्नी के बीच तनाव हो, उनमें तलाक हो जाये तो सब लोग यह कह कर किनारा कर लेते हैं कि यह पति पत्नी की आपस की बात है उसमें देखल देने वाला बेवकूफ होता है। यह सब चिन्ता का विषय इसलिये है कि नदीजोड़ योजना के बारे में यह कहा जाता है कि यही बाढ़ और सूखे का अन्तिम समाधान है। अगर यह अन्तिम समाधान है और उसके बाद कुछ भी करने को नहीं बचता है तब और भी ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। इन सारी समस्याओं पर हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए और आगे की रणनीति बनानी चाहिए।

प्रो. विद्यानन्द मिश्र


कुलपति जी के बाद मिश्र जी ने कोसी के सभी पक्षों को अच्छी तरह उजागर किया है। नवहट्टा में जब तटबन्ध टूटा था तब बोल्डर गिराने का और मिट्टी का सारा काम स्थानीय लोगों ने किया था। इस बार का ठेका आन्ध्र प्रदेश की एक कम्पनी को दिया गया जिससे निर्माण कार्यों में स्थानीय भागीदारी भी समाप्त हो गई। यह सभी मसले इतने गंभीर हैं जिसकी आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता। हमारे साथ यहाँ बहुत से चिन्तक मौजूद हैं और हम सबकी बातें ध्यान पूर्वक सुनकर आगे की रणनीति बनायेंगे।

सरला बहन


नवहट्टा में जब तटबन्ध टूटा था तब हम दोनों (शिवानन्द भाई) यहाँ की स्थिति देखने के लिये आये। हमलोग पहले नाव से महिषी गये और वहाँ की स्थिति को देखने के बाद कुछ राहत कार्य चलाने के बारे में सोचने लगे। गाँव-गाँव में घूमना शुरू किया और लगभग 100 नौजवानों को इकट्ठा किया जो इस काम में हमलोगों की मदद कर सकें। पहले तो शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था की, फिर शौचालय बनाने का काम शुरू किया और उसके बाद जगह-जगह डीडीटी छिड़कवाने का काम किया। यह शुरूआती दौर था पर बाद में लोगों में जागृति आई कि तटबन्ध टूटने का जिम्मेवार तो सरकार थी। तटबन्ध तो उसकी लापरवाही से टूटा था। अतः हम राहत नहीं लेंगे, उसका बहिष्कार करेंगे और सरकार से क्षति-पूर्ति की मांग करेंगे। इस समय हमारे साथ सर्वोदय के शीर्ष नेता ठाकुर दास बंग, सिद्धराज ढढ्ढा और अमरनाथ भाई वगैरह भी आ गये थे।

हमलोगों ने ग्रामीण प्रभावित जनता को संगठित करना शुरू किया और महिलाओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया। हमने कहरा, नवह्टा, महिषी, सिमरी, बख्तियारपुर और सलखुआ प्रखंडों में सघन सम्पर्क किया और सबको लाकर सहरसा में सरकारी दफ्तरों को घेर लिया और सारा काम काज ठप्प कर दिया। सारे अफसरों ने कलेक्टर से कहा कि इन लोगों से बात कीजिये मगर कलेक्टर ने बातचीत करने से साफ मना कर दिया। हम लोग पटना गये लहटन चौधरी से मिलने। वह उस समय राज्य में कृषि मंत्री थे और महिषी उनका विधान सभा क्षेत्र था। चौधरी जी हमारे पिता जी के मित्र थे, उनका कहना था कि सरकार तो सब कुछ कर ही रही है वह कपड़े दे रही है, अनाज दे रही है और नगद अनुदान भी दे रही है। और क्या चाहिये? हमलोगों ने उनसे कहा कि आप को तो यह कुर्सी गांधी, ग्राम स्वराज, भूदान और ग्रामदान आदि की बदौलत मिली है अतः उन मान्यताओं को याद कीजिये। लोगों को भिखारी मत बनाइये। पहले महिलाओं को चरखा दीजिये ताकि वह कुछ कमा सकें और तन ढकने के लिये कपड़ा बना सकें। दूसरे सरल और कठिन श्रम योजनाएँ शुरू कीजिये ताकि लोगों को रोजगार मिल सके और फिर जो लोगों के जान-माल का नुकसान हुआ है उसकी क्षति-पूर्ति की व्यवस्था कीजिये क्योंकि यह बाँध सरकार की लापरवाही से टूटा है। उन्होंने कहा कि इन सारे विषयों पर सहरसा आकर बात करेंगे। वह सहरसा आये मगर जहाज से उतरे नहीं, सीधे पूर्णियाँ चले गये। उन्हें लगा होगा कि यहाँ सहरसा में लोग ऐसे सवाल पूछेंगे जिसका जवाब उनके पास नहीं था। इस तरह के कार्यक्रम हम लोग चलाते रहे।

एक पदयात्रा भी हमने वीरपुर से कोपड़िया तक की। यह करीब सवा सौ किलोमीटर लम्बा रास्ता था जिसमें हमारी तटबन्ध के अन्दर और बाहर रहने वाले सभी लोगों से बात हुई। इस बार हमने तटबन्धों के बाहर का जल-जमाव देखा। यहीं से क्षति-पूर्ति आन्दोलन की शुरुआत की नींव पड़ी। इस बीच में इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बाद चुनाव की घोषणा हुई। हमलोगों ने उस साल चुनाव बूथ पर जाकर विनोबा-जयप्रकाश का फोटो रखकर धरना दिया और वोट के बहिष्कार का आह्वान किया। हम लोगों ने बैनर लगाये की क्षति-पूर्ति नहीं तो वोट नहीं। उस समय सिद्धराज ढ्ढढा जी वहाँ आये थे और हमलोग उनको यह बूथ और वोट का बहिष्कार दिखाने के लिये लेकर आये थे। यह सब चला तो जरूर मगर बाद में इसमें राजनीति घुस गई और आन्दोलन बिखर गया।

पिछले साल कुसहा में दरार की वजह से जो स्थिति बनी वह नवहट्टा से बदतर थी। वहाँ भी हमने काम किया पर इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी और इसका कोई तुरन्त का या सुलभ समाधान नहीं है। यह समाधान खोजना होगा।

हम जहाँ स्थाई रूप से काम करते हैं वह इलाका जमुई जिले में है और नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। वहाँ पिछले पंन्द्रह दिनों में दो जघन्य घटनाएँ हुई हैं। वहाँ भी हम जनता को संगठित करने का काम कर रहे हैं। हमें अपने अधिकारों के लिये लड़ना होगा और यह संघर्ष निरन्तर चलने वाला है।

