जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

Submitted by Hindi on Thu, 06/08/2017 - 12:35
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013


विडम्बना यह है कि पानी के मामले में इतने भयावह हालात होने पर भी न हम और न हमारी सरकार स्थिति को गम्भीरता से ले रही है। वह गेंद को राज्यों के पाले में फेंककर अपना कर्तव्य निभा देती है, जबकि राज्यों की उदासीनता जगजाहिर है। जलसंरक्षण के लिये समाज को आगे आना बेहद ही जरूरी है। झारखंड में जल संसाधनों के विकास एवं विस्तार के बजाय सिर्फ मुनाफे पर आधारित औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के लिये इसका व्यापक पैमाने पर अतिक्रमण किया गया। यह दोहन लगातार जारी है। जल सहित प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय व देशज समुदायों के अधिकार खत्म हो जाने से सामुदायिक जल प्रबंधन में लोक भागीदारी कम होने लगी।

कई बार जनविरोधी सरकारी नीतियों, हस्तक्षेपों एवं कार्यक्रमों के खिलाफ स्थानीय समुदायों ने प्रतिरोध एवं संघर्ष का स्वर भी उठाया। खूँटी, तोरपा एवं तपकरा में एमएनसी (मल्टी नेशनल कम्पनी) के खिलाफ आदिवासी समूहों द्वारा अपने जल संसाधनों की रक्षा के लिये किए गए संघर्ष के आह्वान के व्यापक मायने निकलते हैं। तथाकथित विकास के नाम पर भूमि और जल संसाधनों के अधिग्रहण की प्रक्रिया से लाखों झारखंडी विस्थापित भी हुए और राज्य के वेटलैंड और वाटर बॉडीज की स्थितियाँ भी बद से बदतर होती चली गईंं। वेटलैंड और वाटर बॉडीज के उपयोग को लेकर कृषि, उद्योगों और शहरी वितरण के बीच अन्तर्विरोध ने स्थिति को और भी असमंजसपूर्ण बना दिया है। गौरतलब है कि नए तरीके से क्षेत्र के विकास हेतु पानी की जरूरतों एवं वाटरबॉडीज के संरक्षण-संवर्धन पर मुकम्मल एवं गहन विचार-विमर्श आज तक देखने को नहीं मिला। ग्रामीण विकास की सबसे महत्त्वाकांक्षी योजना मनरेगा का सबसे मुख्य काम जल संरक्षण एवं संवर्धन को व्यापक पैमाने पर बढ़ावा देना है।

झारखंड में मनरेगा अपना लक्ष्य पाने में अप्रत्याशित रूप से नाकाम रहा। किसी भी जिले में जलस्रोतों के विकास-विस्तार में मनरेगा को सही ढंग से लागू नहीं किया गया। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट भी यही बताती है। ऐसे में झारखंड के जल संसाधनों का नियोजन, विकास और प्रबंधन राज्य के समावेशी विकास और राष्ट्रीय दृष्टिकोण से संचालित करने की जरूरत है।

हास्यास्पद है कि पानी से जुड़े ठोस आँकड़े भी राज्य के पास नहीं हैं। इस्तेमाल करने योग्य जल संसाधनों को और अधिक बढ़ाने के लिये अन्तरबेसिन स्थानान्तरण, भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण और गैर-पारम्परिक विधियों के साथ-साथ वर्षा जल संचयन के पारम्परिक तरीकों को भी अपनाना होगा। इन तकनीकों को विस्तार देने के लिये अनुसंधान की जरूरत है, ताकि इन्हें प्रभावी तरीकों से लागू कराया जाए। जहाँ तक सम्भव हो, झारखंड में जल संसाधन विकास परियोजनाएँ एक एकीकृत और बहु-अनुशासनिक उद्देश्य के तहत बनाए जाएँ। वन्चित वर्गों सहित मानव और पर्यावरण के पहलुओं को ध्यान में रखना झारखंड में अनिवार्य होगा। झारखंड में पानी का मतलब केवल पेयजल नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक मामला भी है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

जन उपयोग के लिये पानी का वितरण पहली प्राथमिकता हो। खेतों को पानी नहीं मिलेगा तो अनाज संकट स्वाभाविक है। इन प्राथमिकताओं के बाद पानी का इस्तेमाल पनबिजली, उद्योग वगैरह के लिये किया जा सकता है। सूखा प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों को मानवीय तरीके से समझते हुए जल संसाधनों के उपयोग की जननीति बननी चाहिए। भविष्य को ध्यान में रखते हुए झारखंड के जल संसाधन सुविधाओं की भौतिक और वित्तीय स्थिरता पर पर्याप्त जोर देना होगा। विभिन्न उपयोगों के लिये जल पर भार को सन्तुलित करना होगा, ताकि संचालन और रख-रखाव पर अतिरिक्त व्यय करने की जरूरत न पड़े।

 

 

वेटलैंड और वाटरबॉडीज का क्षरण जारी :


