...क्यों कुचला हाथी ने हमें

Submitted by Hindi on Sat, 06/10/2017 - 16:08
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

जिस दिन पूरे जंगल और जंगल के समाज को हम अपना मानकर उनसे भावनात्मक रिश्ता कायम कर लेंगे, उसी दिन से झारखंड का कल्याण शुरू हो जाएगा। यह भी याद रखना होगा कि हमारे राज्य के लिये जंगल सिर्फ पेड़-पौधे नहीं, बल्कि यह हमारी आजीविका से भी जुड़ा है। जंगल हमें सालों भर आमदनी का जरिया उपलब्ध कराता है। ऐसे में हम जंगल को क्यों उजाड़ने पर उतारू हैं, जिससे न तो हमारा भला होगा और न ही जंगल में रहने वालों का। मुझे याद है जब 1987 में जंगली हाथी बांडी और पनिमाको गाँव में घुस आए। बौखलाकर उन्होंने दो ग्रामीणों को मार डाला था। हाथी के आतंक की शिकार एक महिला भी हुई। मारे गए बांडी के भरत प्रजापति और पनिमाको की बुधनी देवी को देखने ग्रामीणों का हुजूम उमड़ पड़ा था।

गाँव वालों के लिये यह महज एक हादसा सरीखा था, जिसके पीछे छिपे कारणों से वे अनजान थे। मैं हाथियों के इस अप्राकृतिक व्यवहार को समझने में जुट गया। दरअसल, जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई ने हाथियों के आवास को तबाह कर दिया था। जंगल की दुनिया में मस्त रहने वाले ये हाथी झुंड बनाकर गाँवों का रुख करने को मजबूर हो गए थे। तो उन दो ग्रामीणों की हुई मौत का कारण हाथी हुए या हम मानव? पशु, पक्षी, मानव, जंगल, पेड़-पौधे, सब इसी प्रकृति के अंग हैं। सब एक-दूसरे से किसी-न-किसी रूप में जुड़े हैं। इनमें से कोई एक भी प्रभावित होने पर प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ेगा ही। सिर्फ हाथी ही नहीं बल्कि अन्य हिंसक-अहिंसक जंगली पशु भी ऐसा करने पर मजबूर होंगे। इस बात पर हम चिन्तन क्यों नहीं करते कि हाथी जैसा शाकाहारी, शान्त जानवर इतना हिंसक क्यों हो गया है। आए दिन पूरे राज्य में हाथियों द्वारा गाँवों, खेतों में मचाई गई तबाही की खबरें पढ़ने, सुनने को मिलती हैं। हाल के दिनों में हाथियों के हमलावर तेवर और भी तेज हुए हैं।

वन्य जीवों की सुरक्षा : इसे हम आसानी से रोक सकते हैं। हमें सबसे पहले इस मानसिकता से उबरना होगा कि यह धरती केवल मनुष्यों की है। धरती पर मौजूद तमाम प्राणियों के साथ एक सन्तुलित सम्बन्ध स्थापित करना होगा। इसके लिये उनका आश्रय जंगल उजड़ने से हर हाल में बचाना होगा। वन्यजीवों को सुरक्षा उपलब्ध कराने एवं पर्यावरण के सन्तुलन को बनाए रखने के लिये जंगल बचाने की मुहिम चलाने की जरूरत है। इसी कड़ी में चन्द लोगों के साथ मिलकर वन्यजीव सुरक्षा समिति का गठन कर जंगल बचाव अभियान के लिये हम सक्रिय हो सकते हैं। लोगों को जागरूक करने का काम और तेजी से करना होगा। मैंने इस अभियान के तहत हजारों लोगों को जंगल बचाने के लिये प्रेरित किया है।

