विकास के दावों पर खनन की धूल

Submitted by Hindi on Sun, 06/18/2017 - 11:33
Source
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

हम यह नहीं कहते कि माइनिंग न हो। लेकिन क्यों हो, किसके लिये हो, इस पर विचार करने की जरूरत है। उदाहरण के लिये कोयला उत्पादन का बड़ा हिस्सा पावर प्लांट को जाता है। इससे उत्पन्न बिजली का अधिकतर हिस्सा औद्योगिक प्रतिष्ठानों को आपूर्ति होती है। इसके बाद शहरी चमक-दमक में आपूर्ति होती है। और जिसने उत्पादन किया, उसके लिये क्या? सड़क पर बड़ी गाड़ियों में मैडम को जाते देखती हूँ, तो मेरा भी दिल करता है, मेकअप करूँ। सज-सँवर कर निकलूँ। लेकिन आप ही बताइए 24 घंटे जहाँ धूल उड़ती है, वहाँ भला मैं मेकअप करूँगी? क्रीम लगाती हूँ, तो गाल लाल हो जाते हैं। पश्चिम सिंहभूम के नोवामंडी की 30 वर्षीया द्रौपदी समद की बातों में कई सवाल हैं? आखिर इन सवालों का जवाब कौन देगा? नोवामुंडी देश का पहला लौह अयस्क खदान है। यहीं से सम्भवतः टाटा ने खनन शुरू किया था। माइनिंग यानी खनन। कहा जाता है विकास करना है, तो माइनिंग जरूरी है। मैं 20 सालों से सारंडा इलाके में रह रही हूँ। मैंने देखा है, महिलाओं को अत्याचार व लाचारी झेलते हुए, बच्चों को कुपोषण व भूख से मरते हुए, युवाओं को नशे के आगोश में खोते हुए यहाँ विकास का कम सर्वनाश ज्यादा हुआ है।

आजीविका पर संकट : झारखंड में अधिकतर प्राकृतिक सम्पदाएँ व खनिज पदार्थ वनक्षेत्र और आदिवासी इलाकों में ही हैं। किसी जमाने में सारंडा सघन साल वन के रूप में मशहूर था। नोवामंडी में जंगल बहुत था। लेकिन अब कहाँ। जाकर देखिए, सब खाली-खाली सा दिखता है। पेड़ों को कई कारणों से काटा गया। माइनिंग के कारण जंगल को लीलने की साजिश की गई। पर्यावरण को नुकसान तो पहुँचा ही, सबसे अधिक नुकसान आदिवासियों को हुआ। आदिवासियों का जीवन, संस्कृति व पेशा सब कुछ जंगल पर आधारित था। माइनिंग ने आजीविका की उनकी पूरी संरचना को छिन्न-भिन्न कर दिया। उनकी रोजी-रोटी को कथित विकास के वाहकों ने तय किया। जिन इलाकों में माइनिंग हो रही है, सुविधाओं के नाम पर वादे तो कई हुए, लेकिन वास्तविकता कोसों दूर है।

दिशाहीन सामाजिक व्यवस्था : झारखंड के जिस हिस्से में भी माइनिंग हुई, वहाँ विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। सामाजिक व्यवस्था दिशाहीन हो गई। पहले प्रकृति पर आधारित सामाजिक व्यवस्था थी। स्त्री-पुरुष समानता एक बड़ी खूबी थी इसकी। कृषि कार्य हो या गृहकार्य, दोनों की बराबर की भागीदारी थी। माइनिंग पुरुष वर्चस्ववाला पेशा है। पुरुष वर्चस्व समाज ने स्त्रियों को उपभोग की वस्तु बनाकर छोड़ दिया।

बिगड़ता स्वास्थ्य : खनन क्षेत्र में महिलाओं के बिगड़ते स्वास्थ्य के पीछे खनन ही है। दूषित मिट्टी, हवा में उड़ता डस्ट व प्रदूषित पानी बीमारियों की जड़ है। खनन कार्य में लगी महिलाएँ तो प्रभावित होती ही हैं, आस-पास के लोग भी उतने ही प्रभावित होते हैं। साँस की बीमारी यहाँ सामान्य है। इसके अलावा त्वचा रोग, कुपोषण, टीबी, कफ, मलेरिया, गठिया आदि की शिकार होती हैं। जिन इलाकों में यूरेनियम का खनन होता है, वहाँ की स्थिति और विकट है। असमय गर्भपात, अस्वस्थ बच्चों का जन्म, असमय मौत सामान्य सी बात हो गई है। इन इलाकों में मातृ मृत्यु दर सबसे अधिक है। महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं हैं।