डवलपमेंट विजन एवं माइंडसेट का अभाव और गैरवाजिब कार्य नीति-कार्य संस्कृति, इन्हीं कारणों से संसाधन परिपूर्ण एवं असीम सम्भावनाओं से भरे झारखंड के वेटलैंड एवं वॉटरबॉडीज का जनोपयोग में विकास नहीं हो सका। इसका नतीजा यह हुआ कि विकास के प्रायः सभी मानकों पर झारखंड उस राह पर खड़ा है, जहाँ एक वैकल्पिक व सुसंगत स्ट्रैटेजिक डवलपमेंट मॉडल की तलाश की जा रही है। बेहद अफसोस की बात है कि झारखंड के विकास के एजेंडे में गुणवत्तापूर्ण वाटर गर्वनेंस शामिल नहीं है। वाटर गर्वनेंस की नगण्यता एवं इस पर समझ की कमी ने झारखंड में पानी के सवाल को गम्भीर बना दिया है। जलस्रोतों के मृत होने की प्रक्रिया को इसकी गवाही के तौर पर देखा जा सकता है। डायरेक्ट्री ऑफ एशियन वेटलैंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड के जलस्रोत हर वर्ष 5 प्रतिशत की दर से कम हो रहे हैं, जबकि भारत के 27,403 में से लगभग 2,000 वेटलैंड झारखंड में हैं। झारखंड की प्रमुख नदियों स्वर्णरेखा, दामोदर, बराकर, कोयल, कारो तथा 11 नदी बेसिन राज्य के महत्त्वपूर्ण जल संसाधन हैं। लेकिन खनन स्थलों से निकलने वाले दूषित प्रवाह ने खनन क्षेत्रों की धाराओं एवं भूगर्भीय जल को बुरी तरह प्रदूषित किया है।

पर्यावरण सन्तुलन की अनदेखी कर औद्योगिक विकास, अनियन्त्रित शहरी विकास, बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि तथा त्रुटिपूर्ण कानूनों के कारण झारखंड के जलस्रोत, नदियाँ, तालाब तथा अन्य वेटलैंड तबाह होते गए। पेयजल, स्वच्छता, सिंचाई के साधन, एक्वाकल्चर तथा आजीविका के जलीय साधनों पर न सिर्फ काफी बुरा असर हुआ, बल्कि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है।

 

 

 

 

जल का सवाल राजनीतिक एजेंडे में नहीं :


जल संसाधनों का संरक्षण, संवर्धन एवं प्रबंधन राज्य एवं देश के सम्पूर्ण राजनीतिक माहौल से अलग नहीं है, क्योंकि जल है तो जीवन है, की हकीकत से हम भाग नहीं सकते। राष्ट्रीय जल नीति की तरह झारखंड की प्रस्तावित जलनीति का उद्देश्य भी अन्य नीतियों की ही तरह स्पष्ट नहीं है। राज्य के जल-अधिकारियों की चुप्पी इस जल नीति की सबसे गम्भीर कमी है।

जल नीति का ड्राफ्ट सिर्फ वृहद निर्माण तथा कॉर्पोरेट तन्त्र को ही अधिकारपूर्ण बनाने का प्रयास मात्र है। यह बिल पानी का निजीकरण कर विशेष वर्ग का हित साधने और गरीबों को पीने के पानी से भी वन्चित करता हुआ प्रतीत होता है।

 

 

 

 

जल नीति में जनहित गौण :


प्रस्तावित बिल में आम लोगों के पानी से जुड़े सवाल का खास जवाब नहीं मिल रहा। सामाजिक विकास की अनदेखी करके बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उद्योगों को बेरोक-टोक जल मिल सके, कुछ ऐसी व्यवस्था इस जल नीति में की जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि वाटर गवर्नेंस है कहाँ? आजादी के समय देश में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5000 क्यूबिक मीटर थी, जबकि उस समय आबादी 40 करोड़ थी। यह उपलब्धता वर्ष 2000 में कम होकर दो हजार क्यूबिक मीटर रह गई और आबादी 100 करोड़ से पार कर गई। 2025 में यह घटकर 1500 क्यूबिक मीटर रह जाएगी, जबकि आबादी 140 करोड़ से उपर हो जाएगी।

यह आँकड़ा वर्ष 2050 तक 1000 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगा और आबादी 160 करोड़ को पार कर जाएगी। झारखंड हाइकोर्ट ने जलस्रोतों के अतिक्रमण पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए निर्देश दिया था कि जलस्रोतों का संरक्षण और उसमें पानी की उपलब्धता सरकारी मशीनरी सुनिश्चित करे। चीफ जस्टिस भगवती प्रसाद ने कहा था कि राज्य के अधिकतर जलस्रोत, नदियाँ, तालाब व पोखर सूख रहे हैं। सम्बन्धित सरकारी एजेन्सियाँ इनकी रक्षा करने में विफल हैं। एसी चैम्बर में बैठकर सिर्फ शपथ दायर करने से काम नहीं चलेगा, राजधानी के आधे तालाब गायब हो गए हैं।

