विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट पर गोष्ठी 7-8 अगस्त, 2001

Submitted by Hindi on Fri, 06/09/2017 - 10:00
Source
बाढ़ मुक्ति अभियान, 16 अक्टूबर, 2001

समाज विकास संस्थान, राँची-झारखंड
नदियों, बाँधों और लोगों का दक्षिण एशियाई नेटवर्क


पहला सत्र


अध्यक्षता: श्री हरिवंश, प्रधान सम्पादक, प्रभात खबर, राँची
संचालन: सुश्री पुष्पा मार्टिन, गुमला
मुख्य अतिथि: माननीय श्री इन्दर सिंह नामधारी, अध्यक्ष झारखंड विधान सभा


कोसी का विवादित पश्चिमी तटबंधकोसी का विवादित पश्चिमी तटबंध गोष्ठी की शुरुआत दिनेश कुमार मिश्र, संयोजक, बाढ़ मुक्ति अभियान के विषय प्रवेश से हुई। उन्होंने इस गोष्ठी के आयोजन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए बताया कि सारी दुनियाँ में बाँधों के निर्माण में पिछले 50 वर्षों में विश्व बैंक की अहम भूमिका रही है और इसकी वजह से उसका जबर्दस्त विरोध हुआ। दूसरी ओर इन्टरनेशनल कन्जरवेशन ऑफ नेचर (IUCN) और वर्ल्ड कंजरवेशन यूनियन जैसी संस्थाएँ थी जोकि बाँधों के अन्धाधुन्द निर्माण और उससे होने वाले पर्यावरणीय नुकसान से चिन्तित थीं। विश्व स्तर पर काम करने वाली इन दो तरह की संस्थाओं के उद्देश्य एक दूसरे के खिलाफ थे मगर इनके संयुक्त प्रयासों से अप्रैल 1997 में दुनियाँ भर के 39 विशेषज्ञ स्विट्जरलैंड के ग्लाण्ड शहर में बाँधों के अत्यन्त विवादित विषय पर चर्चा के लिये मिल बैठे। इनमें वित्तीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों से लेकर बाँध पीड़ित, सभी तरह के लोग थे। तब इन लोगों ने विश्व बाँध आयोग की स्थापना का प्रस्ताव किया जिसका उद्देश्य बड़े बाँधों की प्रभावात्मकता जाँचना तथा जल संसाधन, एनर्जी और विकास के विकल्पों की तलाश करना था। उसके साथ ही आयोग का काम विश्व स्तर पर बाँधों की डिजाइन, प्लानिंग, निर्माण, मूल्यांकन, रख-रखाव, संचालन तथा उनको निरस्त करने के तौर तरीकों का एक सर्वमान्य दिशा-निर्देश और मानक भी तैयार करना था।

इस रिपोर्ट की प्रक्रिया पर हम आगे चर्चा करेंगे मगर इस वक्त हम उन मुद्दों पर बात करेंगे जो इस रिपोर्ट में उठाये गये हैं। आयोग यह मानता है कि बाँधों की वजह से मानवता के विकास में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और दिखाई पड़ने वाला योगदान हुआ है। इनसे होने वाले फायदे भी कम नहीं है मगर इन फायदों को पाने के लिये समाज ने जो कीमत चुकाई है वह न केवल बहुत ज्यादा है बल्कि कभी-कभी तो अनावश्यक और अस्वीकार्य भी है। अपने प्रांत (बिहार और झारखंड) की अगर हम बात करें तो हमारी सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण की योजनाएँ कठघरे में खड़ी होती है। कोसी परियोजना से अब उतनी भी सिंचाई नहीं होती जितना कि लोग योजना बनने से पहले अपने आप कर लिया करते थे। देश की सबसे सस्ती सिंचाई करने वाली परियोजना के रूप में प्रचारित गण्डक परियोजना के क्षेत्र में सिंचित क्षेत्र से ज्यादा क्षेत्र में अब जल जमाव है। एक हजार करोड़ रुपये खर्च हो जाने के बाद भी सुवर्णरेखा परियोजना से अभी तक एक इंच जमीन में भी सिंचाई नहीं हो पाई है। औरंगा बाँध अभी फाइलों में उलझा हुआ है और कोयल-कारो योजना का शिलान्यास करने के लिये कोई नेता भी तैयार नहीं होता- वहाँ जन प्रतिरोध इतना ज्यादा है। इसके अलावा बुढ़ई, पुनासी, बरनार, शंख, कनहर आदि सभी योजनायें केवल बातचीत के स्तर तक रह जाती है। उत्तर कोयल का भी वही हश्र है।

क्यों नहीं हम इन योजनाओं का मूल्यांकन करते और अगर यह नकारा हैं तो इन्हें बंद क्यों नहीं कर देते? कोसी परियोजना के 338 गाँवों के विस्थापित आज भी तटबंध के अन्दर रहते हैं और उनके ऊपर से कोसी जैसी नदी का पानी हर साल बहता है। इसका जवाब है किसी के पास? सुवर्णरेखा के विस्थापितों का क्या हुआ- कोई आधिकारिक तौर पर बताएगा? पश्चिमी कोसी नहर पिछले 37 साल से बन रही है- कब पूरी होगी? वह सारे सवाल आज नहीं तो कल पूछे जायेंगे और किसी न किसी को इन सवालों का जवाब देना पड़ेगा। विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट शायद यही कहती है कि इसके पहले कि योजनाएँ इस गति को प्राप्त हो जायें उन्हें बचा लिया जाय और इसके लिये जिम्मेवार व्यक्तियों और संस्थाओं को जवाबदार बनाया जाए। जिनके लिये यह योजनाएँ बनती हैं उनकी योजनाओं में भागीदार को सुनिश्चित किया जाय और भविष्य में योजनाएँ सभी सम्बद्ध पक्षों की आम सहमति और पूरी जानकारी में बनें। योजनाओं के बारे में मिथ्या प्रचार बन्द हो- मिसाल के तौर पर बिहार सरकार यह कहती है कि 2017 तक वह बड़ी और मध्यम परियोजनाओं से 66 लाख हेक्टेयर की सिंचाई का लक्ष्य प्राप्त कर लेगी। सच यह है कि पिछले 54 वर्षों में वहाँ 16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई हो सकी है जिसमें से 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आजादी के पहले से सिंचित था। यानी कुल ले देकर आजादी के बाद अब तक 12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई उपलब्ध करवाई जा सकी। अभी 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई करना बाकी है जिसके लिये न पैसा है न नीयत। कैसे पूरा होगा यह काम आने वाले 16 वर्षों में? इस तरह के कई विषयों पर हम इस गोष्ठी में चर्चा करेंगे।

माननीय श्री इन्दर सिंह नामधारी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि मेघदूतम में कालीदास ने कहा है कि बादल समुद्र से पानी लेता है और उसे पूरे देश में बारिश की शक्ल में वापस दे देता है। सरकार भी कुछ इसी तरह से काम करती है। वह जनता से कर लेती है और उसे सारे राज्य पर बिखेर देती है। सिंचाई के लिये ऐसा ही कुछ होना चाहिए। मिश्र जी ने बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं। हमारी परेशानी है कि बरसात का पानी हमारे आँखों के सामने से बह कर चला जाता है। इस पानी को अगर हम बाँध बनाकर नहीं रोकें तो क्या इसे व्यर्थ बह कर चला जाने दें? अगर बड़े बाँध नहीं बनते हैं तो फिर सभी छोटी-छोटी नदियों नालों को बाँधना पड़ेगा। ऐसे छोटे बाँध जल्दी भरते भी हैं और जल्दी पट भी जाते हैं अतः बाँध तो बड़े ही हों तो अच्छा है। सर्फेस वाटर को रोकने का यह सबसे आसान और कारगर तरीका है। इससे भूमिगत पानी का स्तर भी बढ़ता है। आजकल पीने के पानी के लिये जो बोरिंग की जाती है उसे भी 400 फीट तक ले जाना पड़ता है। बाँध बनेंगे तो इतना नीचे तक नहीं जाना पड़ेगा।

पंजाब में भाखड़ा बाँध बना। इस अकेले बाँध ने वहाँ का नक्शा बदल दिया। जहाँ धूल उड़ती थी वहाँ खेत लहलहा रहे हैं। अकेला पंजाब पूरे देश के लिये अनाज पैदा कर रहा है और यह कभी भी भाखड़ा के बिना मुमकिन नहीं होता। वहाँ की बिजली दिल्ली तक सप्लाई होती है। मैं इस बात को यहाँ आप लोगों के बीच इस लिये रख रहा हूँ क्योंकि आप लोगों की राय बाँधों के हक में नहीं है- ऐसा मुझे लगा। मैं शाकाहारियों के बीच शाकाहार की वकालत नहीं करता- वह तो पहले से ही शाकाहारी है। मैं तो मांसाहारियों के बीच शाकाहार की बात करने वालों में से हूँ और आप सबको मेरी बात ध्यान से सुननी चाहिए।

अब हमारे यहाँ कोयल-कारों योजना की बात उठी है। वहाँ मूल समस्या विस्थापन की है। योजना के पक्ष और विपक्ष में बहुत सी बात कही जाती हैं। वह सब एक टैक्निकल मसला है पर पुनर्वास अगर ठीक से हो जाये तो योजना बननी ही चाहिए। हमारे पास जमीन की कमी नहीं है- बस पुनर्वास ईमानदारी से हो और एक निश्चित समय सीमा के अन्दर हो जाना चाहिए जिससे लोगों को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। एक दफे योजना बन गई तो पूरा इलाका खुशहाल हो जायेगा। दिक्कत यह है कि सौ-सवा सौ लोग इकट्ठे हो जायेंगे और योजना के खिलाफ आवाज उठाने लगेंगे कि नहीं बनने देंगे। यह कोई तरीका नहीं है। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि यह योजना बनेगी और निश्चित रूप से बनेगी और अगर कुछ लोगों द्वारा विरोध होगा तो सरकार उससे सख्ती से निबटेगी।

इस समय श्रोताओं के प्रतिवाद करने और बाँध के पर्यावरण पर प्रभाव तथा आम सहमति का प्रश्न उठाने पर मा. श्री नामधारी जी ने कहा कि वह पर्यावरणविद नहीं हैं मगर पर्यावरण के प्रति सचेष्ठ जरूर हैं। अगर कहीं 100 एकड़ जंगलों का नुकसान बाँध के कारण होता है तो 200 एकड़ क्षेत्र पर नये जंगल लगा कर न केवल उसकी भरपाई हो सकती है बल्कि पर्यावरण को बेहतर भी बनाया जा सकता है। सवाल इस बात का है कि थर्मल पाॅवर आप कहाँ तक बनायेंगे। कोयला तो खत्म होने वाला है। उत्तरांचल में मैंने देखा है छोटी-छोटी बिजली परियोजनायें हैं। झरनों से बिजली पैदा कर रहे हैं लोग वहाँ। हमें केवल पुनर्वास की व्यवस्था कर लेनी है मगर इसकी वजह से बाँध निर्माण का काम रुक जाये, ऐसा नहीं होना चाहिये।

मा. इन्दर सिंह जी की बातों का प्रतिवाद किया जनता दल (यू) के झारखंड के प्रान्तीय अध्यक्ष श्री गौतम सागर राणा ने जिनका मानना था कि परियोजनाओं में पुनर्वास पूरी तरह से उपेक्षित रहा है जिसके कारण लोग अब इनका विरोध करने लगे हैं। झारखण्ड के पूरे क्षेत्र में सरकार और उसके लिये काम करने वाली विभिन्न समितियों के बीच कोई तालमेल नहीं है। कुछ दिन पहले ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की खदानों के विस्तार के लिये बड़े पैमाने पर जंगल काटे गये और उनकी पुनर्स्थापना नहीं हुई। खुदी खदान के पास 90 साल पुराना एक बाजार हुआ करता था उसे उजाड़ दिया गया और कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। जब सचिव से बात की गई तो पता चला कि ईस्टर्न कोल्फील्ड्स ने विस्थापन, पुनर्वास और जंगल की कटाई आदि के बारे में कोई ब्यौरा/रिपोर्ट ही तैयार नहीं की है। हमारे पास यह सब करने के लिये पैसा ही नहीं है। पैसा आता है वित्तीय संस्थाओं से और सरकार को उन्हीं की शर्तों पर बाँधों का निर्माण करना पड़ता है। जन-विरोध की अनदेखी कर के सरकार बड़ा या छोटा कोई भी बाँध नहीं बना सकती।

पहले हम अपने प्रचलित और पारम्परिक सभी तरीकों से जहाँ-जहाँ और जितना सींच सकते हैं वह कर लें। अपने तालाब, जोरिया, कुआँ, चेक डैम तथा वाटर हार्वेस्ंटिग संरचनाओं को दुरुस्त कर लें तब उसके बाद बड़े बाँधों के बारे में सोचें। छोटी संरचनायें ठीक काम करेंगी तो बड़ी योजनाओं के प्रति भी विश्वास जग सकता है। मगर आज हम कुछ दिखा सकने की स्थिति में नहीं हैं।

घनश्याम (मधुपुर) ने विकास की दो धाराओं की बात की। पहली धारा प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए विकास की है तो वहीं दूसरी धारा प्रकृति के यथा संभव दोहन की है जिससे कुछ सामर्थ्यवान लोग अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का भोग कर सकें। इतिहास गवाह है कि बड़े बाँधों ने प्रकृति को नष्ट किया है। मनुष्य, पशु और वनस्पतियाँ आदि सभी प्रकृति के अंश हैं और जब प्रकृति को चोट पहुँचती है तो बाकी सभी चीजें भी प्रभावित होती हैं। अब हम नर्मदा या कोयल कारों की बातें करते हैं। हमारा विरोध बड़े बाँधों से नहीं है मगर प्रकृति के स्वरूप को बनाये रखने में है।

माननीय इन्दर जी के क्षेत्र में ही एक मलय जलाश्य है। इससे कुछ सिंचाई भी होती ही होगी, यह हमसे ज्यादा वह जानते होंगे। मात्र 90 परिवार विस्थापित हुए थे इस जलाशय से और मेरा दावा है कि सरकार नहीं बता सकती कि वे 90 परिवार अब कहाँ हैं। पूरे झारखण्ड में सात लाख लोग विस्थापित हैं। पारम्परिक तरीके से सिंचाई हमारे यहाँ 16 प्रतिशत जमीन पर होती है और इतना पैसा खर्च कर लेने के बाद सरकारी क्षेत्र में 5 प्रतिशत जमीन पर भी सिंचाई नहीं हो पाती है।

फिर विरोध के स्वर को सरकार सख्ती से दबाने की बात करती है तब फिर आप योजना किस के लिये बना रहे हैं?

