धरती बचाने की हर पहल उपयोगी है

Submitted by Hindi on Sat, 01/09/2010 - 11:07

एक बात मैं शुरू में ही साफ कर दूं कि जब मैं दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और गरम हो रही धरती पर चिंता जता रहा हूं, तो मैं इस विषय के किसी एक्सपर्ट की हैसियत से नहीं बोल रहा हूं, बल्कि मेरी चिंता बिलकुल उस किसान की तरह है, जो अपने खाली और सूखे खेत देखकर माथा पीटता है। मेरी चिंता ठीक उस पुरुष की तरह है, जिसका वीर्य जांचने के बाद उसका चिकित्सक घोषणा करता है कि अब वह कभी पिता नहीं बन सकता। मेरी चिंता सौ फीसदी ईमानदारी से इस धरती के उस हिस्से की तरह है, जिसका अस्तित्व अंततः इसके होने में ही है।

पिछले दिनों एक युवक ने मुझसे कोपेनहेगन के बारे में सवाल पूछा था, तब मुंह से पहला शब्द यही निकला था, मैं जीनियस नहीं हूं। मैं सब कुछ नहीं जानता, मुझसे सब कुछ जानने की अपेक्षा उचित भी नहीं है, लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि बचपन से आज तक अपने गार्डेन में कोई पौधा रोपते समय मुझे जो सुख मिलता रहा है, वह भौतिकी की वे प्रयोगशालाएं भी मुझे शायद ही कभी दे पाई हों, जिनमें मेरे जीवन का ज्यादातर हिस्सा बीता है। शायद यही वह वजह है कि इस मुद्दे पर हर किसी को सोचना और बोलना चाहिए। भले ही सीधे तौर पर इससे उनका कोई लेना-देना हो या नहीं, क्योंकि घातक होते जा रहे पर्यावरणीय बदलाव हमारे अस्तित्व के लिए संकट बनते जा रहे हैं।

विकास के मौजूदा दौर में औरों से आगे दिख रहे अमेरिका समेत कुछ विकसित देश भले ही दुनिया को किसी विलेन जैसे दिख रहे हों, लेकिन सच्चाई यही है कि अति के बाद हर किसी को अपनी गलतियों की ओर देखना ही होता है। अमेरिका भी इससे अलग नहीं है। एक ओर जब कॉर्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने को लेकर कुछ ताकतवर (बल्कि विकसित कहूं, तो ठीक होगा) देश एक अलग गुट के तौर पर दिख रहे हैं, वहीं भारत ने खुद आगे बढ़कर अपनी जो भूमिका तय की है, उससे विकासशील देशों को ही नहीं, बल्कि विकसित देशों को भी सबक लेना चाहिए। दूसरों पर उंगली उठाने का समय बीत चुका है। अब हर किसी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी।

कोपेनहेगन की सफलता-विफलता को लेकर बैठक से पहले ही दुनिया भर में कयासबाजी चल रही थी। बहुत से लोग नहीं मानते कि कोपेनहेगन आने वाली पीढ़ियों के लिए कभी ऐतिहासिक महत्व के तौर पर याद भी किया जाएगा। लेकिन मेरी नजर में ऐसा नहीं है। मुझे लगता है कि धरती बचाने की हर पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। कभी-कभी किसी बड़े काम के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है। फिर यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि एक ही मुद्दे पर चिंता जताने के लिए अमेरिका, चीन, ब्राजील, भारत, दक्षिण अफ्रीका और यूरोपीय देशों समेत दुनिया के कई गरीब देश, यहां तक कि दर्जनों द्वीप इस बैठक में शामिल हुए। इसे इस नजरिये से भी देखिए कि कुछ न होने से अच्छा तो कुछ होते रहना है। ये कोशिशें शायद हमें अपनी जिम्मेदारी समझने और सही दिशा में चलने में मदद करें।

यह अच्छा ही है कि कोपेनहेगन के बहाने जलवायु परिवर्तन का कोपभाजन बने देशों को सौ अरब डॉलर से अधिक की सहायता देने की बात कही गई है। यह सही है कि कोपेनहेगन प्रस्तावों पर सभी देशों की इस बात एक राय नहीं हो सकती, क्योंकि सभी सरकारें अपने-अपने देशों के आंतरिक प्रशासनिक व राजनीतिक दबावों की अनदेखी नहीं कर सकतीं। यूरोपीय देश वर्ष 2020 तक ग्रीन हाउस गैसों में और कटौती चाहते हैं, लेकिन खुद अमेरिकी सरकार में इस पर सहमति नहीं बन सकी थी। संयुक्त राष्ट्र वर्ष 2010 तक देशों से ऐसी रिपोर्ट की अपेक्षा कर रहा है, जिसमें वे आने वाले वर्षों में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा पर अपना रुख स्पष्ट करें। ये दोनों सवाल हर देश के लिए अलग-अलग नजरिये से देखने के हैं। विकसित देश अपनी सुविधाओं में कमी लाए बगैर विकासशील देशों से कुछ अधिक ही अपेक्षा कर रहे हैं। शायद यही कारण है कि विकासशील देश इसे समर्थ देशों की साजिश के तौर पर देख रहे हैं। उन्हें पता है कि अगर वे ऐसे किसी मसौदे पर हामी भरते हैं, तो आने वाले समय में उन्हें न केवल अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण में रहना होगा, बल्कि अपने देश और समाज के बारे में विकास संबंधी नीतियां बनाने में भी उन्हें पहले जैसी आजादी नहीं होगी।

इन तमाम अड़चनों के बावजूद मैं कोपेनहेगन से निराश बिलकुल नहीं हूं। यह अभी एक कदम भर है। ऐसी कोशिशें बार-बार करने की जरूरत है। हमें यह भी समझना होगा कि यह मामला सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग के अधिकतम स्तर को दो डिग्री सेल्सियस के भीतर रखने तक ही सीमित नहीं है। संकट इससे कहीं बड़ा और गंभीर है। ये दो डिग्री सेल्सियस भी आने वाले कुछ वर्षों में तुवालु और मालदीव जैसे देशों का अस्तित्व खत्म कर देंगे। चूंकि धीरे-धीरे यह संकट हर किसी पर आने वाला है, इसलिए जलवायु परिवर्तन के खतरे को समझने और इसके समाधान के लिए राजनीतिक सिर-फुटव्वल की नहीं, बल्कि तथ्यपरक और तर्कसंगत चर्चा की जरूरत है।

प्रस्तुति : भूपेश उपाध्याय
(लेखक भौतिकी के नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जो एक कार्यक्रम के सिलसिले में पिछले दिनों इलाहाबाद में थे)
 

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