मानसून की बारिश : कुछ रोचक बातें (Interesting facts on monsoon season)

Submitted by Hindi on Fri, 08/11/2017 - 15:51
Source
विज्ञान प्रगति, अगस्त 2017

हमारे देश के लिये मानसून एक जादुई घटना है। जादुई इसलिये क्योंकि मानसून के संग आने वाला बारिश का मौसम भले ही सिर्फ एक ऋतु के रूप में गिना जाता है, पर असल में यह हमारे देश की 6 ऋतुओं (वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर अर्थात पतझड़) को प्रभावित करने की हैसियत रखता है। वैसे तो वसन्त को ऋतुराज कहा जाता है परन्तु असलियत में मानसून यानी वर्षा इस ऋतु-चक्र की धुरी है। गर्मी से त्रस्त धरती को जब मानसून के दौरान बारिश की रिमझिम फुहारों का वरदान मिलता है तो प्रकृति जैसे नया श्रृंगार कर लेती है।

ऐसे बनते हैं मानसूनी बादलबारिश कम या ज्यादा हो, तो सर्दी का असर कम या ज्यादा हो जाता है। गर्मी की चाल भी उसी के समान आगे पीछे हो जाती है। सिर्फ ऋतुएँ ही नहीं, बल्कि देश की खेती, कारोबार और कई बार तो सरकारों का भविष्य भी मानसून की कृपा पर टिका होता है। मानसून के दौरान बारिश अच्छी होने पर पैदावार अच्छी होती है, तो फल-सब्जियों, दाल-अनाजों की कीमतें स्थिर रहती हैं। वरना हर कोई महंगाई का रोना रोता है और सरकार को कोसता है। कुछ वर्ष पहले जनता देख चुकी है कि कैसे प्याज की महंगाई के कारण कुछ राजनीतिक दलों को अपनी सत्ता तक गँवानी पड़ी थी। इसी तरह, उत्तराखंड में केदारनाथ, त्रासदी, जम्मू-कश्मीर की बाढ़, चेन्नई और मुम्बई जैसे शहरों के बेतहाशा बारिश में जलमग्न हो जाने की घटनाओं ने साबित किया है कि कैसे मानसून सीजन के दौरान ज्यादा बारिश भी मुसीबतों का सबब बन जाती है। यही नहीं, बारिश बिल्कुल न हो या उम्मीद से कम वर्षा हो, तो समस्या और भी ज्यादा होती है क्योंकि तब अकाल और सूखा हमारी नियति बन जाता है।

ऐसा होता है मानसून


साहित्य-गीत-संगीत-कला से बाहर विज्ञान की नजर में मानसून एक मौसमी या जलवायु से जुड़ी परिघटना है। इसी तरह मानसून चक्र धरती के तापमान, बर्फ से ढके क्षेत्रों से लेकर सतह के तापमान और समुद्री जल के ऊपर साल भर पड़ने वाली सूरज की गर्मी के कारण तापमान में होने वाले बदलाव का परिणाम है। असल में, समुद्री व बड़े जलाशयों के मुकाबले स्थलीय इलाकों में सौर-विकिरणों को सोखने की क्षमता भिन्न होती है। स्थल (जमीन) के मुकाबले सूरज की गर्मी का असर समुद्री जल पर देर से पड़ता है। भारतीय भू-भाग में शीतऋतु बीतने के बाद अप्रैल-मई में सूरज की गर्मी से भारतीय प्रायद्वीप से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक का स्थलीय भाग खूब गर्म हो जाता है जबकि हिन्द महासागर का पानी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। इस पूरे भू-भाग में हवाएँ गर्म होकर ऊपर की ओर उठती हैं और बंगाल से कश्मीर तक, गंगा-यमुना के मैदानों से लेकर मध्य पश्चिमी व दक्षिणी भारत में निम्न दाब की स्थिति पैदा हो जाती है।

