वनौषधि को औषधि की जरूरत

Submitted by Hindi on Sun, 06/11/2017 - 15:13
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

देश भर के वन्यजीव प्रेमी पर्यटक छत्तीसगढ़ का रुख करते हैं। लेकिन झारखंड में वन्यजीवन का मजा लेने बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या न के बराबर है। सारंडा के जंगलों में एक दशक पहले तक बंगाल, ओडिशा से पर्यटक जरूर आते थे, लेकिन सुरक्षा कारणों से अब उनकी संख्या लगभग शून्य हो चुकी है। पड़ोसी राज्यों छत्तीसगढ़ और ओडिशा से तुलना की बात तो छोड़ दें, बिहार जैसे बेहद कम वनक्षेत्र वाले राज्य से भी हमारा झारखंड वन्यजीव पर्यटन के मामले में काफी पीछे है। जंगल है तो वनौषधि है। झारखंड तो हमेशा से ही भारत का एक सघन वन क्षेत्र रहा है। यहाँ के जंगलों में निवास करने वाले लोग प्राचीन काल से ही आजीविका और स्वास्थ्य के लिये वनों और वनौषधियों पर निर्भर रहे हैं। यह परम्परा आज भी जारी है। लेकिन झारखंड के गर्भ में छिपी अपार खनिज सम्पदा की खोज के लालच ने वनों के दुर्दिन की शुरुआत कर दी। 20वीं सदी के प्रारम्भ से इस क्षेत्र में खनन और औद्योगीकरण के विकास ने वनौषधियों के इन आश्रय स्थलों का निर्ममतापूर्वक विनाश किया है। वन प्राकृतिक परिवेश की अभिव्यक्ति है तथा सभी प्रकार के जीव और वनस्पति के आधार भी।

झारखंड की वन-संस्कृति ने यहाँ के आदिवासियों एवं पिछड़ों के जीवन के सभी पक्षों को गहराई से प्रभावित किया है। अभाव में भी हृष्ट-पुष्ट शरीर तथा खिलखिलाते चेहरों से युक्त यहाँ के आदिवासी वनौषधियों के विशेषज्ञ होते हुए भी आज महँगी आधुनिक चिकित्सा करवाने को बाध्य हो रहे हैं। इससे औषधीय महत्त्व के पौधों के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अभी भी जंगलों को उजड़ने से बचाकर अप्राकृतिक जीवन से उत्पन्न असाध्य रोगों से मानव मात्र को बचाया जा सकता है। आज ऐसे पौधों की पूरी जानकारी के साथ-साथ उनकी सुरक्षा और प्रसार की जरूरत पड़ी है।

प्राकृतिक वनस्पति को ‘जलवायु का प्रतीक’ कहा जाता है। पर इसकी प्रकृति धरातलीय संरचना, उच्चावच और मिट्टी द्वारा निर्धारित होती है। प्राकृतिक दशाओं की कुछ भिन्नता के कारण यहाँ के विभिन्न क्षेत्रों में वृक्षों के प्रकार उनकी ऊँचाई और सघनता भिन्न पाई जाती है।

झारखंड के वन मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं, आर्द्र पर्णपाती एवं शुष्क पर्णपाती वन। आर्द्र पर्णपाती वनों का विस्तार झारखंड में अधिक है। इसके वृक्ष ऊँचे और मोटे होते हैं। सखुआ इस जंगल का सबसे प्रमुख वृक्ष है। आम, कटहल, जामुन, जुग्नफर आदि अन्य वृक्ष हैं, जिनमें पतझड़ के मौसम में भी पत्ते लगे रहते हैं। महुआ छोटानागपुर का सामान्य वृक्ष है, पर जंगलों में यह मुख्य रूप से पहाड़ी और ऊँचे शुष्क क्षेत्रों तक सीमित है। टून, शीशम, सागवान, हर्रे, करम, कुसुम और पैसार कुछ बहुमूल्य इमारती लकड़ियों के पेड़ यहाँ के मूल वृक्ष नहीं हैं, पर यहाँ इनका पर्याप्त विकास हुआ है। शुष्क पर्णपाती वनों के वृक्ष होते हैं और जंगल कम घने होते हैं। यहाँ के जंगलों में शीशम, खैर, बेर, पलास और छोटे बाँस अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

