भोजवेटलैंड : संरक्षण, प्रबंधन एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (CEPT) का मास्टर प्लान

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भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, आईसेक्ट विश्वविद्यालय द्वारा अनुसृजन परियोजना के अन्तर्गत निर्मित, 2015

भोजवेटलैंड के संरक्षण एवं प्रबंधन हेतु शासन द्वारा सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी के मास्टर प्लान से पूर्व में किये गये उल्लेखनीय कार्य इस प्रकार हैं-

म.प्र. सरकार द्वारा EPCO (Environmental Planning & Coordination Organisation) की स्थापना सन 1981 में की गई थी। सबसे पहले EPCO द्वारा ही भोजवेटलैंड के संरक्षण संवर्धन की मास्टर प्लान बनाई गई थी।

- MOEF (Ministry of Env. and Forests) भारत सरकार द्वारा भोजवेटलैंड के संरक्षण के लिये कुछ कदम उठाये गये थे।
- National Wetland Management Committee भी बनाई गई जिसका काम वेटलैंड्स का चयन करना एवं उनके संरक्षण के बारे में भारत सरकार को सलाह देना था।
- EPCO के द्वारा भोजवेटलैंड के लिये मास्टर प्लान बनाने के पश्चात मध्य प्रदेश सरकार ने भारत सरकार से आर्थिक अनुदान देने का अनुरोध किया ताकि इस मास्टर पलान का कार्यान्वयन किया जा सके। भारत सरकार ने इस मास्टर प्लान को जापान की सरकार के सामने द्विपक्षीय सहयोग के लिये रखा। OECF (Overseas Economic Cooperation Fund) का अनुमोदन जापान सरकार द्वारा किया गया। जापान ने इस मास्टर प्लान के लिये 209.97 करोड़ रु. की राशि दी। पूरी मास्टर प्लान के प्रोजेक्ट की अनुमानित राशि 247.02 करोड़ रु. थी। अतः इसमें शेष 37.05 करोड़ रु. का सहयोग मध्यप्रदेश सरकार ने दिया।

इस प्रोजेक्ट के 14 कार्य बिन्दु इस प्रकार थे-

1. गाद हटाना।
2. जल धारा के क्षेत्र को चौड़ा करना।
3. टापू का रख-रखाव।

कैचमेंट क्षेत्र में :-


4. वृक्षारोपण, वफर जोन बनाना।
5. दीवार, चेक डैम आदि बनाना।
6. छोटी झील के सभी तरफ गंदगी के निकास के लिये नाली बनाना।
7. मलमूत्र-सीवेज प्रदूषण की रोकथाम के लिये व्यवस्था।

तटीय क्षेत्रों का प्रबंधन :-


8. रेतघाट से लालघाटी तक लिंक रोड का निर्माण ताकि मानवीय और पशुओं की प्रदूषणात्मक गतिविधियों को रोका जा सके। यह कार्य पूरा हो चुका है।
9. ठोस गंदगी निवारण हेतु प्रबंध।
10. धोबी घाट से प्रदूषण का निवारण, रोकथाम

जल गुणवत्ता प्रबंधन :-


11. खरपतवार दूर करना।
12. जल गुणवत्ता की जाँच हेतु लेबोरेटरी।
13. फ्लोटिंग (तैरते) फव्वारे की स्थापना (झील के जल में ओषजन की मात्रा बढ़ाने हेतु)।
14. जल कृषि (मत्स्य पालन, कछुआ आदि पालन)।

इन योजनाओं के कार्यान्वयन एवं निगरानी के लिये नीचे लिखे अनुसार दायित्वों को बाँटा गया :-

योजना में भूमिका निर्वाह निगरानीयोजना में भूमिका निर्वाह निगरानी

झील में पर्यावरण बिगड़ने से सम्बन्धित समस्यायें एवं परिणामः सन 2000 के आस-पास बड़े तालाब की मुख्य समस्यायें-


