झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

Submitted by Hindi on Fri, 06/16/2017 - 16:42
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‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

आजादी के बाद राज्य में 80 लाख से ज्यादा आबादी अपनी जमीन से विस्थापित होकर दर-दर भटक रही है, बेघर जिंदगी जी रहे हैं-उनको बसाने, उनकी जिंदगी के बारे में एक लाइन भी लिखी नहीं गई है। झारखंड का भविष्य कौन तय करेगा? दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है। आदिवासी-मूलवासी और किसानों का अस्तित्व नदी-पहाड़-जंगल-जमीन पर ही टिका है। जंगल-जमीन, नदी-पहाड़ को अलग-अलग करके नहीं देख सकते, क्योंकि आदिवासी समाज की जीवन शैली का ताना-बाना पूरी तरह प्रकृति से जुड़ा है। जंगल और जमीन एक-दूसरे के पूरक हैं। आदिवासियों ने ही साँप-भालू से लड़कर जंगल-झाड़ को साफ कर जमीन को आबाद किया है। अलिखित परम्परा में जमीन मालिक होने के लिये किसी कागजी सबूत की जरूरत नहीं थी। तब भी इन गाँवों, समाजों और राज के खूंट-कटी मालिक आदिवासी थे।

देश में ईस्ट इंडिया कम्पनी जैसे-जैसे आदिवासी इलाकों में व्यवसाय के लिये अपना पाँव पसारती गई, आदिवासी समाज से जमीन का खूँट-कटी अधिकार छिनता गया। जमीन जो समाज की सामुदायिक सम्पत्ति थी, अंग्रेजों के लैंड सेटलमेंट से व्यक्तिगत सम्पत्ति बन गई। 1856-57 के संथाल हूल से लेकर 1900 तक का बिरसा उलगुलान, जमीन पर बाहरी कब्जे के विरोध-स्वरूप उपजा संघर्ष था। इसके बाद ही सीएनटी और एसपीटी बनाने के लिये अंग्रेज मजबूर हुए।

देश की आजादी में आदिवासी नायकों ने भी बढ़-चढ़कर बलिदान दिया। अगर जलियाँवाला बाग कांड को हम याद करते हैं- तो 30 जून, 1856 के भोगनाडीह में अंग्रेजों की गोलियों से छलनी हुए 15 हजार संथाली आदिवासियों की शहादत को भी हम भूल नहीं सकते। 9 जनवरी 1900 के डोम्बारी मुंडाओं की शहादत को भी इतिहास दरकिनार नहीं कर सकता।

हर बार हमने दी है कुर्बानी : देश आजाद होने के बाद विकास के नाम पर भारतीय कानून बने। आदिवासियों के हक-हकूक की रक्षा, जंगल-जमीन, नदी-पहाड़ों की रक्षा के लिये, प्रकृति मूलक समाज की भाषा-संस्कृति की रक्षा के लिये 5वीं और छठवीं अनुसूची में व्यवस्था की गई। जवाहरलाल नेहरू के पंचशील ने इस अधिकार को सुरक्षा कवच दिया। जब देश के विकास की बात आई, 1948 में पहला औद्योगिक कानून बना, तब सीएनटी और एसपीटी एक्ट में प्रावधान आदिवासियों की जमीन न तो कोई बेच सकता है न ही खरीद सकता है को बदल दिया गया। कहा गया, पब्लिक इंटरेस्ट में जमीन डिस्ट्रिक्ट कमिश्नर के परिमिशन पर खरीदी और बेची जा सकती है। कानून के इस एक छेद ने लूट की बड़ी गुफा का निर्माण किया। जब-जब विकास के लिये जमीन, पानी, जंगल की जरूरत हुई, आदिवासी जमीन सम्बन्धी कानूनों में संशोधन होता गया। हर संशोधन हमें अधिकारों से उजाड़ता गया।

इस सपने को जयपाल सिंह मुंडा, निरल एनेम होरो ने राजनीतिक पहचान दी। 1973 में शायद झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी इसी सोच के साथ अपनी राजनीतिक नींव डाली थी। ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की। लेकिन इन सभी ने सिर्फ अलग राज-एक भौगोलिक क्षेत्र की ही बात की। झारखंड के अस्तित्व-पहचान और इतिहास की नहीं। यही कारण है कि आज राजसत्ता पर यही लोग आसीन है। लेकिन, अलग शहीदों के अलग राज का सपना को नजदीक फटकने भी नहीं दिया जा रहा है।

बार-बार बदला गया कानून : अलग राज 2000 में लम्बे संघर्ष के बाद मिला। देश गवाह है 2000 में देश में तीन राज बने-छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड। छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल में अलग राज के लिये किसी तरह का संघर्ष नहीं था, जबकि झारखंड राज की लड़ाई कई दशकों की यात्रा थी। राज्य बना, विकास के नाम पर झारखंड औद्योगिक कानून 2001 बना। इसमें कहा गया, झारखंड में उद्योगों का जाल बिछाया जाएगा। हर प्रखंड में भूमि विकास बैंक बनाया जाएगा, ताकि उद्योगपतियों को जमीन देने में कठिनाई नहीं हो, जहाँ वे उद्योग लगाना चाहें आसानी से उन्हें जमीन, पानी उपलब्ध कराया जा सके।

