ऐसे किया जा सकता है जल संग्रहण

Submitted by admin on Sat, 01/30/2010 - 09:48
सर्वत्र सुगमता से प्राप्त होने के कारण भूजल आदिकाल से सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रमुख स्रोत रहा है। सूखा एवं अकाल के समय यह स्रोत प्रमुख रूप से उपयोगी रहता है। साधारणतः भूजल रोगाणुरहित होने से पाने योग्य जल का सर्वोत्तम स्रोत है। ग्रामीण क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक पेयजल स्रोत भूजल पर ही आधारित होते हैं। 50 से 80 प्रतिशत तक सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति भी इसी स्रोत द्वारा की जाती है। शहरों में भी लगभग 30 से 50 प्रतिशत तक आवश्यकताओं की पूर्ति भूजल स्रोतो द्वारा की जाती है। शहरों में आबादी बढ़ने एवं औद्योगिक विकास के कारण पीने एवं औद्योगिक उपयोग हेतु जल की मांग बढ़ी है। फलतः भूमिगत जलस्रोतों में कमी होती जा रही है। इमारतों, सड़कों एवं अन्य पक्के निर्माण की बहुलता एवं अवरोध तथा विकास के लिए जंगल एवं पेड़ों को बेरहमी से काटने के कारण वर्षा के जल द्वारा भूमि जल के पुनर्भरण में कमी आई है तथा इसके कारण वर्षा जल का लगभग 90 प्रतिशत भाग बहाव के रूप में व्यर्थ ही बह जाता है।

भूजल का अत्याधिक दोहन होने से संपूर्ण मध्यप्रदेश का मालवा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। मालवा क्षेत्र के लिए किंवदंती प्रसिद्ध थी –‘मालव धरती गहन गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर’। किन्तु वही मालव धरती आज भूजल स्तर गिरने से मरुस्थल बनती जा रही है। जिसका अधिकांश क्षेत्र पीने के पानी की समस्या से बुरी तरह प्रभावित है। यह चिंता का विषय है। वर्षा जल से कृत्रिम भूजल संवर्द्धन करके इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है।

कृत्रिम भरण की विधियाँ कोई नई बात नहीं है। आदिकाल से जिन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती थी, वहां इसका उपयोग लोग करते थे। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर क्षेत्र में जहाँ वर्षा बहुत कम होती है, पीने के पानी के लिए टाँके का निर्माण कर वर्षभर के लिए शुद्ध जल की व्यवस्था की जाती थी। वर्षा जल की एक-एक बूँद को व्यर्थ बहने से रोका जाता था। महाराष्ट्र में श्री अण्णा हजारे द्वारा रालेगांव सिद्धि, जहाँ औसत वर्षा बहुत कम होती थी, लोगों को पीने का पानी नसीब नहीं होता था, वहाँ विभिन्न कृत्रिम विधियों द्वारा वर्षा जल को जमीन के अंदर पहुंचाकर भूजल भंडारण में वृद्धि की गई तथा वह गाँव आज भारत का आदर्श गाँव बन गया है।

कृत्रिम पुनर्भरण विधियाँ अपनाने के पहले हमें यह जानना आवश्यक है कि भूमिजल या भौमजल क्या है? तथा यह किस प्रकार प्राप्त होता है?

भूजल (ग्राउंड वाटर) : भू सतह के नीचे चट्टानों के रंध्रों एवं दरारों में जो जल संचित रहता है, उसे भूजल, भूमिगत जल या भौमजल कहते हैं। वर्षा एवं हिमजल, आकाशीय जल कहलाता है। आकाशीय जल ही भूमिगत जल का प्राथमिक स्रोत है। वर्षा एवं हिमजल भू सतह पर गिरकर तीन भागों में विभक्त हो जाता है। एक भाग धरातल की प्रवणता के अनुसार ढालों पर बहता है। एक भाग धरातल की प्रवणता के अनुसार ढालों पर बहता हुआ नदियों, तालाबों, झीलों आदि में मिल जाता है। जल के इस भाग को त्वरितप्रवाह जल कहते हैं। दूसरा भाग वाष्पीकरण द्वारा वायुमंडल में पुनः लौट जाता है। तीसरा भाग भू सतह के नीचे शैल रंध्रों एवं दरारों में प्रविष्ट होता है। इस भाग को ही भूजल, भूमिगत जल या भौमजल कहते हैं। अतः वर्षा का जल ही भूमिगत जल का प्रधान स्रोत है।

भूमिगत जल की मात्रा चट्टानों में जल के प्रवेश करने या रिसने की क्षमता को पारगम्यता कहते हैं। अतः जो चट्टानें अधिक पारगम्य होती हैं, उनमें आकाशीय जल अधिक मात्रा में प्रवेश कर सकता है। उससे भूजल की मात्रा बढ़ जाती है। पारगम्यता के अनुसार चट्टानों को निम्नलिखित प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है।

(अ) पारगम्य : जिन शैलों में अधिक मात्रा में जल प्रवेश कर सकता है, पारगम्य कहलाते हैं। जैसे बालू, बजरी, बोल्डर्स, विदरित या जोड़ दरारयुक्त, चट्टानें, चूना-पत्थर आदि।

(ब) अर्द्धपारगम्य : इन शैलों में जलकुछ मात्रा में प्रवेश कर सकता है। उदाहरण सैंडीलोम, अपघटित पीट आदि।

(स) अपारगम्य : इस प्रकार के शैलों में जल बिलकुल ही प्रवेश नहीं कर सकता। जैसे अविदरित आग्नेश, शैल, कॉम्पेक्ट मेटामारफिक रॉक आदि।

भूमिगत जल पारगम्य स्तर समूह में मिलता है, जिन्हें जलभूत (एक्वीफर) कहा जाता है। इनकी संरचना के कारण क्षेत्रीय स्थितियों में इनके भीतर पर्याप्त जल गतिशील रहता है।

भूजल स्तर के उपस्थित अथवा अनुपस्थित होने के आधार पर जलभ्रत को अपरिरुद्ध (Unconfined Aquifer) अथवा परिरुद्ध (Confined Aquifer) जलभृतों की श्रेणी में विभाजित किया गया है।

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