हरिवंश जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में विकास की दो धाराओं को पुनः रेखांकित किया। विकास के लिये लोकमत को किस प्रकार प्रभावकारी बनाया जाय इसके लिये हमें संघर्ष करना पड़ेगा। आज विकेन्द्रीकरण की बात चलती है। बड़े बाँधों का रास्ता केन्द्रीकरण का रास्ता है। विकास के छोटे रास्ते मानवीय संबंधों को जोड़ते हैं जबकि बड़े बाँध दरार को बढ़ाने का काम करते हैं।

श्री रामेश्वर सिंह (हजारीबाग) के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह पहला सत्र समाप्त हुआ।

दूसरा सत्र


विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट की प्रस्तुति
अध्यक्षता: श्री जयन्तु बसु (कोलकाता)
संचालन: श्री विनोद कुमार (पलामू)


इस सत्र की पहली प्रस्तुति श्री हिमांशु ठक्कर (सैंड्रप) नई दिल्ली ने की। उन्होंने कहा कि आयोग की स्थापना की पृष्ठभूमि के बारे में कुछ मिश्र जी ने बताया है। विश्व बाँध आयोग की स्थापना तो एक तरह से 1980 के दशक में हो गई थी जबकि न केवल बड़े बाँधों का निर्माण तथा उनका विरोध दोनों ही चरम पर थे। सारी दुनियाँ में अब तक लगभग 45,000 बड़े बाँध बन चुके हैं। तकनीकी रूप से बड़ा बाँध उस बाँध को कहते हैं जिसकी बुनियाद से शीर्ष तक की ऊँचाई 15 मीटर या उससे अधिक हो। अगर बाँध की ऊँचाई 5 से 15 मीटर के बीच में हैं लेकिन उसके जलाशय में 30 लाख घनमीटर से ज्यादा पानी इक्ट्ठा होता है तब भी उसकी गिनती बड़े बाँध के रूप में ही होती है। दुनियाँ में बड़े बाँध बनाने वाले देशों में पहला नम्बर चीन (22,000 बाँध) और उसके बाद क्रमशः संयुक्त राज्य अमेरिका (6,575 बाँध) तथा भारत (4,291 बाँध) का है।

अस्सी वाले दशक में बड़े बाँध क्यों, किसकी कीमत पर और किसके लिये आदि प्रश्न तेजी से उभरने लगे थे। क्या बड़े बाँध विकास के लिये उपयोगी और आवश्यक है- यह भी पूछा जाने लगा था। निशाने पर था विश्व बैंक जो कि ऐसे बाँधों के निर्माण के लिये धन दे रहा था। तंग आकर विश्व बैंक ने अपने द्वारा समर्थित बाँधों का मूल्यांकन करवाया और 1995 में उसकी रिपोर्ट प्रकाशित की। विरोध इसके बाद भी नहीं रुका। तब विश्व बाँध आयोग की विधिवत स्थापना हुई जिसकी रिपोर्ट नवम्बर 2000 में प्रकाशित हुई। इसी रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिये आज हम यहाँ बैठे हैं।

भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। वह शायद यह महसूस करती है कि आयोग में मेधा पाटकर जैसे लोग थे जोकि बाँधों के विरोधी हैं। सच यह है कि दक्षिण अफ्रीका के पूर्व जल संसाधन मंत्री (अब शिक्षा मंत्री) इसके अध्यक्ष थे और उन्होंने खुद कई बड़े बाँधों के निर्माण में भूमिका निभाई है। डॉ. जान वेल्ट्राप, बड़े बाँधों के अन्तरराष्ट्रीय आयोग (आईसीओएलडी) के मानद भूतपूर्व अध्यक्ष, इसके सदस्य थे। श्री गोरान लिन्डाहल, अध्यक्ष, एशिया-ब्राउन-ब्रोवेरी लिमिटेड भी इसके सदस्य थे। यह कम्पनी सारी दुनियाँ में बड़े बाँधों की मशीनें तथा अन्य उपकरणों की सप्लाई करती हैं। श्री डान ब्लैकमोर-आस्ट्रेलिया की मरेडार्लिंग घाटी परियोजना के कार्यकारी अध्यक्ष भी आयोग के सदस्य थे। इसके अलावा कई समाज शास्त्री और विषय विशेषज्ञ भी आयोग के सदस्य थे। आयोग के कुल 12 सदस्यों में से दो, श्री लक्ष्मी चन्द जैन और सुश्री मेधा पाटकर, भारतीय थे। कुल मिलाकर सात सदस्य बाँधों के पक्षधर और शेष पाँच विरोधी थे। किसी भी मायने में यह आयोग बाँध विरोधी लोगों के पक्ष में नहीं था।

आयोग ने दुनियाँ भर में 8 बड़े बाँधों का विषद अध्ययन किया। करीब 125 बाँधों का सर्वेक्षण किया और बाँधों के 17 विभिन्न आयामों-सामाजिक, पर्यावरणीय, आर्थिक, विकल्प, प्रशासन तथा संस्थागत प्रक्रियाओं आदि पर अपने विचार व्यक्त किये। इसके लिये आयोग को पक्ष-विपक्ष सब मिला कर 947 प्रस्तुतियाँ/लेख मिले। इन सूचनाओं के आधार पर आयोग ने तकनीकी, आर्थिक, वित्तीय सफलता, पर्यावरण पर प्रभाव, समाज पर प्रभाव तथा नफे-नुकसान के बँटवारे के समान वितरण को ध्यान में रखकर बाँधों का मूल्यांकन किया। फिर बड़ें बाँधों के विकल्प को लेकर अध्ययन किया। इन विकल्पों को अपनाने से मिलने वाले अवसर तथा उनकी राह में आती रुकावटों का अध्ययन किया। इसके साथ ही आयोग ने बड़े बाँधों की प्लानिंग, उनकी स्वीकृति की निर्णय प्रक्रिया तथा निर्देशों के पालन की प्रक्रिया जैसे मुद्दों का भी अध्ययन किया जिसके आधार पर किसी भी बाँध योजना का चुनाव, डिजाइन, निर्माण, संचालन और उन्हें निरस्त कर देना निर्भर करता है।

आयोग ने बड़े बाँधों से सम्बंधित उन सभी उद्देश्यों का बारीकी से अध्ययन किया जोकि योजना स्वीकृति होने के समय निर्माणकर्ताओं ने सरकार के सामने रखे थे जिनके आधार पर निर्माण की स्वीकृति मिली थी। आयोग ने इस बात पर नजर रखी थी कि जो लक्ष्य सामने रखे गये थे वह क्यों और कैसे हासिल नहीं किये जा सके या कहीं जो हासिल हुआ वह एकदम आशाओं से अलग तो नहीं था।

अध्ययन के बाद आयोग ने पाया कि सिंचाई के मामले में अधिकांश बाँधों में लक्ष्य से कम सिंचाई हुई। विद्युत उत्पादन जरूर बेहतर था। घरेलू और औद्योगिक पानी की सप्लाई दुरुस्त नहीं कर पाई तथा बाढ़ नियंत्रण कहीं-कहीं तो हुआ मगर बहुत सी जगहों पर लोगों पर पहले से ज्यादा बाढ़ का खतरा बढ़ा। बाँधों पर खर्च तथा उनके निर्माण का समय अनुमान से कहीं ज्यादा था। बाँधों में गाद का जमाव आशा से कहीं अधिक था और बाँधों ने जल जमाव और लवणीयता की नई समस्या पैदा की है।

जंगल और वहाँ रहने वाले आदमियों और जानवरों पर बाँधों का बुरा असर पड़ा है। बाँध के ऊपर और नीचे दोनों तरफ पानी में रहने वाले जीवों पर बाँधों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जहाँ एक ही नदी पर एक के बाद एक कई बाँध बने हैं वहाँ उनका पानी की गुणवत्ता, बाढ़ की समस्या तथा जीव विविधता पर बुरा असर पड़ा है। इन सभी चीजों को फिर से दुरुस्त करना आसान नहीं होता।

आयोग ने यह भी पाया कि सारी दुनियाँ में 4 से 8 करोड़ के बीच लोग बाँधों से विस्थापित हुए हैं। बाँधों के नीचे रहने वाले करोड़ों लोगों के जीवन पर बाँध का बुरा असर पड़ा है। बहुत से विस्थापितों को विस्थापित की मान्यता ही नहीं मिलती इसलिये उनको न तो कोई मुआवजा मिलता है और न ही पुनर्वास। मुआवजा आमतौर पर कम मिलता है और आर्थिक तथा सामाजिक पुनर्वास तो नहीं ही हो पाता है। जितने ज्यादा लोग किसी योजना से विस्थापित होते हैं, उनके पुनर्वास में उतनी ही अड़चने आती हैं।

सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण तथा बिजली उत्पादन के सारे विकल्पों की खोज-बीन तथा उनका तुलनात्मक अध्ययन समुचित रूप से नहीं किया जाता है जबकि यह विकल्प उपलब्ध होते हैं।

योजनाओं में पारदर्शिता नहीं होती जिससे लोगों को अपने भविष्य के बारे में पता ही नहीं होता। योजना से प्रभावित होने वाले लोगों की योजना में कोई भागीदारी नहीं होती और अगर कभी कोई सामाजिक या पर्यावरणीय अध्ययन होता भी है तो बहुत देर से होता है और उसकी परिधि बहुत सीमित होती है। माॅनिटरिंग और मूल्यांकन ठीक से न होने के कारण अनुभवों से कुछ भी सीख पाने के अवसर समाप्त हो जाते हैं।

इन सारी कमियों से बचने के लिये यह जरूरी है कि किसी भी योजना में उससे लाभ पाने वालों और नुकसान उठाने वालों को बराबरी से देखा जाय। शुरू से आखिर तक योजना के क्रियान्वयन को दक्षतापूर्वक चलाया जाय। सभी संबंध पक्षों की पूरी भागीदारी से योजनाएँ बनें। योजनाएँ टिकाऊ हों और लागू करने वाले पूरी तरह से जवाबदार हों।

सारी दुनियाँ में विकास के नाम पर सबसे ज्यादा पैसा बड़े बाँधों पर खर्च हुआ है और इसलिये हम सभी के लिये बाँधों का बड़ा महत्व है और इस पर चर्चा होनी चाहिये।

डॉ. निर्मल सेनगुप्त (मद्रास इन्स्टीच्यूट ऑफ डवलपमेन्ट स्टडीज, चेन्नई) ने बड़े बाँधों के भारत के अनुभवों के बारे में बताया। डॉ. सेनगुप्त, ‘बड़े बाँध- भारत का अनुभव’ पुस्तक के लेखकों में से एक है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भारत में लगभग 300 बड़े बाँध थे जिनकी संख्या अब बढ़कर 4291 हो गई है। इनमें से सबसे ज्यादा महाराष्ट्र (1529), मध्य प्रदेश (1093) तथा गुजरात (527) में है। आजादी के समय हमारे पास जो इंजीनियर थे उनमें से बहुत से इंग्लैण्ड और अमेरिका में शिक्षा पाये हुए थे और उन देशों के विकास की प्रक्रिया इन लोगों के ऊपर हावी थी। इस काल में बाँधों के बाजार में जबर्दस्त उछाल आया था।

आजादी के समय हमारा कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 5.1 करोड़ टन था जोकि अब बढ़कर लगभग 20 करोड़ टन हो गया है। तब हमें अन्न का आयात करना पड़ता था और अब यह उत्पादन हमारी जरूरतों से थोड़ा अधिक है। इस समय हमारे कुल खाद्यान्न उत्पादन में गैर सिंचित कृषि का योगदान 40.47 है, जबकि 59.52 प्रतिशत उत्पादन सिंचित क्षेत्रों में होता है। भारत में उन सिंचाई योजनाओं में जिनमें 10,000 हेक्टेयर से ज्यादा सिंचाई होती है उन्हें बड़ी और 2,000 से 10,000 हेक्टेयर तक की सिंचाई योजना को मझोली (मध्यम) माना जाता है। 2,000 हेक्टेयर से कम सिंचाई योजना की छोटी सिंचाई योजना कहते हैं। वर्ष 1996-97 तक भारत में अर्जित सिंचाई क्षमता 918 लाख हेक्टेयर थी जिसमें से बड़ी और मझोली योजनाओं का सिंचन क्षेत्र 338 लाख हेक्टेयर था यानी कुल सिंचित क्षेत्र का 36.8 प्रतिशत। अगर यह मान लिया जाय कि कुल बड़ी और मझोली सिंचाई परियोजनाएँ बाँधों की शक्ल में ही हैं तो भी 1993-94 में कुल खाद्यान्न के उत्पादन में बड़े बाँधों का योगदान 21.9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता।