इसके साथ ही, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में उच्च दाब की स्थिति वाली शीतल समुद्री हवाएँ जबरदस्त दबाव के साथ ताप और दाब के अन्तर के कारण जमीन की तरफ बढ़ती हैं। ये हवाएँ अपने साथ भारी नमी लिये हुए हिमालय की ओर चल पड़ती हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में प्रायः एक साथ उठने वाली मानसूनी हवाएँ उत्तर में हिमालय पर्वत और पश्चिम में सह्याद्रि पहाड़ों से टकराकर मानसूनी हवाएँ ऊपर उठती हैं और ठंडी होकर वर्षा की बूँदों में बदल जाती हैं।

हवाओं के बहने की दिशा के अनुसार, मानसून को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बाँटा जाता है : दक्षिण-पूर्वी मानसून (आता मानसून) और उत्तर-पश्चिमी मानसून (यानी लौटता मानसून)।

दक्षिण-पूर्वी मानसून (आता मानसून)


हर साल मई के अन्तिम पखवाड़े से जून के शुरुआती दिनों तक हिन्द महासागर की ओर से आने वाली हवाओं के कारण भारतीय भू-भाग में होने वाली वर्षा को दक्षिण-पूर्वी मानसून कहते हैं।

उत्तर-पश्चिमी मानसून (यानी लौटता मानसून)


मानसूनइसी तरह अक्टूबर-नवम्बर के आस-पास बंगाल की खाड़ी की ओर से लौटती हुई उन हवाओं को उत्तर-पश्चिमी मानसून कहा जाता है जो तमिलनाडु से लेकर श्रीलंका और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया तक वर्षा के लिये जिम्मेदार है।

कहाँ से आया मानसून


मानसून की बात करें तो इस अंग्रेजी शब्द की उपज पुर्तगाली भाषा के ‘मॉन्सैओ’ से हुई है। वैसे तो इसकी उत्पत्ति यानी उद्गम का एक अन्य स्रोत है अरबी भाषा का शब्द ‘मॉवसिम या मौसिम’, लेकिन इसका एक सिरा डच भाषा के शब्द - ‘मानसून’ से भी जोड़ा जाता है। मूलतः मानसून शब्द का इस्तेमाल हिन्द महासागर और अरब सागर की तरफ से देश के दक्षिण-पश्चिमी तट पर आने वाले बादलों से भरी नम हवा के सन्दर्भ में किया जाता है, जो जून से सितम्बर के बीच भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश में भारी वर्षा कराती हैं। भारतीय मानसून की अवधि 1 जून से 30 सितम्बर यानी चार महीने की होती है।

यह कहना गलत होगा कि यह मानसून सिर्फ हमारा यानी भारत का है। सच तो यह है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर तक असर डालने वाली और पृथ्वी पर घटित होने वाली सबसे बड़ी जलवायु संरचना है। भूगोल पर इसका विस्तार लगभग 10 डिग्री दक्षिण अक्षांश से लेकर 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक होता है। नक्शे पर देखें तो मानसून की दोनों शाखाएँ आगे बढ़ने पर गंगा के मैदानी हिस्से में मिलकर पश्चिम भारत में होते हुए पाकिस्तान की ओर बढ़ जाती हैं।

दक्षिण-पूर्वी मानसून जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, उसमें समुद्री नमी कम होती जाती है और बारिश की मात्रा भी घट जाती है। सितम्बर माह के अन्त में मानसून की चाल उलट जाती है। हवाएँ अपना रुख बदल लेती हैं और मध्य भारत के मैदानों और बंगाल की खाड़ी के ऊपर से लौटते हुए वापसी में नमी से भर जाती हैं। उत्तर-पश्चिम की दिशा में बहती हुई, नमी से भरी ये मानसूनी हवाएँ लौटते समय हमारे देश के तमिलनाडु के अलावा श्रीलंका तथा ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी भागों में सामान्य से भारी वर्षा करती हैं।

