बेजुबान की कौन सुनेगा

Submitted by Hindi on Sat, 06/10/2017 - 11:18
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

वन सम्पदा, जो आदिवासियों, मूलवासियों की सांस्कृतिक पहचान है, उसकी रक्षा तो ऐसे सम्भव नहीं। यहाँ ईमानदार अधिकारियों की कोई कदर नहीं। मेरा 19 वर्ष के सेवाकाल में 21 बार स्थानान्तरण हो चुका है। मैंने सुप्रीम कोर्ट में अपने स्थानान्तरण को चुनौती दी है। सदियों पुराना सारंडा का जंगल झारखंड की शान था। पूरे एशिया में इसकी एक पहचान थी। इसे यूनिफॉर्म साल सेलेक्शन के लिये प्रसिद्ध माना जाता था, पर आज यह बदहाल है। सखुआ जंगल के सारे पुराने पेड़ (मदर ट्री) काट डाले गए। अब वहाँ मात्र पुटुस क झाड़ी और सखुआ के पोल ही सारंडा की कहानी बयाँ कर रहे हैं। आज सारंडा वन में कोई भी वन अधिकारी नहीं रहता, वहाँ नक्सलियों की हुकूमत चलती है।

जानकार बताते हैं जंगल का थोड़ा बहुत अस्तित्व नक्सलियों की वजह से ही वजूद में है, क्योंकि नक्सलियों के छिपने का पनाहगार ये वन प्रदेश ही है। ठीक इसी प्रकार पलामू जिले के वनों का भी गौरवशाली इतिहास रहा है। वर्ष 1973 में यहाँ पलामू टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई। उस वक्त वहाँ 46 की संख्या में रॉयल बंगाल टाइगर थे। जो आज सरकारी आँकड़ों के अनुसार मात्र छह रह गए हैं। स्थानीय जानकार बताते हैं कि यहाँ सिर्फ दो से तीन टाइगर ही बचे हैं। यदि जाँच हुई तो फर्जी आँकड़ों के सहारे व्याघ्र परियोजना के केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा बाघों के विकास पर बहाए गए अरबों रुपये के घोटाले का पर्दाफाश हो जाएगा और कई अधिकारी सलाखों के पीछे होंगे।

हाथी झारखंड राज्य का राजकीय वन्य प्राणी घोषित है, लेकिन इसकी बदहाली पर वन अधिकारी मौन धारण किये हैं। आज वन विभाग हाथियों के पुनर्वास के नाम पर सिर्फ उनके झुंड को एक इलाके से दूसरे इलाके में भगाने एवं उस पर कागजी खर्च करने के दावे प्रस्तुत करता है, लेकिन ये दावे कितने खोखले हैं, यह सारंडा के जंगलों से सटे जमशेदपुर शहर के नजदीक देश का पहला हाथियों के संरक्षण के लिये बने एलिफैंट रिजर्व को देखकर पता चलता है। मैंने तीन हाथियों को जब्त किया था, जिसे वन प्रशासन दिखाता आ रहा है। औद्योगिक शहर से सटे होने के कारण वनों की अन्धाधुन्ध कटाई ने जंगली हाथियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। नेपाल तथा अन्य राज्यों के हाथी दाँत तस्करों के लिये झारखंड के वन प्रदेश सुरक्षित पनाहगार बन गए हैं। आज आलम यह है कि राज्य के हाथियों के सारे कॉरिडोर बन्द कर दिए गए हैं, जिससे उनका प्रजनन प्रभावित हो रहा है।

आज झारखंड के वन विभाग के पास इन जंगली हाथियों के पुनर्वास एवं पर्यवास की कोई ठोस योजना नहीं है। नतीजतन ये बेजुबान आम ग्रामीणों के जान-माल पर कहर बरपा रहे हैं। अलग राज्य गठन से अब तक 101 करोड़ रुपये का भुगतान सिर्फ मुआवजा बाँटने में व्यय हो गया। हाल ही में खूँटी जिले में हाथियों को सरेआम बिजली के करंट से मार डाला गया। उधर चाईबासा में भी नेपाल के तस्कर हाथियों को मारकर दाँत काट चलते बने।

फैला है भ्रष्टाचार : कितने दुख की बात है कि अधिकारियों पर भी हाथी दाँत की तस्करी एवं हिरण के मांस खाने के आरोप लगे, जिसे संचिकाओं में दबा दिया गया। ठीक उसी प्रकार मुटा मगर प्रजनन केंद्र बना, लेकिन इसका लाभ यहाँ के वन अधिकारियों को हुआ, न कि नदियों को। आज यहाँ मात्र तीन मगर बचे हैं, जिस पर सरकार का सालाना लाखों खर्च करने का दावा कर रही है। ऐसा ही हाल राँची से सटे कालामाटी में संरक्षित वन्यप्राणी चित्तीदार हिरणों का है, जिन्हें मात्र दो वर्ग किलोमीटर में ठूँस-ठूँस कर भर दिया गया है। यहाँ इनके आपस में टकराने से अक्सर मौतें होती रहती हैं। यदि कभी किसी वायरस ने इन बेजुबानों पर हमला किया तो सारे बेमौत मारे जाएँगे।