लोगों को अगर अपनी गलती का अहसास कराया जाए तो अधिक समर्पण के साथ जंगल को बचाएँगे। जंगल बचाव अभियान के तहत मैंने ग्रामीणों को पेड़ों को राखी बाँधने को प्रेरित किया। इसके बाद देखा कि लोग उसकी रक्षा करने को प्रतिबद्ध हो गए और जंगलों का बढ़ना निरन्तर जारी रहा। वर्ष 1995 में सात अक्टूबर को टाटीझरिया स्थित जंगल के पेड़ों का रक्षा बन्धन करने का सफल समारोह हुआ। इसमें महिला-पुरुषों ने वृक्षों को राखी बाँधकर जंगल बचाने की कसम खाई। वृक्षों को राखी बाँधने का यह अभियान हर साल दुधमटिया में आयोजित किया जाता है। इसमें कई स्कूलों, संस्थाओं और आस-पास के गाँवों के हजारों लोग शामिल होते हैं। मैं अपने काम को महिमामंडित नहीं कर रहा, बल्कि बस यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि थोड़े से ही प्रयास से लोगों को जागरूक किया जा सकता है। इसका सकारात्मक असर पर्यावरण के साथ-साथ समाज पर भी पड़ता है। जंगल को नुकसान पहुँचाना मानव समाज के लिये बड़ी क्षति होगी।

जंगल को भी जीने का हक: जंगल में आग लगाना खुद के घर में आग लगाने के बराबर है। जंगल, नदी, पहाड़ आदि को बचाए बिना मानव समाज किसी भी तरह उन्नति नहीं कर सकता। जंगल के छोटे से छोटे जीव-जन्तु का भी बड़ा महत्त्व है, जिसका जीवन प्रभावित होने से पूरा का पूरा पारितंत्र प्रभाविकत हो जाता है। हम अपनी रक्षा एवं विकास के लिये मानवाधिकार पर जोर देते हैं, ठीक उसी प्रकार वन्यजीवों की रक्षा के लिये इन्हें भी जीने का अधिकार देना होगा।

इसके लिये जरूरी है कि जंगल जीवित रहे। जंगल है तो शुद्ध हवा है और जब तक शुद्ध हवा है तभी तक हम हैं। मैं गर्व के साथ कहता हूँ कि सात अक्टूबर 1995 को दुधमटिया से शुरू किया गया रक्षाबंधन अभियान दूर-दूर तक फैल चुका है। अब ग्रामीणों ने कई एकड़ पर फैले जंगल को बचाने का संकल्प ले लिया है। आज की तारीख में हजारीबाग के अलावा चतरा, कोडरमा, रांची, गुमला, गिरिडीह में वृक्षों को राखी बाँधी जा रही है।

लकड़ी माफिया पर लगाम : क्या हो रहा है, यह सबको पता है। जंगलों का विनाश पूरे पर्यावरण की मौत से जुड़ा है। इसके प्रभाव से हम चाहकर भी नहीं बच सकते। झारखंड प्राकृतिक रूप से बेहद संवेदनशील राज्य है। यह बात न तो लोगों को भूलना चाहिए और न ही सरकार को। इतने दिनों में राज्य के विभिन्न इलाकों में जंगलों का लगातार नाश हुआ है। जो इलाके पहले कभी बेहद ही घने जंगलों से आच्छादित हुए करते थे, वहाँ बंजरता हावी होने लगी है। इसमें दोष किसका है? लकड़ी माफिया पर लगाम कसने के लिये कड़े कदम उठाने की जरूरत है।

वन विभाग अधिक से अधिक जागरूकता अभियान चलाए और लोगों को वनों की रक्षा के माध्यम से मानव अस्तित्व की रक्षा के लिये प्रेरित करे। छोटी-छोटी बातें भी बड़े परिणाम दे जाती हैं। जिस दिन पूरे जंगल और जंगल के समाज को हम अपना मानकर उनसे भावनात्मक रिश्ता कायम कर लेंगे, उसी दिन से झारखंड का कल्याण शुरू हो जाएगा। यह भी याद रखना होगा कि हमारे राज्य के लिये जंगल सिर्फ पेड़-पौधे नहीं, बल्कि यह हमारी आजीविका से भी जुड़ा है। जंगल हमें सालों भर आमदनी का जरिया उपलब्ध कराता है। ऐसे में हम जंगल को क्यों उजाड़ने पर उतारू हैं, जिससे न तो हमारा भला होगा और न ही जंगल में रहने वालों का।

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