तपेश्वर भाई


कल चन्द्रायण हाई स्कूल में सैंकड़ों लोगों के बीच भारी बारिश में हुई चर्चा को हम आगे बढ़ा रहे हैं। कोसी नदी पर बराज बनने के पूर्व से लेकर आज तक के कोसी की स्वरूप पर उप-कुलपति जी ने बड़ा महत्त्वपूर्ण भाषण दिया। कल से आज की चर्चा में दिनेश मिश्र जी ने कोसी के बहुत से आयामों की चर्चा की है और उन सभी मुद्दों पर एक लम्बी लड़ाई लड़ने की बात की है। मेरा जन्म जरूर मधुबनी में हुआ पर मैं पिछले पचास से अधिक वर्षों से सहरसा की धरती से भूदान और सर्वोदय के माध्यम से जुड़ा हुआ हूँ। सहरसा हमेशा से मेरी कर्मभूमि रहा है। पुराने सहरसा के तीनों जिलों को मिलाकर 48,000 एकड़ जमीन यहाँ भूदान में मिली थी जिसमें से 42,000 एकड़ जमीन बंटचुकी है। मगर कोसी को उसके तटबन्धों के कारण जो आपने कठिनाई झेली है उसकी एक अलग व्यथा देख कर सारे देश के सर्वोदय कार्यकर्ता यहाँ जुटे थे। उस समय हम सभी के हृदय में संघर्ष दम भरता था और सरला बहन की मौजूदगी ने महिलाओं को साथ लाने में बड़ी मदद की। छोटी सी सूचना पर 5000 से 10000 लोगों को इकट्ठा कर लेना साधारण बात हो गई थी। उन दिनों मिश्र जी भी इस क्षेत्र में काम कर रहे थे पर उनका उस समय का चिन्तन दूसरा था लोगों को राहत पहुँचाने का और उनकी मदद करना उनका दायित्व था मगर बाद में जो उन्होंने इस क्षेत्र के लिये कार्य किया वह अभूतपूर्व था। कोसी का तटबन्ध कैसे और क्यों बना, कितनी बार टूटा, कितना नुकसान हुआ, तटबन्ध के अन्दर की स्थिति क्या है वहाँ लोग कैसे रहते हैं और कैसे जीते हैं आदि सभी विषयों पर उन्होंने साधक की दृष्टि से लिखा। उन सारी चीजों को पढ़ने के बाद लगता है कि जो-जो संघर्ष का माहौल बनना चाहिए था वह नहीं बना। सर्वोदय के ग्रमादान के, जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति के सार मुद्दे हैं - संगठन, शिक्षण, रचना और संघर्ष। इनमें पहले तीन पर तो काम करना अपेक्षित है ही मगर हमें एकजुट होकर संघर्ष की तैयारी करनी होगी। जेलें भर देनी होंगी। इमरजेन्सी के समय हमलोगों का नारा था- ‘‘कितनी लम्बी जेल तुम्हारी-देख लिया और देखेंगे।’’ आज परिस्थितियाँ भिन्न हैं और हमारे साथ बहुत से विद्वान और जुझारू लोग आ मिले हैं। इनके माध्यम से संगठन और शिक्षण का काम आगे बढ़ायें। आज हमें जिस मुकाम पर बिहार सरकार और केन्द्र सरकार ने लाकर खड़ा कर दिया है वहाँ संघर्ष के अलावा दूसरा कोई दरवाजा नहीं खुलता है। मैं अपनी तरफ से यह जरूर कहना चाहूँगा कि इस संघर्ष में यहाँ का जिला सर्वोदय मंडल, राज्य सर्वोदयय मंडल तथा राष्ट्रीय सर्वोदय मंडल अपनी पूरी ताकत से मदद में आ खड़ा होगा। यह सभी लोग आन्दोलन में शामिल होंगे और अगर आन्दोलन बलिदान मांगेगा तो वह भी दिया जायेगा।

शिवानन्द भाई


1984 में जब नवहट्टा में बाँध टूटा था तब हम लोग यहाँ रिलीफ बाँटने या पीड़ितों की कुछ ऐसी ही मदद करने क लिये आये थे। मगर यहाँ आकर जैसे-जैसे हम लोग समस्या की तह में जाने की कोशिश करने लगे तो पता लगा कि तटबन्ध टूटने के एक सप्ताह पहले यहाँ ठेकेदारों को 52 लाख रूपये का भुगतान किया गया था। जब स्थानीय लोगों से हम लोगों ने बात की तो उनका कहना था कि बावन रूपये भी वहाँ खर्च नहीं हुये होंगे। तटबन्ध टूटने की जाँच तो शायद विभाग ने जरूर की मगर एक भी आदमी को अपने कर्तव्य में कोताही बरतने की सजा नहीं हुई। तब हमने राहत के स्थान पर क्षति-पूर्ति का आन्दोलन चलाया। एक स्तर पर हमने 40,000 लोगों के साथ सहरसा में प्रशासन को घेर लिया था, सारा काम काज ठप्प कर दिया था। जिलाधिकारी आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश मांगता था प्रशासन से, मुख्यमंत्री से। वह आज्ञा तो उसे नहीं मिली मगर मुख्यमंत्री ने लहटन चौधरी को हम लोगों से बातचीत करने के लिये भी भेजा। वह जहाज से आये भी मगर यहाँ भीड़ देखकर उतरे नहीं और पूर्णियाँ चले गये। उस आंदोलन को राजनीति करने वालों ने घुस कर कमजोर किया और धीरे-धीरे वह बिखर गया। उस आंदोलन को अगर हमने सफलतापूर्वक चलाया होता तो आज यह नोबत नहीं आती। यह हमारी भूल थी।

इतनी बड़ी त्रासदी पिछली साल कुसहा में हो गई। उसकी जिम्मेवारी किसी की नहीं है। जाँच हो रही है- कब पूरी होगी पता नहीं। किसी को सजा भी मिलेगी या नहीं यह तय नहीं है। 1984 में लहटन चौधरी ने तटबन्ध टूटने की नैतिक जिम्मेवारी लेते हुए भले ही दिखावे के लिये ही क्यों न किया हो, त्यागपत्र दिया था। इस बार तो वह दिखावा, वह नाटक भी नहीं हुआ। हम सभी लोग इस त्रासदी के बारे में पढ़ते रहते हैं और यह भी पढ़ते हैं कि सहरसा, सुपौल या पूर्णिया आदि जगहों पर इस घटना की पुनरावृत्ति के प्रति चिन्ता व्यक्त की जाती है मगर होता कुछ नहीं है। इसका क्या कारण हो सकता है? इन सब छिटपुट प्रयासों को एक मंच पर लाने का प्रयास करना चाहिए। दिनेश मिश्र जी ने विस्तार से बताया कि किस तरह से सरकारी प्रपंच के माध्यम से यह अवैज्ञानिक काम लगातार होता जा रहा है। दूसरी नदियों पर शायद तटबन्ध काम करते हों मगर कोसी नदी के तटबन्ध तो सरासर नाकाम रहे हैं।

