दुष्काल मुक्ति को चाहिए समग्र प्रयास

Submitted by Hindi on Tue, 05/30/2017 - 13:19
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आंकड़े कह रहे हैं कि भारत के 32 फीसदी इलाकों में उपयोगी जल की उपलब्धता ज़रूरत से कम है। 11 फीसदी आबादी को पेयजल मानकों के अनुरूप पानी उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, मई-जून नहीं, पानी अब बारहमासा संकट का सबब बनता जा रहा है। कोई ताज्जुब नहीं कि जिन राज्यों से आज सूखे की खबरें आ रही हैं, अगस्त माह में उन्हीं राज्यों से बाढ़ की भी खबरें आये। इससे स्पष्ट है कि मौजूदा सूखे का कारण वर्षा में कमी नहीं, जल संचयन, प्रबंधन और जलोपयोग में अनुशासन की कमी है। सूखा आसमां में नहीं, हमारे दिमाग में हैं।पानी का संकट, तो अकाल; पानी और अनाज का संकट, तो दुष्काल; पानी, अनाज तथा चारा..तीनों का संकट, तो तिरस्काल यानी ऐसा काल, जब जीवन का तिरस्कार एक मज़बूरी बन जाये। साल-दर-साल बढ़ता सुखाड़, बढ़ता रेगिस्तान, बढ़ती बंजर भूमि, और घटती चारागाह भूमि बता रहे हैं कि यदि हम नहीं चेते, तो वर्ष 2025 का भारत - दुष्काल और वर्ष 2050 का भारत - तिरस्काल के कारण दुखी होगा।

परिदृश्य


गत वर्ष महाराष्ट्र में मची चीख-पुकार और लातूर पहुँची पानी ट्रेन के चित्र अभी जेहन से मिटे भी नहीं हैं कि सूखा फिर सिर पर है। चिंता की सबसे ज्यादा सूखी लकीरें इस बार दक्षिण भारत में खींची दिखाई दे रही हैं। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना - तीनों प्रदेशों में संकट का स्तर यह है कि पानी पर निर्भर आर्थिक गतिविधियों को संचालित करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। तमिलनाडु के किसान पानी की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने को विवश हुए। महानदी बेसिन के उड़िया हिस्से के खेतिहर, मछुआरे तथा वनवासी पानी बँटवारे की मांग को लेकर आंदोलन की योजना बना रहे हैं। राजस्थान के कोटपुतली में जलापूर्ति को लेकर धरने की धमक अप्रैल माह में ही सुनाई पड़ गई थी। बिहार, बाढ़ लाने वाली नदियों का राज्य है।

आज बिहार की नदियाँ गाद, खनन और जल शोषण की शिकार हैं; लिहाजा, गंगा कई जगह 700 मीटर की चौड़ाई में सिमट गई है। गत एक दशक के दौरान बिहार में गंगा किनारे बसे भागलपुर, पटना आदि का भूजल स्तर 25 से 30 फीट गिर गया है। बंगाल तक के इलाके आर्सेनिक, फ्लोराइड और भारी धातु वाला विषाक्त पानी पीने को मज़बूर हो गये हैं। झारखण्ड की हरमू और स्वर्णरेखा नदी की चौड़ाई 90 प्रतिशत तक घट गई है। उत्तर प्रदेश में 45 से 90 सेंटिमीटर प्रति वर्ष तक की रफ्तार से भूजल स्तर के गिरावट के आंकड़े हैं।

