एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

Submitted by Hindi on Thu, 06/15/2017 - 16:42
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

अगर संताल परगना काश्तकारी कानून को सही ढंग से प्रयोग में लाया जाए, तो यहाँ की सामुदायिक परम्परागत स्वशासी व्यवस्था भी मजबूत की जा सकती है और ‘अपने गाँव में अपना राज’ की अवधारणा को जमीन पर उतारा जा सकता है। आम धारणा यही है कि संताल परगना काश्तकारी कानून जमीन से जुड़ा एक कानून है। कानूनी विशेषज्ञ से लेकर इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों तक के मन में यही बात बैठी हुई है। इस आम धारणा ने न सिर्फ यहाँ के जीवन को हानि पहुँचाई है बल्कि सांस्कृतिक जीवन-पद्धति और स्वायत्त शासन व्यवस्था पर भी कुठाराघात किया है।

आजादी के बाद इस धारणा को और पुख्ता किया गया। परिणामतः एसपीटी एक्ट महज एक भू-बन्दोबस्ती कानून बन कर रह गया है। इस सच्चाई को जानने के लिये पिछले सवा दो सौ वर्ष के इतिहास को खंगालना होगा। सन 1793 से लेकर अब तक की प्रक्रिया और साजिश को समझना होगा। यह सभी जानते हैं कि 1765 में जब मीर कासिम अली ईस्ट इंडिया कम्पनी के मेजर एडक्स के हाथों पराजित हुआ, तब राजमहल से 6 मील दूर स्थित उधवानाला में जंगलतरी पर शासन के लिये दीवानी का अधिकार सैन्यशक्ति के द्वारा शाह आलम द्वितीय से ले लिया।

1765 में ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल और बिहार की दीवानी सौंपी गई। उससे पूर्व यहाँ की भूमि-व्यवस्था राजे रजवाड़ों के कब्जे में नहीं थी, बल्कि पूरी व्यवस्था सामुदायिक स्वशासन व्यवस्था के अधीन कार्यरत थी। डब्ल्यूडब्ल्यूएल हंटर 1868 में अपनी पुस्तक में विस्तार से ‘संताल विलेज गवर्नमेन्ट’ में लिखते हैं कि यहाँ की व्यवस्था जिसमें सामाजिक-आर्थिक और स्वशासन की व्यवस्था शामिल थी, यहाँ की स्वशासी व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करती थी। जमीन के रिश्ते समाज संचालन की विधियों से जुड़े थे। गाँव बसाने की प्रक्रिया और पद्धति तथा उसके लिये जुटाई जाने वाली सारी सामग्री का निर्णय गाँव समाज में होता था।

गाँव की परम्परागत स्वशासी व्यवस्था के खिलाफ न तो कोई व्यक्ति जा सकता था, न ही समाज संचालन के प्रमुख मांझी, परगना या फिर दिशोम परगना। ‘आबुआ आतो रे, आबुआ राज’ की जीवन-पद्धति थी, जिसका सम्बन्ध जमीन-जंगल से था। इसका सम्बन्ध व्यक्ति और व्यक्ति के बीच भी था तो मानव और मानवेत्तर प्राणी और सम्पदा के बीच भी। संताल परगना गजेटियर के अध्याय 17 में कहा गया है “द पीपुल देमसेल्व्स ऑर द फाइनल अथॉरिटी, द ऑफिसियल्स आर ऑन्ली देयर रिप्रजेन्टेटिव्स एप्वाइन्टेड टू परफॉर्म सर्टेन ड्यूटीज एण्ड टू कीप ऑडर एंड टू रिप्रजेन्ट देम जनरली।” इससे साफ है कि अंग्रेजी शासन काल और उसके भी पहले इस क्षेत्र में आदिवासी सामुदायिक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था कायम थी। इस शासन व्यवस्था को कमजोर किए बिना ईस्ट इंडिया कम्पनी अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर सकती थी। इसलिये लॉर्ड कार्नवालिस ने सम्पूर्ण जमीन की बन्दोबस्ती का कानून बनाया जो ‘स्थाई बन्दोबस्ती कानून’ के रूप में सामने आया। इसके माध्यम से ईस्ट इंडिया कम्पनी ने व्यक्ति के नाम से जमीन की बन्दोबस्ती शुरू की। यहीं से सामुदायिकता को तोड़कर व्यक्तिवादी व्यवस्था की शुरुआत आदिवासी इलाके में हुई।

इसी व्यवस्था के तहत जमींदारी और घटवाली व्यवस्था इस इलाके में फैलाई गई। प्रधानी व्यवस्था भी इसी का अंग थी। अब तक जो गाँव स्वशासन के प्रमुख ‘मांझी हड़ाम’ या ‘परगना’ थे, अंग्रेजों ने उन्हें प्रधान और लगान वसूलने वाला घटवाल बना दिया। ब्रिटिश शासन और प्रशासन को अपनी व्यवस्था चलाने के साथ ब्रिटेन को अधिक से अधिक साधन यहाँ से भेजना था, इसलिये इन लोगों ने जमीन पर लगान लगाने की प्रक्रिया की शुरुआत की। 1781-84 के बीच तिलका मांझी के नेतृत्व में हुआ जनविद्रोह इसी लगान के खिलाफ एक सामूहिक अभिव्यक्ति थी। तब तिलका मांझी ने कहा- ‘यह जमीन मारांगबुरू की देन है। यह धरती माता है। हमारी माता। इसलिये हम सब किसी को भी इस पर लगान नहीं देंगे। चाहे वह घटवाल हो या अंग्रेज बहादुर।’ सामुदायिक जमीन की रक्षा का यह पहला विद्रोह था। तिलका शहीद हो गये, जिनका स्मारक आज भागलपुर में है। लेकिन यह विद्रोह रुका नहीं।