इस खाद्यान्न उत्पादन का केवल बड़ा बाँध ही दावेदार नहीं है। कृषि विभाग वाले भी कहते हैं कि उन्नत बीज, उर्वरकों का उपयोग, कृषि अनुसंधान और उसकी विस्तार सेवा, कृषि कार्य के लिये ऋण और समर्थन मूल्य आदि आयामों का प्रभाव भी कम नहीं है। यदि उत्पादकता बढ़ाने वाले इन उपायों के योगदान का आकलन किया जाय तो बड़े बाँधों का खाद्यान्न उत्पादन में उपयोग 10 प्रतिशत के आस-पास होगा। यह कोई छोटा योगदान नहीं है मगर उतना ज्यादा भी नहीं है जितना कि उसका प्रचार होता है।

देश में विभिन्न जगहों पर फसल चक्र बदला है। चावल-गेहूँ की महत्ता बढ़ी है। मोटे अनाजों का उत्पादन कम हुआ है। तिलहन में हम आत्मनिर्भर हुये हैं। इसमें सिंचाई का योगदान रहा है मगर सिंचाई के साधनों के योगदान को अलग-अलग कर के देखना शायद सम्भव नहीं है। बहुत सी बड़ी योजनाओं में इतना जरूर हुआ है कि उसका लाभ बड़े किसान ज्यादा ले गये और अनाज की जगह गन्ना या केला उपजने लगा।

बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में डी.वी.सी. योजना बंगाल/बिहार में बनी तो उड़ीसा में हीराकुंड बाँध में बाढ़ नियंत्रण की व्यवस्था की गई। इन दोनों की उपयोगिता पर शुरू से ही संदेह किया जाता रहा है। इस वर्ष हीराकुड पर फिर उंगलियाँ उठ रही हैं। बाढ़ नियंत्रण के लिये गंगाघाटी और ब्रह्मपुत्र के मैदानों के क्षेत्रों को सुरक्षा देने के लिये बड़े बाँधों की बात चल रही है। नेपाल में प्रस्तावित बाँधों पर दोनों देशों की सहमति चाहिये। उत्तर-पूर्व में भी ऐसे बाँधों का प्रस्ताव है पर उनकी भूमिका भविष्य के गर्भ में है।

बिजली उत्पादन के लिये देश की 48 प्रतिशत क्षमता उत्तर-पूर्व के राज्यों में तथा 36 प्रतिशत क्षमता गंगा घाटी की पहाड़ियों में है। यह सब बड़े बाँध की मदद से सोचा जा रहा है मगर नवीं योजना के प्रारूप के अनुसार हिमालय की पारिस्थितिकी प्रकृति नाजुक है और इनमें से अधिकांश बाँध दुर्गम क्षेत्रों में है। ब्रह्मपुत्र का शरू का हिस्सा चीन से होकर आता है और अगर वह अपने यहाँ इस नदी को बाँधे तो हमारे यहाँ उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा देश की सुरक्षा की दृष्टि से इस क्षेत्र में बड़े बाँध नहीं बनाये जा सकते- ऐसा कुछ अधिकारियों का मानना है। अन्तरराष्ट्रीय टकराव की स्थिति में यह देश की घनी आबादी के लिये खतरा बनेंगे।

डॉ. प्रणव बनर्जी (इन्डियन इन्स्टीच्यूट ऑफ पब्लिक ऐडमिनिस्ट्रेशन, नई दिल्ली) ने बड़े बाँधों की आर्थिक समीक्षा की। उन्होंने बताया कि भारत और चीन में मिलाकर दुनियाँ भर के बड़े बाँधों की लगभग आधी संख्या है अतः बाँधों की रपट भी मुख्यतः इन्हीं दोनों देशों से मिलती है।

बाँधों के निर्माणकर्ता इंजीनियर इस बात की दलील देते हैं कि बड़े बाँधों के कारण उत्पादकता में वृद्धि होती है। यह केवल आंशिक रूप से सत्य है। उत्पादकता में वृद्धि तो वर्षा सिंचित क्षेत्रों में भी हुई है। इस विषय पर डॉ. सेनगुप्त ने विस्तार से बताया है अतः उसे दोहराने की जरूरत नहीं है।

व्यावहारिक रूप से बाँध के निर्माण और प्लानिंग की प्रक्रिया बड़ी विचित्र है। काम पहले शुरू हो जाता है और विस्तृत योजना रिपोर्ट उसके बाद में बनती है। उपलब्ध विकल्पों का कोई अध्ययन नहीं होता यहाँ तक कि दूसरे विशेषज्ञों की बात भी नहीं सुनी जाती हैं सारी प्रक्रिया गोपनीय रहती है और जिसके लिये योजनाएँ बनती हैं उसकी कोई भागीदारी इन योजनाओं में नहीं होती।

1997 तक मध्यम/बड़ी सिंचाई योजनाओं पर लगभग 1,32,000 करोड़ रुपये खर्च हुये हैं और कुल सिंचित क्षेत्र लगभग 9.20 करोड़ हेक्टेयर है। सिंचाई की यह लागत अपने आप में बहुत ज्यादा है। इसके ऊपर से डूब क्षेत्र की समस्या, पुनर्वास और पर्यावरण की लागत अगर जोड़ दी जाय तो समाज इस तरह की सिंचाई की काफी बड़ी कीमत देता है।

सर्वश्री हिमांशु ठक्कर, निर्मल सेनगुप्त और प्रणव बनर्जी के वक्तव्य के बाद रिपोर्ट पर प्रश्नोत्तर शुरू हुए।

डॉ. त्रिजुगी प्रसाद (पटना) का मानना था कि बाँध आम जनता की खुशहाली के लिये विकल्प है। हमें यह देखना चाहिए कि बाँध आया कैसे। हमारे देश में 87 प्रतिशत पानी बारिश के तीन महीनों में बरस जाता है। साल भर के लिये इस्तेमाल होने वाले पानी को तीन महीने में तो खर्च नहीं कर सकते। इसलिये उसे बचाकर रखना होगा और इसके लिये नदी पर बाँध चाहिए।

विद्यार्थी के तौर पर जब पानी के प्रबंधन की बात करते हैं तो उसमें विज्ञान का उपयोग और परिणाम दोनों के बारे में बात करते हैं। प्रोजेक्ट प्लानिंग और प्रस्ताव में सारी चीजों की व्याख्या होती है। गड़बड़ी होती है वहाँ जहाँ विज्ञान का आधा अधूरा उपयोग होता है। जल संसाधनों के उपयोग पर सारे विश्व में राजनीति हो रही है। यह सब सामाजिक और पर्यावरणीय जन चेतना के बावजूद हो रहा है।

बिहार की स्थिति और भी विचित्र है। यहाँ पहले बाढ़ नियंत्रण के लिये नेपाल में बाँध बनाने का प्रस्ताव था जोकि नहीं बन पाया। उसके बाद तटबंध बने और उसमें भी राजनीति घुसी हुई है। आधा काम कर के बीच में छूट गया जिसकी वजह से अब परेशानियाँ आ रही हैं। राजनीति के चलते काम अधूरे रह जायें और दोष विज्ञान के सर मढ़ दिया जाय, यह तो ठीक नहीं है।

हमारे यहाँ जल-संसाधनों की शिक्षा का भी वही हाल है। ले देकर बिहार में एक वाटर रिसोर्स डेवलपमेंट सेन्टर है और उसमें भी सुविधाओं का बुरा हाल है। हम अपने घर को दुरुस्त करें और फिर योजनाओं के बारे में बात करें तो बेहतर हो।

डॉ. प्रसाद के वक्तव्य के बाद प्रश्नों की झड़ी सी लग गई। सुश्री जया मित्र (कोलकाता) ने पूछा कि बाँध के दुष्परिणामों को पढ़ाया नहीं जाता या फिर इंजीनियर लोग जान-बूझ कर अनजान बने रहते हैं। उनकी आँखों के सामने लोगों की बदहाली होती है और योजनायें अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाती है। लागत दस गुना-बीस गुना ऊपर भागती है मगर निर्माण कार्य कभी रुकता नहीं है। जब राजनीति की बात उठती है तो निहित स्वार्थ वाले तत्वों और बिल्डरों की कारगुजारी का ध्यान रखना चाहिए। कुछ लोग परिणाम की चिन्ता किये बगैर अपने स्वार्थों को पूरा करने के आदि होते हैं। इस खेल में ठेकेदार-इंजीनियर बराबर के भागीदार हैं।

राँची के उपेन्द्र कुमार सिंह जानना चाहते थे कि झारखंड के आर्थिक और सामाजिक परिवेश को देखते हुए बड़े बाँधों का क्या विकल्प हो सकता है। डॉ. निर्मल सेनगुप्त का मानना था कि जो भी तकनीकी शिक्षा आज कल दी जा रही है उसका देश की जरूरतों से कोई लेना देना नहीं है। इसमें आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है। जमशेदपुर के श्री राणा गौतम का कहना था कि बड़े बाँधों का निर्माण सारी दुनियाँ में प्रायः बन्दी के कगार पर है- जो बचे हैं वह भी धीरे-धीरे पट रहे हैं। इस तरह जो शून्यता की परिस्थिति पैदा हो रही है उसका क्या विकल्प हो सकता है? देवनाथ देवन (मधुबनी, बिहार) का कहना था कि डैम का विकल्प हम सुझा सकते हैं मगर इसका निर्णय आम जन ले सकें- ऐसी परिस्थितियों की सृष्टि करना हमारा काम होना चाहिये।

एक आवाज-बाँध की ऊँचाई फिर कितनी होनी चाहिए जिसे हम स्वीकार कर सकें। दूसरी आवाज -12 फीट तक ठीक रहेगा। कामेश्वर लाल ‘इन्दु’ (चनपटिया-पश्चिमी चम्पारण, बिहार) ने बताया कि उनके क्षेत्र में गंडक नदी पर बना बाँध अब केवल 5 फीट ऊँचा बचा है। बाकी नदी का तल का लेवेल ऊपर उठ जाने से प्रायः खत्म है। यह पाँच फुट का बाँध भी जब टूटता है तो काफी तबाही होती है। हमारा पिपरा-पिपरासी तटबन्ध हर साल टूटता है और यह केवल पश्चिमी चम्पारण के चार प्रखण्डों में ही तबाही नहीं मचाता है वरन उत्तर प्रदेश के पडरौना जिले में भी तबाही मचाता है।

दरभंगा-बिहार के दयानाथ ने बताया कि उनके यहाँ नदियों के किनारे बाँध बनाये जाने के कारण नदी का तल ऊँचा हो गया है और बाढ़ पहले से ज्यादा और जल्दी-जल्दी आने लगी है। बाँधों के बाहर जल-जमाव रहने लगा है और बाँधों के अन्दर और बाहर का फर्क मिट गया है। जहाँ के लोग ज्यादा परेशान होते हैं वहाँ बाँध को काट देते हैं। जहाँ पहले अच्छी फसल होती थी और तीन फसल वाला इलाका था वहाँ अब धान के भी लाले पड़ गये हैं। कई-कई इलाके तो ऐसे हैं जहाँ साल में 9-9 महीने पानी रहता है। भाखड़ा नांगल से क्या फायदा हुआ वह तो वहाँ के लोग जाने मगर हमको चीन की हांग हो नदी के बाँधों का उदाहरण देकर बिना बात फँसा दिया गया।

मंथन (जमशेदपुर-झारखंड)ने स्पष्टीकरण मांगा कि यहाँ इस समय बाढ़ क्षेत्र से आये वक्ता बाँध और तटबंधों के लिये एक ही शब्द बाँध का प्रयोग कर रहे हैं। बाँध नदी की धारा के सामने बनी हुई संरचना होती है जबकि तटबन्ध नदी के किनारे लम्बाई में बनते हैं और इनका उद्देश्य नदी के पानी को बाहर फैलने से रोकना होता है। उनका सुझाव था कि बाढ़ नियंत्रण के लिये बनाये गये तटबंधों को बाँध न कहा जाय। इसके अलावा उन्होंने जानना चाहा कि विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट में तटबन्धों पर चर्चा हुई है या नहीं? बड़े बाँधों और छोटे बाँधों का तुलनात्मक अध्ययन इस रिपोर्ट में है या नहीं? विस्थापन का दंश झेलने वाले तो स्वाभाविक रूप से बड़े बाँधों के विरोध में रहते हैं मगर वहीं पड़ोस में बाँधों से फायदा उठाने वाले लोग भी रहते हैं। अतः बहुत कम दूरी के फासले पर ही बाँधों के बारे में राय अलग-अलग होती है। इस तरह के विरोधाभास का अध्ययन इस रिपोर्ट में है या नहीं?