गंगा किनारे की काशी भी प्यासी है, सबसे नम क्षेत्रों वाला मेघालय भी और नदियों का राज्य उत्तराखण्ड भी। उत्तराखण्ड के 90 हजार, 500 जलस्रोतों में से 17,000 जलस्रोतों में संचित कुल पानी की मात्रा में 50 से 90 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। हरियाणा में भूजल स्तर वर्ष 2000 के 31 फीट की तुलना में अब 60 हो गया है। गुरुग्राम, फतेहाबाद रेवाड़ी, फरीदाबाद, कैथल जैसे नगरों का भूजल स्तर औसत 120 फीट है। कुरुक्षेत्र का आंकड़ा लें, तो 273 गाँवों के 19708 नलकूपों में से 9877 नलकूप तौबा बोल गये हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान से होकर उत्तर प्रदेश तक फैले चंबल के बीहड़ों में फैली नदियों के सूखने से संकट अब करौली, भिंड, मुरैना, इटावा में भी है। कछार की खेती ही नहीं, चंबल अभ्यारण्य क्षेत्र में जीवों पर भी संकट गहरा गया है। तीन दशक में बुन्देलखण्ड के 12 लाख हेक्टेयर के कुल रकबे वाले 8,000 तालाबों का पानी सूख चुका है। कारण है जगह-जगह स्टाॅप डैम, पम्पिंग सेट से अंधाधुंध पानी निकासी और नदी-तालाब भूमि पर कब्जा। इस तरह गिनते जाइये कि उड़ीसा, मध्यप्रदेश समेत देश के लगभग 11 राज्य जल उपलब्धता में कमी का संकट झेल रहे हैं।

कारण


आंकड़े कह रहे हैं कि भारत के 32 फीसदी इलाकों में उपयोगी जल की उपलब्धता ज़रूरत से कम है। 11 फीसदी आबादी को पेयजल मानकों के अनुरूप पानी उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, मई-जून नहीं, पानी अब बारहमासा संकट का सबब बनता जा रहा है। कोई ताज्जुब नहीं कि जिन राज्यों से आज सूखे की खबरें आ रही हैं, अगस्त माह में उन्हीं राज्यों से बाढ़ की भी खबरें आये। इससे स्पष्ट है कि मौजूदा सूखे का कारण वर्षा में कमी नहीं, जल संचयन, प्रबंधन और जलोपयोग में अनुशासन की कमी है। सूखा आसमां में नहीं, हमारे दिमाग में हैं।

दक्षिण के जिन राज्यों में सूखा है, वहाँ के कृष्णा बेसिन का अरबों लीटर पानी ले जाकर महाराष्ट्र के उच्च वर्षा औसत वाले कोकण क्षेत्र को दिया जा रहा है। एक तरफ, पानी तथा बहाव कम होने से नर्मदा की निर्मलता संकट में है; शासन ने मलीनता मुक्ति जनजागरण के नाम पर करोड़ो खर्च कर नर्मदा सेवा यात्रा की है; दूसरी तरफ, नर्मदा का पानी खींचकर शिप्रा नदी और कांडला पोर्ट को दिया जा रहा है। पुनर्जीवन के नाम पर नदियों की गाद निकालकर किनारे लगा देना, निर्माण के नाम पर नदी का रेत से महरूम कर देना, रिवर फ्रंट डवलपमेंट के नाम पर नदी खादर के ऊपर बसावट बसा देना, राजमार्गों के नाम पर वर्षों पुराने लाखों पेड़ों का नामो-निशां मिटा देना; द्रव्यवती जैसी भरपूर पानी वाली नदी का नाम बदलकर अमानीशाह नाला लिख देना; नदी भूमि पर मानसरोवर जैसी काॅलोनी और संस्थाओं की इमारतें खड़ीदना; नदी विपरीत ऐसी हरकतों को दिमाग का सूखा नहीं, तो और क्या कहेंगे?

गौर कीजिए कि 'मन की बात' में पानी बचाने का संदेश देने वाले प्रधानमंत्री जी की काशी नगरी के 64 तालाब, पोखर और कुंडों पर भूमाफिया का कब्जा है। वसुंधरा राजे सिंधिया ने अपने पिछले शासन काल में जयपुर और अलवर जैसे कम पानी के इलाकों में भी अधिक पानी पीने वाली शीतल पेय, चीनी और शराब उत्पादन करने वाली 23 फ़ैक्टरियों को लाइसेंस दिए थे। रेलवे ने उत्तर प्रदेश के ज़िला अमेठी और बुन्देलखण्ड के ज़िला ललितपुर के ऐसे इलाकों में रेल नीर संयंत्र लगाये हैं, जहाँ पहले से ही पानी की कमी का संकट है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी ने बुन्देलखण्ड में उ.प्र. के हिस्से में उद्योग लगाने का निर्णय लिया है। इन सभी को कोई बताये कि उद्योग जलसंकट घटायेंगे कि बढ़ायेंगे? बंगलुरु, अब झीलों का नगर नहीं रहा। दुखद है कि कुआँ और तालाब, हर नगर से गायब हो रहे हैं। पानी का अतिशोषण और ज़मीन का लालच इस गायब को और व्यापक बना रहा है। किसान भी उपलब्ध पानी के अनुकूल अपने फसल चक्र में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है। पानी का संकट झेलने के बावजूद, गन्ने की खेती और मिलों से महाराष्ट्र का मोह टूट नहीं रहा।