भारतीय मानसून


भारत में पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर से कर्क रेखा निकलती है इसलिये इसका देश की जलवायु पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इस कारण हमारे देश की जलवायु उष्णकटिबन्धीय हो जाती है जो मुख्य रूप से दो प्रकार की हवाओं से प्रभावित होती है- 1. उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवा और 2. दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी हवा।

ये मानसूनी हवाएँ हिन्द महासागर और अरब महासागर की तरफ से उठती हैं और हिमालय की तरफ से आने वाली ठंडी हवाओं से मिलती हैं। जून से सितम्बर के बीच चार महीनों में जब ये हवाएँ आपस में देश के दक्षिण-पश्चिमी तट पर पश्चिमी घाट (केरल के इलाके में) टकराती हैं तो पूरे देश और पड़ोसी मुल्कों में भारी वर्षा कराती हैं। यह है दक्षिण-पश्चिम मानसून और ज्यादातर वर्षा इसी के असर से होती है।

सितम्बर के बाद हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को पार करके आने वाली हवाएँ जब मैदानी इलाकों से समुद्र की तरफ चलती हैं, तो उसे उत्तर-पूर्वी मानसून कहा जाता है। आम भाषा में इसे शीत मानसून या लौटता मानसून भी कहते हैं। पूरे भू-भाग का तापमान घटाने में मददगार भारतीय मानसून की सबसे विशेष उपलब्धि इस क्षेत्र में नमी यानी आर्द्रता में बढ़ोत्तरी करना है जिसे जलवायु विज्ञान में बहुत महत्त्व का माना जाता है। यह आर्द्रता बारिश के कारण वायुमंडल में पैदा हुई जलवाष्पों की वजह से बनती हैं और ये जलवाष्प पृथ्वी की सतह पर हुए वाष्पीकरण के विभिन्न रूपों से वायुमंडल में पहुँचती हैं।

सूखा

गैर-भारतीय मानसून


भारतीय मानसून से अलग जिन दूसरे मानसूनों की चर्चा की जाती है, उनमें पहला स्थान पूर्व एशियाई मानसून का है, जिसका दायरा भारतीय-चीनी भू-भाग, फिलीपींस, चीन, कोरिया और जापान तक फैला हुआ है। चीन में ऐसी मौसमी वर्षा को मेइयु, कोरिया में चांग्मा और जापान में बाई-यु कहते हैं। ग्रीष्मकालीन वर्षा का आगमन दक्षिण चीन एवं ताईवान में मई माह के आरम्भ में एक मानसून-पूर्व वर्षा से होता है।

इसके बाद मई से अगस्त तक ग्रीष्मकालीन मानसून जारी रहता है। इस मानसूनी वर्षा की शुरुआत भारतीय-चीनी भू-भाग और दक्षिण चीनी सागर में मई माह में होती है, जो चीन की प्रमुख नदी यांग्तजे के इलाकों को छूते हुए जून के आखिर में जापान तक पहुँचती है और वहाँ से जुलाई में उत्तर चीन व कोरिया तक बारिश कराती है। अगस्त माह में इस पूर्वी एशियाई मानसून की समाप्ति हो जाती है और यह दक्षिणी चीन की तरफ लौट जाता है।

मानसून का एक असर विषुवतरेखीय देश अफ्रीका में भी दिखाई देता है। अफ्रीका क्षेत्र के सूडान आदि देशों के मरुस्थलीय इलाकों में होने वाली ज्यादातर वर्षा 22 जून के आस-पास ग्रीष्म काल में शुरू होती है और अक्टूबर माह तक जारी रहती है। इसके अलावा उत्तरी-अमेरिकी मानसून जून माह के आखिर या जुलाई से शुरू होकर सितम्बर तक वर्षा कराता है। जून के अन्त में इसकी शुरुआत मैक्सिको से होती है और जुलाई के मध्य तक विभिन्न अमेरिकी राज्यों में इसके कारण बारिश होती है। उत्तरी-अमेरिकी मानसून के कई नाम प्रचलित हैं।