- जल भंडारण क्षमता में कमी होना। (गाद के भराव के कारण)
- सीवेज (मल-मूत्र) का तालाब में मिलना।
- अतिक्रमण (मलिन बस्तियों का निर्माण एवं कृषि कार्य)
- जलीय वनस्पतियों की बहुतायत।
- मूर्ति विसर्जन, ताजिया विसर्जन।

छोटे तालब की समस्यायें :


- गाद जमाव।
- सीवेज का मिलना।
- धोबी घाट पर धुलाई की गतिविधियाँ। इसके अलावा इसमें 28 नालों का प्रदूषित अपशिष्ट भी मिलता था।
- कमल की खेती।
- जलीय वनस्पति की अधिकता।
- स्वच्छ जल की ऊपरी सतह का निकास।

छोटी झील से गाद हटाने के लिये पहले बान गंगा नाले, एमवीएम हॉस्टल और जहाँगीराबाद नाले को चुना गया।

बफर जोन बनाना इसलिये जरूरी था ताकि अतिक्रमण, पशुओं की गतिविधियाँ खेती आदि पर रोक लगाई जा सके। वन संवर्धन भी किया गया।

बड़ी झील के कैचमेंट में मार्च 1998 तक लगभग 12.94 लाख पेड़ लगाए गये। 792 हेक्टेयर की जमीन पर बफर जोन के अंतर्गत पौधा रोपण किया गया। 80 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण होने के कारण पौधरोपण नहीं हो सका। पौधों का चुनाव जलवायु, भूमि, वातावरण, जल उपलब्धता आदि को ध्यान में रखकर बड़ी सावधानी पूर्वक किया गया। पौधों के वित्तीय एवं औषधीय गुणों का भी चयन के समय ध्यान रखा गया।

वृक्षारोपण में जनसहयोग भी अपेक्षा के अनुकूल रहा।

छोटे तालाब के चारों ओर गारलैंड ड्रेन (Garland Drains) बनाने हेतु लगभग 23 लाख रुपयों की योजना बनाई गई।

लिंक रोड- रेत घाट से लालघाटी तक के लिंक रोड की लंबाई 4.9 कि.मी. है तथा इस पर 437.2 मीटर लंबे चार पुल बनाये गये हैं। इस योजना की अनुमानित लागत 26.04 करोड़ रु. थी।

ठोस अपशिष्ट- कैचमेंट क्षेत्र में करीब 131 टन प्रतिदिन के हिसाब से कचरा पैदा होता है। इसको भानपुर के पास निपटान किया जाता है।

धोबी घाट का स्थान- परिवर्तन रसायनों, डिटरजेंटों से प्रदूषण रोकने के लिये छोटी झील के धोबी घाट को पात्रा पुल के नीचे की दिशा में परिवर्तित किया गया है। यह कार्य धोबी भाइयों द्वारा स्वेच्छानुसार संपन्न किया गया है। धोबी घाट के पुनर्स्थापना के लिये 10.50 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई गई है।

जल गुणवत्ता प्रबंध :


परियोजना के अंतर्गत, झील के किनारे के उगे हुए, जल में तैरने वाले काई, शैवाल एवं अन्य वनस्पतियों को काटने, उखाड़ने और निकालने का कार्य हाथ में लिया गया।

बड़ी झील (Mesotrophic) अवस्था में मानी जाती है, किन्तु कहीं-कहीं उथले पानी में अतिपोषण (Eutrophication) हो रहा है।

छोटी झील में तो अत्यधिक पोषण (Hyper Eutrophication) है। इसके जल में पोषक रसायनों की भरमार है अतः वनस्पति भी अत्यधिक है।

जलीय वनस्पति के निपटान की योजना पर 14.05 करोड़ रु. खर्च आने का अनुमान था। पूरी जल-वनस्पति को सन 2000 तक निकालने की योजना थी। कुल जलीय वनस्पति का अनुमानित वजन 4 मीट्रिक टन था। जिसे निकालकर फेंकना था।

