डेढ़ हजार में नदी जिन्दा

Submitted by admin on Wed, 01/27/2010 - 13:04
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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


मालवा में एक कहावत है : क्वांर की गर्मी में हिरण भी काले पड़ जाते हैं। क्वांर की चुभन असहनीय होती है। वैसे इस क्षेत्र की पहचान बनारस की सुबह, शाम-ए-अवध और शबे-मालवा के रूप में भी होती है। मालवा की रातें अभी भी अनेक स्थानों पर ठण्डी और खुशनुमा होती है। मालवा से ही लगा है पश्चिमी मध्यप्रदेश का निमाड़ क्षेत्र। मालवा में यदि क्वांर में हिरण काले पड़ते हैं तो निमाड़ की तेज गर्मी में परिंदे तो ठीक इन्सान भी मरने लगते हैं। तापमान यहां 47 और कभी-कभी 48 डिग्री सेल्सियस छू जाता है। सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखलाएं और नर्मदा के आसपास का क्षेत्र यहां की भौगोलिक पहचान है। खरगोन, बड़वानी और खंडवा जिले का लगभग पूरा हिस्सा निमाड़ में आता है। देवास, धार और झाबुआ की नर्मदा पट्टी को भी निमाड़ में ही गिना जाता है।

भीषण सूखे के दरम्यान हम निमाड़ की पगडण्डियों पर बूंदों की मनुहार जानने निकल पड़े। कहीं हमें केवल डेढ़ हजार रूपये और समाज के सहयोग से नदियां लबालब मिलीं। कहीं तपते-नाराज दिखते सतपुड़ा की पहाड़ी जमीन पर पानी से भरा तालाब मिला। कुछ ऐसी मिसाले बता रही थीं। गर्मी में सफेद गमछा माथे पर डालने वाला निमाड़ का यह समाज नन्हीं-नन्हीं बूंदों को सहेज कर तेज तपन और सूखे के सामने आंखे तरेर सकता है।

हमारी यात्रा का पहला पड़ाव खरगोन जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर भीकनगांव है। यहां से हम झिरन्या रोड पर 8-10 किमी. दूर छिल्टिया गांव में हैं। यहां के ठेठ गंवई समझे जाने वाले समाज ने चमत्कार कर दिया। इस क्षेत्र में वेदा नदी बहती है। गर्मियों में अन्य नदियों की तरह यह नदी भी सूख जाती है। इस गांव में भी यही हुआ था। इस समाज की दृढ़ इच्छा शक्ति और प्रशासन की पहल ने यहां मैदान को फिर से नदी में बदल दिया। गांव में अजबलाल, अशोकसिंह, रामलाल और नानकलाल ने बताया : हमने पांच फिट रेत में खुदाई की। नदी की अंतर्धारा को रोका। पौने दो सौ फीट लम्बाई वाले पाट पर मिट्टी का बंधान बना दिया। अब यह विशाल जलराशि आप देख ही रहे हैं। पानी रोकने से सूखे में इस गांव की जिंदगी में बहार आ गई। पास ही कुछ कुएं भी रिचार्ज हो गए। आपको आश्चर्य होगा, समाज के श्रम के अलावा केवल पंद्रह सौ रूपये प्रशासन की ओर से राहत मद में मिले पैसे का उपयोग किया गया।

वेदा सतपुड़ा की पहाड़ी पर भोपाली-धुपी क्षेत्र से निकलती है। यह आगे जाकर नर्मदा में समाहित हो जाती है। ग्राम इगरिया में भी हमें भीषण गर्मी में भी नदी को जिंदा रखने वाले समाज के दर्शन हुए। पिछले साल गर्मी में इस नदी की पहचान-रेत और पत्थरों का एक छत्र साम्राज्य रह गया था। फती बाई कहती हैं- हम जाग गए तो इस साल बहुत आराम है। मैनें भी लगातार तीन दिन तक मिट्टी का बंधान बनाने में मदद की थी। कमलाबाई कह रही थीं: जब हम लोग बंधान बांध रहे थे तब उम्मीद नहीं थी, पानी मिल ही जाएगा। लालचंद, किशन और धन्नूलाल कहने लगेः पहले तो योजना और उसके सकारात्मक परिणाम पर विश्वास ही नहीं था। गांव के समाज ने इस पर चिंतन-मनन किया और सब मिलकर जुट गए। केवल चार दिनों में नदी से रेत हटाकर डेढ़ सौ फीट पाट वाला मिट्टी का बंधान बना दिया। पानी भरने के बाद हमने गांव के भारत, ललिता, दुर्गा, रचना, माया अमरोती के चेहरे पर वे भाव पढ़े जो केवल जिंदा नदी के किनारे रहने वाले खुशनसीब लोगों में ही पाए जाते हैं। जनपद प्रतिनिधि रघुनाथसिंह ने कहाः गांव का समाज प्रोत्साहन और मार्गदर्शन के लिए प्रशासन का आभार व्यक्त करता है।

