क्या नदियों को जोड़ा जा सकता है?

Submitted by admin on Wed, 01/27/2010 - 15:27
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3 अक्टूबर 2002 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय सरकार से कहा है कि वह देश की नदियों को दस साल के भीतर जोड़ने के बारे में विचार करे। इस समाचार ने उन सब को चौंका दिया है, जो पानी से जुड़े सवालों के बारे में सोचते रहे हैं। नदियों को जोड़ने के प्रस्ताव के लिए यह दलील दी जाती है कि देश के कुछ भागों में तो पानी की कमी है, और कुछ भाग बाढ़ से पड़ित रहते हैं। इसका हल यही है कि ज्यादा पानी वाली नदी घाटियों से कम पानी वाली नदी घाटियों को स्थानांतरित किया जाए। उच्चतम न्यायालय का यह निर्देश न्यायिक एक्टिविज्म के एक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

वैसे देश के उत्तर की नदियों को दक्षिण की नदियों से जोड़ने का पहला प्रस्ताव 1970 में पेश किया गया था। तब देश की नदियों को जोड़ने के बारे में नेहरु मंत्रिमण्डल के सिंचाई मंत्री केएल राव के गंगा कावेरी नहर योजना की सबसे ज्यादा चर्चा हुई थी। ढाई हजार किलोमीटर से ज्यादा लम्बी इस प्रस्तावित नहर में गंगा के करीब 50 हजार क्यूसेक पानी को करीब साढ़े पांच सौ मीटर ऊंचा उठाकर दक्षिण भारत को ले जाना था। केन्द्रीय जल आयोग ने इसे रद्द कर दिया था क्योंकि एक तो यह आर्थिक रूप से यह अव्यवहारिक है, दूसरे, इसमें बहुत बिजली खर्च होगी, तीसरे इससे बाढ़ नियंत्रण के फायदे नहीं मिलेंगे और चौथे, जलाशयों की व्यवस्था न होने के कारण इससे सिंचाई के फायदे भी नहीं मिलेंगे।

इसके बाद कैप्टेन दिनशा दस्तूर ने 1977 में गार्लेण्ड नहर का प्रस्ताव पेश किया। जिसमें दो नहर प्रणालियों की बात कही गयी थी। एक नहर प्रणाली हिमालय के दक्षिण ढाल में 90 जलाशयों के साथ होना था और दूसरी मध्य और दक्षिणी नहर प्रणाली जिसमें 200 जलाशय होने थे। दो विशेष समितियों ने इसे इस बिना पर खारिज कर दिया कि-यह तकनीकी आधार पर कमजोर है, और आर्थिक आधार पर संभव है।

सरकार अब एक नयी योजना प्रस्तुत कर रही है जो 1980 में विकसित हुए नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान का सुधरा हुआ रूप है। इसमें हिमालय की नदियों का विकास इस प्रकार किया जायेगा कि भारत में गंगा और ब्रह्मपुत्र की खास सहायक नदियों में पानी एकत्र करने के सरोवर बनाए जायेंगे। इस योजना में हिमालय की नदियों के विकास में भारत, नेपाल और भूटान में गंगा और ब्रहमपुत्र की मुख्य सहायक नदियों में पानी संग्रह करने के जलाशय बनाए जाएंगे। इसके साथ ही इसमें गंगा की पूर्वी सहायक नदियों का अतिरिक्त पानी स्थानान्तरित करने के लिए परस्पर जुड़ी नहर प्रणाली का प्रस्ताव है मुख्य ब्रहमपुत्र और उसकी सहायक नदियों को गंगा के साथ जोड़ने का और गंगा महानदी से जोड़ने का प्रस्ताव भी है। दक्षिण भारत की नदियों को जोड़ने की योजना के चार हिस्से हैं-

1. महानदी-गोदावरी-कृष्णा-कावेरी नदियों की श्रृंखला

2. मुम्बई और ताप्ती नदी के बीच की पश्चिम की तरफ बहने वाली नदियों की श्रृंखला

3. वेन-चम्बल

4. पश्चिम की तरफ बहने वाली अन्य नदियों को पूर्व की तरफ मोड़ना

नदियों को जोड़ने के इस निर्देशक के बारे में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केन्द्रिय सरकार के जल संसाधन विभाग के पूर्व सचिव रामस्वामी अय्यर तो यही सवाल उठाते हैं कि जिसे जुडीशियल एक्टिविजम कहा जाता है उसके लिए नदियों को जोड़ने का विचार क्या सही मुद्दा है?...पीने के पानी का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है और उच्चतम न्यायालय को निर्देश दे सकती है कि- इस अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए। पर उस अधिकार को कैसे सुनिश्चित किया जाये यह बताना न्यायपालिका के क्षेत्र में नहीं आता। ऐसे कई अलग-अलग तरीके हैं जिनके द्वारा लोगों के पाने के पानी की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, और इस संदर्भ में नदियों को जोड़ने का उपाय उनमें से एक है उच्चतम न्यायालय को सरकार को इस जरूरत को पूरी करने लिए कदम उठाने का निर्देश देना था पर इसके लिए कौन सा रास्ता अपनाया जाए यह उसे नहीं बताना था।