तटबन्धों के प्रति हमारी समझ भी बड़ी विचित्र है। हम लोगों ने एकता परिषद के पी.वी. राजगोपाल के नेतृत्व में एक पद यात्रा निकाली नेपाल सीमा से लगे हुए अपने पहले गाँव बनैलीपट्टी से लेकर सहरसा तक। पहले ही पड़ाव बीरपुर में हमारा विरोध हुआ, काले झंडे दिखाये गये। वहाँ लोगों का कहना था कि हम बहुत गलत काम कर रहे हैं। तटबन्ध के खिलाफ बोल रहे हैं। तटबन्ध बनना चाहिए, उसकी मरम्मत होनी चाहिए। अब उनको समझाना तो पड़ेगा कि यह तो टूटने वाला ही बाँध है। यह आपको फिर मौत के मुँह में ढकेलेगा। बालू निकल नहीं पायेगा। नदी की पेटी ऊपर को उठती ही रहेगी। खतरा पहले से ज्यादा बढ़ेगा मगर सब शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन दबाये खड़े हुये हैं। बस रिलीफ का सामान चाहिए। रिलीफ सभी को भिखमंगा बनाने का जरिया है। यह सभी बातें सत्य हैं और इसका एक ही इलाज है सत्याग्रह। कोसी का बाँध न तो उपयोगी है और न वैज्ञानिक। आठ बार टूट चुका है और फिर किसी भी समय टूटने वाला है। इसी सत्य की रक्षा के लिये गांधी जी ने सत्याग्रह का प्रयोग किया था। संघर्ष साथ में चलेगा और वह शान्तिमय संघर्ष होगा। सरकार को झुकाने के लिये यह एक कारगर अस्त्र साबित होगा। संगठन बनाइये, दस लाख लोगों को इकट्ठा कीजिये और पटना चलिये। सरकार तभी आप की बात सुनेगी। ऐसा नहीं है कि आप के साथ दस लाख लोग नहीं आयेंगे, वह हैं मगर छिट-पुट तौर पर हैं, अलग-अलग जगहों पर हैं। हमें गाँव जाकर लोगों को समझाना पड़ेगा। यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि कोई बाहर का आदमी हमारी लड़ाई नहीं लड़ेगा। जिसकी पीड़ा है वही लड़ेगा और वही नेतृत्व भी देगा बाकी सबकी भूमिका सहयोगी होगी। इसके लिये रणनीति बने, जितने भी मित्र इस काम में लगे हुये हैं, उन्हें एकजुट होना पड़ेगा। एक तगड़ी समन्वय समिति बनाइये और अगली बारिश के पहले एक बार सरकार को अपनी ताकत का एहसास करवाना पड़ेगा।

देव नारायण यादव (राज विराज-नेपाल)


कोसी ने अब तक आठ बार बाँध को तोड़ा है जिसमें से तीन बार यह घटना नेपाल में हुई है और मैं इन तीनों घटनाओं का चश्मदीद रहा हूँ। पहली बार 1963 में जो पश्चिमी तटबन्ध डलवा में टूटा था मैं उसी डलवा गाँव का निवासी हूँ और जब यह बाँध टूटा था तब मैं बच्चा था। वह कटाव मैंने होते देखा था। उस समय क्या परेशानी हुई थी और कैसे-कैसे राहत दी गई थी, उसका कुछ-कुछ मुझे याद है। इस बार कुसहा में जो कुछ भी घटा उस पर मैं मई 2008 से नजर रखे हुये था। 1984 में नवहट्टा की जो दुर्घटना हुई उस समय भारत सरकार ने जो कोसी संधि हुई थी उसके अधीन कोसी को नियंत्रित किया था। उस कोसी संधि में कोसी के साथ नेपाल में जो कुछ भी होता है वह भारत सरकार के निर्देश के अनुसार होता है। कोसी बराज पर जो कर्मचारी हैं वह सब बिहार के हैं और वह बताते हैं कि वहाँ जो कुछ भी किया जाता है वह आपकी पूना की प्रयोगशाला में निर्देश पर होता है। बराज को खोलने या बन्द करने के लिये, फाटकों के खोलने या बन्द करने के सभी निर्देश पूना प्रयोगशाला के लोग करते हैं अगर किसी समाधान की बात भी कोसी तटबन्ध या बराज के बारे में की जाती है तो उसका निर्देश भी दिल्ली या पूना से होता है। बिहार के इंजीनियर केवल उन निर्देशों का पालन भर करते हैं 1984 में जब नवहट्टा में तटबन्ध टूटा उस समय नदी का पानी कोसी के पूर्वी फाटकों की तरफ से निकलता था। पानी के उस प्रवाह को नियंत्रित करने के लिये नदी के पूर्वी तट और पूर्वी तटबन्ध के बीच क्रेटिंग और पत्थर डालने का काम किया गया। जिसका परिणाम हुआ कि पानी पूरब से हटकर पश्चिम की ओर से होकर बहने लगा तब 1991 में पश्चिमी तटबन्ध पर जागिनियाँ में कटा। उस समय जोगिनियाँ से नीचे के गाँवों को खाली कर देने के लिये सूचना जारी की गई। नेपाल के जो 10-12 गाँव वहाँ पास में पड़ते थे उन्हें खाली करा लिया गया मगर खतरा तो भारत में दक्षिण में मधुबनी जिले में झंझापुर तक महसूस किया जा रहा था। किस्मत अच्छी थी कि तटबन्ध काट देने के बाद नदी पीछे की ओर हट गई। मौसम ने भी साथ दिया और बारिश भी थमी रही। उसके बाद जो घटना हुई, जोलोग हटाये गये उनके पुनर्वास का काम अभी तक नहीं हुआ। जिसकी जमीन पर से रिटायर्ड लाइन गुजरी या जो जमीन नदी और रिटायर्ड लाइन में आ गई, उसको तो कुछ पैसा मिल गया मगर जो लोग वहाँ सरकारी जमीन पर बसे थे, वह तो पूरी तरह उजड़ गये। वह गरीब, भूमिहीन थे, दलित थे वह लोग अब नहर के किनारे जाकर बसने को मजबूर हो गये।

डलवा या जोगिनियाँ के उजड़े लोगों की बात जब हम अपनी सरकार से उठाते हैं तो वह कहती है कि भारत ने अभी तक मुआवजे की रकम नहीं दी है। जब तक वहाँ से पैसा नहीं आयेगा तब तक इन लोगों को कुछ मिलेगा नहीं, ऐसा हमें बताया जाता है। भारत और नेपाल के बीच पानी/बाढ़/तटबन्ध आदि को लेकर बहुत से कमेटियाँ बनी हुई हैं जिनमें इन विषयों, खासकर कटाव और पुनर्वास आदि पर चर्चा तक नहीं होती।

