आर्कटिक में भी मंडराता जलवायु परिवर्तन

Submitted by Hindi on Tue, 06/13/2017 - 15:22
Source
विज्ञान प्रगति, जून 2017

सदियों से ही आर्कटिक यानी उत्तर ध्रुवीय प्रदेश प्राकृतिक सौंदर्य, रहस्य एवं चुनौती का पर्याय रहा है। लेकिन मनुष्यों के क्रियाकलापों के चलते रहस्य, सौंदर्य एवं चुनौती भरे इस प्रदेश पर आने वाले समय में हिमविहीन होने का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हालात यूँ ही बने रहे तो वर्ष 2040 तक आर्कटिक बर्फविहीन हो जाएगा।

आर्कटिक में एस्किमो जाति के लोग सदियों से ही आर्कटिक यानी उत्तर ध्रुवीय प्रदेश प्राकृतिक सौंदर्य, रहस्य एवं चुनौती का पर्याय रहा है। लेकिन मनुष्यों के क्रियाकलापों के चलते रहस्य, सौंदर्य एवं चुनौती भरे इस प्रदेश पर आने वाले समय में हिमविहीन होने का खतरा मंडरा रहा है।

आर्कटिक का प्रसंग आते ही हमें ध्रुवीय भालू की याद आती है। असल में, आर्कटिक ग्रीक यानी यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘भालू के निकट’ लेकिन ध्रुवीय भालुओं के अलावा और भी कुछ जीवधारियों का यहाँ निवास है। आर्कटिक के एक छोर से लगे टुंड्रा प्रदेश में कस्तूरी मृग यानी मस्क डियर से मिलता-जुलता प्राणी मस्क ऑक्स पाया जाता है जिसके शरीर से कस्तूरी की तेज महक उठती है, जो सम्भवतया मादा को आकर्षित करने के लिये होती है। यहाँ सील मछलियाँ तथा आर्कटिक कॉड भी पाए जाते हैं।

आर्कटिक में केरिबाऊ नामक एक खास रेंडीयर भी पाया जाता है जो अपनी खाल, सींग और मांस के लिये जाना जाता है। इसके खुरों का भी विशेष महत्त्व होता है। वर्ष 2011 में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज द्वारा किए गए शोध द्वारा यह बात सामने आई है कि स्तनधारियों में केरिबाऊ ही अकेला ऐसा प्राणी है जो पराबैंगनी (अल्ट्रावायलेट) प्रकाश को देख सकता है।

‘आर्कटिक टर्न’ नामक पक्षी का निवास भी आर्कटिक में है। यह पक्षी प्रतिवर्ष आर्कटिक से अंटार्कटिका और फिर वापस आर्कटिक की ओर उड़ान भरता है। इस प्रकार यह प्रवासी पक्षी किसी और प्राणी की तुलना में एक बार में दो ग्रीष्म ऋतुओं को झेलने के साथ-साथ अधिक दिन के प्रकाश को भी झेलता है। आर्कटिक प्रदेश का एक और पक्षी है हिम उल्लू (स्नोई आउल) जो घुमन्तू प्रकृति का होता है। जहाँ तक वनस्पतियों की बात है तो टुंड्रा प्रदेश में मुख्यतया बोनी झाड़ियाँ, शाक (हर्ब), लाइकेन तथा कई जाति के पौधे उगते हैं।

आर्कटिक में एस्किमो जाति के लोगों का भी निवास होता है। करीब 5,000 साल से एस्किमो आर्कटिक में निवास करते आ रहे हैं। ये बर्फ के बने घरों, जिन्हें इग्लू कहते हैं, में रहते हैं। मन में एक प्रश्न उठ सकता है कि आखिर आर्कटिक में मानव निवास कितना पुराना है? आर्कटिक में मानव बसावट करीब 35,000 पूर्व की मानी जाती है। लेकिन, वर्ष 2012 में सेंट पीटर्सबर्ग स्थित रशियन अकादमी ऑफ साइंसेस में एलेक्साई तिकहोनोव के नेतृत्व में काम करते हुए एक शोध दल ने पता लगाया कि साइबेरियाई आर्कटिक में मनुष्यों का निवास और भी 10,000 वर्ष पुराना यानी 45,000 वर्ष पूर्व का है। इस शोध के परिणाम साइंस नामक जर्नल में प्रकाशित हुए थे।