वनों के वितरण की दृष्टि से रांची, हजारीबाग, खूँटी, पलामू, चतरा, दुमका, लातेहार और सिंहभूम जिले अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, जहाँ की लगभग आधी धरती जंगलों से भरी है। यातायात के सुगम साधनों के विकास के कारण रांची और हजारीबाग के जंगलों का सबसे अधिक दोहन हुआ है।

वन सम्पदा के विनाश में मानवीय हस्तक्षेप सबसे अधिक जिम्मेदार है। बढ़ती आबादी, वन प्रबंधकों, ठेकेदारों, बिल्डरों की अधिक लाभ अर्जित करने की प्रवृत्ति, वनों से आजीविका प्राप्त करने की जनजातियों की विवशता तथा सरकार की गलत नीति के कारण वनों का अंधाधुंध कटाव हुआ है। आग के कारण झारखंड के कई वर्गकिमी के जंगलों का नाश होता रहा है। इनमें से अधिकांश आग मनुष्यों द्वारा लगाई जाती है। लोग जाने-अनजाने जलती हुई बीड़ी-सिगरेट फेंक देते हैं या महुआ को चुनने के लिये पत्तों में आग लगा देते हैं। जंगल धू-धू कर जलने लगता है। धरती से सटे घास जड़ी-बूटी और झाड़ियाँ नष्ट तो होते ही हैं, ऊँचे पेड़ों के मुलायम पत्ते और डालियाँ असमय ही झुलस जाते हैं।

तीसरा महत्त्वपूर्ण कारक भूमि अपरदन है। पेड़ों की जड़ें खासकर नाला अपरदन के कारण बाहर झूलने लगती है और वृक्ष बेसहारा होकर धराशायी हो जाती है। कल-कारखानों व खनन कार्य और बाँधों का निर्माण झारखंड में वनों के व्यापक विनाश के विशेष कारण रहे हैं। इन कामों के लिये वनभूमि को आसान निशाना बनाया जाता रहा है। इससे जंगलों का नाश तो होता ही है, साथ ही प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न होती है। झारखंड के वनों में वनौषधियों का जो भंडार है, वह पूरे विश्व के जंगलों में नहीं है। सर्वेक्षण रिपोर्ट बार-बार कह रही है कि झारखंड की जड़ी-बूटियाँ निरन्तर विलुप्त हो रही हैं। सर्पगंधा, कुसुम, रत्ति, आँवला, हर्रे, बहेड़ा आदि के फल, जड़ एवं छाल की व्यापक पैमाने पर इन जंगलों से चोरी हो रही है। वनाधिकार कानून तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों के तहत वनवासियों को वनोत्पादों के उपयोग की छूट दी गई है। इसका अवैध लाभ जंगल से बाहर के लोग उठा रहे हैं।

चोरी-छिपे इन जड़ी-बूटियों की बाहर के व्यापारियों को अच्छी रकम लेकर बेचते हैं। व्यापारी इन्हें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडीशा तथा पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में भेजते हैं। तस्करी कार्य नेपाल के रास्ते धड़ल्ले से हो रहा है। पलामू के जंगलों में सोना छाल का वृक्ष पाया जाता है। इसकी चोरी करने वाले लोग ऐसे गलत तरीके से छाल उतार लेते हैं कि कुछ दिनों बाद वह वृक्ष सूख जाता है। जड़ी-बूटियों और वनौषधियों के मामले में इतना धनी होने के बावजूद झारखंड में इसे बचाने और इसके जरिये रोजगार के सृजन की कोई नीति नहीं बनाई गई है। जंगल माफिया की नजर में तो ही पेड़ लकड़ी है और वे उसे व्यापारिक कामों के लिये काटते हैं। इन अनमोल औषधीय पेड़-पौधों का भी तेजी से नाश हुआ है। झारखंड के किसी भी इलाके में चले जाएँ, जड़ी-बूटियों की परम्परागत जानकारी रखने वाले आदिम लोगों को तिरस्कृत छोड़ दिया गया है।

