जंगल बचेगा, तो आदिवासी बचेगा

Submitted by Hindi on Sat, 06/10/2017 - 16:12
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

सही बात बोलूँ तो आजादी के बाद इस समाज के लिये सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए गए, फिर भी उनका कोई खास भला हुआ, ऐसा दिखता नहीं है। इसे विकास नहीं लूट कहते हैं। झारखंड अलग हुए 11 साल हो गए हैं। अब इसे और कितना वक्त चाहिए-लूट को विकास में तब्दील करने के लिये। पहाड़िया संताल परगना की प्राचीन आदिम जनजाति है। इस आदिवासी समुदाय की जिन्दगी ही पहाड़ है। ये दामिन-ए-कोह के पर्वत शिखर पर 700-1000 फीट की ऊँचाई पर अवस्थित गाँवों में सदियों से पहाड़, जंगल, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, माटी-पानी, नदी-झरने और जड़ी-बूटियों के साथ रहते आए हैं। लेकिन, आज मानव जीवन के स्तर को सुधारने वाला एक ही शब्द ‘विकास’ की वजह से इनकी जिन्दगी पहाड़-सी हो गई है।

राजमहल पहाड़ को पीसकर झारखंड में विकास का रास्ता बनाया जा रहा है। फलतः पहाड़िया आदिवासी समाज का अस्तित्व आज अन्तिम साँस ले रहा है। पहाड़िया समाज में गरीबी और भुखमरी की भीषण समस्याएँ व्याप्त हैं। पहाड़िया के जीवन का आधार पहाड़ है, जिसे आज खोदा जा रहा है। बरहड़वा से लेकर साहेबगंज की सड़क या रेलमार्ग से यात्रा करते हुए आपको सभी पहाड़ियों को काटकर तोड़कर बोल्डर बनाने का दृश्य नजर आएगा।

बड़े पैमाने पर क्रशर चल रहे हैं। वैध भी, अवैध भी। आज राजमहल पहाड़ को खंड-खंड करने के लिये तकरीबन 600 क्रशर घनघना रहे हैं। यह पहाड़ पहाड़िया लोगों का है, जिसके लिये वे सरकार को मालगुजारी देते हैं। यह अलग बात है कि यह मालगुजारी नाममात्र की होती है। क्रशर के ठेकेदार डरा-धमकाकर पहाड़िया से पहाड़ लीज पर ले लेते हैं और पहाड़ काटते हैं। पहाड़िया पहाड़ पर खेती करते हैं। मकई और बारबट्टी की खेती वहाँ प्रमुख रूप से की जाती है। समतल भूमि पर धान भी उपजाया जाता है। वहाँ कटहल, इमली, आम की अच्छी फसल ली जाती है। बाजार में इसे बेचकर जरूरत की अन्य वस्तुएँ खरीदी जाती हैं। पहाड़िया जलाऊ लकड़ी, बाँस, चौखट आदि बेचकर पैसा कमाते हैं। अकाल के समय कंद-मूल, फल-फूल, तो बीमारी के वक्त जड़ी-बूटी का इस्तेमाल करते हैं। आज भी पहाड़िया कुएँ के बजाय झरने के पानी का इस्तेमाल करते हैं। यानी पहाड़ियों के लिये पहाड़ ही जिन्दगी है। लेकिन, अब पहाड़ों के कटने से उनकी जिंदगी बोझ सी हो गई है। पहाड़ों के कटने से सदियों से प्रवाहमान जीवनदायिनी झरने सूखने लगे हैं। पहाड़ों के कटने से जीव-जन्तु भाग गए हैं। मूल्यवान औषधीय पौधे खत्म हो रहे हैं। जंगल के कटने से वर्षा अनियमित हो गई है। इसलिये पहाड़िया समाज की आबादी तेजी से घट रही है।

सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि देश में पक्षियों की करीब 70 से अधिक प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। पहाड़िया ही नहीं, जंगल पर निर्भर झारखंड की कई जनजातियाँ इन्हीं पक्षियों की श्रेणी में आ गई हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक बंजारा आदिवासियों की संख्या मात्र 374, खोंड की संख्या 196 रह गई है। बथूडी, गोडाइत और सवर आदिवासियों की जनसंख्या भी चार की संख्या को पार नहीं करती। आजादी के पूर्व के 50 साल में इनकी करीब 50 फीसदी आबादी विलुप्त हो चुकी है।

यह हालात सिर्फ पहाड़िया आदिवासी की नहीं है, उन तमाम आदिवासियों की भी है, जो अपनी आजीविका के लिये पूरी तरह जंगलों पर निर्भर हैं। बिरहोड़, कोरवा, असुर और बिरजिया-ये ऐसी ही आदिम जनजातियाँ हैं, जो नेतरहाट के पठार पर सदियों से अपनी जिंदगी निबाह रहे हैं। उनके ऊपर दो योजनाओं की तलवार लटक रही है। एक तो बॉक्साइट खनन के कारण उनके रहवास उजड़ रहे हैं और दूसरा, नेतरहाट फील्ड फायरिंग पायलेट प्रोजेक्ट से बेदखलीकरण का भय हमेशा सताता रहता है।