हालांकि संक्षेप में इसे नैम (NAM) भी कहते हैं परन्तु उत्तर अमेरिकी लोग इसे समर, साउथ-वेस्ट, मैक्सिकम और एरिजोना मानसून आदि कई नामों से पुकारते हैं। कहीं-कहीं तो इसे डेजर्ट मानसून तक कहा जाता है।

कहाँ से आए बदरा यानी कैसे होती है मानसून की भविष्यवाणी


हवा से लेकर बर्फ तक का नाता : हालांकि इससे सम्बन्धित भविष्यवाणी 16 अप्रैल से 25 मई के बीच कर दी जाती है। भारतीय मानसून विभाग कुल 16 तथ्यों का अध्ययन करता है। 16 तथ्यों को चार भागों में बाँटा गया है और सारे तथ्यों को मिलाकर मानसून के पूर्वानुमान निकाले जाते हैं। जैसे, पवनचक्रीय बदलावों से लेकर हिमालय पर पड़ने वाली बर्फ तक का सीधा नाता मानसून से है।

वायु दबाव भी मानसून की भविष्यवाणी में अहम भूमिका निभाता है। वसन्त ऋतु में देश के दक्षिणी भाग का वायु दबाव और समुद्री सतह का दबाव, जबकि जनवरी से मई तक हिन्द महासागर विषुवतीय दबाव को मापा जाता है। इसके बाद बर्फबारी का अध्ययन किया जाता है। जनवरी से मार्च तक हिमालय के खास भागों में बर्फ का स्तर, क्षेत्र और दिसम्बर में यूरेशियन भाग में बर्फबारी मानसून की भविष्यवाणी में अहम भूमिका निभाती है।

देश में महाकवि घाघ और भड्डरि की लोक कहावतों के रूप में ग्रामीण अंचलों में मानसून के आगमन की तिथियाँ ही बांची-बताई जाती थीं, ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका के किसान ‘द ओल्ड फार्मस अल्मानक’ नामक पंचांग को वर्षा के मामले में अधिक सटीक मानते रहे हैं परन्तु हमारे देश में पंचांग, ग्रह-नक्षत्रों, कहावतों से इतर विशुद्ध वैज्ञानिक तौर-तरीकों से मानसून की भविष्यवाणी की शुरुआत वर्ष 1881 में तब हुई थी, जब भारत सरकार के मौसम रिपोर्टर एच.एफ. ब्लैनफोर्ड ने ऐसी पहली ‘गैर-सरकारी’ भविष्यवाणी की थी। हालांकि भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) वर्ष 1875 से मानसून की गतिविधियों पर नजर रख रहा था, लेकिन सरकारी तौर पर इस विभाग ने पहला आधिकारिक पूर्वानुमान वर्ष 1886 में जारी किया और तबसे यह सिलसिला निरन्तर जारी है।

उन्नीसवीं सदी के अन्तिम दशकों में ही हमारे मौसम विभाग ने मानसून की भविष्यवाणी के लिये वे मानक (पैरामीटर्स) तलाशने शुरू कर दिए थे, जिनके सहारे इसकी चाल-ढाल का पता चलता है। वर्ष 1909 में भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक सर गिल्बर्ट वाकर ने भारत के सन्दर्भ में मई महीने को आदर्श मानते हुए इस अवधि में हिमालय पर्वत श्रृंखला पर जमी बर्फ, अप्रैल-मई के मध्य तंजानिया में हुई बारिश, मई में मॉरीशस तथा वसन्त के मौसम में दक्षिणी अमेरिका में उत्पन्न वायुमंडलीय दबाव- इन चार मानकों का अध्ययन अनिवार्य बताया था। इसके बाद वर्ष 1916 से इसमें पांचवें घटक के रूप में श्रीलंका में मई माह में हुई वर्षा का रिकॉर्ड भी जोड़ा जाने लगा।