राँची के मेधनाथ का प्रश्न था कि पश्चिम के विकसित देशों में बाँध नदियों के अस्तित्व को बचाने के लिये बनाये गये थे वहीं चीन जैसे समाजवादी देशों मे बाँध बिजली के उत्पादन को ध्यान में रख कर बने। इन दोनों में बाँधों के प्रति आम जनता का क्या रूख था? चीन में तो अभी भी दुनियाँ का सबसे बड़ा बाँध बन रहा है। क्या वजह है कि बाँध के नाम पर समाजवादी और साम्राज्यवादी चिन्तन एक हो जाता है।

पुरी-उड़ीसा के भगवती बलवन्त राय ने अपना मत रखा कि जरूरी नहीं है कि सारे बाँध बुरे ही हो। कुछ बाँधों से आम जनता का हित साधन भी हुआ है। अतः बाँध बनाते समय समग्रता में बाँध निर्माण के सभी पहलुओं पर चर्चा होना बहुत जरूरी है ताकि लाभ-हानि को परखा जा सके। हमें हानि को कम करने के लिये संगठित रूप से दबाव डालना चाहिए। बीजू नेगी (देहरादून-उत्तरांचल) कहा कहना था कि वर्षा आधारित कृषि पर शोध बहुत कम हुये हैं। जोभी शोध इस दिशा में हुए हैं उनमें जोर सिंचित कृषि या कम से कम नियमित सिंचाई को ध्यान में रखकर हुये हैं। वर्षा पर आधारित कृषि या सूखे वाले क्षेत्र प्राथमिकता में नहीं आ पाते हैं। इसके अलावा बाँध जहाँ भी बनेगा वहाँ वह जमीन को निश्चित रूप से डुबायेगा। उतने क्षेत्र की कृषि तो समाप्त ही हो जाती है- लगे हुये क्षेत्र की खेती पर भी बुरा असर पड़ता है।

डॉ. जयन्त बंद्योपाध्याय (इंडियन इन्स्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेन्ट-कोलकाता) का मानना था कि बड़े बाँधों के संबंध में मुख्य मुद्दा विस्थापन और पुनर्वास के रूप में उभरता है। यदि इसका समाधान कर दिया जाय तो बाँधों से सम्बन्धित एक बड़े आक्षेप को हल किया जा सकता है। समस्या वहीं आती है जब यह काम भी ठीक से नहीं होता।

पुरी के रवि कुमार त्रिपाठी ने बताया कि 1950 के दशक में बनाये गये हीराकुंड बाँध का पुनर्वास अभी तक पूरा नहीं हुआ है। जो कुछ पुनर्वास मिला है वह या तो नदी क्षेत्र में रहने वाले जंगलों में मिला है जहाँ वह रहने के आदी नहीं हैं या वह अभी भी बाँध के डूब क्षेत्र में बसे हुए हैं। जो क्षेत्र सिंचित हैं उनमें भी धान की उत्पादकता घटती जा रही है। इसके अलाव बाँध के छोड़े गये पानी से निचले क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति भयंकर होती जा रही है। यह 1981 में हुआ उसके बाद 1993 में और अब 2001 में। इस बाँध से बाढ़ को नियंत्रित करने का वायदा किया गया था मगर यह उसके खतरे को बढ़ा रहा है। इसलिये पुनर्वास एक अहम प्रश्न हो सकता है मगर बाकी चीजें भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।

हिमांशु ठक्कर ने बहस का जवाब देते हुए कहा कि पानी के भण्डारण की आवश्यकता है- यह निर्विवाद है मगर यह कैसे हो इस पर बहस है। यह भण्डारण केवल बाँधों द्वारा नहीं हो सकता। आजतक हमारे देश में जल संसाधन के विकास पर जो भी पैसा खर्च किया गया उसका 80 प्रतिशत बाँधों के निर्माण में गया मगर परिणाम आशा के अनुकूल नहीं मिले। गुजरात के कई क्षेत्रों में आज से तीस साल पहले तक पाताल फोड़ कुएँ हुआ करते थे। पानी के बेतरह दोहन ने उनको समाप्त कर दिया। भूगर्भ जल की सतह नीचे चली गई और आधुनिक विज्ञान के नाम पर इसको अपनी जगह बनाये रखने वाले पारम्परिक तरीकों को तिलांजलि दे दी गई। अब अगर कोई समस्या पैदा होती है तो एक नया प्रोजेक्ट बना लीजिए। विकल्प के रूप में सिंचाई के पारम्परिक साधन विकसित करने के लिये पैसा नहीं है मगर नकारा बाँधों के लिये हैं। सिंचाई के लिये नहरें बनेंगी मगर जल निकासी की व्यवस्था नहीं होगी। वह समस्या जब पैदा होगी तब उसके लिये अलग से योजना बनेगी और फिर कर्ज उपलब्ध होगा। विश्व बैंक की भी कुछ वर्ष पहले तक यही मान्यता थी।

हमलोग अक्सर यह सुनते हैं कि भाखड़ा नहीं होता तो देश के लोग भूखों मर जाते। भारत में भाखड़ा के अलावा करीब 4,000 बाँध और भी हैं और जैसा कि डॉ. निर्मल सेनगुप्त ने अभी बताया कि देश के कुल कृषि उत्पादन में इन सारे बाँधों का योगदान 10 प्रतिशत के आस-पास है तब आप इसमें भाखड़ा का योगदान खोज लीजिये। वैसे भी इस बाँध का जीवनकाल अब 50 वर्ष से अधिक नहीं बचा होगा। इसलिये बाँधों की भूमिका की एक तर्क संगत व्याख्या होनी चाहिए और हमें प्रचार तंत्र के कामों को अपने विवेक से आंकना चाहिए।

डॉ. परशुरामन (मुंबई) ने इस विषय पर अपनी संक्षिप्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बढ़ती जनसंख्या और बाँधों के संबंध को निहित स्वार्थ वाले तत्व जोर शोर से उभार रहे हैं। वह मानते हैं कि जनसंख्या बढ़ेगी तो अधिक अन्न की जरूरत पड़ेगी और इसके लिये सिंचाई चाहिए जोकि बड़े बाँधों से ही मिल सकती है। वास्तव में अन्न स्वावलंबन का इस तरह का सीधा सम्बन्ध बड़े बाँधों से नहीं है। इस बात का समर्थन अमर्त्य सेन जैसे चिन्तकों ने भी किया है। अभी कुछ दिन पहले पूना में इसी तरह की एक मीटिंग में बाँध समर्थकों ने कहा कि अगले पचास साल में हमारी जितनी आबादी हो जायेगी उसके लिये लगभग 40 करोड़ टन अनाज चाहिए। यहाँ तक तो ठीक है मगर उसके बाद यह कह देना कि इसके लिये बाँध चाहिए यह विवादग्रस्त है। इसके लिये जब हम विकल्प बताते हैं तो उसे बाँध समर्थक अनसुना कर देते हैं।

अमेरिका में, बाँधों का पुनर्मूल्यांकन करके 150 बाँधों को हटा दिया गया क्योंकि उनसे होने वाले फायदे के मुकाबले उनका न रहना समाज और पर्यावरण के हित में अधिक पाया गया। यह उस देश की घटना है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने अपना विकास कर लिया और अब वह नहीं चाहता कि बाकी देश विकसित हो। हमें अपने बाँधों का मूल्यांकन भी लगातार करते रहना चाहिए और अगर उनसे फायदे की जगह नुकसान ज्यादा हों तो उस पर कोई सार्थक निर्णय लेना चाहिये।

विश्व बैंक, एशियन डवलपमेन्ट बैंक आदि सहित बहुत सी वित्तीय संस्थाओं ने इस रिपोर्ट के प्रति अपनी सहमति जताई है और वैसी परिस्थिति में इस रिपोर्ट का भारत सरकार द्वारा खारिज किया जाना और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बाँध बनाने के हमारे अपने संसाधन प्रायः समाप्त हैं। बाहरी मदद के बिना अब हम शायद एक भी बाँध इस देश में नहीं बना सकते। तब हमें विकल्पों की तलाश जारी रखनी चाहिए और उस पर गम्भीरता से काम करना चाहिए।

विस्थापन पर हमलोग अगले सत्र में चर्चा करेंगे।

तीसरा सत्र


विस्थापन-पुनर्वास तथा विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट
अध्यक्षता: श्री बीजू नेगी


सत्र की शुरुआत डाॅ. परशुरामन के वक्तव्य से हुई जिसमें उन्होंने पुनर्वास के मुद्दे पर विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट के अध्ययन के बारे में बताया।

उन्होंने कहा कि अब तक दुनियाँ भर में बाँधों के कारण चार से आठ करोड़ के बीच लोग विस्थापित हुए हैं। यह बात बहुत विभिन्न देशों की आधिकारिक रिपोर्टों के आधार पर कही गई है। क्योंकि इन रिपोर्टों में विस्थापितों की संख्या पर स्वयं में विवाद है तथा जनता की राय इन रिपोर्टों से मेल नहीं खाती अतः यह केवल अनुमान के आधार पर ही कहा जा सकता है। मगर जो सूचनाएँ विश्व बाँध आयोग को मिली उनके आधार पर यह संख्या बहुत ही कड़ी छानबीन के बाद तय की गई है। अकेले चीन में 1990 तक कम से कम 1.20 करोड़ लोग बाँधों के कारण विस्थापित हुये हैं।

तथाकथित विस्थापितों के अलावा बाँध के निचले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की, खासकर घाटी में बसने वाले किसान और मछुआरों की जीविका पर बाँधों का बहुत बुरा असर पड़ा है। लम्बे समय तक बाँध निर्माण के क्षेत्र में विस्थापन और पुनर्वास का कोई मुद्दा ही नहीं था।

अक्सर बहुत से विस्थापितों को विस्थापित होने की मान्यता ही नहीं मिलती और इसलिये न तो उन्हें कोई पुनर्वास मिलता है न कोई क्षति-पूर्ति। जिन्हें मुआवजा या पुनर्वास मिलता भी है उन्हें भी केवल भौतिक रूप से अलग बसा दिया जाता है- उनकी जीविका और सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्स्थापना का कोई प्रबंध नहीं होता। उदाहरण के लिये अपने देश में सरदार सरोवर बाँध के पुनर्वास को ले लें। यह सच है कि अब तक के बाँधों के निर्माण से हुये विस्थापन के प्रश्न पर इस योजना में सबसे अच्छे तरीके से पुनर्वास किया गया है मगर यह भी आशा और जरूरत के अनुकूल नहीं है। जो भी पुनर्वास हो रहा है वह केवल डूब क्षेत्र के लोगों के लिये है। नहरों और अन्य कारणों से विस्थापित लोग इस श्रेणी में नहीं आते हैं।

इसके अलावा आदिवासियों तथा अन्य पिछड़ों और अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों का विस्थापन बाकी लोगों के मुकाबले कहीं ज्यादा हुआ है। उनकी जीविका, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं पर बाँधों का निश्चित रूप से बुरा असर पड़ा है। हमारे देश में आदिवासियों की संख्या 10 प्रतिशत से अधिक नहीं है मगर विस्थापित लोगों पर नजर डालें तो कुल विस्थापित होने वाले लोगों में उनका हिस्सा 45 प्रतिशत के आस-पास है। इसमें अगर दलितों को भी शामिल कर लिया जाय तो विस्थापित आबादी में इन दोनों का प्रतिशत 50 के ऊपर हो जाता है जबकि दोनों की कुल आबादी देश में 20 प्रतिशत के करीब है। इन्हीं गरीबों ने देश के उत्थान के लिये अपने हितों की कुर्बानी दी है और जब विकास के लिये योजनायें बनती हैं तब इनके हितों की ही अनदेखी कर दी जाती है। विस्थापन की पीड़ा यही वर्ग सबसे ज्यादा झेलता है।

बाँधों का स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ तो पानी के भण्डारण के कारण और कुछ सिंचित क्षेत्रों में जल जमाव के कारण। मलेरिया, कालाजार और बहुत सी पानी जन्य बीमारियों का दंश यह लोग झेलते हैं। महिलाओं पर इनका असर पहले से और भी बुरा पड़ता है क्योंकि उनको अपनी सारी जिम्मेवारियाँ बदली परिस्थितियों में निभानी पड़ती हैं।

इसलिये जब हम भी विकास की योजनायें बनायें तब नकारात्मक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों को विश्वास में लें। उन्हें सारी चीजों की जानकारी हो और उनका जहाँ तक मुमकिन हो सके, उनका पूरी तरह से पुनर्वास किया जाय। योजना के निर्माण में इन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिये और उनकी स्वीकृति ली जानी चाहिये। यह स्वीकृति सार्वजनिक होनी चाहिए न कि प्रतिनिधित्व के आधार पर। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि दो-चार विभिन्न स्तर के जन प्रतिनिधियों को बुलाकर बन्द कमरे में यह खानापूरी कर ली जाती है। आजकल यह स्वीकृति जन-सुनवाई के आधार पर मिलती है मगर हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह जन-सुनवाई नौटंकी न बन कर रह जाय।

इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी एक नदी घाटी में बनने वाली परियोजना में जब तक सारे विस्थापितों का पुनर्वास न हो जाय तब तक वहाँ कोई दूसरी योजना हाथ में न ली जाय।