कुसहा की घटना तो अभी ताजा है। कोसी नदी अपना काम कर रही थी। कोसी प्रोजेक्ट क्या कर रहा था वह तो किसी को पता नहीं। वह तो अपने आप में विवाद का विषय बन चुका है। कुसहा के तटबन्ध के रख-रखाव के लिये नियुक्त एक इंजीनियर से मेरी एक लम्बी बात चीत हुई थी। जब तटबन्ध कट रहा था। तब सारे इंजीनियर मैदान छोड़ कर भाग खड़े हुये थे। सुरक्षा के लिये वह अनजान बन कर हम लोगों के बीच रह रहे थे। उस समय कोसी प्रोजेक्ट में प्रमोशन/डिमोशन की चर्चा जोरों पर थी जिसका उनके काम पर असर पड़ता था। एक जूनियर इंजीनियर को सीनियर बनाना, सीनियर को जूनियर कर देना, ट्रान्सफर आदि न जाने कितने बखेड़े वहाँ चल रहे थे, काम की चर्चा नहीं थी। कोसी के बाँध के कटाव या उसके टूटने की आशंका नेपाल में 5 अगस्त के पहले से थी। मीडिया सक्रिय था मगर कोसी प्रोजेक्ट के अधिकारियों को शायद यह लगता था कि तटबन्ध टूटेगा नहीं। उनकी लापरवाही ही कुसहा तटबंध टूटने का मूल कारण था।

भारत सरकार एक ओर तो बाराह क्षेत्र बाँध बनाने का दम भरती है पर बिहार सरकार से जो संकेत मिलते हैं कि बिहार की बाढ़ के लिये नेपाल जिम्मेवार है और वही पानी छोड़ता है। नेपाल अगर पानी छोड़ता है तो आप वहाँ बाँध क्यों बनाना चाहते हैं। दरअसल, यह पानी तो बिहार और उसके ही इंजीनियर छोड़ते हैं। भारत और नेपाल के बीच कोसी, गंडक और महाकाली नदियों को लेकर तीन संधियाँ हैं और इन तीनों की निगरानी भारत करता है। हमें अगर पानी चाहिये तो भारत की अनुमति लेनी पड़ती है। भारत नेपाल मैत्री संघ चाहता है कि भारत और नेपाल के प्रबुद्ध लोग मिल कर साझा चिन्तन के आधार पर अपनी आवाज पैदा करें यदि ऐसा हो पाता तो हम जरूर सहयोग करेंगे।

देव कुमार सिंह


मैं कोसी तटबन्धों के अन्दर रहने वाला हूँ। मेरा गाँव वहीं है। हमें कोसी की समस्या को दो भागों में देखना जरूरी है। एक तो तटबन्ध के अन्दर रहने वाले लोग हैं और दूसरे हैं तटबन्ध के बाहर तीन किलोमीटर की दूरी तक रहने वाले जल जमाव ग्रस्त लोग। इन दोनों की समस्याएँ पूरे कोसी क्षेत्र की समस्या से अलग है। कोसी तटबन्धों के बीच 380 गाँव हैं और कोई 10 लाख की आबादी है वहाँ। उनके ऊपर से कोसी नदी का पानी हर साल गुजरता है और हर साल वहाँ वही होता है। जो पिछले साल कुसहा में हुआ। वहाँ कोई हमारा हाल चाल पूछने भी नहीं आता। वह तो भला हो दिनेश कुमार मिश्र जी का जो वहाँ गाँव-गाँव घूमे और तब कहीं हमारी त्रासदी पर अपनी पुस्तक ‘दुई पाटन के बीच में’ लिखी जिससे थोड़ा बहुत बाहर के लोग भी हमारी हालत के बारे में जानने लगे हैं। कुसहा की घटना के बाद सारी दुनियाँ के लोग पीड़ितों की मदद के लिये पहुँच गये। वहीं हमारी और तटबन्धों के बाहर के जल जमाव क्षेत्र में रहने वालों के प्रति किसी की हमदर्दी नहीं है। वहाँ मदद करने के लिये न तो कोई सरकार जाती है न एन.जी.ओ. वाले जाते हैं और न ही कोई सर्वोदय आदि जैसी संस्था के लोग। हमारी तो नागरिकता ही सुरक्षित नहीं है- पता नहीं हम भारत के इस देश के नागरिक हैं भी या नहीं? कुसहा दरार की दुर्घटना से पीड़ित लोगों को राहत बांटी गई, बालू हटाने के लिये अनुदान दिया गया, घर बनाने की योजना है। क्या तटबन्धों के भीतर बसे लोग इन चीजों के हकदार नहीं हैं? अगर वह लोग पीड़ित हैं तो हमलोग पीड़ित नहीं है? जिस जमीन की हम मालगुजारी देते हैं उस जमीन के कट जाने के बाद सरकार मालिक हो जाती है। उसकी बन्दोबस्ती सरकार करने लगती है। जमीन हमारी, मालिक सरकार। तटबन्ध बनते वक्त हमसे न जाने कितने वायदे किये गये, सब झूठे निकले। हमारे लिये स्कूल नहीं है, अस्पताल नहीं है, काॅलेज नहीं है, यातायात नहीं है, मनोरंजन का कोई साधन नहीं है और किसी को चिन्ता भी नहीं है।

इस बार की बाढ़ में हमारे गाँव और घर कटे-कोई आकर पाॅलीथीन की कुछ चादरें दे गया। हो सकता है, यह पिछले साल का कुसहा का बचा हुआ हो। हमने प्रशासन से राहत कार्य चलाने को कहा तो हमको बताया गया कि अब राहत कार्य नहीं चलेगा क्योंकि उप चुनाव के कारण आचार संहिता लागू कर दी गई है। हमलोगों ने कलेक्टर के सामने प्रदर्शन किया तो उनका भी वही कहना था। हमने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने नदी पर भी आचार संहिता लागू की थी? इसका जवाब उनके पास नहीं था पर उससे क्या होता है। राहत वैसे भी नहीं मिलनी थी, इस बार तो कानून का बहाना था। चुनावों में क्षेत्र का परिसीमन इस प्रकार कर दिया गया है कि अब तटबन्धों के अन्दर वाला कभी चुना ही नहीं जा सकेगा और बाहर वाले को हमारी समस्या में कोई दिलचस्पी ही नहीं होगी। अब कोई जन-प्रतिनिधि हमारी समस्या को उठायेगा, इसकी संभावना ही खत्म हो गई है।

हमारे यहाँ कोसी नदी पर भपटियाही के पास एक पुल बन रहा है सड़क और रेल विभाग। इसके लिये जो गाइड बाँध बन रहा है उस पर हमें ऐतराज था। हम लोग उसके अलाइनमेन्ट में परिवर्तन चाहते थे ताकि तटबन्धों के बीच हमारे गाँवों को इस पुल की वजह से आने वाली बाढ़ और कटाव से नुकसान न पहुँचे। हमने सम्बद्ध अधिकारियों से बात की, उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। फिर सुपौल के कलेक्टर से बात की, उनकी समझ में बात आई और उन्होंने पुल अधिकारियों को हमारा सुझाव मानने के लिये लिखा। उन्होंने उसे सरकार को अग्रसारित कर दिया जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। हमने काम रुकवा दिया। अब सुनते हैं कि पुल निर्माण के अधिकारियों ने सरकार को लिखा है कि हमारी वजह से काम में देरी हो रही है और उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है। उन्होंने हमारे खिलाफ कानूनी कार्यवाही की सिफारिश की है। अगर ऐसा हुआ तो हम आमरण अनशन पर जायेंगे। बरसात के बाद वह काम शुरू करेंगे तो संघर्ष तीव्र होगा।

हमारी समस्या एकदम अलग है और इस पर अलग से विचार होना चाहिए। इसे बिहार की बाढ़ समस्या से जोड़ कर देखना हमारी बदहाली को हलका कर के देखना होगा। कुसहा टूट गया वहाँ के पीड़ितों के प्रति हमारी हमदर्दी है। हमारे यहाँ सरायगढ़-भपटियाही और किशुनपुर प्रखंड के 500 घर कट कर नदी में समा गये जबकि इस साल किसी बाढ़ की कानों कान किसी को खबर नहीं है। तब हमारे प्रति भी किस की हमदर्दी है क्या?

