विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

Submitted by Hindi on Fri, 06/16/2017 - 16:34
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

संताल परगना काश्तकारी अधिनियम का किस तरह उल्लंघन हुआ है, यह बताने की जरूरत नहीं। इस पर कार्रवाई करने की जरूरत है। संताल परगना के जंगलों को काटकर, पहाड़ों को ध्वस्त कर और स्थानीय मूल-निवासियों को यहाँ से भगाकर किसका विकास होगा? सवाल यह है कि अब तक इस बात पर हम एकमत हो ही नहीं पाए हैं कि हमें जाना किस दिशा में है। जमीन तो जमीन है। खेती के लिये भी जमीन चाहिए, उद्योगों के लिये भी जमीन चाहिए, माइनिंग कार्य के लिये भी जमीन चाहिए, लोगों को रहने-बसने के लिये भी जमीन चाहिए। झारखंड के संदर्भ में जमीन का सवाल हमेशा से ही संजीदा रहा है।

बाबा तिलका मांझी के जमाने से लेकर अब तक संथाल परगना का इलाका जमीन के मामले आधिपत्यवादी रहा है। जान से भी अधिक प्यार जंगलतरी के लोगों ने जमीन को किया है। पैनम परियोजना का भारी विरोध और 2008 के दिसम्बर में काठीकुंड में घटी घटनाओं ने लोगों के जमीन से जुड़ाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कर दिया। इसमें शक नहीं कि पूरा का पूरा संथाल परगना खेती-बाड़ी पर टिका है। संथाल हो या पहाड़ों के राजा पहाड़िया या फिर अन्य कोई भी समुदाय, जाति हर किसी के लिये खेती ही सबसे बड़ा रोजगार है, आजीविका है।

चार दशक पूर्व जब मयूराक्षी को बाँधने का काम शुरू हुआ था तो उस वक्त भी लोगों ने इसका विरोध किया था। मसानजोड़ के लोग सिर्फ इसलिये जमीन देने को तैयार हुए थे कि इससे उनके खेतों को पानी मिलेगा और सालों भर फसल लहलहाएगी। लेकिन हुआ क्या? लक्ष्य के मुकाबले आधे खेतों को भी पानी नहीं मिल रहा और हजारों लोगों को परियोजना के नाम पर उजाड़ भी दिया गया। गलती एक बार होती है, बार-बार नहीं। स्थानीय लोगों ने देखा कि जमीन देने के बाद भी कोई लाभ उन्हें नहीं मिलता, उल्टे उन्हें अपने खेतों और घरों से बेदखल होना पड़ता है।

जमीन अधिग्रहण का विरोध करने पर अगर संथाल परगना के लोग उतारू हुए हैं तो यह स्थिति अचानक नहीं आई है। जिस तरह हर रोग में एक दवा का इस्तेमाल नहीं हो सकता, उसी तरह अलग-अलग इलाकों की समस्याएँ भी अलग-अलग हैं और उनका उपचार भी अलग तरीके से होना चाहिए। नीतियों और योजनाओं को लागू कराने में इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता है। झारखंड के अन्य इलाकों की अपेक्षा में संथाल परगना के क्षेत्र में जमीन का वितरण अत्यधिक असमान नहीं है।

समतल जमीन बहुतायत है। इस कारण संताल आदिवासी जिनकी आबादी 20 से 25 लाख के बीच है, खेती के जरिये ही अपनी आजीविका चलाते आए हैं। सिद्दो, कान्हू, चांद, भैरव और फूलो-झानों के नेतृत्व में जब संतालों की उग्र-आन्दोलित आबादी स्थानीय प्रशासन की बर्बरता की शिकायत करने गवर्नर जनरल से कोलकाता जा रही थी, तो रास्ते में दर्जनों जमींदारों को मौत के घाट उतार दिया था। बाहरी लोगों के इस इलाके में प्रवेश के बाद यहाँ पर जमीन हथियाने का खेल शुरू हो गया था।