वेदा नदी को जिंदा करने की इस रणनीति पर जिला पंचायत अध्यक्ष श्री तोताराम महाजन औऱ जिला कलेक्टर श्रीमती अलका उपाध्याय ने बेहतर प्रबंधन के साथ आयोजना तैयार की। भीकनगांव के अनुविभागीय दण्डाधिकारी श्री एचएस मीणा कहते हैं- जिला प्रशासन ने मिट्टी के बंधान के लिए प्रति विकासखंड छह हजार रूपये आवंटित किए थे। भीकनगांव और झिरन्या विकासखंड में हमारे पास केवल 12 हजार रुपये थे। हमने 29 कच्चे बंधान बनाने का फैसला किया। बिना समाज के सहयोग अकेले प्रशासन के बलबूते पर यह कार्य नहीं किया जा सकता था। हमने गांव-गांव समाज से चर्चा की। लोग सहयोग के लिए आगे आए। चंद दिनों में 29 बंधान बना दिए। इनकी लागत साढ़े तीन लाख रुपये होती यदि समाज सहयोग के लिए आगे नहीं आता। इससे आंकड़ों की दुनिया पर भरोसा रखने वाले, समाज की अहमियत से और अच्छी तरह से रूबरू हो सकते हैं। वेदा नदी पर समाज का यह चमत्कार केदवा, खेड़ा केदवा, जामन्या, पोखराबाद, कालीकराय, रतनपुर, माण्डवी, नरवट, बायरवेड़ा, पालधा, जूनापानी, पलौना-साकड़ सहित अन्य गांवों में देखने को मिल सकता है। ग्राम पोखराबाद में तो कच्चे बंधान से रोका गया पानी नगर पंचायत भीकनगांव ने पेयजल हेतु जनता को उपलब्ध कराया। इन बंधानों से आसपास के कुएं और ट्यूबवेल जिंदा रहे। दूर-दूर से लोग औऱ मवेशी पानी के लिए यहां आते रहे।

 

 

बूंदों की खातिर भूदान


खरगोन में पानी आंदोलन का एक और रूप हमें देखने को मिला। वह है बूदों के खातिर समाज के उस तबके द्वारा अपनी जमीनें दान में दे देना- जिनकी आर्थिक हालत पहले से ही बहुत अच्छी नहीं है। इसके लिए बड़े दिल की जरूरत होती है। लेकिन इस विशाल दुनिया में विशाल दिल वाले भी कम नहीं है। बूंदों से बदलाव की खोज और शोध यात्रा में हमने पाया कि मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के द्वारा शुरू पानी आंदोलन में समाज में सरकारी अफसरों की बात भी उसी रूप में अनेक जगह मानी जा रही है मानो वे समाज के नेता हों। गांव के सच्चे हितचिंतक हों। खरगोने के ही भीकनगांव के गांव खोलवा में हमने जलग्रहण क्षेत्र कार्यक्रम के परियोजना अधिकारी श्री आरके शर्मा और समाज के बीच रिश्तों की इस गर्मी को महसूस किया। शर्मा जब खोलवा के लोगों से बात करते हैं तो उनकी बात गांव वाले ऐसे स्वीकारते हैं, मानो वे उन्हें सब कुछ मानते हों।

मुस्लिम समाज बहुल वाले इस गांव में पचायत भवन की चौपाल पर गांव वालों से काफी देर तक पानी आंदोलन पर बातचीत की। यहीं हमने दो भाइयों को आदर से आदाब किया जिन्होंने तालाब के लिए अपनी डेढ़-डेढ़ एकड़ जमीन दान में दे दी। नाम है अनवर और अब्दुल्ला। यो आजादी के आंदोलन में कुर्बानी देने वालों की तरह पानी आंदोलन के ‘सेनानी’ नजर आए। पूरे गांव वाले भी इन्हें श्रद्धा के साथ प्रस्तुत कर रहे थे। पानी समिति अध्यक्ष मुस्तकीम खान और बुजुर्ग मन्नू खां बताते हैं: तालाब में बूंदों के थमने के बाद गांव के सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में व्यापक बदलाव आए हैं। पहले पूरे गांव में गेहूं की फसल 5 क्विंटल से ज्यादा नहीं होती थी, अब यह आंकड़ा 15 से 20 क्विंटल तक जा पहुंचा है। गर्मी का कपास भी पहले केवल दो या तीन लोग ही बोते थे अब अधिकांश लोग बो रहे हैं। पहाड़ी पर भी सैकड़ों वृक्ष फिर उग आए हैं। चारे की बहुलता से दुग्ध उत्पादन भी बढ़ा है। इस गांव का दूध अब भीकनगांव तक विक्रय के लिए जाने लगा है।

