02 डिग्री सेंटीग्रेड के पास है प्रलय

Submitted by Hindi on Sun, 06/11/2017 - 12:14
Source
राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप, नई दिल्ली, 10 जून, 2017

भारत में वार्षिक औसत तापमान 1995 से लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि इसी रफ्तार से तापमान बढ़ता रहा तो अगले 20 सालों में यह 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड की सीमा को पार कर जाएगा। सर्दियों के महीनों की बात करें तो 20वीं सदी की तुलना में अब यह दो डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म है। बीते एक सौ सत्रह सालों के तापक्रम का हमने विश्लेषण किया है। उसके परिणामों की बात की जाए तो हमारा तापमान 1.2 सेंटीग्रेट बढ़ा है। यदि अपने अध्ययन के प्रारंभिक वर्ष 1901 से अब तक देखें तो पाएंगे कि 1995 और 2016 का साल सबसे अधिक गर्म साल रहा। मौसम में तापमान का उतार-चढ़ाव बहुत अधिक है। अब ठंड भी ठंड के मौसम में उतनी ठंडी नहीं होती। हमने अपने अध्ययन में 1901 से 2030 तक की अवधि को बेसलाइन के तौर पर लिया है। हमने पाया है कि भारत का तापमान बढ़ा है। देश में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बढ़ा है। बाढ़ और सूखे की तीव्रता बढ़ी है।

पिछले 100 सालों में देश में औद्योगिक क्रांति आई। साथ ढेर सारा प्रदूषण भी साथ लाई। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या भारत की स्थानीय समस्या नहीं है। इसलिए भारत चाह कर भी इसका हल अकेले नहीं निकाल सकता।

यह एक वैश्विक समस्या है। जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेवार विकसित देश हैं। जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में यही बात कही गई है कि तापमान के बढ़ने को 2 डिग्री सेंटीग्रेट से ऊपर नहीं जाने दिया जाएगा। अब जलवायु परिवर्तन अमेरिका के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है जबकि वह ऐतिहासिक तौर पर दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला देश है, और वर्तमान में दो नम्बर पर है। पर्याप्त उत्सर्जन कटौती के बिना पेरिस समझौते के उद्देश्यों के अनुसार ग्लोबल वार्मिग को 02 डिग्री सेंटीग्रेड तक नियंत्रित रखने में कामयाबी यदि हासिल नहीं होती है, तो अमेरिका ही इसके लिए जिम्मेवार होगा। चूंकि डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही यूएनएफसीसीसी और आईपीसीसी को वित्त-पोषण रोकने की घोषणा कर दी है, और ग्रीन क्लाइमेट फंड (जीसीएफ) को 02 बिलियन अमेरिकी डॉलर देने की प्रतिबद्धता से पलट गया है।

अमेरिका का वादा जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर तीन बिलियन अमेरिकी डॉलर देने का था, जिसमें एक बिलियन अमेरिकी डॉलर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा दे चुके हैं। लेकिन जिस तरह जलवायु परिवर्तन पर ट्रंप का रवैया रहा है, उसे देखकर लगता है कि अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ने कोशिश की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों ही पेरिस समझौते से खुद को अलग कर लिया। वह समय ऐसा था, मानो जलवायु परिवर्तन की ताबूत में एक कील और ठोंक दी गई हो। अब तक जलवायु परिवर्तन के सवाल पर अलग-अलग देशों ने 10 बिलियन डॉलर देने का वादा किया है। यह लक्ष्य 2020 तक 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का था, लेकिन अब इतना पैसा इकट्ठा हो पाना मुश्किल लगता है।

भारत जैसे विकासशील देश इस बात के लिए सक्षम नहीं हैं कि अपने दम पर इस वैश्विक समस्या से निबट सकें। इस समस्या से निबटने के लिए बहुत सारा पैसा और तकनीक चाहिए। इसके अभाव में विकासशील देश कैसे काम कर पाएंगे? उनको विकसित देशों की तरफ देखना ही होगा।

20वीं सदी के आरंभ से देश का तापमान 1.2 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया है। भारत में वार्षिक औसत तापमान 1995 से लगातार बढ़ता जा रहा है। यदि इसी रफ्तार से तापमान बढ़ता रहा तो अगले 20 सालों में यह 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड की सीमा को पार कर जाएगा। सर्दियों के महीनों की बात करें तो 20वीं सदी की तुलना में अब यह दो डिग्री सेंटीग्रेड अधिक गर्म है। जलवायु परिवर्तन के लिए 02 डिग्री सेंटीग्रेड की सीमा तय की गई है, इस 02 डिग्री सेंटीग्रेड के पास प्रलय है। पूरी दुनिया में इसका भय है कि इसके बाद कुछ भी हमारे हाथ में नहीं रह जाएगा। 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड और 1.8 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ने के बाद इंसान संभल ही नहीं पाएगा। सब कुछ खत्म।

लक्ष्य तो यह है कि 2030 तक 30 से 35 फीसदी तक उत्सर्जन कटौती की जाए। जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण के लिए लगभग ढाई ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जरूरत पड़ने वाली है। लक्ष्य है अक्षत ऊर्जा को बढ़ावा देना और वृक्षारोपण के लिए गंभीरता से काम करना।

भारत सरकार की बात करें तो क्लाइमेट चेंज को ध्यान में रखते हुए कई सारे एक्शन प्लान पर सरकार काम कर रही है। नेशनल वॉटर मिशन, ग्रीन इंडिया मिशन, नेशनल सोलर मिशन, नेशनल मिशन ऑन सस्टनेबल हेबिटेट, नेशनल मिशन ऑन एन्हांस एनर्जी, नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग हिमालयन इकोसिस्टम, नेशनल मिशन फॉर सस्टनेबल एग्रीकल्चर।

जलवायु परिवर्तन को लेकर सरकार की कई योजनाएं 2015 से आरंभ हुई हैं। इन्हें 2030 तक पूरा होना है। इसलिए इन योजनाओं की समीक्षा अथवा विश्लेषण करने का यह सही समय नहीं है। जलवायु परिवर्तन की समस्या और इस चुनौती को आम जन के साथ-साथ संसद में बैठे नेता भी समझें और इस मुद्दे पर जागरूक हों, यह आवश्यक है।

(आशीष कुमार अंशु से बातचीत पर आधारित)

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