अवध नन्दन यादव


कोसी पर जब तटबन्ध बना तो उसके बाहर रहने वाले लोग एक तरह से निश्चिंत हो गये थे कि अब उनके ऊपर नदी का कोई खतरा बाकी नहीं बचा है। यह सच है क्या? 1968 में नदी में 9,13,000 क्यूसेक पानी आया था और इतने प्रवाह को सरकार ने अपनी तरफ से तटबन्धों के बीच बहा दिया था कि वहाँ रहने वाले लोग अपनी मर्जी से मरना चाहें तो मर जायें या फिर जहाँ भागना चाहें भाग जायें- उनको तकलीफ तो बहुत हुई मगर वह मरे नहीं। पिछले साल डेढ़ लाख क्यूसेक पानी 5 जिलों में फैला और न जाने कितने आदमी मारे गये, कितने बेघर हुए और कितनों की रोजी रोटी नदी ने छीन ली। यह सब बाहर वाले तथाकथित सुरक्षित क्षेत्रों के लोग थे। तटबन्ध बनने से पहले कोसी की पेटी का लेवल आज से लगभग 15-20 फुट नीचे था। जब तटबन्ध बना तो नदी इतना ऊपर चढ़ गई। अब यह तो बाहर वालों को सोचना चाहिए कि अगर डेढ़ लाख क्यूसेक में उनकी यह हालत हुई है तो 9 लाख क्यूसेक प्रवाह पर उनका क्या होगा? अब इस तटबन्ध की यह क्षमता नहीं बची है कि वह इतना ज्यादा पानी का प्रवाह बर्दाश्त कर सके। कुसहा तटबन्ध के बंध जाने से प्रसन्न होने वाले लोगों को मेरी सलाह है कि वह अपना भविष्य सोच लें कि अगर अबकी बार बाँध टूटेगा तो उनका क्या होगा? नदी जब आजाद थी तो उसकी गाद पूरे इलाके पर फैलती थी। अब तो उसने 125 किलोमीटर लम्बा पहाड़ बना दिया है तटबन्धों के बीच, उस पहाड़ी नदी को अब कौन सम्भालेगा।

दीनानाथ पटेल


हम 1984 वाली बाढ़ की समस्या के बारे में बात कर रहे हैं। नदी ने जितनी परेशानी उस साल बाहर वाले क्षेत्र में पैदा कर दी थी वह हम तटबन्धों के अन्दर रहने वाले लोग हर साल भोगते हैं। हम आसानी से अन्दाजा लगा सकते हैं कि कुसहा में क्या हुआ होगा? कोई मीडियाकर्मी, समाजकर्मी या नेता लोग हमारे इलाके में नहीं आते। सरकार भी हमारे दुःख को दुख नहीं मानती, हमें बाढ़ पीड़ित भी नहीं मानती। वहाँ के बाशिन्दे अब बीबी, बच्चों के साथ पलायन करने के लिये मजबूर हैं। तटबन्ध का विरोध उनके बीच रहने वाले लोग करते हैं मगर उनकी वजह से परेशान जल-जमाव क्षेत्र वाले लोग यह विरोध नहीं करते। यहाँ परेशानी के बीच भी परस्पर द्वन्द्व है। जब पिछले साल तटबन्ध की दरार को पाटने का समय आया और अन्दर वालों ने विरोध के स्वर को तेज किया तब बाहर वालों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया। मुझे लगता हैं कि हमें तटबन्ध रखते हुए अपनी समस्या का समाधान खोजना होगा वरना हम लोग आपस में ही लड़ते रहेंगे।

अन्दर वाले लोगों के उत्थान के लिये 1987 में कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार की स्थापना हुयी वह तब से आज तक कुछ करता ही नहीं है। विधायक बनने के पहले किशोर कुमार मुन्ना एक बार पूरे इलाके में घूमे थे और वह आज भी यहाँ मौजूद हैं और इसलिये उनसे हमारी अपेक्षाएँ बढ़ती हैं कि वह कम से कम विधान सभा में हमारी आवाज उठायेंगे। हमारे यहाँ स्कूल नहीं चलता है, मुखिया वहाँ कुछ नहीं करता है, सरकारी कर्मचारी वहाँ नहीं जाता है- इन सारी चीजों का क्या किया जाये? यह कहना शायद ठीक नहीं है कि बड़ी जाति के लोगों ने छोटी जाति के लोगों को वहाँ परेशान किया। सच यह है कि जिस-जिस को उसकी विद्या और बुद्धि ने साथ दिया वह जाति के बंधनों को तोड़ता हुआ वहाँ से निकलता गया। मैं भी पिछले चार साल से यहीं सहरसा में रहता हूँ। मेरी जमीन कट गई है या बची है मुझे नहीं मालूम। उसे कोई दूसरा जोत रहा है, यह भी मैं नहीं जानता। अब सुनते हैं कि जमीन की बन्दोबस्ती जोतने वाले के नाम कर दी जायेगी। मेरी जमीन, कुछ साल पहले कट गई थी। अमीन ने उसे बिहार सरकार का कब्जा दिखा दिया। वह जमीन जब फिर जग गई तो कर्मचारियों ने पिछले दरवाजे से बिचैलियों के नाम लिखवा दिया। अब जमीन का कागज मेरे पास और कब्जा दूसरे के पास। ऐसा बहुत लोगों के साथ हुआ होगा। अब जमीन के पुराने मालिक कब्जा जताने के लिये अंदर जायेंगे तो फिर फौजदारी ही होगी और यह स्थिति जल्दी ही अनियंत्रित होने जा रही है।

विजय कुमार (भागलपुर)