तालाब के लिए जमीन दान देने का सिलसिला अन्य गांवों में भी देखने को मिला। विकासखंड कसरावद के गांव पिपलई में पानी समिति के अध्यक्ष भवानीसिंह परमार ने अपनी जमीन तलाई और गेबियन संरचना के लिए दान में दे दी। बाल्या नंदा ने भी अपनी जमीन का मोह छोड़ा और एक उस स्थान पर एक तलाई बनवा दी। यहां पर समाज से अप्रोच परियोजना अधिकारी व्हीके. देवड़ा ने की। इसी तरह बलखड़िया के सीताराम ने अपनी दो हेक्टेयर जमीन परकोलेशन तालाब के लिए और सपडूभाई यादव ने अपनी एक एकड़ जमीन को बूंदों की खातिर दान देकर गर्व महसूस किया। परियोजना अधिकारी श्री एसएल. मधुकर उत्साहित होकर गांव में बूंदों से विकास के दिशा में जुट गए। इसी तरह से विकासखंड के महादेव पड़ावा में रूमालसिंह ने अपनी दो एकड़ जमीन दे दी। लिपनी में एक छोटी तलाई का निर्माण तुकाराम द्वारा अपनी एक एकड़ जमीन दान में देने से ही सम्भव हो पाया। जलालाबाद में फूलसिंह ने समाज में पानी की बूंदों की महत्ता का फैलाव करने के लिए आव देखा न ताव और अपनी तीन एकड़ जमीन दे दी। इन सब मामलों में सेगांव के परियोजना अधिकारी ओपी शर्मा के ‘सामाजिक योगदान’ की गणना करना मत भूलिएगा। गोगांवां के परियोजना अधिकारी श्री टीएल. सोलंकी ने समाज को साथ लिया और मंजिल बना ली। मेघर घट्टी की पहाड़ी। कभी जंगल से आबाद रही यह पहाड़ी वीरान हो चुकी थी। बूंदें पहाड़ी के भीतर न जाते हुए बहकर चली जाती थीं, अकेले नहीं बल्कि मिट्टी के साथ। क्षेत्र का भूमिगत जल स्तर भी नीचे जा रहा था। लेकिन समाज के संकल्प के आगे भला कौन से अवरोध खड़े हो सकते हैं।

..........हमें झाबुआ के काकरादरा की याद आ गई। वहां भी कभी जंगल काटने वाले चैनसिंह और उनकी टोली ने पहाड़ी को जिंदा कर दिया था। वहां सागवान के हजारों वृक्ष फिर उग आए थे।........मेहर घट्टी में भी किशन केता, कांतिलाल, केस्तरिया के साथ जब पूरे समाज ने कोशिश को तो यहां कुछ क्षेत्र खैर, आंवला, सागौन व धावड़ा के वृक्षों से पुनः आच्छादित हो गए। पानी आंदोलन के पूर्व इस गांव में पहले 121 हेक्टेयर में फसल उत्पादन होता था। अब यह क्षेत्र बढ़कर 202 हेक्टेयर हो गया है।

खरगोन में बूंदों को सहेजने के अभियान में गांव-गांव जनजागृति के लिए दौरा कर रहे जिला पंचायत अध्यक्ष तोताराम महाजन से भी हमारी मुलाकात हुई। उनका कहना है- बूंदों के बह जाने से बचाने की हमारी कोशिशें ही हमारे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। गांवों के समाज में इस क्षेत्र में अब अपेक्षाकृत जागृति आ रही है। सभी का एक ही मकसद होना चाहिए- पानी रोको। मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के उस आह्वान का व्यापक असर खरगोन के समाज में भी हुआ है, जिसमें वे कहते हैं : सूखे की आपदा को अवसर में बदलना है। वेदा नदी को जगह-जगह जिंदा कर यहाँ के समाज ने बता दिया है कि उसमें सूखे से लड़ने का माद्दा है। हमारा मानना है कि पानी को सहेजने के लिए सरपंचों को दिए जाने वाला प्रशिक्षण गांवों में बड़ा बदलाव लाएगा। एक योग्य सरपंच सरकारी योजनाओं और समाज के सहयोग से गांव की तस्वीर बदलने में सक्षम है। इस पर अमल के लिए हम एक कार्ययोजना बना रहे है। महाजन का मानना है कि खरगोन में बूंदें रोकने के लिए पहाड़ियों पर व्यापक उपचार की जरूरत है। हमने नए तालाबों के निर्माण के साथ पुराने तालाबों का भी जीर्णोद्धार का काम हाथ में लिया है।