वे आगे कहते हैं कि यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि पानी के प्रति अधिकार और नदियों को जोड़ने के बीच कोई सीधा संबंध है। पानी के प्रति “मानव अधिकार” की बात इस संदर्भ में उठायी जाती है कि पानी याने पीने का पानी जीवन के लिए जरूरी है। पर पेयजल तो पानी की कुल जरुरत का एक छोटा सा हिस्सा है। असल में पानी की विशाल जरूरत अक्सर सिंचाई के संबंध में उठती है जो हमारे उपयोग योग्य जलस्रोतों का 80 फीसदी से ज्यादा है। इन विशाल मांगो के लिए ही बड़ी परियोजनाएं – बड़े बांध, लम्बी दूरी तक पानी का स्थानान्तरण, नदियों को जोड़ने-की मांग उठाई जाती है। इसलिए जुडिशियल एक्टिविज्म को सही ठहराने के लिए का हवाला देकर नदियों को जोड़ने के निर्देश देना तर्कसंगत नहीं हो सकता।

अय्यर आगे कहते हैं कि उच्च न्यायालय सिर्फ यह कह सकता है कि “नदियों के पानी पर होने वाले झगड़ों को दूर करने के तरीके निकालिए।” यह नहीं कि “कम पानी वाली नदियों में पानी बढ़ाने के लिए बचत वाली नदियों से पानी स्थानान्तरित कीजिए और झगड़े दूर कीजिए”। ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय ने यह मान लिया है कि नदियों को जोड़ना एक स्वीकार्य विचार है जिस पर दशकों से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अगर ऐसा होता तो कार्यवाही तेज करने का निर्देश देना न्यायिक एक्टिविज्म के लिए ठीक कार्यवाही दिखती है। पर यह याद दिलाना जरूरी है कि नदियों को जोड़ने का विचार पुराना होने पर भी उसकी मजबूती और व्यावहारिकता पर हमेशा सवाल उठाये जाते रहे हैं।

न्यायिक एक्टिविज्म कितना सटीक और उचित है इस पर हम विचार न भी करें तो भी देश की नदियों को जोड़ने का मामला इतना सरल नहीं है। इसके सिर्फ आर्थिक पहलु ही नहीं है बल्कि उसके साथ सामाजिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक मुद्दे भी जुड़े हैं। जिनके बारे में गंभीरता से सोचना होगा। नदियों को जोड़ने के संबध में विचार करते समय निचे लिखे बिन्दुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता-

• तादाद नदियों को समुद्र में जाने से रोकने से पूरा हाइड्रोलाजिकल चक्र बदलने की आशंका है। बड़ी संख्या में बांध और नहरें बनाये जाने के कारण कृषि की पैदावार तो बढ़ेगी नहीं, बल्कि प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम बदल जाएगी। जिसमें बाढ़ और दलदलीकरण की समस्या पैदा हो जाएगी। पानी का स्थानान्तर करने के लिए कहां कितना पानी अधिशेष है इसके बारे में पर्याप्त अध्ययन और शोध नहीं हुए हैं।

• मद्रास इन्स्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट स्टडीज, चेन्नई के प्रोफेसर वैघनाथन कहते हैं कि भारत में करीब-करीब सभी नदियों में उच्चतम बहाव उसी समय यानी जुलाई से अक्टूबर के बीच होता है। तब बहुत भारी तादाद में पानी एकत्र करना होगा। वे कहते हैं कि वितरण का ऐसा नेटवर्क बनाना असंभव है जो सभी बेसिनों को पर्याप्त पानी पहुंचाने के योग्य हो।

• इसके अलावा दूर के स्रोतों से पानी स्थानान्तरित करने की विश्वसनीयता और पर्याप्तता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जिन नदियों की लिंक परियोजना की नहरें नेशनल पार्कों और अभयारण्यों से होकर जाएंगी उनके लिए पर्यावरण और वन मंत्रालय से मंजूरी लेने की जरूरत होगी।

