बंगलुरु की हाउसिंग सोसाइटी ने दिखाई बरसात के पानी के संरक्षण की राह

Submitted by Hindi on Sun, 08/13/2017 - 15:07
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Source
भगीरथ, जनवरी-मार्च, 2010, केन्द्रीय जल आयोग, भारत


.जैसे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल है उसी तरह दक्षिण भारत में स्थित कर्नाटक राज्य की राजधानी बंगलुरु है। इस शहर ने पिछले कुछ सालों में कम्प्यूटर और सूचना तकनीक के क्षेत्र में काफी तरक्की की है और अपनी पहचान बनाई है। इस तरक्की और उपलब्ध सुविधाओं के कारण देश-विदेश की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बंगलुरु में अपने ऑफिस खोले हैं। इन ऑफिसों में देश विदेश के विभिन्न भागों से कम्प्यूटर और सूचना तकनीक के क्षेत्र के प्रशिक्षित एवं पढ़े लिखे युवक और युवतियाँ नौकरी कर रहे हैं और बस रहे हैं। इन उच्च आय वर्ग वाले लोगों के बसने के कारण बंगलुरु नगर के आस-पास के इलाके में विदेशों की तर्ज पर नई-नई सुविधा संपन्न आधुनिक कॉलोनियाँ बस रही हैं। इन्हीं आधुनिक कॉलोनियों में बंगलुरु-सरजापुर रोड पर रेनबो नाम की एक हाउसिंग सोसाइटी है। इस सोसाइटी में लगभग 200 परिवार हैं और इसके सदस्यों ने सन 2002 के आस-पास से यहाँ रहना प्रारंभ किया है।

अन्य आधुनिक हाउसिंग सोसाइटियों की तरह रेनबो हाउसिंग सोसाइटी में भी पानी की व्यवस्था नलकूपों से है। रेनबो हाउसिंग सोसाइटी में पाँच सामुदायिक नलकूप हैं जिनसे 200 परिवारों को पानी सप्लाई किया जाता है। शुरू-शुरू में इन नलकूपों से पर्याप्त पानी मिलता था पर सन 2004 में गर्मी के मौसम में भूजल स्तर 300 मीटर अर्थात 1000 फुट तक नीचे उतर गया। गर्मी के मौसम में कॉलोनी के पाँच में से तीन नलकूप सूख गये। सन 2007 में स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई और कॉलोनी वासियों को पानी की कमी से निपटने के लिये पानी के टैंकरों का सहारा लेना पड़ा। हर परिवार ने गर्मी के मौसम में प्रति माह पानी के टैंकरों पर लगभग एक हजार रुपये खर्च किये। पानी की कमी के कारण हर परिवार परेशान हो गया और सोसाइटी की आधुनिक सुख सुविधायें उन्हें बौनी लगने लगी।

परेशानी के इस दौर में रेनबो हाउसिंग के एक सदस्य श्री जयवन्त भारद्वाज जो पेशे से कम्प्यूटर इंजीनियर थे, ने अन्य सदस्यों की मदद से पानी की कमी से निपटने के लिये प्रयास प्रारंभ किये। इसी बीच उन्हें बरसाती पानी के संरक्षण की मदद से जल कष्ट को कम करने की तकनीकों के बारे में पता चला। उन्हें यह जानकारी बंगलुरु स्थित रेन वाटर क्लब से प्राप्त हुई। उन्होंने सबसे पहले बरसाती पानी के संरक्षण अर्थात भूजल रिचार्ज की इस तकनीक के मूल सिद्धांत को समझने का प्रयास किया। मूल सिद्धांत को समझकर उन्होंने हर घर में छत के पानी को जमीन में उतारने के बदले, रेनबो हाउसिंग सोसाइटी की स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध व्यवस्थाओं से बेहतर तालमेल बनाकर अधिकतम साथ देने और कम खर्चीली नई किन्तु अभिनव तकनीक को अपनाने का फैसला लिया। उन्होंने इस अभिनव तकनीक के बारे में बाकी सदस्यों को बताया, उन्हें विश्वास में लिया और अन्ततः कॉलोनी की खुली जमीन, सड़कों, स्वतंत्र मकानों और फ्लैटों की छत पर बरसने वाले पानी की निकासी के लिये बनी पक्की नालियों में बहने वाले बरसाती पानी के उपयोग का निर्णय लिया। इसके लिये बाकायदा प्लान और संभावित खर्च का एस्टीमेट तैयार किया गया। पानी की समस्या से पीड़ित कॉलोनी वासियों ने हर संभव मदद का वायदा किया और जरूरी राशि भी सरलता से एकत्रित हो गई।

