पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

Submitted by Hindi on Fri, 06/09/2017 - 12:50
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

पानी बचाने, संग्रहण एवं इसके उपयोग हेतु एक ओर जहाँ व्यापक जनान्दोलन का सामाजिक प्रयास आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर कानूनी रूप से वर्तमान समय में उपलब्ध नदियों एवं जलाशयों का संरक्षण तथा नए स्थाई जलाशयों का निर्माण एवं विकास के लिये सरकारी तंत्र पर जनदबाव तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना भी आवश्यक है। वर्षा के पानी को अपने स्थानों पर रोकना कोई एकांगी कार्य नहीं है, बल्कि इसके लिये अन्य कार्य साथ-साथ करने पड़ेंगे। इसके लिये सामाजिक पहल कर एक ओर जहाँ जनजागरूकता की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर सरकार की योजना में भी इसे प्राथमिकता की सूची में लाना होगा। नदियों के साथ हो रहे अतिक्रमण और ग्रामीण क्षेत्रों के पहाड़ों को विभिन्न कारण से तोड़ना, नदियों को खदानों की वाशरियों के कारण भरा जाना, नदियों पर बड़े-बाँध बनाकर मेगाप्रोजेक्ट के नाम पर पानी का औद्योगिक घरानों द्वारा अनाधिकृत रूप से दोहन, नदियों-तालाबों-झीलों सहित सभी जलाशयों को कृषि उद्योग एवं मल्टी कॉम्प्लेक्स के लिये भरा जाना, पहाड़ों एवं जंगलों से लगातार वृक्षों का काटा जाना, वर्षा के कारण भूमि कटाव के कारण नदियों की गहराई कम होना, अनेक ऐसी समस्याएँ हैं, जिन्हें सरकार को सख्त कानून द्वारा ही समाधान देना है। केवल वर्षाजल संग्रह के उपाय मात्र से बात नहीं बनेगी। नदियों-जलाशयों के दुश्मनों से पानी बचाने को साथ-साथ प्रयास करना होगा।

1. खेत का पानी खेत में अर्थात वर्षा की हर बूँद उसी खेत में इस्तेमाल हो, जहाँ वह गिरती है। इसके लिये मेड़बन्दी, कंटूरिंग एवं खेत के छठे भाग में वर्षाजल संग्रहण गड्ढा बनाया जा सकता है।
2. झारखंड के पानी की हर बूँद एवं मिट्टी के हर कण को बाहर नहीं जाने देना अर्थात मिट्टी कटाव को रोकने हेतु पहाड़ों की तोड़ाई एवं जंगल-पहाड़ों से वृक्ष कटाई रोकना होगा। अधिक से अधिक पौधरोपण कर बहते पानी को रोकने का प्रयास एवं मिट्टी का संरक्षण करना होगा।
3. बड़े बाँध की जगह नदियों पर 3 से 4 फीट ऊँचाई के छोटे-छोटे चेक डैम हर 200-300 मीटर की दूरी पर बनाकर नदियों में वर्षभर जलस्तर बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
4. भूगर्भ जलस्तर ऊँचा हो, इस निमित्त हर स्तर पर अधिकतम पौधरोपण करना एवं वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का उपयोग करना लाभकारी हो सकता है।
5. नदियों, झीलों, तालाबों की गहराई बढ़ानी होगी। नए बन रहे तालाबों का आकार एवं गहराई पुराने जमाने के तालाबों के अनुसार बड़ा बनाना, ताकि उसमें वर्ष भर पानी रह सके। झारखंड में कुआँ का उपयोग सफल रहा। अतः अधिक से अधिक कुओं का निर्माण हो इसकी व्यवस्था सरकार बजट में करे।
6. नदियों-जलाशयों एवं चुआं-डाड़ी-झरना जैसे अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों का सर्वेक्षण कर ग्रामीण तरीके एवं परम्पराओं को आधार बनाकर उसे उपयोगी बनाया जाए। गैर संवैधानिक तरीकों से नदियों-जलाशयों को उपयोग के लिये किये जा रहे विदोहन कोहर हाल में रोकना होगा।
7. गाँव-गाँव में हर किसान को कम पानी द्वारा सिंचाई पद्धति के तरीके का प्रशिक्षण एवं साधन उपलब्ध करवाना जैसे स्प्रिंकलर, डीप इरिगेशन सिस्टम आदि। कम समयावधि एवं कम पानी की आवश्यकता वाली कृषि फसलों को बढ़ावा देना होगा।
8. पानी बचाने, संग्रहण एवं इसके उपयोग हेतु एक ओर जहाँ व्यापक जनान्दोलन का सामाजिक प्रयास आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर कानूनी रूप से वर्तमान समय में उपलब्ध नदियों एवं जलाशयों का संरक्षण तथा नए स्थाई जलाशयों का निर्माण एवं विकास के लिये सरकारी तंत्र पर जनदबाव तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना भी आवश्यक है।

 

और कितना वक्त चाहिए झारखंड को

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

जल, जंगल व जमीन

1

कब पानीदार होंगे हम

2

राज्य में भूमिगत जल नहीं है पर्याप्त

3

सिर्फ चिन्ता जताने से कुछ नहीं होगा

4

जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

5

राज व समाज मिलकर करें प्रयास

6

बूँद-बूँद को अमृत समझना होगा

7

जल त्रासदी की ओर बढ़ता झारखंड

8

चाहिए समावेशी जल नीति

9

बूँद-बूँद सहेजने की जरूरत

10

पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

11

जंगल नहीं तो जल नहीं

12

झारखंड की गंगोत्री : मृत्युशैय्या पर जीवन रेखा

13

न प्रकृति राग छेड़ती है, न मोर नाचता है

14

बहुत चलाई तुमने आरी और कुल्हाड़ी

15

हम न बच पाएँगे जंगल बिन

16

खुशहाली के लिये राज्य को चाहिए स्पष्ट वन नीति

17

कहाँ गईं सारंडा कि तितलियाँ…

18

ऐतिहासिक अन्याय झेला है वनवासियों ने

19

बेजुबान की कौन सुनेगा

20

जंगल से जुड़ा है अस्तित्व का मामला

21

जंगल बचा लें

22

...क्यों कुचला हाथी ने हमें

23

जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा

24

करना होगा जंगल का सम्मान

25

सारंडा जहाँ कायम है जंगल राज

26

वनौषधि को औषधि की जरूरत

27

वनाधिकार कानून के बाद भी बेदखलीकरण क्यों

28

अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबाँट

29

विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते

30

एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

31

विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

32

पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

33

झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

खनन : वरदान या अभिशाप

34

कुंती के बहाने विकास की माइनिंग

35

सामूहिक निर्णय से पहुँचेंगे तरक्की के शिखर पर

36

विकास के दावों पर खनन की धूल

37

वैश्विक खनन मसौदा व झारखंडी हंड़ियाबाजी

38

खनन क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी, गुलामों से भी बदतर

39

लोगों को विश्वास में लें तो नहीं होगा विरोध

40

पत्थर दिल क्यों सुनेंगे पत्थरों का दर्द

 

 
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