• परियोजना में कई अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएं भी आएंगी। गंगा नदी के पानी के बंटवारे के बारे में दिसम्बर 1996 की भारत-बंग्लादेश संधि के अनुसार भारत ने यह वादा किया कि फरक्का बैराज में जो बहाव है उसे वह बनाए रखेगा। अब अगर नदियों को परस्पर जोड़ने की योजना अमल में लायी गयी और गंगा का पानी दक्षिण की नदियों को मोड़ा गया तो इस संधि की शर्तो को कैसे पूरा किया जा सकेगा।

अन्त में, एनडबलूडीए द्वारा पैरवी किया गया नदियों को जोड़ने का विचार 1997 में एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय कमीशन (एकीकृत जल संसाधन विकास योजना पर) द्वारा खारिज कर दिया गया था।

एक बेसिन से दूसरे बेसिन को पानी स्थानान्तरित करने की विशाल योजनाएं बनी हैं, जबकि हम एक बेसिन के दो पड़ोसी राज्यों को पानी के बंटवारे के लिए राजी नहीं कर पा रहे हैं। नेशनल वाटर डेवलपमेंन्ट एजेन्सी प्रायद्वीपीय नदियों को जोड़ने की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है लेकिन उड़ीसा यह मानने को तैयार नहीं है कि महानदी में अधिशेष पानी और आंध्र भी यह मानने को तैयार नहीं है कि गोदावरी में अधिशेष पानी है।

एक ओर तो हम कहते हैं कि बेसिन को हाइड्रोलाजिकल इकाई मानकर उसके आधार पर नियोजन होना चाहिए। और दूसरी ओर हम कह रहे हैं कि बेसिन की सीमाओं के पार जाकर नदियों को जोड़ना चाहिए। बेसिनों के बीच के प्राकृतिक अवरोधों के पार पानी को ले जाने के लिए पानी को उठाने में भारी तादाद में बिजली खर्च होगी। यदि सुरंगो के जरिये या पहाड़ के किनारे किनारे लम्बे रास्ते से नहर बनाकर पानी ले जाया जाएगा तो उसमें असाधरण रूप से ज्यादा व्यय होगा।

इस परियोजना में बड़े बांध, जलाशय और नहरें बनानी होंगी जिसमें बहुत निवेश लगेगा और उसका पर्यावरण पर बहुत असर होगा और विस्थापन और पुनर्वास की समस्याएं भी पैदा होंगी।

जो परियोजनाएं हाथ में हैं उनके लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। तब कैसे इस भीमकाय योजना के लिए धन जुटाया जायेगा?

अन्त में यही कहा जा सकता है कि नदियों को जोड़ने के बारे में एक उच्चस्तरीय नेशनल कमीशन ने विचार कर लिया है, और उसने इसे उपयोगी नहीं पाया है। बेहतर होगा कि हम-नदियों को जोड़ने के बारे में फिर से विचार करने के पहले उस कमीशन की रपट को देख लें और उसके द्वारा दिये गये तर्को पर गौर कर लें।

यहां यह जोड़ना जरूरी है कि पानी की कमी को दूर करने के लिए नदियों को जोड़ने से हटकर हमारे पास ज्यादा सार्थक तरीके है जैसे वाटर हारवेस्टिंग और जलसंचयन के पारम्परिक तरीके। इसके अलावा पुराने जलाशयों, तालाबों और बावड़ियों को फिर से जीवित किया जा सकता है। इसके साथ ही खेती, उद्योग या निस्तार के पानी के उपयोग में कुशलता और मितव्ययता लाने के लिए अभियान चलाया जा सकता है। जिससे पानी की आपूर्ति की समस्या हल हो सके।

सौभाग्य से, नदियों को जोड़ने के बारे में माननीय उच्चतम न्यायलय ने जो निर्देश दिये हैं- वे अंतरिम निर्देश हैं, और इस मामले पर पुनर्विचार करने के लिए अभी भी समय है। हमें उम्मीद करना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर जो टास्क फोर्स स्थापित होना है, वह नदियों को जोडने की सिर्फ माडलिटीज पर विचार नहीं करेगा बल्कि यह भी देखेगा कि नदियों को जोड़ने का विचार कितने मजबूत आधार पर टिका है? उसकी उपयुक्तता कितनी है? क्या वह अपरिहार्य है, और क्या उसका कोई विकल्प नहीं है?

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श्री सुरेश मिश्र लंबे समय से एकलव्य भोपाल से संबद्ध हैं। पानी आन्दोलन से आपका काफी पुराना जुड़ाव है। जलसंचय पर नियमित लेखन।

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