मानसून की सटीक भविष्यवाणी के सिलसिले में भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने एक बार सोवियत संघ के साथ मिलकर ‘मोनेक्स’ नामक कार्यक्रम भी चलाया था। इस शोध के जो नतीजे सामने आए, उससे गिल्बर्ट वाकर का पंच-घटकीय सिद्धान्त नाकाफी साबित हुआ। मोनेक्स अध्ययन के अनुसार मानसून के लिये जो अनेक दूसरे कारक जिम्मेदार माने गए, उनमें मध्य एशिया और तिब्बती पठार की तपन, धरती और समुद्र के तापक्रम में आया अन्तर, प्रशान्त महासागर व चीन सागर से आने वाले समुद्री तूफानों की दर और एशियाई क्षेत्र में इस अवधि के दौरान बनने वाला वायुमंडलीय दबाव आदि प्रमुख थे। वर्ष 1998 से आईएमडी जिन प्रणालियों के तहत इन मानकों का निर्धारण व अध्ययन करता है, उनमें सुपर कम्प्यूटरों व उपग्रहों से प्राप्त जानकारी का कई प्रणालियों (पैरामीट्रिक रिग्रेशन प्रणाली, डायनेमिक स्टोकैस्टिक ट्रांसफर और मल्टीपल रिग्रेशन प्रणाली) के विश्लेषण से प्राप्त बुनियादी जानकारियों का इस्तेमाल किया जाता है। अब तो अन्तरिक्ष में तैनात इसरो के कई मौसमी उपग्रह इस काम में भरपूर मदद कर रहे हैं और अब निकट भविष्य में (सम्भवतः 2021 में) अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के साथ मिलकर इसरो जिस बेहद महत्त्वपूर्ण उपग्रह-निसार (नासा-इसरो के सिंथेटिक अपरचर राडार) को प्रक्षेपित करने की योजना पर काम कर रहा है, उससे ऐसी भविष्यवाणियों में और मदद मिलेगी।

निसार के जरिये वैज्ञानिकों को धरती के पारिस्थितिकी तंत्र (इको-सिस्टम) की जटिलताओं को समझने, प्राकृतिक आपदाओं की टोह लेने, अंटार्कटिका की बर्फ और अन्य ग्लेशियरों की पिघलन की दर मापने आदि के काम करेंगे, जिससे मौसम की चाल के सटीक अनुमान भी पेश किये जा सकेंगे।

तीन स्तरों वाला पूर्वानुमान


आमतौर पर मानसूनी वर्षा के पूर्वानुमानों के तीन स्तर होते हैं- 1. दीर्घावधि, 2. मध्यम अवधि और 3. अल्पावधि। इसमें सबसे पहले दीर्घावधि अनुमान होता है, यानी मानसून आने से तीन महीने पहले अप्रैल में इस बारे में सूचना दी जाती है जिसके आधार पर विशेषज्ञ बनाई जाने वाली नीतियों के बारे में अहम फैसले लेते हैं।

वैसे, दीर्घावधि पूर्वानुमान की सटीकता अच्छी नहीं होती है, लेकिन मौसम विभाग के लिये सूचना देना जरूरी होता है ताकि नीतियों का निर्धारण किया जा सके। लेकिन भारतीय मौसम विभाग मध्यम अवधि पूर्वानुमान के मामले में काफी सही साबित होने लगा है। हालांकि इसमें समस्या यह है कि मौसम विभाग के बताए गए दिनों में बारिश तो होती है, लेकिन किस इलाके में बारिश की मात्रा कितनी होगी- यह सौ फीसदी सटीकता से नहीं बताया जा सकता। इसके लिये मध्यम के साथ अल्पावधि अनुमान, दोनों को मिलाकर अनुमान लगाया जाता है। मुंबई का रेल नेटवर्क भी बाढ़ से प्रबावित हुआ थाउल्लेखनीय है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत मौसम विभाग जिला स्तर पर पूर्वानुमान दे रहा है और अब ब्लॉक स्तर पर मौसम का पूर्वानुमान देने की योजना पर काम चल रहा है। यह विभाग अभी पाँच दिन तक के मौसम का सटीक पूर्वानुमान देता है और बड़े शहरों के लिये दस दिन तक के मौसम का सटीक पूर्वानुमान देने की तैयारी की जा रही है। मौसम की भविष्यवाणी की सटीकता के सम्बन्ध में यह बात विशेष रूप से ध्यान रखनी होगी कि हमारे देश में विविधता बहुत ज्यादा है जैसे, जैसलमेर और चेरापूंजी एक ही अक्षांश पर स्थित हैं लेकिन एक जगह सूखा पड़ता है और दूसरी जगह साल भर बारिश होती है। इस विविधता के कारण पूरे देश के लिये मौसम की सटीक जानकारी देना विभाग के लिये बड़ी चुनौती है।