जमींदारी-सूदखोरी प्रथा के खिलाफ भी यहाँ के आदिवासियों ने संगठित होकर अठारहवीं सदी के अन्तिम दशकों से ही विरोध और संघर्ष शुरू कर दिया था। सिद्दो-कान्हू ने भोगनडीह पर से जो जमीन मुक्ति का उग्रनाद किया था, वह जनजातीय क्षेत्र का सबसे पहला संगठित विद्रोह था। केनाराम-बेचाराम और महेशलाल दारोगा जैसे दलालों का प्रतिवाद यहाँ के सामाजिक व्यवहार का हिस्सा रहा है। आजादी के बाद भी यह इलाका इस तरह चंगुलों से मुक्त नहीं हो पाया। लोगों को खेती के जरिये घर-परिवार चलाने लायक पर्याप्त उपज तो हो जाती है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा सूदखोरों को ऋण चुकाने में चला जाता है। भुखमरी की समस्या और पलायन की जड़ यही है। झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद अन्य इलाकों की तरह संताल परगना के जिलों पर भी निवेशकों की नजर पड़ी। पत्थर उद्योग हर रोज पहाड़ों का सीना छलनी करते हैं तो दूसरी तरफ वन माफिया संताल परगना के जंगलों पर बेरहमी से टूट पड़े हैं।

राजमहल की पहाड़ियाँ नंगी हो चुकी हैं। यह बताना भी जरूरी है कि संताल परगना के संदर्भ में जमीन का सवाल केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इलाके की पहाड़ियाँ भी आदिम पहाड़िया जनजातियों का आदिकाल से ही निवास स्थान रहा है। जहाँ एक तरफ कोयला, पत्थर उद्योगों के लिये जमीन के लोगों को हटाया गया, वहीं पहाड़िया लोगों के आवास भी उजाड़े गए। मानव तस्करी जोर-शोर से जारी है और इस पर रोक लगाने वाला कोई नहीं।

ये सारे सवाल जमीन-पहाड़ से जुड़े हैं। पहाड़िया समुदाय के लोग जो पहाड़ों पर रहते हुए आज भी कंदमूल और जंगली फल-फूलों पर निर्भर हैं, पहाड़ों के समतल हो जाने से घुट-घुटकर मर रहे हैं। पत्थर लोडिंग-अनलोडिंग के लिये पहाड़िया लड़कियाँ जो हिंदी भाषा नहीं जानती, उन्हें ट्रकों में डालकर बांग्लादेश भेजने का सिलसिला चल रहा है। इस दुर्गति की जड़ जमीन ही है। जमीन का लोकहित में कैसे बेहतर उपयोग हो, इसकी एक जन-नीति बननी चाहिए। यह बताना भी जरूरी है कि पूरे राज्य में संथाल परगना ही नक्सलवाद के प्रभाव से मुक्त रहा है।

2009 की जनवरी में इसे नक्सलग्रस्त बताया गया, कहा गया कि आमगाछी-पोखिरिया में आंदोलनकारियों की भीड़ में नक्सली भी घुसे हुए थे। जाहिर है कि किसानों, ग्रामीणों की जमीन लेने के हर उस हथकंडे को अपनाने का प्रयास पूरे झारखंड में हो रहा है, जिससे स्थानीय लोग मजबूर हो जाएँ। आठ सौ करोड़ का देवघर भूमि घोटाला इस बात का सबूत है कि पूरे इलाके में जमीन की बंदरबांट चल रही है और दूसरी तरफ गरीब किसान, आदिवासी मारे जा रहे हैं। बीते दस सालों में जमीन का सवाल न सिर्फ और भी संजीदा हुआ है, बल्कि इसने हिंसा की जमीन भी तैयार कर दी है।

संताल परगना काश्तकारी अधिनियम का किस तरह उल्लंघन हुआ है, यह बताने की जरूरत नहीं। इस पर कार्रवाई करने की जरूरत है। संताल परगना के जंगलों को काटकर, पहाड़ों को ध्वस्त कर और स्थानीय मूल-निवासियों को यहाँ से भगाकर किसका विकास होगा? यह ठीक वही स्थिति होगी, जिसमें चोरों की बस्ती में हमने अपने दरवाजे को खुला छोड़ दिया हो- आओ लूटो हमें।

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