जंगलों में तस्करों का राज : धड़ल्ले से पेड़ों को सरेआम काटकर मिल मालिकों एवं तस्कर गिरोहों द्वारा खुलेआम अन्य राज्यों में लकड़ी की तस्करी जारी है। लेकिन वन अधिकारियों पर जरा सा भी असर नहीं होता है। राँची में ही आरा मशीन मालिकों की चाँदी है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में आरा मिलों की संख्या को जनसंख्या के आधार पर सीमित करना था, लेकिन ऐसा हो न सका। राज्य की वनभूमि का तो और भी बुरा हाल इन वन अधिकारियों ने कर दिया है। मात्र 25000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि में से एक लाख 25 हजार हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण के नाम पर वन अधिकारियों और भू-माफिया के हाथों खुलेआम बाजार दर पर बेच दी गई।

मैंने इस मामले में राज्य के मुखिया को पत्र लिखकर निगरानी विभाग के आला अधिकारियों को बेची गई वन भूमि का जिलावार रकबा के आँकड़ों के आधार पर जाँच करने का अनुरोध किया। इस मामले में उलटे राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे ही स्पष्टीकरण की माँग की व हलफनामा दायर कर वरीय अधिकारियों पर आरोपों के साक्ष्य माँगने के तहत अनुशासनिक कार्रवाई करनी शुरू कर दी। मैंने हलफनामे में 130 भारतीय वन सेवा के कैडर संख्या के विरुद्ध 68 वन अधिकारियों के विरुद्ध सरकारी राशि के गबन एवं अन्य आपराधिक मुकद्मा में चल रही विभागीय कार्रवाई में भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण एवं प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया। साथ ही सरकार से 46 वन अधिकारियों की नियुक्ति की वैधता को चुनौती देकर उनकी बर्खास्तगी की माँग हलफनामे में की।

हो सीबीआई जाँच : झारखंड में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इस कदर हुआ है कि हर जगह सीबीआई जाँच चल रही है। चाहे जंगलों से लौह अयस्कों की तस्करी का मामला हो या कोयला, बॉक्साइट के अवैध उत्खनन का। सारंडा से लौह अयस्कों की तस्करी ने झारखंड की पहचान ही बदल डाली। केंद्र सरकार ने वहाँ के विकास के लिये एक्शन प्लान बनाया है। राज्य के वन विभाग का हाल यह है कि वनरक्षियों की बहाली 70 के दशक से नहीं हुई।

वनपाल की बहाली हुए 25 साल हो गए। 1990 से वन क्षेत्र पदाधिकारियों की नियुक्ति नहीं हुई है। वहीं भारतीय वनसेवा के अधिकारियों की फौज साल-दर-साल बढ़ती गई। वनरक्षियों की कुल संख्या 3883 के विरुद्ध 1009 है। वनपाल की संख्या बल 1062 है, जिनमें 415 रिक्त हैं। राज्य सरकार के भारतीय वन सेवा के पुनर्गठन प्रस्ताव को यदि केंद्र सरकार मान लेती है, तो प्रत्येक जिले में छः अधिकारी भारतीय वन सेवा के होंगे। आज स्थिति यह है कि राज्य के प्रत्येक जिले में छह की संख्या में वनरक्षी एवं वनपाल तथा वन क्षेत्र पदाधिकारी नहीं है। वन सम्पदा, जो आदिवासियों, मूलवासियों की सांस्कृतिक पहचान है, उसकी रक्षा तो ऐसे सम्भव नहीं। यहाँ ईमानदार अधिकारियों की कोई कदर नहीं। मेरा 19 वर्ष के सेवाकाल में 21 बार स्थानान्तरण हो चुका है। मैंने सुप्रीम कोर्ट में अपने स्थानान्तरण को चुनौती दी है।

 

और कितना वक्त चाहिए झारखंड को

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

जल, जंगल व जमीन

1

कब पानीदार होंगे हम

2

राज्य में भूमिगत जल नहीं है पर्याप्त

3

सिर्फ चिन्ता जताने से कुछ नहीं होगा

4

जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

5

राज व समाज मिलकर करें प्रयास

6

बूँद-बूँद को अमृत समझना होगा

7

जल त्रासदी की ओर बढ़ता झारखंड

8

चाहिए समावेशी जल नीति

9

बूँद-बूँद सहेजने की जरूरत

10

पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

11

जंगल नहीं तो जल नहीं

12

झारखंड की गंगोत्री : मृत्युशैय्या पर जीवन रेखा

13

न प्रकृति राग छेड़ती है, न मोर नाचता है

14

बहुत चलाई तुमने आरी और कुल्हाड़ी

15

हम न बच पाएँगे जंगल बिन

16

खुशहाली के लिये राज्य को चाहिए स्पष्ट वन नीति

17

कहाँ गईं सारंडा कि तितलियाँ…

18

ऐतिहासिक अन्याय झेला है वनवासियों ने

19

बेजुबान की कौन सुनेगा

20

जंगल से जुड़ा है अस्तित्व का मामला

21

जंगल बचा लें

22

...क्यों कुचला हाथी ने हमें

23

जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा

24

करना होगा जंगल का सम्मान

25

सारंडा जहाँ कायम है जंगल राज

26

वनौषधि को औषधि की जरूरत

27

वनाधिकार कानून के बाद भी बेदखलीकरण क्यों

28

अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबाँट

29

विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते

30

एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

31

विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

32

पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

33

झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

खनन : वरदान या अभिशाप

34

कुंती के बहाने विकास की माइनिंग

35

सामूहिक निर्णय से पहुँचेंगे तरक्की के शिखर पर

36

विकास के दावों पर खनन की धूल

37

वैश्विक खनन मसौदा व झारखंडी हंड़ियाबाजी

38

खनन क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी, गुलामों से भी बदतर

39

लोगों को विश्वास में लें तो नहीं होगा विरोध

40

पत्थर दिल क्यों सुनेंगे पत्थरों का दर्द

 

 
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