अगर ये यहाँ से उजड़ गये तो पुनर्वास के डब्बेनुमा कॉलोनियों में वे जी नहीं सकेंगे। इसकी प्रमुख वजह यह है कि ये आदिवासी जंगल से जीते हैं और जंगल आदिवासियों से जीता है। यह उदाहरण भी सिर्फ आदिम जनजातियों के लिये लागू नहीं होती है। ये आदिवासी समुदाय भी अपने आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक ज़रूरतों के लिये जंगल पर ही निर्भर है।

खेती करने के सारे उपकरण, घर बनाने की सारी लकड़ियाँ, जलाऊ लकड़ी, पशु चारे, जंगली फल-फूल और कन्दमूल, जड़ी-बूटी और अन्य वनोत्पाद के लिये ये आदिवासी भी, जिसकी एक अच्छी खासी आबादी की आर्थिक स्थिति बेहतर है, जंगल पर आश्रित हैं। पिछले कई वर्षों से नियमित बारिश नहीं होने की वजह से आदिवासी समुदायों के बीच खाद्य असुरक्षा बढ़ी है। दूसरी ओर खनिजों के उत्खनन, उद्योग, विद्युत, परिवहन एवं संचार के कारण जंगलों पर काफी दबाव बढ़ा है। लगातार जंगलों की कटाई हो रही है। परिणामस्वरूप जंगल सिकुड़कर 11 प्रतिशत रह गया है। हालाँकि, सरकारी आँकड़े 19 प्रतिशत हैं। रांची और खूँटी में 23 प्रतिशत, लोहरदगा में 18 प्रतिशत, पूर्वी सिंहभूम में 30 प्रतिशत, लातेहार में 41 प्रतिशत हजारीबाग, रामगढ़ में 40 प्रतिशत जंगल हैं और यही वन क्षेत्र आदिवासी इलाके हैं। इसीलिये इन जिलों में वनों का क्षेत्रफल 33 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन इन तमाम इलाकों में खनन कम्पनियों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है। अगर इन इलाकों में उत्खनन को सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया गया तो बचे-खुचे जंगलों का भी नाश हो जाएगा। इसके अलावा भी व्यावसायिक कारणों से जंगलों का विनाश हो रहा है। एक आकलन के मुताबिक पूरे भारत में जंगलों की कटाई की दर 4000 वर्ग किलोमीटर है।

झारखंड की भी यही स्थिति है। सरकारी वन संरक्षण की नीति कारगर साबित नहीं हो पा रही है। ऐसी स्थिति में समुदाय को ही वनों की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। लेकिन, इसके उलट सरकार यहाँ वनाधिकार कानून-2006 के तहत मिले अधिकारों को भी आदिवासियों के सुपुर्द नहीं कर पा रही है। आज भी वन विभाग उन्हें अतिक्रमणकारी करार देकर जेलों में बन्द करने से बाज नहीं आ रहा है। कहीं-कहीं पर आदिवासियों को माओवादी सफाया करने के नाम पर ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाकर जंगलों से खदेड़ा जा रहा है, ताकि खाली पड़ी खनिज सम्पदा से भरी जमीन खनन कम्पनियों के सुपुर्द की जा सके। ये कम्पनियाँ सिर्फ और सिर्फ मुनाफे के लिये झारखंड आ रही हैं। पर्यावरण असंतुलन से उनका तनिक भी लगाव नहीं है। लेकिन, यहाँ के आदिवासियों को जंगल की बड़ी चिन्ता है। यही कारण है कि वे किसी भी बड़ी परियोजना का, जिससे जंगलों का नाश होने वाला है, का कड़ा विरोध जताते हैं। क्योंकि आदिवासी जल-जंगल-जमीन के बगैर जी नहीं सकते। सरकार को आदिवासी संस्कृति के अनुसार विकास की नीति बनानी चाहिए।

इस सरकार को कम-से-कम ‘विकास’ शब्द को परिभाषित इसलिये करना चाहिए कि विभिन्न समाजों के लिये विकास के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। आज रांची से लेकर दिल्ली और अमेरिका तक जिस विकास का शोर मचा है, उसमें आदिवासियों की आर्थिक स्थितियाँ, सामाजिक रीति-रिवाज और राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ कहाँ दिखती हैं? सही बात बोलूँ तो आजादी के बाद इस समाज के लिये सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए गए, फिर भी उनका कोई खास भला हुआ, ऐसा दिखता नहीं है। इसे विकास नहीं लूट कहते हैं। झारखंड अलग हुए 11 साल हो गए हैं। अब इसे और कितना वक्त चाहिए-लूट को विकास में तब्दील करने के लिये।

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