मैं 1982 से गांगेय क्षेत्र में गंगा नदी पर काम करता रहा हूँ और कोसी क्षेत्र से मेरा कोई खास वास्ता नहीं था। कुछ साल पहले गंगा नदी पर 45 करोड़ रूपये की लागत से हमारे क्षेत्र में बना एक तटबन्ध टूट गया था जोकि कोसी और गंगा के बीच में पड़ता था। वह पहला मौका था जब हम कोसी के इतना नजदीक पहुँचे थे। बाद में पता लगा कि स्थानीय लोगों ने यह तटबन्ध काट दिया था। मेरी कुसहा की घटना के पहले की इतनी सी पृष्ठभूमि थी। कुसहा का तटबन्ध 18 अगस्त को टूटा और मैं उस क्षेत्र में 22 अगस्त को आ गया था। मैं सहरसा पहुँचा और देखा कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी यहाँ सरकार नहीं थी, संस्थाएँ नहीं थी, कम्पनियाँ नहीं थीं मगर सहरसा के लोग यहाँ थे मैंने लोगों से पूछा कि क्या राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता यहाँ सक्रिय नहीं हुये हैं? कोई जवाब नहीं मिला। फिर मैंने सहरसा काॅलेज के अध्यापकों से सम्पर्क किया। मैं तो कोसी को समझने के लिये यहाँ आया था मगर कोसी तो माया नगरी निकली जो एक साल से मुझे यहाँ से निकलने ही नहीं दे रही है। मैं नौकरी करता हूँ और भागलपुर में गांधी दर्शन, गांधी साहित्य और गांधी विचार पढाता हूँ। संस्कारवश यहाँ से छोड़ कर जा भी नहीं सकता था। मैंने समाज देखा है और समाज की कल्पना किये बगैर कोसी समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता। पता नहीं कोसी पर जब भी बात होती है तो वह बाँधों पर जाकर अटक जाती है बाँधों से आगे बात बढ़ती ही नहीं है। मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ की समुद्र तल से ऊँचाई 45 फुट है और बीरपुर 143 फुट की ऊँचाई पर है। पिछले पच्चीस वर्षों से ऊँचाई के इतने अंदर से जब पानी आता है तो वह नीचे कितनी तबाही मचाता होगा? इसका उत्तर खोजने के लिये मैंने दिनेश मिश्र जी की किताबें पढ़ना शुरू किया। मुझे इसका उत्तर नहीं मिला। कोसी क्षेत्र को हम चार हिस्सों में बाँट सकते हैं। पहला तो बीरपुर से लेकर कोपड़िया तक के तटबन्धों के बीच की आबादी, दूसरी पूर्वी तटबन्ध के पूरब की आबादी, तीसरी पश्चिमी तटबन्ध के पश्चिम की आबादी और चौथी कोपाडिया से लेकर कुर्सेला तक की आबादी।

मैं मिश्र जी और उनके साथ के सारे बुजुर्गों से कहना चाहूँगा कि उन्होंने चाहे कुछ भी किया हो, कोपड़िया से नीचे के क्षेत्र के लिये कुछ नहीं किया। वह लोग अटके रहे तटबंधों को लेकर मगर उन्हें वहाँ से निकलने का रास्ता उन्हें नहीं मालुम। रास्ता है - जरा और खुल कर बात करने की जरूरत है। इन चारों इलाको में विध्वंस हुआ है, वहाँ पुनर्निमाण की आवाज़ आप लोगों को उठानी चाहिये थी जो आप लोगों ने नहीं उठाई। यह पुनर्निमाण तटबन्ध के अन्दर, उसके बाहर पूरब और पश्चिम में तथा कोपड़िया से नीचे कुर्सेला तक उठनी चाहिए थी, वह अब तक नहीं उठी। क्या इन मांगों के लिये सत्याग्रह के अलावा कोई दूसरा रास्ता बच गया है? अगर नहीं तो सत्याग्रह के लिये हमारी पूर्ण सहमति है। वह योजनाकार और वह सरकार जो नीतियाँ बनाती हैं उनके सामने पुनर्निमाण की बात रखनी चाहिए थी कि उनकी गलत नीतियों से इस इलाकों की इतनी दुर्गति हई है।

कोसी बाढ़कोसी बाढ़केन्द्र सरकार आपदा घोषित करके निकल गई और बिहार सरकार सुन्दर कोसी बनाने का वायदा कर के चली गई। यहाँ जो पुनर्निमाण होगा वह मचान पर होगा। कोसी की पेटी तटबन्धों के बीच में 18 फीट ऊपर उठ गई है। वहाँ 6 फुट का गैप देकर 24 फीट पर मचान के घर बनें हमें एक ठोस विकल्प बताना होगा। सरकार चाहे दिल्ली की हो या पटना की, उनकी हालत एक जैसी ही रहती है। आज हमारे पास बिहार आन्दोलन के बाद का 34 साल का अनुभव है और उसके अनुसार मैं यह कह सकता हूँ कि जब तक उन विचारों वाले लोग एकजुट होकर प्रयास नहीं करेंगे तब तक न वह सरकार बनेगी और न ही वह विपक्ष बनेगा जो लोगों की समस्या का समाधान कर सके। यह बात मेरे बुद्धिजीवी मित्र भी नहीं बोलते हैं। मैं तो विश्वविद्यालय में भी अपने छात्रों से भी यही कहता हूँ। दूसरी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात मैं आप से यहाँ कहना चाहता हूँ वह यह कि यह जो उत्तर बिहार का 22 जिलों वाला क्षेत्र है इसके नीचे अकूत खनिज संपदा दबी पड़ी है जिस पर विदेशी ताकतों की नजर है। इसके नीचे तेल, सोना, चांदी सब कुछ है। मगर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नन्दीग्राम की घटना ने साफ कर दिया है कि अब किसी खनिज समृद्ध क्षेत्र से लोगों को हटाना सम्भव नहीं है। अतः अब वे ऐसे हालात पैदा करना चाहती हैं कि लोगों का जीना दूभर हो जाये और वह खुद ब खुद इलाके को छोड़कर भाग जायें। कुसहा की घटना प्राकृतिक नहीं है वह इसी लोभ से प्रेरित है। हमारा अनुमान है कि कम से कम 12 लाख लोग कोसी क्षेत्र छोड़कर पलायन कर गये हैं। यहाँ की सरकार और केन्द्र सरकार की यह साझा साजिश है। एक ने तटबन्ध तुड़वाया और दूसरे ने रेल के जरिये खुली छूट दे दी लोगों को चले जाने के लिये।

आइये, आज हम संकल्प लें कि हम इन ताकतों के खिलाफ आन्दोलन तेज करें। इन पर लगाम कसने की जरूरत है।

बम भोला प्रसाद


बात चाहे 1984 की हो या 2008 में कुसहा की तटबन्ध में दरार की, यह कभी भी प्राकृतिक नहीं थी। यह मानव निर्मित थी, इतना तो सभी की समझ में आ गया है। दूसरी बात यह है कि पिछड़ी जातियों की तटबन्धों के भीतर रख कर उनके साथ ज्यादती हुई है। तीसरी बात यह कि कोसी को अगर कोसी, सुरसर और गेड़ा धार से होकर बहा दिया जाय तो तीन धारों में बँट जाने के कारण पानी ज्यादा तबाही नहीं कर पायेगा। कई धाराओं में बँटने के बाद न तो नदी में कटाव करने की क्षमता बचेगी और न ही वह जल जमाव कर पायेगी।

राजकुमार सिंह ‘गोपाल’