सुवर्णरेखा परियोजना (पूर्वी सिंहभूम) में विस्थापितों के हक की लड़ाई लड़ने वाले संगठन सुवर्णरेखा विस्थापित मुक्ति वाहिनी के अरविन्द अंजुम ने बताया कि इस योजना की शुरुआत 1970 में 90 करोड़ रुपयों की लागत से बनने वाली एक बहुउद्देशीय योजना के रूप में हुई थी। इसमें तीन राज्य बंगाल/बिहार/उड़ीसा शामिल थे। मार्च 2000 तक इस योजना पर 926 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और अब इसका इस्टीमेट 1995 की दर पर 2,376 करोड़ रुपया हो गया है। इस परियोजना से बिहार (अब झारखंड) और उड़ीसा में 10,921 परिवार विस्थापित होने वाले थे। हम लोगों ने परियोजना के चाण्डिल बाँध के विस्थापितों के बीच तब काम करना शुरू किया जबकि इस बाँध का निर्माण पूरा कर लिया गया था। बाँध के निर्माण काल के समय भी योजना का विरोध हुआ था। लगभग उसी समय कोयल-कारो परियोजना की भी घोषणा हुई थी मगर उस योजना पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है।

पुनर्वास की मांग पर हमलोग लगातार धरना प्रदर्शन और अनशन आदि करते रहे हैं। सरकार यह मानती है कि पुनर्वास का काम ढीला है और इसके लिये उसे 80 करोड़ रुपयों की जरूरत पड़ेगी।

सरदार सरोवर परियोजना में भूमिहीनों को भी मनचाही 5 एकड़ जमीन मिलने की बात कही गयी थी। विश्व बैंक के दबाव पर यह बात स्वीकार भी की गई। हम भी ऐसा ही चाहते हैं कि हमारी योजना में भी 18 वर्ष के प्रत्येक वयस्क को एक स्वतंत्र परिवार माना जाय। आज से 15 दिन पहले करीब 8000 लोगों को मुआवजा मिला है और जल संसाधन मंत्री का मानना है कि इतने लोगों का पुनर्वास पूरा हो गया। हमारा मानना है कि सिर्फ जमीन का मुआवजा मिल जाना पुर्नवास नहीं होता। इसके लिये भौतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा जीविका आदि सभी पहलुओं पर पहल होनी चाहिए।

कोयल-कारो परियोजना क्षेत्र (राँची) के विजय गुड़िया का मानना था कि यह योजना 70 के दशक से ही हम लोगों के सिर पर टंगी है मगर हमलोग संघर्ष का मन बना चुके हैं और यह योजना हमलोगों के रहते हुए नहीं बन पायेगी। क्योंकि हम यह परियोजना बनने नहीं देंगे अतः पुर्नवास और विस्थापन हमारे लिये कोई मुद्दा है ही नहीं। यह प्रश्न तो वहाँ उठता है जहाँ योजना बनती हो। सरकार ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिये जो तीन अलग-अलग जगहें दिखाई हैं वह रिहाइश के लिये उपयुक्त नहीं है और वहाँ कोई भी जाने के लिये तैयार नहीं है। हम बाँध के खिलाफ कोई लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, हम तो झारखंड के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। हम अपनी संस्कृति और अपनी परम्परा की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे पुरखे इस क्षेत्र में रहते थे, हमारे धार्मिक स्थल यहाँ हैं, हमारा जंगल, हमारी नदी सब कुछ यहाँ है। इसे हम नहीं छोड़ेंगे।

सरकार को चाहिए कि वह बिजली उत्पादन के विकल्पों के बारे में सोचे। 10-20 किलोवाट बिजली तो बड़ी आसानी से नदियों से बिना किसी को उजाड़े पैदा की जा सकती है। फिर गोबर गैस है, पन-चक्की है, हवा से चलने वाली टरबाइनें हैं- सौर ऊर्जा है-उन सबका विकास कीजिये और बनाइये बिजली। कारखानों/शहरों में बिजली की बर्बादी और चोरी रोकिये। पानी के संग्रह की उचित दृष्टि राजनीतिज्ञों में भी नहीं है। सांसद या विधायक कोष का पैसा कहीं भी खर्च हो जाता है मगर पानी पर नहीं। यह सब उन लोगों का काम है, करें मगर हमारी स्थिति स्पष्ट है न तो हम अपना गाँव-घर छोड़कर कहीं जायेंगे और न ही अनधिकृत रूप से अपने इलाके में किसी को घुसने देंगे। आज सुबह विधानसभा के माननीय अध्यक्ष महोदय ने हम सबसे सख्ती से निबटने के बात की थी- हम सभी लोगों को उनकी इस घोषणा से बहुत चोट पहुँची है।

स्वामी अद्वैतानन्द (गुमला) ने कहा कि उनकी सूचना के अनुसार कोयल-कारो परियोजना में 65 गाँव डूबेंगे। कहाँ जायेंगे यह लोग? पुनर्वास और विस्थापन का मामला बड़ा पेचदार होता है। इसमें भोले-भाले लोग तो मारे जाते हैं और तेज तर्रार लोग दूसरों का भी हक खा जाते हैं। 20 साल के बाद सरकार कहती है कि आईआरडीपी योजना विफल हो गई। इतना समझने में 20 साल का समय लगता है क्या? कोयल-कारो योजना की बात 1970 के आस-पास से चल रही है। इस योजना पर कभी हाथ लगेगा या नहीं पता नहीं मगर पूरे क्षेत्र में तभी से विकास का काम बन्द है क्योंकि सरकार कहती है कि यह गाँव डूबने वाले हैं। इस अनिश्चितता की कोई जिम्मेवारी लेगा? गुड़िया जी कहती हैं कि योजना नहीं बनेगी। क्या अजीब स्थिति है। अगर योजना बनेगी तो इलाका डूबेगा और नहीं बनेगी तो 50 साल पीछे जायेगा। इस अनिश्चितता का कोई अंत है?

हमारे इलाके में महिलाओं ने अपने प्रयासों से सिंचाई का प्रबन्ध किया हुआ है- बिना किसी बाहरी मदद के। उधर सरकार 100 करोड़ रुपये जल संसाधन विभाग के कर्मचारियों को तनख्वाह बाँटती है, किसलिये? हमने रसोई के लिये ईंधन गैस को खोज निकाला। नहीं खोजते तो आज भी पूरा देश चूल्हा फूँकता। चूल्हा फूँकने से बड़े लोगों को परेशानी होती थी, उन्होंने विकल्प खोज निकाला। अपने लिये विकल्प खोज सकते हैं तो गरीब के लिये भी कुछ कीजिये। यह काम निष्पक्ष लोग कर सकते हैं।

त्रिलोचन पुँजी (बलांगीर-उड़ीसा) ने पश्चिम उड़ीसा के प्रकल्पों की चर्चा करते हुए कहा कि पश्चिमी उड़ीसा में बाँधों की बुनियादी एक तरह से हीराकुंड बाँध के साथ पड़ी। इस बाँध का एक तो पुनर्वास पूरा नहीं हुआ दूसरे जब अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो अन्य बाँध चर्चा में आने लगे जिसमें तेल नदी और इन्द्रावती आदि नदियों के बाँध मुख्य हैं। सरकार न सिर्फ पुनर्वास से बचना चाहती है बल्कि पुनर्वास की बहस से भी किनारा कर लेना चाहती है। 15-20 साल से विस्थापितों की सुधि लेने वाला हमारे राज्य में कोई नहीं है। रामचन्द्र खान (पटना/दरभंगा) ने पचास के दशक में कोसी परियोजना (उत्तर बिहार-सहरसा, सुपौल, दरभंगा और मधुबनी जिला) के बारे में ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि इस परियोजना में आम आदमी के हितों की रक्षा के लिये विज्ञान ने जो मॉडल खड़ा किया वह निहायत तर्कहीन था। योजना से 300 गाँव, 3,00,000 लोग और तीन लाख एकड़ जमीन के अस्तित्व पर बन आई। मोटा-मोटी यह यही हिसाब तथा उस समय। वैज्ञानिक विकास की सोच पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी। 14 जनवरी 1955 को जिस दिन योजना का शिलान्यास होने वाला था उस दिन कोई 2,000 गांधीवादियों के एक समूह ने भारत सरकार की इस योजना का विरोध किया था। योजनाओं के मानवीय आधार की उन दिनों चर्चा नहीं होती थी। हमारे इलाके में आदिवासी नहीं हैं, गण्डक योजना की तरह थारू भी नहीं है। सबसे विपन्न मुसहर हैं- दलित हैं। वे ही हमारे आदिवासी हैं।

कोसी नदी, जिसको बाँधने का उस दिन षड्यंत्र किया गया था, 100 किलोमीटर क्षेत्र पर 15 धाराओं में बहती थी। इसका विस्तार पूर्णियाँ और सहरसा तथा मधेपुरा में अधिक था। हमारे दरभंगा में केवल एक नदी तिलयुगा थी जोकि कोसी से भिन्न थी। नदी पर तटबंध बनाकर उसकी सारी धाराओं को तटबंधों के बीच समेटने की कोशिश की गई 6 से 10 किलोमीटर के बीच। इस समय तटबंधों के बीच तीन धारायें हैं। अब 100 किलोमीटर में फैलकर बहने वाली नदी को 10 किलोमीटर में समेटेंगे तो क्या होगा इसका उत्तर इंजीनियरों के पास न तब था और न अब है।

कोसी परियोजना के प्रस्ताव में इन 300 गाँवों, 3,00,000 लोग और 30,00,000 एकड़ जमीन के भविष्य पर कोई चर्चा नहीं थी। पुनर्वास केवल पुनर्वास नहीं होता, उसे पूर्णवास होना चाहिए मगर हमारी इस योजना की तो नींव ही धोखा-धड़ी पर रखी गयी थी। पूर्णियाँ, सहरसा में 15 धाराओं में बहने वाली नदी को दरभंगा पहुँचा कर तटबंधों में कैद कर लिया गया। अब तटबंधों के अन्दर फँसी नदी के कटाव तथा बालू जमाव की समस्या है तो बहार जल जमाव है। अन्दर और बाहर वाले दोनों लोग तबाह हैं पहले बाढ़ का पानी 3-4 फीट गहरा होता था अब 15 से 20 फीट गहरा होता है। हमारा गाँव, हमारा घर, हमारे बगीचे, हमारे रास्ते, हमारे मंदिर-मस्जिद सब उजड़ गये। आज सारी जमीन बंजर पड़ी है। घर के बदले घर, जमीन के बदले जमीन, प्रत्येक परिवार से एक सदस्य को योजना में नौकरी-क्या-क्या नहीं कहा गया था उस समय हम से। जो था वह भी चला गया।

विज्ञान और विकास का ऐसा संगठित छल और कहीं नहीं हुआ होगा।

बीजू नेगी (देहरादून) ने अध्यक्ष पद से विस्थापन पुनर्वास की बहस को समेटते हुए कहा कि रिवाज यह है कि बाँध प्रभावितों में केवल डूब क्षेत्र के लोगों को शामिल किया जाय। बाकी प्रभावित होने वाले लोग हमेशा छूट जाते हैं। विस्थापित आमतौर पर गरीब लोग होते हैं जो यूँ भी समाज में हाशिये पर होते हैं। बड़े बाँधों के निर्माण से नुकसान ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। जिनके पास स्थानीय अनुभव है उनका तकनीकी ज्ञान रखने वालों के साथ कोई तालमेल ही नहीं है। उनके बीच वार्तालाप भी नहीं है।

विस्थापन तो बड़ी आसान सी चीज है, किसी को उजाड़ देना तो चुटकी का खेल है मगर पुनर्वास उतना ही मुश्किल होता है। विस्थापन में सरकार केवल संख्यायें गिनती है और कभी-कभी तो वह भी नहीं। विस्थापन पूर्ण होता है- गाँव, घर, नदी, बगीचे, खेत, खलिहान, परिवेश, रोजी-रोजगार सबका और जब पुनर्वास की बात उठती है तो वह भी इसी समग्रता में होना चाहिए।

अंत में दिनेश कुमार मिश्र के इस वक्तव्य के साथ आज के दिन की चर्चा समाप्त हुई कि जहाँ भी लोगों के कल के पुनर्वास पर विश्वास कर लिया उन्हें कुछ भी नहीं मिला मगर जहाँ लोगों ने आज पुनर्वास ले लिया वहाँ योजना ही खटाई में पड़ गई। निर्माणकर्ताओं की नीयत पर इसी से परदा उठ जाता है। कल पर विश्वास करने का नतीजा था कि कोसी के विस्थापित आज तक पुनर्वास की राह देख रहे हैं और आज की बात उठाने पर नर्मदा घाटी में 15 वर्षों से संघर्ष चल रहा है।

दूसरा दिन-8 अगस्त, 2001
पहला सत्र


बाढ़ नियंत्रण और विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट
अध्यक्षता: डॉ. जयन्त बन्द्योपाध्याय (कोलकाता)
संचाल: प्रो. अमरेन्द्र नारायण


बहस की शुरुआत एक बार फिर डॉ. परशुरामन ने की। उन्होंने बताया कि सतही तौर पर तो लगता हैं कि बाढ़ का पानी अगर बाँध बनाकर रोक लिया जाये तो बाढ़ की समस्या हल हो जायेगी। मिश्र के आसवान बाँध में ऐसा कर भी दिखाया है। मगर बाढ़ एकदम खत्म कर देने से निचले इलाकों की जमीन भी उर्वरा शक्ति पर बुरा असर पड़ा है। बाकी जो सूचनायें मिली हैं उनके अनुसार बड़ी बाढ़ों के परिणाम में बाँधों ने निश्चित रूप से कमी की है और निचले इलाकों की बाढ़ को घटाया है।