बढ़ा महिला उत्पीड़न : माइनिंग से सबसे अधिक महिलाएँ प्रभावित हैं। कृषि जमीन का खनन में उपयोग से रोजी-रोटी छिन गई। बाहरी लोगों का इन इलाकों में अधिकाधिक प्रवेश होने लगा। इनके साथ इनके परिवार नहीं रहते। अधिक से अधिक अविवाहित आदिवासी लड़कियों को मजदूर के रूप में रखा जाता है। डरा-धमकाकर उनका यौन शोषण किया जाता है। आदिवासी समुदाय में एड्स और अन्य यौन संक्रामक बीमारियाँ आम हैं। आदिवासी महिलाओं के लिये मजदूरी के अलावा कोई काम नहीं बचा। जिन आदिवासियों के बीच दुष्कर्म या बलात्कार जैसे शब्द कभी सुनने को नहीं आता था, आज आए दिन महिलाएँ शिकार हो रही हैं। मजदूर महिलाओं का यौनशोषण किया जाता है।

नशे में युवा : माइनिंग ने युवाओं को नशे के आगोश में धकेल दिया है। रोजगार छीनने के बाद हंड़िया को पेशे के रूप में महिलाओं ने बड़ी संख्या में अपनाया है। जो हंड़िया पवित्र समझा जाता था। शुभ अवसरों पर उपयोग की जाने वाली हंड़िया नशे के रूप में उपयोग की जाने लगी है। माइनिंग कार्य में मजदूरी के बाद जो धन लाभ होता है, उसका आधा हिस्सा इसी हंड़िया में चला जाता है। अधिकतर युवा अशिक्षित हैं। खेती तो रही नहीं, मजदूरी ही एक मात्र अपने को व्यस्त रखने का जरिया है। जो नहीं करते, हंड़िया के नशे में डूबे रहते हैं। घर चलाने के लिये महिलाएँ हंड़िया बेचने को मजबूर होती हैं।

मजबूरी बना दूषित पानी : खनन क्षेत्रों में जलस्रोत पूरी तरह प्रदूषित हो गए हैं। नदी, धाराएँ, कुएँ और बोरपम्प का पानी पीने योग्य नहीं है। लेकिन मजबूरी है, अन्य कोई स्रोत नहीं है। सरकार या कम्पनी की ओर से ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। चूँकि पानी का वास्ता महिलाओं से अधिक पड़ता है, इसलिये उनके स्वास्थ्य पर इसका प्रतिकूल असर अधिक पड़ता है। जल संग्रहण से लेकर उनके उपयोग कपड़ा धोने, खाना बनाने आदि तक की अधिक जिम्मेदारी महिलाएँ ही निभाती हैं। खनन क्षेत्र में मजदूरी करने वाली आदिवासी महिलाएँ अपनी पीठ पर बच्चों को बाँध कार्य करती हैं। खुद तो जहरीली हवा का सेवन करती है, ये बच्चे भी बीमारियों की जद में रहते हैं।

किसके लिये माइनिंग : हम यह नहीं कहते कि माइनिंग न हो। लेकिन क्यों हो, किसके लिये हो, इस पर विचार करने की जरूरत है। उदाहरण के लिये कोयला उत्पादन का बड़ा हिस्सा पावर प्लांट को जाता है। इससे उत्पन्न बिजली का अधिकतर हिस्सा औद्योगिक प्रतिष्ठानों को आपूर्ति होती है। इसके बाद शहरी चमक-दमक में आपूर्ति होती है। और जिसने उत्पादन किया, उसके लिये क्या? क्या हमारे लिये यह बिजली नहीं है? हमारी चीज पर हमारा हक क्यों नहीं? ऐसी विकास नीति जिसका लाभ गांधी के आम आदमी तक नहीं पहुँचे, वह विकास हमें मंजूर नहीं।

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