बरसात के पानी को एकत्रित करने का काम शुरू हो गया। इसके लिये बरसाती पानी की निकासी के लिये बनी नालियों में थोड़े-थोड़े अन्तर पर भूजल रिचार्ज कुएँ बनाये गये, उनमें बजरी बिछाई गई ताकि बरसाती पानी, छनकर जमीन में प्रवेश करे। इसके अलावा, स्वतंत्र मकानों के मालिकों ने अपने घर की खाली जमीन पर अपने पैसों से भूजल रिचार्ज कूप बनाये। कुल मिलाकर 200 परिवारों की सोसाइटी ने सन 2008 के अन्त तक 54 भूजल रीचार्ज कूपों का निर्माण कर कॉलानी के पानी को कॉलोनी की जमीन में सहेजने के फैसले को क्रियान्वित कर दिखाया। इन भूजल रिचार्ज कूपों ने कॉलोनी की जमीन पर बने इन भूजल रिचार्ज कूपों ने सफलता की नई इबारत लिख दी और रेनबो हाउसिंग सोसाइटी की जमीन के नीचे हर साल लगभग 600 लाख लीटर पानी जमा होने लगा। इस पानी ने सोसाईटी के सभी नलकूपों को जिन्दा कर दिया। आज हर परिवार प्रतिदिन एक हजार लीटर पानी पा रहा है।

जल प्रदाय की व्यवस्था को स्थायी बनाने के लिये रेनबो हउसिंग सोसाइटी ने पानी के माप के आधार पर मीटर की व्यवस्था लागू की। सोसाइटी ने प्रतिदिन लगभग 1000 लीटर पानी का इस्तेमाल करने वाले परिवारों पर प्रति 10,000 लीटर का सत्रह रुपये प्रतिमाह और प्रतिदिन 1000 लीटर से अधिक पानी खर्च करने वाले परिवारों पर प्रति 10000 लीटर का साठ रुपये प्रतिमाह चार्ज निर्धारित किया। सोसायटी ने निजी प्लाट पर भूजल रिचार्ज कूप बनाने वाले सदस्यों को पानी के बिल में हर माह एक सौ रुपयों की छूट दी। पानी की बिलिंग से मिलने वाली राशि से सोसायटी के भूजल रीचार्ज कूपों और जल मल निकासी व्यवस्था का रखरखाव किया जाता है।

श्री जयवन्त भारद्वाज के अनुसार रेनबो हाउसिंग सोसाइटी का पानी का सालाना खर्चा लगभग 650 लाख लीटर है। भूजल रीचार्ज ने सोसाईटी को हर साल लगभग 600 लाख लीटर पानी मिल जाता है। अर्थात सोसाइटी की पानी की सालाना कमी लगभग पाँच लाख लीटर है। इस कमी का समाधान खोजा गया और बाथरूम से निकल कर व्यर्थ बहने वाले पानी के इस्तेमाल की योजना बनाई गई और बाथरूम के पानी को साफकर बगीचे, लान और कारों की साफ सफाई का इन्तजाम किया गया। इस तरह सोसाइटी ने पानी के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की।

बंगलुरु के रेनबो हाउसिंग सोसाइटी में अब भूजलस्तर वापिस लौट रहा है। पानी की गुणवत्ता में अंतर दिखने लगा है और अब कॉलोनी में पानी के टैंकरों के दर्शन नहीं होते। पानी की खरीद बंद हो गई है। रहवासियों में पानी को लेकर कोई विवाद नहीं है। हालात बदले हैं और आधुनिक कही जाने वाली सोसाइटी में पानी की मूलभूत सुविधा बहाल हो गई है।

इस कहानी की सफलता का राज जाने बगैर कहानी अधूरी है। गौरतलब है कि कहानी का तकनीकी पक्ष उजला है। इलाके में वांछित मात्रा और सही तीव्रता से पानी बरसता है। यद्यपि सोसाइटी की जमीन के नीचे धरवार युग की कठोर चट्टानें मौजूद हैं, पर उनमें बरसाती पानी को सहेजने का गुण मौजूद है। भूजल रीचार्ज कूपों ने बरसाती पानी और पानी को सहेजने वाली परतों के बीच का अवरोध दूर कर इष्टतम जल संचय को संभव बनाया है। यही कहानी के तकनीकी पक्ष का उजला पक्ष है और सोसाइटी की जमीन में जल संचय के लिये अपनाई सही तकनीक, कहानी की सफलता का राज है।

वर्षाजल संग्रहण के लिये बनी नाली

लेखक परिचय


के.जी. व्यास
71, चाणक्यपुरी, चूना भट्टी, कोलार रोड, भोपाल, फोन-0755, 2460438, मो.-09425693922

 

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.कृष्ण गोपाल व्यास जन्म – 1 मार्च 1940 होशंगाबाद (मध्य प्रदेश)। शिक्षा – एम.एससी.

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