योजना आयोग के मुताबिक देश का 35 फीसदी इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। योजना आयोग भले ही जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डाले, लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है। असल में अधिकाधिक पानी फैक्ट्रियाँ ही पी रही हैं। साथ ही दूषित जल को नदियों में बहा दिया जा रहा है।

विश्व बैंक भी मानता है कि कई बार फैक्ट्रियाँ एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गाँव पूरे महीने में भी नहीं खींच पाता। ग्रामीण विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव ए भट्टाचार्य कहते हैं कि कृषि जिस रफ्तार से जमीन से पानी लेती है, प्रकृति उसकी पूर्ति कर देती है। यदि यह खत्म हो गया, तो सारा विकास धरा का धरा रह जाएगा। सवाल यह उठता है कि जिस देश में भू-जल व सतही जल की उपलब्धता 2300 अरब घनमीटर हो और जहाँ नदियों का जाल बिछा हो और सालाना औसत वर्षा सौ सेमी से भी अधिक होती है, वहाँ पानी का अकाल क्यों है? असलियत यह है कि वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी पानी नदियों में चला जाता है, जो भंडारण-संरक्षण के अभाव में समुद्र में जाकर बेकार हो जाता है। इसे बचाया जा सकता है।

 

 

 

 

जल संरक्षण व प्रबंधन के प्रति गम्भीरता :


वर्षाजल का संरक्षण और उसका उचित प्रबंधन ही एकमात्र रास्ता है। यह तभी सम्भव है, जब जोहड़ों, तालाबों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया जाए। पुराने तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए। खेतों में सिंचाई हेतु पक्की नालियों का निर्माण किया जाए या पीवीसी पाइप का उपयोग किया जाए। बहाव क्षेत्र में बाँध बनाकर पानी को इकट्ठा किया जाए ताकि वह समुद्र में बेकार न जा सके। बोरिंग-ट्यूबवेल पर नियंत्रण लगाए जाएँ। उन पर भारी कर लगाया जाए, ताकि पानी की बर्बादी रोकी जा सके। जरूरी यह भी है कि पानी की उपलब्धता के गणित को शासन व समाज समझे। यह आमजन को जागरूकता-सहभागिता से ही सम्भव है।

भूजल संरक्षण की खातिर देशव्यापी अभियान चलाया जाना अतिआवश्यक है, ताकि भूजल का समुचित नियमन हो सके। भू-जल के 80 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल तो हम कर ही चुके हैं और इसके बाद भी उसके दोहन का काम जारी है। विडम्बना यह है कि पानी के मामले में इतने भयावह हालात होने पर भी न हम और न हमारी सरकार स्थिति को गम्भीरता से ले रही है। वह गेंद को राज्यों के पाले में फेंककर अपना कर्तव्य निभा देती है, जबकि राज्यों की उदासीनता जगजाहिर है। जलसंरक्षण के लिये समाज को आगे आना बेहद ही जरूरी है।

 

 

 

 

 

 

 

और कितना वक्त चाहिए झारखंड को

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

जल, जंगल व जमीन

1

कब पानीदार होंगे हम

2

राज्य में भूमिगत जल नहीं है पर्याप्त

3

सिर्फ चिन्ता जताने से कुछ नहीं होगा

4

जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

5

राज व समाज मिलकर करें प्रयास

6

बूँद-बूँद को अमृत समझना होगा

7

जल त्रासदी की ओर बढ़ता झारखंड

8

चाहिए समावेशी जल नीति

9

बूँद-बूँद सहेजने की जरूरत

10

पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

11

जंगल नहीं तो जल नहीं

12

झारखंड की गंगोत्री : मृत्युशैय्या पर जीवन रेखा

13

न प्रकृति राग छेड़ती है, न मोर नाचता है

14

बहुत चलाई तुमने आरी और कुल्हाड़ी

15

हम न बच पाएँगे जंगल बिन

16

खुशहाली के लिये राज्य को चाहिए स्पष्ट वन नीति

17

कहाँ गईं सारंडा कि तितलियाँ…

18

ऐतिहासिक अन्याय झेला है वनवासियों ने

19

बेजुबान की कौन सुनेगा

20

जंगल से जुड़ा है अस्तित्व का मामला

21

जंगल बचा लें

22

...क्यों कुचला हाथी ने हमें

23

जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा

24

करना होगा जंगल का सम्मान

25

सारंडा जहाँ कायम है जंगल राज

26

वनौषधि को औषधि की जरूरत

27

वनाधिकार कानून के बाद भी बेदखलीकरण क्यों

28

अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबाँट

29

विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते

30

एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

31

विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

32

पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

33

झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

खनन : वरदान या अभिशाप

34

कुंती के बहाने विकास की माइनिंग

35

सामूहिक निर्णय से पहुँचेंगे तरक्की के शिखर पर

36

विकास के दावों पर खनन की धूल

37

वैश्विक खनन मसौदा व झारखंडी हंड़ियाबाजी

38

खनन क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी, गुलामों से भी बदतर

39

लोगों को विश्वास में लें तो नहीं होगा विरोध

40

पत्थर दिल क्यों सुनेंगे पत्थरों का दर्द

 

 
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