उन इलाकों में जहाँ बाढ़ बार-बार आती है वहाँ जरूर जलाशय खाली न रहने के कारण बाद वाली बाढ़ों का बुरा असर पड़ा है क्योंकि बाद की बाढ़ों का सारा का सारा पानी बाँध से होकर बहा देना पड़ता है। भारत जैसे देश में जहाँ बरसात का मौसम होता है वहाँ यह देखने में आया कि बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में बाँधों की भूमिका पर उंगलियाँ उठी हैं। बाढ़ नियंत्रण के लिये जलाशय में पानी रख पाने की क्षमता हमेशा बची हुई होनी चाहिए जबकि सिंचाई/विद्युत उत्पादन के लिये जलाशय का यथासंभव भरे रहना जरूरी है। इन दोनों मार्गों में अन्तर्विरोध है और बाजी सिंचाई/बिजली उत्पादन के हाथ में रहती है।

दामोदर घाटी निगम के बाँधों तथा तेनूघाट का उदाहरण बाढ़ नियंत्रण के पूरी तरह पक्ष में नहीं जाता। इसके अलावा जहाँ भी बाँधों में बाढ़ नियंत्रण की व्यवस्था रहती है वहाँ निचले इलाकों में रहने वाले लोग बाढ़ से सुरक्षा के प्रति आश्वस्त रहते हैं और अगर कभी जल ग्रहण क्षेत्र में भारी बारिश के कारण बेहतर बाढ़ आ गई और फाटक खोल देने पड़ें तो बाढ़ से नुकसान पहले से कहीं ज्यादा होता है। वियेन्तिएन (लोआस) और पोलैण्ड के बाँधों से ऐसी दुर्घटनायें हाल के कुछ वर्षों में हुई हैं। हीराकुंड का नाम भी इस सन्दर्भ में लिया जाता है। जापान में आश्चर्यजनक रूप से बाँधों ने जरूर बाढ़ को रोका है।

तटबंधों पर विशेष चर्चा इस रिपोर्ट में नहीं है मगर वियतनाम और चीन में नदियों पर बने तटबंधों का प्रभाव कुछ अच्छा नहीं रहा है।

डॉ. जयन्त बन्द्योपाध्याय ने कहा कि बाढ़ नियंत्रण शब्द ही भ्रामक है। बाढ़ों का नियंत्रण सम्भव नहीं है, उसका प्रबंधन करना चाहिए। जब वर्षा पर कोई नियंत्रण नहीं हो सकता तो बाढ़ पर नियंत्रण कैसे होगा? डॉ. त्रिजुगी प्रसाद ने इसका विरोध किया और कहा कि बाढ़ों को हम जितना ज्यादा संचित कर सकेंगे, निचले क्षेत्रों में बाढ़ का प्रभाव उतना ही कम होगा। यह शाश्वत सत्य है। बाँध निश्चित रूप से बाढ़ को कम करते हैं और निचले इलाके में पानी के फैलाव को रोकते हैं।

हिमांशु ठक्कर ने इस पर आपत्ति की और कहा कि बाढ़ केवल खतरा ही नहीं है। गाँवों में किसानों से जाकर पूछिये तो वह कहेंगे कि उन्हें बाढ़ चाहिए। ऐसे भी किस्से हैं कि बाँधों ने बाढ़ को बढ़ाया है। पश्चिम बंगाल (1978), उड़ीसा (1981-2001), बांदा उत्तर प्रदेश (1992) में बाढ़ बाँधों की वजह से आई थी। कैचमेन्ट एरिया का प्रबंधन हमारे इंजीनियर सोच ही नहीं पाते हैं। मधुबनी (बिहार) में तालाबों/चौरों के कारण बाढ़ों का कितना विस्तार कम होता था, उस पर कभी कोई बात नहीं करता। बस बाँध चाहिए। आज वह पूरा इलाका डूबता है। कैचमेन्ट के जंगल साफ हो गये। बाढ़ का कारण और चरित्र होता है यह हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

विजय कुमार (मधुबनी) का कहना था कि उत्तर बिहार में बहुत से तटबन्ध बने। सरकार कहती है कि उसने इतना-इतना इलाका बाढ़ से मुक्त कर दिया है। हम लोगों की मांग थी कि जब आपने मुक्त कर ही दिया है तो बाढ़ मुक्त क्षेत्रों का नक्शा भी छपवा दीजिये ताकि सबको पता लग जाय कि बिहार का कौन-कौन सा इलाका बाढ़ से मुक्त हो गया है। सरकार यह खतरा नहीं लेती है।

डॉ. निर्मल सेनगुप्त ने बहस को मोड़ा और कहा कि बाढ़ नियंत्रण के हमारे देश में तीन सामान्य तरीके हैं, बाँध बनाना, तटबन्ध बनाना और कुछ न कर के बाढ़ों को बर्दाश्त कर लेना। व्यावहारिक रूप से बाढ़ रोकने के लिये बाँध बनते नहीं है। वह बनते हैं बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिये क्योंकि उसमें पैसा है। बाढ़ नियंत्रण जन कल्याण का विषय है जिसमें राजस्व वसूल नहीं किया जा सकता, बस जैसे-तैसे बाढ़ नियंत्रण का नाम बाँधों के साथ जोड़ दिया जाता है जिससे योजना का ग्लैमर बढ़ जाये। बाँधों में जो भी बाढ़ रोकने की क्षमता होती है वह जल्दी ही गाद भरने के कारण समाप्त हो जाती है और तब बाँध खुद बाढ़ का कारण बन जाते हैं। तटबंधों के कारण गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटी में क्या हुआ है उसके बारे में तो कई लोगों ने यहाँ बताया। अब तीसरा विकल्प है कि बाढ़ रोकने के लिये कुछ न कुछ किया जाय और उनके साथ जीवन निर्वाह किया जाय। कुछ लोगों के अनुसार यह एक बेहतर विकल्प है। इन परिस्थितियों में विकास कैसे हो- यही रास्ता हम लोगों को तलाश करना है। मिश्र जी ने तीसरे विकल्प पर अच्छा काम किया है वह कुछ बताएँगे।

दिनेश कुमार मिश्र ने बाढ़ों का ऐतिहासिक सन्दर्भ बताते हुए कहा कि बाढ़ का पानी केवल पानी नहीं होता, वरन उसके साथ अच्छी खासी मात्रा में सिल्ट भी आती है। यह गंदला पानी जब पूरे इलाके पर फैलता है तो लोगों को कुछ समय के लिये तकलीफ जरूर होती है मगर जमीन ताजी हो जाती है और उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है पहले लोग खुद पहाड़ी इलाकों में रहते थे और वहीं खेती करते थे। धीरे-धीरे उनकी खेती मैदानों में फैली मगर रिहाइश पहाड़ों पर ही थी। अन्त में उनका घर बार भी मैदान में नदी के किनारे आ गया। यहाँ तीन महीने की बारिश और बाढ़ की तकलीफ के बदले उन्हें साल भर धन-धान्य और मौज मस्ती मिलती थी। उन्होंने खेती का विस्तार किया और अपने भोग के लिये जंगल काटे। लकड़ी उन्हें गृह-निर्माण, बर्तन बनाने, ईंधन और नाँव बनाने के लिये जरूरी थी। इस तरह पानी के रास्ते की रुकावटें खत्म हो गईं और बाढ़ आने लगी। तब तक आदमी यह भूल गया कि नदी और उसके प्रवाह क्षेत्र में वह खुद गया था, नदी उसके इलाके में नहीं गई। यहीं से बाढ़ नियंत्रण की बनियाद पड़ी होगी।

फिर भी हमारे पुरखों ने अपने अनुभव के आधार पर बाढ़ को रोका नहीं। नदी के पानी को पूरे इलाके पर फैलने दिया। इसके दो फायदे थे- एक, जमीन की उर्वराशक्ति बनी रहती थी और दो, व्यापक क्षेत्र पर बाढ़ का पानी फैलने के कारण बाढ़ की गहराई कम होती थी। बाढ़ मारक नहीं बनती थी। इन बाढ़ों के अनुरूप उन्होंने अपनी जीवनशैली को ढाला हुआ था। उनका फसल चक्र, घर-द्वार की डिजाइन, तीज-त्योहार आदि सभी बाढ़ के चक्र से संचालित था। विदुर ने महाभारत में कहा है कि आदमी को दिन में वह सारे काम कर लेने चाहिए जिससे वह रात में सुख से सो सके और वर्ष के आठ महीनों में वह सारी तैयारी कर लेनी चाहिए ताकि वर्षा के चार महीनों में सुख से रहा जा सके। चाणक्य ने बाढ़ का मुकाबला करने के लिये ‘अर्थशास्त्र’ में नाव और बांस का नाम सुझाया था जो कि आज भी प्रासंगिक है।

आजकल हमारी स्वयं सेवी संस्थाएं खूब डिजास्टर प्रिपेयर्डनेस की बातें करती हैं, सरकार भी यही करती है मगर कोई भी आम आदमी से सीखने को तैयार नहीं है कि वह किस तरह से सदियों से बाढ़ क्षेत्रों में बिना किसी बाहरी मदद के आराम से रहता आया है। बाढ़ अगर समस्या होती तो देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले क्षेत्र राजस्थान और रायलसीमा जैसी जगहों में होते।

बाढ़ की तकनीकी परिभाषा में कहीं न कहीं यह कहा जाता है कि जब वर्षा के पानी से आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी पर बुरा असर पड़ जाए तो उसे बाढ़ की स्थिति कहते हैं। रोजमर्रा की जिन्दगी पर बाढ़ों का असर न पड़े या कम से कम पड़े ऐसे उपायों को अमल में लाना ही बाढ़ों के साथ जीवन निर्वाह की तैयारी है। उत्तर पूर्व राज्यों के बाढ़ क्षेत्र के घरों की डिजायन को देखिये। वह बांस या लकड़ी के खम्भों पर बने होते हैं। छोटी-मोटी बाढ़ें घरों के नीचे से निकल जाती हैं। लोग बड़े आराम से अपने घरों में रहते हैं जबकि घर के नीचे से ब्रह्मपुत्र जैसा नद बहता है। केले के खम्भों को जोड़कर संडास का प्लेटफॉर्म बना लिया जाता है, बोरे की दीवारें और प्लेटफॉर्म में 5-6 इंच व्यास का छेद बनाकर इस संरचना को घर के साथ रस्सी से बाँध दिया जाता है। बाढ़ का पानी ऊपर चढ़े तो संडास भी उसके साथ तैरता हुआ ऊपर आता है। घरों के दीवारें भी बांस की चटाई और उस पर मिट्टी के पलस्तर की बनी हुई होती है। बाढ़ के बाद थोड़ी सी मरम्मत और घर वापस अपने ढर्रे पर।

नाव से यातायात/बाजार सब कायम रहता है। कुछ दिनों पहले तक सुन्दरवन के इलाके में नावों की माध्यम से बैंक और पोस्टऑफिस की सुविधा उपलब्ध थी। बाढ़ वाले क्षेत्रों में स्कूल कॉलेज बरसात में बन्द रखे जा सकते हैं। फसलें बाढ़ों के चक्र के अनुरूप रखी जा सकती हैं।

बांग्लादेश में अपने ही देश की तरह एक ही मौसम में कई बार बाढ़ आती है और धान के पौधे नष्ट हो जाते हैं। वहाँ लोग तैरती पट्टियों पर धान के पौधे उगा कर रखते हैं। बाढ़ आने पर यह पट्टी पानी पर तैरने लगती है और बाढ़ उतरने पर इन पौधों का इस्तेमाल उन जगहों पर नई रोपनी के लिये किया जा सकता है जहाँ फसल नष्ट हो जाती है।

इसी तरह पीने के पानी की व्यवस्था का प्रश्न है। बाढ़ के समय वर्षा भी बनी रहती है जिसका पानी एक दम शुद्ध होता है। इस पानी को अगर इक्ट्ठा कर लिया जाय तो पानी से होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है।

बारिश के साथ खेती का बड़ा समृद्ध अनुभव बर्द्धमान जिले में विलियम विलकाक्स ने लिखा है। इस पर कभी बाद में चर्चा करेंगे। मिथिला के प्रायः हर गाँव मे प्राकृतिक स्रोतों से सिंचाई की अपनी व्यवस्था थी। वह सब खत्म हो गई और किसी को भी यह फुर्सत नहीं है कि बड़ी योजनाओं के चलते हमने क्या-क्या खोया, उसकी जानकारी हासिल करें। सत्तू और चूड़ा जैसी तैयार खाद्य सामग्री बाढ़ क्षेत्रों में क्यों प्रचलित है इस पर भी किसी का ध्यान नहीं जाता। इन क्षेत्रों के लोग आचार बनाने और सब्जियों को सूखा कर रखने में माहिर हैं। यह भी अकारण नहीं है। इन सब चीजों की बरसात में जरूरत पड़ती है। इंजीनियरों को तो केवल बाँध और तटबंध दिखाई पड़ते हैं।