बड़वानी से 8 किलोमीटर दूर जैन तीर्थ स्थल बावनगजा है। सतपुड़ा की पर्वतमालाओं के बीच भगवान बाहुबली की विशाल पत्थरों से तराशकर बनाई गई प्रतिमा देश-विदेश में मशहूर है। बरसात में बावनगजा की पहाड़ियों के झरने सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन गर्मी में इनकी तपन अच्छे-अच्छे के होश उड़ा देती है। पानी का यहां दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं मिलता है। चारों ओर पहाड़! इसी रास्ते पर आगे चलकर पाटी आता है।

हम इस समय पाटी विकासखंड के डोंगरगांव में खड़े हैं। पानी आंदोलन का नेता आदिवासी सहदरिया पटेल भगोरिया पर्व में जाने की तैयारी कर रहा है। गांव घुमाते हुए वह कहता जाता है- सरकारी अफसर आकर जब शुरू में पानी आंदोलन की बात करते तो हमें लगता यह भी कोई सरकारी कार्य होगा। गांव के समाज को श्री अण्णा साहेब हजारे का पानी रोकने वाला काम दिखाने के लिए ले जाया गया। सहदरिया कहते हैं-यूं समझिए, गांव वालों ने उस समय ही ठान लिया था कि डोंगरगांव को रालेगांव सिद्दी बनाकर ही दम लेंगे। निशाना गांव की पहाड़ी थी। यहाँ कणटूर ट्रेंच तैयार कर उसके आस-पास पौधारोपण किया गया। पहाड़ पर रोक लगाई गई। वर्षा की बूंद पहले पहाड़ी से सीधे बहकर नालों में बहती हुई, सीधे गांव से बाहर निकल जाती थी। समाज हाथ पर हाथ धरे बैठे रहता था। वर्षा बाद बेकारी और पलायन के हालात पैदा होते। लेकिन पहाड़ी पर बूंदों की इस ‘इबादत’ के बाद वे थम गई और समाज को प्रसन्न कर दिया। गिट्टी और पत्थर के पहाड़ पानी के पहाड़ बनने लगे। इसी तरह गांव वालों ने पानी को जगह-जगह रोका। कहीं बांध बनाए तो कहीं गेबियन संरचनाएं। इस रूके पानी से किसानों ने फसल के लिए भी सिंचाई की।

इस गांव की कहानी सुनते-सुनते हम एक बड़े जल भंडार के सामने आ गए। इस भीषण गर्मी और दो साल से सूखे का सामना कर रहे पाटी क्षेत्र में इतना पानी!! हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। पहले तो हमें लगा क्या यह रेगिस्तान का कोई ‘नखलीस्तान’ तो नहीं है। थोड़ा निकट गए........हां, वास्तव में जल भंडार मौजूद है।

दो साल से रोक रखी इन बूंदों की विशाल राशि की माफिक आत्मविश्वास से लबरेज सहदरिया ने हमें विस्तार से किस्सा सुनाया कि किस तरह गांव के समाज ने जलग्रहण कार्यक्रमों के चलते यहां पानी रोका। वे कहते हैं बूंदे रुकने के बाद गांव में एक नई तरह की आस्था जागी है। गांव में घाटों की कटाई करके एक फालिए से दूसरे फालिए में जाने वाले रास्तों को आसान बनाया है। एक नया मंदिर बना। उसके बाद गांव के कुछ लोगों ने शराब भी छोड़ दी। प्रत्येक हनुमान जयंती को यहां मेला भी लगता है।

.........सहदरिया और डोंगरगांव के समाज ने सतपुड़ा के तपते पहाड़ों पर मानों बूंदों की इबादत लिक दी : ‘समाज संकल्प ले तो डोंगरगांव की तरह दूसरे गांव भी बदल सकते हैं!!’

 

 

 

 

 

 

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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