कब-कब रूठ गए बादल


वैसे तो बारिश की अनहोनियों के कई किस्से हैं, जैसे अतिवृष्टि की घटनाओं से मुम्बई, जम्मू-कश्मीर में भीषण बाढ़ के हालात पैदा हो चुके हैं और चार साल पहले केदारनाथ जैसी त्रासदी भी हो चुकी है। मुम्बई में 25 जुलाई, 2005 को जरूरत से ज्यादा बारिश हुई थी। इससे शहर में नावें चलाने के हालात पैदा हो गए थे और हजारों लोगों की जानें गईं थीं। हालांकि बारिश के कारण हुए नुकसान के लिये मुम्बई के महानगर-पालिका की बदइन्तजामी को जिम्मेदार ठहराया गया था परन्तु तेज बारिश के पैटर्न ने साबित किया था कि वह एक सामान्य बारिश नहीं थी। अतिवृष्टि की कई और घटनाएँ देश में हुई हैं, जैसे वर्ष 2014 में असम के गुवाहाटी और चार अन्य जिलों में 15 घंटे तक तेज बारिश में 16 लोगों की मौत हो गई थी। इससे पहले 17 जून, 2015 को उत्तराखंड की केदार घाटी में हुई अचानक वर्षा के कारण भयानक हादसा हो गया था। इस राज्य के रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ में गाँव के गाँव बह गए थे। इसी तरह 6 अगस्त, 2010 को लद्दाख में हुई तेज बारिश में दर्जनों स्थानीय लोगों के अलावा छह विदेशी टूरिस्ट भी मारे गए थे। वर्ष 2016 में चेन्नई में हुई बारिश में पूरे शहर में जलभराव के अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिले थे।

महोबा को ट्रेन द्वारा पानी पहुँचाया जा रहा हैअतिवृष्टि से उलट एक किस्सा बादलों के रूठने का भी है। पिछले चार दशकों के दौरान मानसूनी बारिश का आँकड़ा देखें तो पता चलता है कि इस दौर में पाँच बार बादल हमसे रूठ गए और देश में पाँचों बार सूखा पड़ा-

1. वर्ष 1972 में 24 फीसदी बारिश कम हुई।
2. वर्ष 1979 में 19 फीसदी बारिश कम हुई।
3. वर्ष 1987 में भी 19 फीसदी बारिश कम हुई।
4. वर्ष 2002 में भी 19 फीसदी बारिश कम हुई।
5. वर्ष 2009 में 24 फीसदी बारिश कम हुई।

वर्ष 2009 में मौसम विभाग सूखे का अन्दाजा नहीं लगा पाया था जिस कारण भारत में धान और गन्ने की उपज प्रभावित हुई थी। इस कारण भारत को चीनी आयात करनी पड़ी थी और विश्वभर में चीनी के दाम 30 प्रतिशत तक बढ़ गए थे।

वर्ष 2012 में शुरुआती दो महीनों में 19-20 प्रतिशत सूखे के हालात बन गए थे, बाद के दो महीनों में बारिश हुई भी तो ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ वाले अन्दाज में।

लेखक परिचय


डॉ. संजय वर्मा
वरिष्ठ सहायक सम्पादक-नवभारत टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग, दूसरा तल 7, बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-110 002 मो. 9958724629

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