वर्ष 1980 से वर्ष 2012 के दौरान आर्कटिक सागर आर्कटिक क्षेत्र में मानव बसाहट के इतने पुराने होने के बावजूद आधुनिक सभ्यता में इसकी चर्चा बीसवीं सदी में ही होनी शुरू हुई। पहले तो उत्तरी ध्रुव की खोज पर उठे विवाद के कारण आर्कटिक चर्चा में आया।

मानव क्रियाकलापों से उत्पन्न ग्रीनहाउस गैसों ने अब आर्कटिक क्षेत्र को भी प्रभावित किया है। नतीजतन, वहाँ भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। ध्रुवीय बर्फटोप पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर हालात यूँ ही बने रहे तो वर्ष 2040 तक आर्कटिक बर्फविहीन हो जाएगा।

ग्लोबल वॉर्मिंग द्वारा आर्कटिक के ऊपर मंडराते खतरे की पुष्टि व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा भी हुई है। एक ऐसा ही प्रयास वर्ष 2009 में रूपर्ट निगेल पेड्रिल हैड्रो द्वारा किया गया था। उनके द्वारा किए गए सर्वेक्षण से बहुत ही चौंकाने वाले परिणाम सामने आए थे। सर्वेक्षण के अनुसार, आर्कटिक सागर की ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ की चादर वर्ष 2020 तक करीब 20 प्रतिशत तक कम होने की सम्भावना है। सर्वेक्षण द्वारा यह भी संकेत मिला है कि इसकी अत्यधिक सम्भावना है। वर्ष 2030 से वर्ष 2040 के दौरान ग्रीष्मकाल में आर्कटिक पूरी तरह से बर्फविहीन हो जाएगा।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव न केवल आर्कटिक में रहने वाले ध्रुवीय भालुओं एवं अन्य प्राणियों पर पड़ेगा बल्कि बर्फ के पिघलने से पानी के बढ़ते आयतन के कारण उत्तरी गोलार्द्ध के मौसम पैटर्नों पर भी पड़ेगा। ऊपर से समुद्रों के जलस्तर के बढ़ने से निचले स्तर वाले अनेक क्षेत्र एवं द्वीपसमूह डूब जाएँगे। केवल इतना ही नहीं बल्कि तुषार भूमि यानी परमाक्रॉस्ट में कैद मीथेन जो एक ग्रीन हाउस गैस है, भी निर्मुक्त होकर ग्लोबल वॉर्मिंग को बढ़ाने में अपना योगदान देगी।

स्थिति और भी बदतर हो जाएगी यदि तेल की बड़ी-बड़ी कम्पनियों को आर्कटिक क्षेत्र में तेल निष्कर्षण की अनुमति मिल जाए। यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि हालाँकि आर्कटिक वृत्त के आस-पास का क्षेत्र पृथ्वी के समूचे पृष्ठ का मात्र 6 प्रतिशत है लेकिन विश्व के अब तक दोहन न किए गए तेल एवं प्राकृतिक गैस के संसाधनों का 20 प्रतिशत यहीं मौजूद है। यही कारण है कि तेल एवं गैस के दोहन के लिये विकसित राष्ट्रों की गिद्ध दृष्टियाँ इस क्षेत्र में टिकी हैं। गौरतलब है कि रूस के साइबेरिया क्षेत्र में प्राकृतिक गैस के अधिकतर भंडार मौजूद हैं जबकि तेल के अधिकतर भंडार अमेरिका के अलास्का क्षेत्र में मौजूद हैं। रूस के साइबेरिया तथा अमेरिका के अलास्का क्षेत्रों के अलावा कनाडा, नार्वे तथा ग्रीनलैंड के आर्कटिक क्षेत्र भी सम्भावित क्षेत्र माने जाते हैं।

फिलहाल आर्कटिक के ‘स्वास्थ्य’ पर खतरे की घंटी बज रही है। आर्कटिक का बर्फविहीन भविष्य न केवल सम्पूर्ण मानव जाति बल्कि यहाँ रहने वाले जीवधारियों के लिये भी सचमुच दुखद होगा। वैश्विक पर्यावरण के लिये यह संकटपूर्ण एवं घातक होगा।