पहल


हमारी इन हरकतों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अकेले को दोष देने से समाधान नहीं निकलेगा। काल-दुष्काल लाने वाले स्थानीय कारणों को भी समझकर ही समाधान तलाशना होगा। सुखद है कि सूखे से सीखकर महाराष्ट्र ने जन को जल से जोड़ने के लिये ‘जलशिवार’ नाम से जलसाक्षरता का ज़मीनी कार्यक्रम शुरू किया है। गंगा गाद समस्या समीक्षा रिपोर्ट आने तक गंगा गाद की कृत्रिम उड़ाही यानी ड्रेजिंग को स्थगित करने की घोषणा कर बिहार शासन के जलसंसाधन विभाग ने भी राहत की खबर सुनाई है। इन्दौर नगर ने भूजल रिचार्ज की दृष्टि से अपने कुएँ जिंदा करने का निर्णय लिया है। मध्य प्रदेश शासन ने समीक्षा रिपोर्ट आने तक नर्मदा में रेत खनन पर स्थगित करने का निर्णय लिया है। नर्मदा किनारे व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण का काम शुरू कर दिया है। इससे प्रेरित हो, उत्तर प्रदेश और बिहार ने भी गंगा किनारे वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का निश्चय किया है। मनरेगा के तहत मौजूद श्रम के जरिए खेतों की मेड़ों को ऊँचा करने का काम कई राज्यों में चल रहा है। कई प्रतिष्ठानों और समुदायों ने अपने स्तर पर पहल शुरू कर दी।

आवश्यकता


उक्त प्रयास सुखद हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। असल समाधान के लिये प्राकृतिक प्रवाहों की आज़ादी उन्हें वापस लौटानी होगी। छोटी नदियों को प्रवाहमान बनाने पर खास बल देना होगा। जलदोहन घटाना और जल संचयन बढ़ाना होगा। पानी के बाज़ार पर लगाम लगानी होगी। औद्योगिक, व्यावसायिक और कृषि गतिविधियों में लगे वर्ग को सख्त कानून तथा सहयोग व्यवस्था बनाकर पायबंद करना होगा कि वे जितना और जैसा पानी उपयोग करें, धरती को वैसा और कम से कम उतना पानी लौटायें। चारागाह और हरियाली सुरक्षा के विशेष प्रयास करने होंगे। नमी को मिट्टी में रोकना होगा। उपलब्ध पानी में जीवन चलाना सीखना होगा।

इसके लिये धरती के छोटे पेट वाले इलाकों में आजीविका के लिये कृषि पर निर्भरता घटाकर आय के प्रकृति अनुकूल वैकल्पिक उपक्रम विकसित करने होंगे। स्थानीय हुनर तथा आधारित ग्राम कुटीर उद्योगों के संचालन तथा उत्पाद की बिक्री सुनिश्चित कर यह किया जा सकता है। कृषि में बागवानी का मिश्रित उत्पादन प्रयोग इसमें सहायक हो सकता है। पुरानी वैद्यक पद्धति तथा जड़ी-बूटी आधारित ग्रामीण फार्मेसी तंत्र खड़ा करके भी बीमारी और जल संकट दोनों का उपाय तलाशने में मदद हो सकती है। भारत की परम्परा ने दुष्काल के ऐसे कई उपाय सुझाये हैं। किंतु कोई सुने, तब न। आइये, ग्राम गुरू से सुनें और गुने भी।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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