1854 में विरसिंह मांझी के नेतृत्व में आंदोलन हुआ महाजनों के खिलाफ। जमीन की लूट के खिलाफ। इसके एक वर्ष बाद 1855 में झारखंड का सबसे बड़ा विद्रोह हुआ सिद्दो-कान्हू, चाँद, भैरव और फूलो, झानो के नेतृत्व में। यह विद्रोह भी जमीन हड़पने तथा लगान वसूलने के खिलाफ ही था। इतिहास गवाह है कि लगभग 15000 विद्रोही इस जन अदालत में शहीद हुए। कार्ल मार्क्स ने भी अपने ‘दास कैपिटल’ में इस विद्रोह को ‘एग्रेरियन रिवोल्ट’ कहा है। इसी एग्रेरियन रिवोल्ट के परिणामस्वरूप संताल परगना काश्तकारी कानून सामने आया। जब अंग्रेजों को लगा कि इस इलाके में शासन व्यवस्था तब तक कायम नहीं हो सकती जब तक यहाँ की परम्परागत व्यवस्था से समझौता नहीं हो जाता। इसलिये अंग्रेजों ने यहाँ की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था के साथ समझौते की पहल शुरू की।

सिद्दो-कान्हू, चाँद और भैरव के शहीद होने के बाद मांझी, परगना और देश मांझी से सम्पर्क स्थापित किया गया। संवाद किया गया। छोटेराय देश मांझी ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिणामतः 1856 में ‘संताल परगना’ नामक एक अलग पहचान वाले क्षेत्र का सृजन किया गया। 1856 में न्यू पुलिस रूल्स के तहत स्थानीय स्वशासी व्यवस्था को मान्यता मिली। इसमें उपायुक्त नामक पद का सृजन हुआ, जिन्हें राजस्व और दण्ड दोनों का अधिकार सौंप दिया गया। उपायुक्त से सीधे मांझी, परगना और दिशोम परगना संवाद कर सकता था। इसमें मध्यस्थता यानी बिचौलियापन की प्रक्रिया पर रोक लगा गई। इसके तहत गाँव समाज की शासन-व्यवस्था को भी मान्यता मिली।

परम्परागत रीति-रिवाज को भी ध्यान में रखकर अधिकार बहाल किए गए। यानी यह व्यवस्था दो सत्ता के बीच आपस की ‘संधि-पत्र’ थी। और यह हूल की ज्वाला से उपजी संधि थी। इसी संधि का परिणाम है कि आज भी संताल परगना के आम लोगों और यहाँ के निवासियों के पास जीवन-यापन लायक जमीन है। महज 3 प्रतिशत लोग यहाँ के भूमिहीन हैं। वे वैसे लोग हैं जो बाद के दिनों में आकर यहाँ बसे हैं। संताल परगना काश्तकारी कानून ने यहाँ के आदिवासियों और मूलवासियों को भूमिहीन होने से बचा लिया। अन्यथा यहाँ के आदिवासियों और मूलवासियों की स्थिति दूसरे राज्यों के आदिवासियों की तरह होती और वे भी दर-दर की ठोकरें खाने को विवश होते।

आज इस संधि (कानून) को बदलने की साजिश बड़ी तेजी से हो रही है, जिसे यहाँ की मांझी परगना व्यवस्था और स्वशासन की परम्परागत व्यवस्था कामयाब नहीं होने दे रही हैं। 5वीं अनुसूची की व्यवस्था और ‘पेसा कानून’ के तहत मिले अधिकार ने इस कानून को मजबूती प्रदान की है। बाद के दिनों में बने वनाधिकार कानून से भी सामुदायिक अधिकार के प्रावधान को बल मिला है। यही कारण है कि ‘ग्लोबल इकोनॉमी’ के पुरोधाओं तथा ‘भू-खोरों’ को यहाँ जमीन खरीदने में काफी कठिनाई हो रही है। खरीदी गई जमीन में हुई अनियमितता और गैर कानूनी हरकतें अभी कुछ महीने पहले सामने आई हैं। देवघर में ‘भूमि घोटाला’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

अगर संताल परगना काश्तकारी कानून पर सही ढंग से अमल किया जाए और सम्बन्धित जिलों के उपायुक्त जिन्हें विशेषाधिकार प्राप्त है, अपने अधिकारों का प्रयोग करें तो हजारों एकड़ हड़पी गई जमीन का उद्भेदन हो सकता है और गरीब आदिवासियों तथा मूलवासियों से अवैध ढंग से छीनी गई जमीन गरीब-गुरबों को वापस मिल सकती है। इतना ही नहीं अगर संताल परगना काश्तकारी कानून को सही ढंग से प्रयोग में लाया जाए, तो यहाँ की सामुदायिक परम्परागत स्वशासी व्यवस्था भी मजबूत की जा सकती है और ‘अपने गाँव में अपना राज’ की अवधारणा को जमीन पर उतारा जा सकता है।

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