किसी भी संरचनात्मक समाधान की एक सीमा है फिर चाहे वह बाँध हो या तटबंध। रिंग बाँध हो या नदी की उधाढ़ी करना या फिर गाँवों को ऊँचा करना। एक स्थान पर जाकर टेक्नोलॉजी ठहर जाती है ओर इन सारे समाधानों के साथ एक कीमत की पूर्जी लगी होती है जो कि लाभुकों (?) को कभी दिखाई नहीं जाती। मगर समाज उसकी कीमत चुकाता जरूर है आज नहीं तो कल और यहाँ नहीं तो वहाँ। एक मंजिल ऐसी जरूर है जहाँ इंजीनियरों की भूमिका समाप्त हो जाती है और समाज की भूमिका शुरू होती है। समाज को अपनी भूमिका समझनी चाहिए और उसको संभालने की उसकी तैयारी होनी चाहिये।

सुश्री जया मित्रा (आसनसोल-कलकत्ता) ने बताया कि 1978 और 2000 में पश्चिम बंगाल में भयंकर बाढ़ें आई थीं। बाढ़ तो 1975 में भी आई थी मगर उसका प्रभाव उतना भयंकर नहीं था। 2000 में जो बाढ़ आई वह 1975 की बाढ़ से अधिक थी जबकि वर्षापात उतना नहीं था। इस बार बाढ़ की गहराई और उसका समय पहले से ज्यादा था। 1978 में बाढ़ से बचाव के लिये बनाये गये स्कूल आदि भी उतने कारगर नहीं रह पाये।

मालदा सहित बहुत से बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोग बाढ़ चाहते हैं क्योंकि उनका कहना है कि जमीन बाढ़ के बाद इतनी उपजाऊ हो जाती है कि एक कट्ठा जमीन से दो मन अनाज मिल जाता है वह भी बिना मेहनत के।हम बाढ़ रोकने के लिये जितना काम करते जा रहे हैं उसी के साथ-साथ बाढ़ का परिणाम आर क्षेत्र दोनों बढ़ते जा रहे हैं। ईच्छामती नदी का कोई तल ही नहीं है। यही हाल दामोदर मयूराक्षी, अजय और गंगा नदियों का हो रहा है। सब का स्वरूप सपाट। सिल्ट की वजह से सबके मुहाने बंद हैं, नदी में थोड़ा भी पानी आयेगा तो वह छलकने को मजबूर होगा। नतीजा यह है कि अब नदी ऊपर है और गाँव नीचे। परिणामतः निचले इलाकों में साल में 7-8 महीनें पानी रहता है। हावड़ा और हुगली के कितने ही इलाके हैं जहाँ पानी सूखता ही नहीं है। बहुत सारी जमीन कहीं बंजर पड़ी है तो कहीं तालाब बन गई है।

कैचमेन्ट एरिया के प्रबन्धन के लिये हमें कुछ करना चाहिए इसके पहले कि पानी सिर से गुजरने लगे।

रामचन्द्र खान (पटना-दरभंगा) ने कहा कि बाढ़ वास्तव में अतिरिक्त जल है। हमारी पृथ्वी पर जल के अनेक स्रोत हैं। दिखाई पड़ने वाले स्रोतों में यह शृंखला तालाबों से लेकर समुद्र तक फैली हुई है। वर्षा के मौसम में अतिरिक्त जल की मात्रा नदी के किनारों को तोड़ फैलती है तो वह बाढ़ का एक स्वरूप बनती है। सूर्य पृथ्वी से पानी ग्रहण करके बादल बनाता है जिससे बारिश होती है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को आदान और प्रदान कहते हैं। इसी क्रम में नदी का निर्माण होता है जिसका मूल कार्य है बाढ़ के पानी को समुद्र तक पहुँचाना। पहाड़ और जंगल वर्षा के पानी को नदी तक पहुँचने के रास्ते की रुकावट बनते हैं और बाढ़ को कम करते हैं।

इस तरह सूर्य, समुद्र, पहाड़, जंगल, नदी और तालाब आदि सब के सब कहीं न कहीं बाढ़ से संबंधित हैं। इन सभी को हम बाढ़ नियंत्रण का कारक मानते हैं। यहीं से जनता का विज्ञान पनपता है। धर्म विज्ञान का सबसे बड़ा स्रोत है। भारत ने विज्ञान की बात सबसे पहले की थी मगर विज्ञान ने विषमता को जन्म दिया। विज्ञान के पास सब कुछ है मगर मानव कल्याण के मसले पर वह मौन है। हमें नदियों को बचाना है। गतिशीलता ही उनका धर्म है। बाँध गतिशीलता को नष्ट करते हैं। हमें नदियों और बाढ़ के प्रति अपनी समझ को पक्का करना होगा।

रवि कुमार त्रिपाठी (पुरी) ने एक बार फिर तटबंधों की बात छेड़ी। उन्होंने कहा कि पुरी जिले में समुद्र का किनारा होने के कारण बहुत सी नदियाँ समुद्र में जाकर मिलती है। यह सारी नदियाँ कभी मुक्त हुआ करती थीं। बचपन की स्मृतियों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि किस प्रकार वह नाव में बैठ कर बाढ़ के समय अपने घर वालों के साथ सैर को निकला करते थे। बाँध आना एक चिर-प्रतीक्षित सुयोग के रूप में गिना जाता है। धीरे-धीरे इन सभी नदियों पर तटबंध बने। छोटी-छोटी सहायक धाराओं के मुँह बंद हो गये। बाहर का पानी अब नदी में नही जा पाता था और नदी के तटबंधों के बाहर का पूरा इलाका जलमग्न हो गया। उपजाऊ जमीन बर्बाद हो गई।

समुद्र से तीस किलोमीटर अन्दर तक नदी पर तटबंध बन गये। पहले बाढ़ धीरे-धीरे आती थी, उसकी गहराई कम होती थी और वह जल्दी ही चली जाती थी। अब सब कुछ उलट गया है। बाढ़ तटबंधों को तोड़कर दैत्य की तरह आती है और सब कुछ बहाकर ले जाती है। हमारी सारी मछलियाँ नष्ट हो गईं, कृषि पद्धति नष्ट हो गई और पेड़ पौधे नष्ट हो गये। हम चाहते हैं कि कम से कम तटवर्ती क्षेत्रों में नदियों पर जो तटबंध बने हैं उन्हें ध्वंस कर दिया जाय। हमारा परिवेश उसी परिस्थति में हमें वापस मिल सकता है।

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से आये तपन साहा ने बताया कि वह महानन्दा नदी के किनारे के रहने वाले हैं और नदी से नहीं मगर उसके तटबंधों से तबाही झेल रहे हैं। दिनेश कुमार मिश्र लिखित ‘बन्दिनी महानन्दा’ पुस्तक के हवाले से उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में महानन्दा के बिहार वाले हिस्से के बारे में बहुत कुछ लिखा है मगर पश्चिम बंगाल के बारे में सूचना नगण्य है। फिर भी समस्याओं का जो विश्लेषण इस पुस्तक में बिहार के संदर्भ में किया गया है, उससे पश्चिम बंगाल की परिस्थिति कतई भिन्न नहीं है। बंगाल में भी हर वर्ष करोड़ों रुपया राहत कार्यों पर खर्च होता है। यही स्थिति दामोदर, अजय और रुपनारायण के क्षेत्रों की भी है।

फरक्का में जितना पानी रोका जाता है उससे गंगा की तमाम सहायक धाराओं का पानी ठहर जाता है और उन नदियों में बाढ़ आ जाती है और लम्बे समय तक बनी रहती है। हम आप सभी से आग्रह करते हैं कि आइये। मिल कर कुछ किया जाय। उनकी यह भी शिकायत थी कि विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल की समस्या का कोई खास जिक्र नहीं है।

मेघनाथ (राँची) ने कहा कि पिछली सदी तक जितनी लड़ाइयाँ हुई उनकी जड़ में अधिकांश जमीन के झगड़े थे मगर इस सदी में अगर युद्ध होगा तो उसकी जड़ में पानी होगा। अब गाँवों में दो अलग-अलग ग्रुप साफ दिखाई देते हैं। एक वह जिनके पास पानी है और दूसरे वे लोग जिनके पास यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। देश के विभिन्न राज्यों के बीच पानी को लेकर विवाद है। नेपाल-भारत, बांग्लादेश-भारत के बीच पानी के सवाल को लेकर मतान्तर है। नदियाँ तो 100 करोड़ वर्षों से बह रही थीं और आने वाले 100 करोड़ वर्षों में भी वैसे ही बहती मगर इनके बाँध देने का अधिकार कुछ लोगों को कैसे मिल गया? डा. परशुरामन ने कल बताया कि अमेरिका में अनावश्यक बाँध तोड़े जा रहे हैं, और तटबंधों का भी यही हाल होने वाला है।

गेहूँ की फसल सिर्फ गेहूँ नहीं है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि उसे उपजा कौन रहा है। दूसरा प्रश्न सिंचाई का है। दो अलग-अलग क्षेत्रों में सिंचाई की पद्धति, उसका परिमाण और उसकी जरूरत अलग-अलग है। किसी तकनीक में कितनी मानवता है यह प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है। अपने मित्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसने अपने खेती 3-4 एकड़ में शुरू की जबकि उसे बोरिंग लगाने का सुझाव दिया गया। उसने बोरिंग लगाने से साफ मना कर दिया यह कह कर कि दूसरे का पानी चुराने का उसे क्या हक है? तकनीक के विकास और मानवीय संवेदनाओं में यही अन्तर है। तकनीक ने तो अपना विकल्प जरूर दे दिया मगर उसका मानवीय मूल्य क्या है?

सुश्री बिदिशा मल्लिक, डॉ. जयन्त बन्द्योपाध्याय तथा सुश्री पुष्पा मार्टिन के अलग-अलग प्रश्न दिनेश कुमार मिश्र के लिये इस स्तर पर किये गये। बिदिशा का कहना था कि जब हम इस क्षेत्र के जल संसाधनों के विकास या बाढ़ की बात करते हैं तो नेपाल को शामिल किये बिना कोई भी चर्चा अधूरी रह जाती है। उनका मानना था कि इस विषय पर उन्हें कुछ कहना चाहिए था। डॉ. जयन्त बन्धोपाध्याय ने भी शिकायत की कि जल जमाव पर और उसके निदान पर जितनी बात होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। सुश्री पुष्पा मार्टिन का पूछना था कि इसी तरह की एक गोष्ठी अप्रैल में पटना में हुई थी, उसके बाद क्या कार्यक्रम हुये?

जवाब में दिनेश कुमार मिश्र ने बताया कि जल संसाधनों के विकास का अन्तरराष्ट्रीय पक्ष बड़ा प्रबल है। इसमें भारत-नेपाल और भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय सम्बन्ध हैं। अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भूमिका है। भारत और नेपाल सरकार तथा इन दोनों देशों की जनता का पक्ष है। समयाभाव में हम इन विषयों पर आज चर्चा नहीं कर पायेंगे। डॉ. जयन्त बन्द्योपाध्याय के प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि जल-जमाव और लवणीयता बहुत पुरानी परेशानियाँ हैं। मिथिला की पूरी जमीन आदिकाल में दलदल थी और रेह की शक्ल में दिखने वाली लवणीयता को भीष्म ने महाभारत में पृथ्वी का ज्वर कहा है। मगर आज हमारे खेतों में जो जल जमाव है उसके पीछे तटबन्धों, नहरों, सड़कों तथा रेलवे लाइनों के निर्माण के अवैज्ञानिक तरीके हैं। जंगलों की कटाई से भूमि का कटाव हुआ है। उससे गाद का जमाव बढ़ता है और पानी के रास्ते में रुकावटें आती हैं। राजनैतिक रूप से सिंचाई की व्यवस्था करना नेताओं के लिये ज्यादा फायदेमंद होता है। जल-निकासी के काम में कहीं न कहीं अपनी गलतियों को स्वीकार करना पड़ता है और उसमें जय-जयकार भी उतनी नहीं मिलती। इसलिये जल जमाव का काम हमेशा पिछड़ता है। यह आज की बात नहीं है। 1873 में एक अंग्रेज इंजीनियर रॉबर्ट ग्रीन केनेडी ने शोध करके बताया कि हेडवर्क से जितना पानी नहर में छोड़ा जाता है उसका मात्र 28 प्रतिशत खेतों तक पहुँचता है और बाकी रास्ते में रह जाता है, भूमिगत जल की सतह को ऊँचा करता है और जल जमाव बढाता है। उनका मानना था कि अगर सरकार सिंचाई करने का श्रेय लेती है और उसके लिये कैनाल रेट वसूल करती है तो उसे जल-जमाव की भी जिम्मेवारी लेनी चाहिए और उसे हटाने का खर्च वहन करन चाहिए। यह सच उजागर करने के इल्जाम में केनेडी का तबादला अफगानिस्तान के युद्ध क्षेत्र में कर दिया गया जहाँ उसे 18 साल रहना पड़ा। जल-जमाव का सर्च कोई कहना नहीं चाहता। यह मसला कभी भी आन्दोलन के बिना हल नहीं होगा। सुश्री पुष्पा मार्टिन के सवाल पर उन्होंने कहा कि हमारा लोक शिक्षा का काम लगातार चल रहा है। इस बीच में बाढ़ मुक्ति अभियान की कई गोष्ठियों में भाग लिया है, लेख लिखे हैं, जन सम्पर्क किया है तथा बिहार के जल-संसाधान सचिव तथा राज्यपाल से मिल कर अपना पक्ष रखा है। हमलोग अपने प्रयासों में लगे हुए हैं।

घनश्याम (मधुपुर-देवधर) ने बताया कि बाढ़ अब झारखण्ड में भी सिर उठाने लगी है। मयूराक्षी बाँध की वजह से अब दुमका तबाह है। पिछले साल 19 लोग मारे गये और डेढ़ महीने तक बाढ़ टिकी रही। अब हमें नई-नई चीजों का विकल्प ढूँढना पड़ेगा।