मिश्र जी की बातों से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि इतने खर्च के बाद भी हम कहीं के नहीं हुये। मैं मूलतः कांग्रेसी हूँ और 1984 में जब नवहट्टा में तटबन्ध टूटा तब मैंने सरकार को लिखा था कि स्थानीय एम.पी. और एम.एल.ए. को बुलाकर इस पूरे मसले पर एक चर्चा आयोजित की जाय और उसी के आधार पर आगे का कार्यक्रम बने। यह काम जब नहीं हुआ तब मैंने खुद एक सेमिनार का आयोजन किया और सारे एम.पी., एम.एल.ए. और इंजीनियरों को उसमें आमंत्रित किया। उसमें भी कोई नहीं आया। शायद उसमें जनता को मुँह दिखाने और उसके सवालों का उत्तर देने का साहस नहीं था। सवाल इस बात का है कि दोषी कौन है? दोषी वह है जो जनता को गुमराह करता है या फिर जनता खुद दोषी है जो इन गुमराह करने वालों को पहले पैदा करती है और फिर बाद में बर्दाश्त करने के लिये अभिशप्त हो जाती है।

रामदेव शर्मा


कोसी का तटबन्ध अब तक आठ बार टूटा और भविष्य में भी यह टूटता रहेगा-यह निश्चित है। कुसहा घटना की जाँच के लिये जस्टिस वालिया की अध्यक्षता में एक आयोग बैठाया गया है। इसकी रिपोर्ट जब आयेगी तब घटना के कारणों की विवेचना हो सकेगी। वास्तव में तटबन्ध बने तो बालू से ही हैं क्योंकि स्थानीय तौर पर वही उपलब्ध था। यह बालू की भीत कोसी के आगे कब तक टिकी रह पायेगी, यह हम और आप सभी जानते हैं। इस पूरे मसले पर एक राष्ट्रीय बहस की जरूरत है मगर बिहार के राजनीतिज्ञों को इसकी कितनी समझ है पता नहीं। पन्द्रह धाराओं और 150 किलोमीटर की चौड़ाई में बहने वाली कोसी को क्या समझ कर 10 किलोमीटर में कैद किया यह सोचने की बता है। वह भी जब उसे बाँधा गया तो तटबन्धों के बीच फँसे लोगों को समुचित पुनर्वास नहीं किया गया। उस वक्त सवर्ण जातियों का वर्चस्व था और उनके गाँवों को यथासंभव तटबन्ध के बाहर रखा गया। इसके लिये तटबन्ध के अलाइन्मेन्ट तक को बदल दिया गया मगर पिछड़े और गरीब तबकों के लोग तटबन्ध के बीच रह गये।

तटबन्ध जब तक नहीं था तब तक जीवन सामान्य तरीके से चलता था। ढाई तीन दिन में बाढ़ समाप्त हो जाती थी और दुर्गा पूजा के ढोल के साथ बरसात और बाढ़ का मौसम खत्म हो जाता था। अब हमारे लिये तो बाढ़ ढाई से तीन महीने की परेशानी है मगर बाहर वालों के लिये जल-जमाव पूरे साल भर की त्रासदी है। अब हमारी हालत को और भी बदतर बनाने के लिये तटबन्धों को ऊँचा किया जा रहा है। होना यह चाहिए था कि पानी की निकासी के रास्ते तैयार किये जाते ताकि पानी जल्दी निकल सके।

किशोर कुमार मुन्ना


कोसी नदी के बारे में इतनी अधिक जानकारी रखते हुए आप लोग यहाँ चिन्तन करने के लिये बैठे हैं, इसके लिये मैं आप सभी को सत्प्रयासों की सफलता की कामना करता हूँ। दरअसल, मेरी इतनी समझ नहीं है कि कोसी की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है, इसका कोई सुझाव मैं आपको यहाँ दे सकूँ। मगर इतना तय है कि अगर हम समस्या की सही-सही पहचान कर लेते हैं तो इसके समाधान की दिशा में जरूर सार्थक प्रयास किये जा सकते हैं।

कोसी और उसके तटबन्धों की समस्या आज की नहीं है। भारत सेवक समाज के तत्वावधान में जब कोसी नदी पर तटबन्ध बन रहा था तब परमेश्वर कुंअर कैसे समाजवादी सोच के नेताओं ने उसके विरोध में लम्बी लड़ाई लड़ी थी। दुःख इस बात का है कि उनकी सुनने वाला सत्ता में कोई भी नहीं था। अपनी प्रतिबद्धता के कारण उन्हें न जाने कितनी बार जेल जाना पड़ा था। कोसी पर तटबन्धों के निर्माण का अपना गणित था। तटबन्धों के बाहर रहने वाले लोगों की बाढ़ से रक्षा की जानी थी और उसकी कीमत देनी थी। तटबन्धों के अंदर रहने वाले लोगों को। अन्दर वालों का जिस तरह से पुनर्वास किया जाना चाहिए था वह नहीं हुआ। उन्हें अंधेरे में रखा गया और उनके साथ सरासर नाइंसाफी हुई। न जाने कितनी कमेटियां बनी, प्राधिकार बना मगर जमीन पर कोई काम नहीं हुआ। मैं यहाँ इतना जरूर कहना चाहूँगा कि तटबन्ध के अन्दर सभी जातियों के लोग हैं और मुझे ऐसा नहीं लगता कि वहाँ इस विषय पर कोई मतभेद है।

पिछले साल कुसहा की जो घटना हुई तो उसे तत्कालीन सरकार ने शुरू-शुरू में उसे बड़ी मामूली घटना बता कर खारिज करने की कोशिश की। 1984 में कितने लोग मरे होंगे कह पाना मुश्किल है मगर सरकार के अनुसार 527 लोग कोसी की घटना में मरे और 3,740 लोग लापता हैं। अगर इतने ज्यादा लोग मरे और इतनों का अता-पता नहीं है तो यह मामूली घटना तो नहीं ही कही जा सकती। सरकार की वेबसाइट पर दर्ज है कि 3,46,000 लोगों के घर ध्वस्त हो गये थे। तब सवाल उठता है कि जो लोग कैम्पों में नहीं गये वह गये कहाँ?