राज्य बने ग्यारह साल हो गए। राज्य विकास के नाम पर सिर्फ उद्योगों, पूँजीपतियों के हित को केंद्र बिंदु में रखा गया। आदिवासी, किसान, मेहनतकश, काश्तकार, यहाँ की भाषा-सांस्कृतिक पहचान हाशिये में धकेल दिए गए। आज तक राज्य में 104 कम्पनियों के साथ एमओयू साइन किया गया। इनमें 90 फीसदी माइनिंग कम्पनियाँ हैं। 98 कम्पनियाँ स्टील मेकर हैं। बरही से बहरागोड़ा फोरलेन बन रहा है। सड़क के दोनों ओर पाँच-पाँच किमी की जमीन विशेष औद्योगिक क्षेत्र बनाने की बात जमीन पर अब दिखाई दे रही है। लाखों पेड़ अब तक काटे जा चुके हैं। अभी तो शुरुआत है, पर्यावरण के विनाश का। शहर के किनारे सैकड़ों गाँवों का रैयती-भूअधिकार होने का कानून समाप्त कर दिया गया। अरबन सीलिंग एक्ट खत्म कर दिया गया। अब नगर निगम में शामिल हो गए। शहर के चारों ओर फोरलेन का रिंगरोड सैकड़ों गाँवों को बुलडोज कर दे रहा है। हरियाली जंगल काँटे के तारों से घेरा जा रहा है। जंगल-पहाड़ को दीवारों से घेर कर अब भूमाफिया-पूँजीपति अपना कैम्पस बना रहे हैं।

और कितना लूटेंगे : 104 कम्पनियाँ तो सूचीबद्ध हैं। जो सूचीबद्ध नहीं हैं-वे भी हजारों में होंगे, जो मौका देखकर जहाँ-तहाँ जमीन कब्जा रही हैं। सभी कम्पनियों को पानी चाहिए, सड़क चाहिए, पावर प्लांट चाहिए, खदान चाहिए, बाजार चाहिए, शहर भी बनाएँगे। सभी कम्पनियों को जमीन लेने के लिये खुली छूट दी जाये, तो मात्र एक साल में पूरे झारखंड की जमीन किसानों, आदिवासियों, मूलवासियों के हाथ से निकल जाएगी। इन्हें पाँव रखने के लिये भी जगह नहीं मिलेगी। जब जमीन, जंगल, नदी-पहाड़ बचाने की लड़ाई स्थानीय समुदाय लड़ रहा है, तब इन्हें विकास विरोधी, देश विरोधी करार किया जा रहा है। लेकिन विकास की आँधी जब थम जाती है, तब देश और राज्य के दूसरे समुदाय भी विकास के कुप्रभाव को महसूस करने लगते हैं।

सरकार गम्भीर नहीं : ऐसी परिस्थिति में झारखंड में जमीन का सवाल सबसे संवेदनशील और गम्भीर है। झारखंड के लिये दुखद बात है कि आदिवासी राज्य होने के कारण जितने भी मुख्यमंत्री बने आदिवासी ही बने। लेकिन, किसी ने भी जमीन, जंगल, नदी-पहाड़, खेत-खलिहान, गाँव समाज की चिन्ता नहीं की। सीएनटी एक्ट, एसपीटी एक्ट में जो छेद बढ़ता जा रहा है, जहाँ से जमीन निकलती जा रही है, उसे कैसे ठीक किया जाए, कैसे रोका जाए।

खतरे में हमारा अस्तित्व : देश में पूँजीपतियों का निवेश बढ़ाने उन्हें आसानी से जमीन उपलब्ध कराने के लिये भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन विधेयक 2011 ड्राफ्ट किया गया है। जो पिछले शीतकालीन सत्र में संसद में आने वाला था, लेकिन किसी कारणवश इसे रोक के रखा गया है। यह कानून देश के आदिवासी, मूलवासी, किसान विरोधी है। इस कानून में सरकार ने पूरी तरह से निजी कम्पनियों को किसानों के हाथों से जमीन साम-दाम-दंड-भेद के साथ छिनने की छूट दी है। अब सरकार अपने नागरिकों के प्रति किसी तरह की जिम्मेवारी नहीं निभाना चाहती है।

निजी कम्पनियों द्वारा साम-दाम-दंड भेद के साथ किसानों से जमीन लूटने, किसानों के अधिकारों को हनन करने का ताजा उदाहरण बोकारो जिला के चंदन क्यारी में इलेक्ट्रो स्टील, रामगढ़ जिला के पतरातू प्रखंड के देवरिया इलाके में जिंदल की दबंगता से समझा जा सकता है। ये तो अभी शुरुआत ही है। इस कानून में रैयतों-जमीन मालिकों से जमीन लेने के लिये मुआवजा और पुनर्वास की बात कही गई है। लेकिन, आजादी के बाद राज्य में 80 लाख से ज्यादा आबादी अपनी जमीन से विस्थापित होकर दर-दर भटक रही है, बेघर जिंदगी जी रहे हैं-उनको बसाने, उनकी जिंदगी के बारे में एक लाइन भी लिखी नहीं गई है। झारखंड का भविष्य कौन तय करेगा? दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है।

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