भय और आतंक से उपजा विज्ञान मानव हित की बात नहीं कर सकता। समाज वर्गों में विभाजित है ओर जिसके पास सत्ता है, विज्ञान उनके हितों के लिये काम करता है। आज गरीबों के विज्ञान को मान्यता देने की जरूरत है। उनका विज्ञान एकदम सहज और सरल है। आप किसी किसान से बात करेंगे तो वह हमेशा कहेगा कि वह खेती-बाड़ी करता है। उसकी खेती अलग है और बाड़ी, जहाँ कि वह अपनी सब्जियाँ और फल उगाता है वह अलग है। उसकी सारे जरूरतें पूरी होती हैं और वह खाली हाथ तो कभी नहीं रहता। यह सब व्यवस्था प्रकृति के साथ चलने की है। इसलिये हमें नदी के साथ जीन होगा और उसे अविरल बहने देना होगा। पहले लोगों से सीखना होगा और उसी के अनुरूप विज्ञान को विकसित करना होगा।

डॉ. जयन्त बन्द्योपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि इस सत्र में जितनी भी प्रस्तुतियाँ हुई उनका सार यही है कि समाज विज्ञान के दुरुपयोग से त्रस्त और तकनीक से पस्त है। हमारे सामने विज्ञान की दो धारायें हैं एक सत्ता पक्ष का विज्ञान तथा दूसरा लोकपक्ष का विज्ञान। सत्ता पक्ष का विज्ञान अपने तरीके से काम कर ही रहा है। जरूरत है लोक विज्ञान को आगे बढ़ाने की। विश्व बाँध आयोग भी शायद यही चाहता है कि विज्ञान को सीमित क्षेत्र से निकाल कर विस्तृत क्षेत्र में ले आया जाय।

द्वितीय सत्र


विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट और मानवाधिकार
अध्यक्षता: सुश्री जया मित्रा
संचालन: विजय कुमार


बहस की शुरुआत एक बार फिर डॉ. परशुरामन ने की। उन्होंने बताया कि विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट में मानवाधिकारों पर विस्तार से चर्चा है। कल हिमांशु ठक्कर ने योजनाओं में बराबरी, दक्षता, भागीदारी, टिकाऊपन तथा जवाबदेही की बात कही थी। यह सारी अपेक्षायें इस रिपोर्ट के केन्द्र बिन्दु में हैं। इन मान्यताओं का समीकरण संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार घोषणा पत्र (1948) से सही बैठता है। बाँधों पर होने वाली किसी भी बहस में यह अधिकार बुनियादी का काम करते हैं।

जीविका और मानवाधिकार के दो स्वरूप होते हैं। जहाँ तक खतरा उठाने की बात है तो वह एक ओर तो स्वैच्छिक होता है, जैसे मान लीजिए एनरॉन की बात करें। इस योजना में भारत सरकार ने उसको काउन्टर गारन्टी दे रखी है और इसलिये एनरॉन उस गारन्टी से सुरक्षित है। एनरॉन को पहले से पता है कि वह अपने प्रयास में कितना खतरा उठा रहा है और उसे कितनी सुरक्षा प्राप्त है। दूसरी ओर वह लोग हैं जिन पर खतरा थोप दिया जाता है और उन्हें जानकारी ही नहीं होती कि भविष्य में उनके साथ क्या होने वाला है। ऐसे लोग अनिच्छा से खतरा उठाते है। अधिकांश विस्थापित होने वाले लोग इसी श्रेणी में आते हैं। पर्यावरण भी इसी कोटि में आता है। कोई भी योजना बनने के बाद पर्यावरण पर जो खतरा आता है वह भी अनिच्छा से ही झेलना पड़ता है।

योजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों की जीविका पर जो प्रश्न चिन्ह लगता है उसकी योजना के प्रारूप में कोई सुधि नहीं ली जाती। लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। एनरॉन से यह जरूर पूछा जाता है कि उसे क्या-क्या सुरक्षा चाहिए मगर एक गरीब आदमी पर यह सब मेहरबानी नहीं होती। हमारे भारतीय संविधान में आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिये बड़े स्पष्ट प्रावधान हैं कि उसे दूसरे उपयोगों में नहीं लाया जा सकता। इसी तरह ग्रामसभा को अधिकार मिले हैं। भाषा और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार है। पर्यावरण की सुरक्षा का अधिकार है। फॉरेस्ट एक्ट है जिसके अनुसार अगर जंगल की कोई जमीन हासिल की जाती है तो उसके लिये राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की सहमति जरूरी है। सूचना का अधिकार कुछ राज्यों में हैं मगर बाकी जगह यह अधिकार मिलना चाहिए।

हमें इस बात की पूरी जानकारी होनी चाहिए कि हमारे अधिकार क्या-क्या हैं। विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रभावित होने वाले लोगों के विचार विमर्श के बिना कोई भी योजना नहीं बननी चाहिए। हम अपने अधिकारों को पहचानें और योजनाओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। इन जानकारियों को आम आदमी तक उसी की भाषा में पहुँचायें।

विजय कुमार का यहाँ प्रश्न था कि भारत सरकार तथा नेपाल सरकार दोनों ने ही इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। ऐसी परिस्थिति में समता, दक्षता, जवाबदेही आदि जैसे दिशा देने वाले सिद्धांतों का क्या होगा। हमारी सरकारें तो इन दिशा निर्देशों को खतरनाक मानती हैं। जाहिर है कि इन लोगों ने किसी भी कीमत पर बाँध बना डालने के अपने मंसूबे साफ कर दिये हैं। ऐसे में लोग क्या करेंगे?

डॉ. परशुरामन का उत्तर था कि नकारात्मक रूप से बाँध से विस्थापित लोग अक्सर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। एक ओर तो यह उजाड़े जाते हैं तो दूसरी तरफ बाँध से होने वाले किसी तरह के लाभ से भी इन्हें वंचित रखा जाता है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इसी समूह को बाँध से होने वाले किसी भी फायदे का पहला हकदार होना चाहिए। चाहे यह लाभ बिजली का हो या सिंचाई का। यह सुनिश्चित करना इस समाज का काम है कि इस तरह की योजना का पहला फायदा इन विस्थापितों को मिले।

बाँध अपने आप में कोई बड़ी समस्या नहीं है। समस्या है देश की नीतियों का सही रूप से क्रियान्वयन नहीं हो पाना। इसी की वजह से न हमें बराबरी का फायदा मिलता है और न हम भागीदारी कर पाते हैं। इसी की वजह से योजनाओं का लाभ निचले स्तर तक उतर ही नहीं पाता। अफ्रीका में बाँध बनने के बाद नीचे की जमीन पर महिलाओं ने कब्जा करके अपने अधिकार को जताया और बहुत सी विषमताओं को दूर करने का प्रयास किया। हमने इस सारी चीजों का अध्ययन करके अपने देश में उन तौर-तरीकों को खोजने पर बल दिया है जिससे प्रभावितों को भागीदारी मिले और उनकी समस्यायें कम हो सकें।

दक्षिण अफ्रीका में बाँधों से होने वाले सारे फायदे वहाँ के गोरे लोगों को जाते थे। अब यह फायदे वहाँ के मूल निवासियों को भी मिलने लगे हैं। इन सारे अनुभवों से हमें सीख लेनी पड़ेगी और अपनी मिसाल कायम करनी पड़ेगी।

डॉ. परशुरामन के इस स्पष्टीकरण पर दो प्रश्न फिर उभरे। एक, विजय कुमार ने समता के प्रश्न पर और आगे स्पष्टीकरण मांगा कि अगर सरकार बराबरी की बात को नकारती है तब हमारा हस्तक्षेप क्या होगा और दूसरा प्रश्न भुवनेश्वर सिंह (सीवान) का था जिसमें उन्होंने पूछा कि विस्थापितों के बारे में तो काफी बातें हुई मगर जो लाभान्वित होते-होते योजना के शिकार हो गये उनके बारे में रिपोर्ट क्या कहती है। जल-जमाव इसका एक अनोखा उदाहरण है। शुरू-शुरू में तो खेतों को सिंचाई मिली मगर बाद में खेत पानी में डूब गये। ऐसे किसानों को परंपरागत या कानूनन कोई सुरक्षा नहीं मिलती है।

डॉ. परशुरामन का जवाब था कि बराबरी के प्रश्न पर स्थानीय लोक संगठनों का दबाव बनाने से प्रभावितों के साथ वादा खिलाफी किसी के लिये आसान नहीं होगी। योजना के क्रियान्वयन के बाद में नकारात्मक रूप से प्रभावित होने वाले लोगों के बारे में रिपोर्ट कहती है कि अगर सरकार अब किसी नये प्रकल्प को हाथ में लेती है तो उससे कहा जाय कि आपने जो पहले पूरी की गई योजनाओं से समस्याएँ पैदा की हैं उन्हें दुरुस्त कीजिये तब किसी नई योजना में हाथ लगाइये। इस रिपोर्ट को हम एक विश्व कानून की तरह इस्तेमाल करने पर दबाव डाल सकते हैं; यह दबाव उन वित्तीय संस्थाओं पर भी डाला जा सकता है जो नई योजनाओं में पैसा लगाने का मन बनाती हैं।

अध्यक्षा सुश्री जया मित्रा ने बहस को समेटते हुए कहा कि समय कम रहने के कारण चर्चा अधूरी रह जायेगी यद्यपि हम जीविका पर खतरों तथा विभिन्न प्रकार की सुरक्षाओं पर कुछ समझ बना सके हैं। विस्थापितों की समस्या वाकई बहुत गंभीर है। निचले इलाकों के मछुआरों की जीविका पर तो खतरे साफ तौर पर आये हैं - उन पर अगर विशिष्ट रूप से चर्चा हुई होती तो अच्छा था। सुबह मेरी कोयल कारो क्षेत्र की एक कर्मी से बात हो रही थी। उनका कहना था कि योजना क्षेत्र में आठ लोग गोली के शिकार हुये हैं मगर उनका मनोबल नहीं टूटा है। सरकारी हिंसा से किस तरह निबटा जाय पर इस पर भी हमें कभी सोचना चाहिए।

तीसरा सत्र


विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट पर स्थानीय चर्चा द्वारा भावी कार्यक्रम
अध्यक्षता: रामेश्वर सिंह (हजारीबाग)
संचालन: कामेश्वर लाल ‘इन्दु’ (पश्चिमी चम्पारण)


इस सत्र में आगन्तुक प्रतिनिधि चार समूहों में बंट गये और भावी कार्यक्रम के बारे में अलग-अलग चर्चा की। उनके जो प्रस्ताव आये उनका सार निम्नलिखित है।

1. विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट को स्थानीय स्तर पर प्रचारित/प्रसारित किया जाय और कम से कम जिला स्तर की गोष्ठियां आयेाजित की जायें।

2. बाँधों के मुद्दे को लेकर आम लोगों के बीच चर्चा चले और उन्हें संगठित किया जाय।

3. परम्परागत खेती/सिंचाई का विषद अध्ययन किया जाय और इसके सारे सकारात्मक पक्षों को बाहरी हमले से बचाया जाय।

4. क्षेत्रीय कोर ग्रुप बनाने की दिशा में प्रयास किया जाय जिसमें बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग शामिल हों।

5. विधायकों/सांसदों तथा इंजीनियरों के बीच पानी/बिजली/विकास के प्रश्न पर बहस चलाने के लिये दबाव बढ़ाया जाय।

इसके बाद रमेश पंकज, दयानाथ और शाहिद कमाल के एक प्रस्ताव पर उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हाल में राहत की मांग करने वाले निर्दोष लोगों पर पुलिस द्वारा औराई में गोली चालन की निन्दा की गई। गोली काण्ड के शहीदों के परिवारों के लिये पुनर्वास की मांग की गई और इस हत्या कांड के दोषी पुलिस कर्मियों पर कत्ल का मुकदमा चलाने की मांग की गई। यह भी प्रस्ताव किया गया कि राहत सामग्री के बँटवारे का काम स्थानीय ग्राम सभाओं को दे देना चाहिए।

रामेश्वर सिंह ने बताया कि अब विश्व बाँध आयोग का कार्यकाल समाप्त हो चुका है अतः अब इससे कोई अपेक्षा हमें नहीं रखनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन अब डैम एण्ड डवलपमेन्ट ग्रुप के नाम से एक संस्था आने वाले दो वर्षों तक काम करेगी। यह पूरी रिपोर्ट इन्टरनेट पर उपलब्ध है। इसके हिन्दी अनुवाद की दिशा में प्रयास चल रहे हैं। बाढ़ मुक्ति अभियान इस दो दिन की संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रकाशित करने का प्रयास करेगा और आप सभी को उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा। कृपया संपर्क बनाये रखें और इसी तरह हमें अपना सहयोग देते रहें।

कामेश्वर कामति के धन्यवाद प्रस्ताव के साथ गोष्ठी का समापन हुआ।

 

विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट पर गोष्ठी 7-8 अगस्त, 2001

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

विश्व बाँध आयोग की रिपोर्ट पर गोष्ठी 7-8 अगस्त, 2001

2

Consultative Meeting on the Report of the World Commission on Dams (WCD) Social Development Centre, Ranchi

 

 
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