साइक्लोन जैसे तूफान प्रश्न उठता है कि आर्कटिक में पिघलती बर्फ आखिर वैश्विक जलवायु को कैसे प्रभावित कर सकती है? दरअसल, स्थल और सागरों की तुलना में बर्फ सौर विकिरण को कहीं अधिक तीव्रता से परिवर्तित करती है। ग्रीनहाउस गैसों का सान्द्रण बढ़ने से जब धरती का औसत तापमान बढ़ता है तो उसके असर से बर्फ पिघलने लगती है। पिघलने की यह प्रक्रिया बर्फ के नीचे स्थित अदीप्त स्थलों एवं जल की सतहों को अनावृत्त करती है। ये अदीप्त सतहें सौर ऊर्जा को और अधिक परिमाण में अवशोषित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप तापन में वृद्धि होती है जिससे और अधिक बर्फ पिघलती है। इस पुनर्भरण (फीडबैक) प्रक्रिया को एल्बीडो प्रभाव या हिम-एल्बीडो प्रभाव कहते हैं। इस प्रकार बर्फटोप (आइसकैप्स) पृथ्वी की जलवायु को नियंत्रित करने में अपना योगदान देते हैं।

अतः आर्कटिक में पिघलती बर्फ कपोल कल्पना मात्र न होकर अब एक कड़वी सच्चाई है जिससे मुँह मोड़ना वास्तविकता को नकारना होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्कटिक में बर्फ इस कदर तेजी से पिघल रही है जिसे पहले कभी अवलोकित नहीं किया गया। इसका कारण वैज्ञानिक यह बताते हैं कि इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा पूर्वानुमानित बढ़ोत्तरी से कहीं तेजी से तापमान में वृद्धि हो रही है।

आर्कटिक में बर्फ के पिघलने का एक और प्रभाव भी होता है। पिघलती बर्फ से आर्कटिक सागर से ऊर्जा निर्मुक्त होकर चारों ओर के वायुमंडल में समा जाती है। इससे साइक्लोन जैसे तूफान उत्पन्न होते हैं जो निम्न पृष्ठ राख तथा तेज आँधी-तूफान की पुष्टि करते हैं। ये झंझावत खुले समुद्र पृष्ठ पर बर्फ जमने की प्रक्रिया को भी धीमा करते हैं।

आर्कटिक में बढ़ते हुए तापमान के कारण घटती हुई बर्फ ध्रुवीय भालू तथा वहाँ रहने वाले अन्य जीवधारियों के अलावा बर्फ के नीचे के समुद्र में निवास करने वाले जीवों, जैसे कि सील मछलियाँ तथा बेलुगा व्हेल आदि को भी हर तरह से प्रभावित कर रही है।

बर्फ के पिघलने का असर आर्कटिक कॉड नामक जीव पर भी पड़ रहा है। ये जीव पादपप्लवकों (फाइटोप्नेक्टन्स) एवं एल्गी आदि पर निर्भर करते हैं। लेकिन बर्फ के पिघलने से आर्कटिक कॉड उत्तर की ओर चले जाते हैं। इसी के साथ उन पर निर्भर करने वाले बेलुगा व्हेलों को भी उत्तर की ओर जाना पड़ता है। आर्कटिक क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन के परिणाम यह बताते हैं कि आर्कटिक कॉड को अपना आहार बनाने के लिये मादा व्हेलों को 500 किलोमीटर तक उत्तर का सफर तय करना पड़ता है। इस अध्ययन द्वारा यह भी पता चला है कि मरकरी (पारा) जैसे संदूषक तेजी से आर्कटिक आहार श्रृंखला यानी फूड वेब में अवशोषित होते चले जा रहे हैं। महासागरीय एवं वायुमंडलीय धाराओं द्वारा लाए जाने वाले मरकरी तथा अन्य संदूषकों के लिये आर्कटिक सागर एक तरह से एक प्राकृतिक अधिगम यानी ‘सिंक’ का ही कार्य करता है।

आर्कटिक पर जलवायु परिवर्तन का खतरा तो मंडरा ही रहा है यह क्षेत्र प्रदूषण की चपेट में भी है। आर्कटिक के ‘स्वास्थ्य’ पर हम सभी को विचार करना होगा नहीं तो वैश्विक पर्यावरण पर संकट लाने के साथ-साथ सम्पूर्ण मानव जाति तथा आर्कटिक में रहने वाले जीवधारियों में अस्तित्व के लिये भी यह दुखद होगा।

डॉ. प्रदीप कुमार मुखर्जी
43, देशबंधु सोसाइटी 15, पटपड़गंज, दिल्ली 110 092

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