बाढ़ से जो परेशानी हुई है उसकी पुनरावृत्ति के प्रति राज्य के इंजीनियर भी आश्वस्त नहीं हैं। तटबन्धों के स्वास्थ्य पर उनकी भी चिन्ताएँ लगभग उतनी ही है जिस पर हम लोग यहाँ चर्चा कर रहे हैं। उनकी परेशानी बस इतनी है कि वह लोग खुल कर अपनी बात नहीं रख सकते। 21वीं सदी की अब तक की हमारी उपलब्धि यही है कि हमने सत्य से मुकरना सीख लिया है। 20वीं सदी में गांधी जी की पुरजोर कोशिश थी कि सत्य को स्वीकार किया जाय। सत्य से पीछे हटने में अब किसी भी धर्म, जाति या पार्टी के लोग पीछे नहीं हैं। इससे कोई भी अछूता नहीं है।

1984 में जब नवहट्टा में तटबन्ध टूटा था तब उसकी जाँच के लिये कोई आयोग नहीं बैठा मगर इस बार उसका गठन किया गया। इस आयोग की रिपोर्ट छः महीने में मिल जाने की बात थी मगर उसके आने में समय लगेगा और तब तक बात पुरानी पड़ जायेगी। इसी तरह से भूमि सुधार के मुद्दे पर एक बनर्जी आयोग की विवादस्पद रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट की सिफारिशें अगर वैसी की वैसी ही लागू कर दी जायें तो बड़े पैमाने पर गाँवों में झगड़े लगेंगे और न लागू करने पर भी कम झमेला नहीं होगा। देखना है क्या होता है मगर फिलहाल सभी राजनैतिक पार्टियाँ और सरकार उप चुनाव में व्यस्त हैं। अदालतों के कोई 12,000 आदेश हैं जिन पर सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं है। बहुत से मामलों में अदालत की अवमानना के भी मुकदमें चल रहे हैं। कोई भी दुर्घटना घटित होती है तो उसकी जाँच के आदेश दे दिये जाते हैं। अब उसकी सिफारिशों के प्रति व्यवस्था कितना गंभीर रह पाती है यह विवाद का विषय बन जाता है। 1984 में जो तटबन्ध टूटा था तब उस बार लहटन चौधरी ने नैतिक जिम्मेवारी लेकर अपने पद से त्याग पत्र दे दिया था। यह त्याग पत्र भले ही औपचारिकता रहा हो पर इस बार तो वह औपचारिकता भी नहीं निभाई गई। सभी लोग अपनी-अपनी जगहों पर डटे पड़े हैं।

जिस दिन कुसहा में तटबन्ध टूटा उस दिन मैं मुंबई में था और टी.वी. पर खबर देख कर तुरन्त वहाँ से सुपौल के लिये चल पड़ा। मैं शायद पहला जन प्रतिनिधि था जो दुर्घटना के बाद वहाँ पहुँचा था। सरकार कहती थी कि माओवादियों के कारण रख-रखाव में बाधा पड़ रही थी। आपके पास तो साल भर का समय था मरम्मत करने के लिये, क्यों नहीं किया और क्यों नेपाल में लाइजन अफसर को इन दिक्कतों के बारे में नहीं लिखा? लम्बे समय से लाइजन अफसर को वेतन देने में क्यों अनियमितता बरती गई?

जैसे चित्र हम हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बँटवारे के समय देखा करते थे, करीब-करीब वही दृश्य था तटबन्ध टूटने के बाद जब लोग अपना घर द्वार छोड़ कर जो कुछ भी बची खुची सामग्री थी वह लेकर पलायन कर रहे थे। इन सारी पीड़ाओं को याद रखते हुए संघर्ष करने की जरूरत है ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो। आप लोग अपनी आवाज उठाते रहें। मेरा सहयोग आपको हमेशा मिलता रहेगा।

दिनेश कुमार मिश्र


मुन्ना जी को धन्यवाद यहाँ चल रही बातों का समर्थन करने के लिये मगर मेरी उनसे यह मुराद है कि वह जब भी विधान सभा में जायें तो हमारी तरफ से दो बातें जरूर उठायें। एक तो तटबन्धों के अन्दर का जो इलाका है बसन्तपुर से कोपड़िया तक या उससे भी आगे जिधर से कोसी गुजरती है उसे एक अलग जिला बनाने का मांग रखें। इसका मुख्यालय सुपौल के पश्चिम परसौनी या गोपालपुर सिरे आदि के आस-पास हो सकता है। वहाँ जब मुख्यालय बनेगा तब वहाँ कलेक्टर और एस.पी. आदि बैठेंगे। उनको उस समय अन्दजा लगेगा कि तटबन्धों के अन्दर रहने वालों की क्या-क्या परेशानियाँ हैं।

दूसरी अपेक्षा हमारी यह है कि जल संसाधन विभाग और आपदा प्रबन्धन विभाग को या तो मिला दिया जाये या यह सुनिश्चित किया जाय कि दोनों विभागों के मंत्री हर मीटिंग में एक साथ मौजूद रहें। बिहार की मुख्य आपदा पानी से पैदा होती है जिसकी थोड़ी सी कमी सूखा पैदा करती है और जरा सा भी ज्यादा पानी बाढ़ लाता है। जल संसाधन विभाग की अकर्मण्यता से ही राज्य में सूखे या बाढ़ की स्थिति पैदा होती है और एक तरह से जल संसाधन विभाग आपदा प्रबंधन की रोजी रोटी की व्यवस्था करता है। इन दोनों विभागों के बीच किसी भी प्रकार का सामंजस्य न होना ही हमारी विपत्ति का पहला कारण है।

तीसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि जब हमारे जैसे लोग सरकार को कुछ सुझाव देते हैं तो सरकार उसकी अनदेखी करती है यह कह कर कि यह लोग पर्यावरणवादी हैं, यह तो ऐसा कहेंगे ही और उसके बाद सारे सुझाव रद्दी की टोकरी में चले जाते हैं। इस प्रचलन पर अंकुश लगना चाहिए।

प्रो. विद्यानन्द मिश्र


हमारी चर्चा में कुछ मुद्दे खास तौर पर उभर कर आये हैं। एक तो जल निकासी का अहम मसला है। हमने पानी के प्रवाह के रास्ते को रोक रखे हैं, वह रास्ते खुलने चाहिए। तटबन्धों के अन्दर रहने वाले लोगों की आजीविका और पुनर्वास का प्रश्न है, इस पर हम सभी को काम करते रहना चाहिये। जो नये पुल बन रहे हैं चाहे वह भपटियाही में बनता हो या बलुआहा में, सुविधा देने के साथ-साथ वह एक अच्छी खासी आबादी को तबाह भी करेगा। इनकी मांगों पर सरकार संवदेनशील हो सके। वह संघर्ष हमें जारी रखना होगा। तटबन्धों के अन्दर अगर लोग लम्बे समय से पीड़ित हैं और शायद भविष्य में भी उन्हें बिना संघर्ष के कुछ हासिल होने वाला नहीं है मगर खतरा उन लोगों पर ज्यादा है जो तटबन्धों के बाहर रहते हैं। हम चाहते हैं कि यह लोग अपने ऊपर लटकती हुई इस तलवार का संज्ञान लें और अन्दर वालों से मिल कर समस्या का समाधान खोजें। जल-जमाव के मुद्दे पर हम क्या करेंगे, यह हमें तय करना होगा। हम इन सारे विषयों पर आप से सम्पर्क बनाये रखेंगे।

अनवर आजाद के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ कार्यक्रम समाप्त हो गया।

 

बाढ़ मुक्ति अभियान के छठें प्रतिनिधि सम्मेलन की रपट

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बाढ़ मुक्ति अभियान के छठें प्रतिनिधि सम्मेलन की रपट

2

Proceedings of the Sixth Delegates Conference (5th Sept 2009)

 

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