न तो अभयारण्य बना, न ही नेशनल पार्क : हमारा राज्य जब बिहार से अलग हुआ था, उस वक्त सबने सोचा था कि झारखंड के जंगलों और जंगलवासियों (जंगली जानवर सहित) के लिये अब न्याय के क्षण आ गए हैं। अर्थव्यवस्था में जंगलों की एक बड़ी भागीदारी होगी। लेकिन, झारखंड के जंगलों का कैसे बेहतर इस्तेमाल हो, इस पर अब तक कोई ठोस नीति या कार्ययोजना नहीं बनी है। विभाग अपना पूरा समय जंगलों को बचाने में ही लगता है। प्राकृतिक सुन्दरता और वन्यजीवन को पर्यटन उद्योग का रूप देने की दिशा में कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ। हाँ, इतना जरूर हुआ कि किसी वनक्षेत्र को बराह (सूअर) आरक्ष तो कभी गज आरक्ष घोषित करने के लिये तख्त जरूर टाँग दिए गए। बगैर किसी योजना, सुरक्षा और पर्यटन सुविधा के राज्य के तमाम वन्यप्राणी अभ्यारण्य और राष्ट्रीय उद्यान बस सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। सुरक्षा कारणों और जंगली जानवरों की गिनती मात्र की मौजूदगी वन्यजीव प्रेमी पर्यटकों के भीतर कोई खास उत्साह नहीं जगा पाता। पलामू का टाइगर रिजर्व इसका उदाहरण है।

देश भर के वन्यजीव प्रेमी पर्यटक छत्तीसगढ़ का रुख करते हैं। लेकिन झारखंड में वन्यजीवन का मजा लेने बाहर से आने वाले पर्यटकों की संख्या न के बराबर है। सारंडा के जंगलों में एक दशक पहले तक बंगाल, ओडिशा से पर्यटक जरूर आते थे, लेकिन सुरक्षा कारणों से अब उनकी संख्या लगभग शून्य हो चुकी है। पड़ोसी राज्यों छत्तीसगढ़ और ओडिशा से तुलना की बात तो छोड़ दें, बिहार जैसे बेहद कम वनक्षेत्र वाले राज्य से भी हमारा झारखंड वन्यजीव पर्यटन के मामले में काफी पीछे है। झारखंड में 29.6 फीसदी भू-भाग पर वन होने के बावजूद सिर्फ एक बेतला राष्ट्रीय उद्यान है। यह नेशनल पार्क भी झारखंड बनने से पहले से (1986) मौजूद है। झारखंड बनने के बाद अब तक न तो एक भी वन्यप्राणी अभ्यारण्य बना है और न ही नेशनल पार्क। छत्तीसगढ़ में झारखंड के मुकाबले तीन गुना अधिक वनक्षेत्र में और ओडिशा में चार गुना अधिक वनक्षेत्र पर राष्ट्रीय जैविक उद्यान और वन्यजीव अभ्यारण्य मौजूद है। यहाँ तक कि बिहार के मामले में भी यह आँकड़ा झारखंड से करीब 12 सौ वर्ग किमी अधिक है। जाहिर है कि सरकार ने कभी भी वन को पर्यटन उद्योग बनाने और उसे स्थानीय लोगों की आमदनी से जोड़ने का गम्भीर प्रयास नहीं किया। नाइट सफारी बनाने का मामला आठ सालों से लटका पड़ा है।

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