जल गुणवत्ता की जाँच के लिये EPCO में लैब की स्थापना की गई। इसमें जल के भौतिक, रासायनिक, जैविक गुणों के अलावा भारी धात्विक पदार्थों की भी जाँच का प्रावधान किया गया। लैब के ऊपर अनुमानित खर्च 2.12 करोड़ रु. था।

तैरते हुए फव्वारे (Floating Fountain) का लगाना इसलिये जरूरी माना गया ताकि जल में अधिकाधिक ऑक्सीजन घुले। ये फव्वारे 500 मीटर की त्रिज्या में घूम सकते हैं।

मत्स्य पालन :


जल को स्वच्छ बनाये रखने में मछलियों का बड़ा योगदान है। मछुआरों का सहयोग मत्स्य पालन में आवश्यक है। तालाबों में घास भोजी मछली, कटला, रोहित, म्रिगाल आदि मछलियों को डालने की योजना थी। इस योजना पर 1.07 करोड़ रुपयों का खर्च अनुमानित था।

जनभागीदारी, जन जागरण :


भोजवेटलैंड के प्रबंध में स्थानीय निवासियों का सहयोग आवश्यक है। अतः शैक्षणिक संस्थाओं, प्रायवेट गैर सरकारी संस्थाओं (NGOs) की सहायता से पर्यावरण जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान से झीलों को स्वच्छ, प्रदूषण रहित बनाये रखने में मदद मिलेगी।

भोजवेटलैंड के संरक्षण में महिला सहभागिता के लिये भी योजना बनाई गई। योजना की राशि 1.47 करोड़ रु. थी। इसके लिये भोपाल के निवासियों के सुझाव भी माँगे गये।

जे.बी.आई.सी. (JBIC) के सहयोग से तालाब की गाद की निकासी, खरपतवार की निकासी, सीवेज के बहाव की दिशा परिवर्तन, सीवेज के जल का उपचार एवं कैचमेंट क्षेत्र में वन संवर्धन के कार्य किये गये हैं।

गांधी नगर, महोली और कोटर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाये गये हैं।

गाद रोकने के लिये वन-रोपण किया गया है तथा चेक डैम बनाये गये हैं। झील के चारों ओर तीन-तीन की श्रेणी में वृक्षारोपण किया गया है।

भोजवेटलैंड प्रगति की डायरी :


लेखक ने अपनी डायरी में भोजवेटलैंड के संरक्षण और प्रबंधन के लिये शासन द्वारा समय-समय पर किये जा रहे कार्यों की जानकारी को स्थान दिया है। यह जानकारी सन 2005 से लेकर दिनांक 7 अक्टूबर 2014 तक दिनांक सहित दी गई है।

4 अप्रैल 2005 :


राजधानी का अपनी तरह का पहला जल आधारित मास्टर प्लान तैयार किया गया जिसके अनुसार न केवल भोपाल के सभी जल क्षेत्र प्रदूषण मुक्त होंगे अपितु बेतवा नदी में भोपाल की मिलने वाली गंदगी भी बंद हो जायेगी। इस योजना में भोपाल के 18 जल क्षेत्र शामिल किये गये थे। कार्य योजना की लागत 1500 करोड़ रुपये आँकी गई थी।

योजना के अनुसार तालाबों में मिलने वाले गंदे नालों को डबल डेकर नालों में तब्दील करके ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रावधान था जिससे कि बरसात का पानी तो तालाबों में जाये लेकिन गंदे पानी को रोका जा रके। गंदे पानी का उपचार करके सिंचाई के लिये बेचने की योजना थी। ठोस अपशिष्ट से खाद और बायोगैस बनाने की भी योजना थी।

छोटी झील के पानी के साथ ही पुराने शहर के नालों का जो गंदा पानी पातरा नाले से हलाली डैम और फिर बेतवा में जाता है उसे रोके जाने की योजना थी।

इस मास्टर प्लान में शामिल जलस्रोत इस प्रकार थे-

बड़ी झील, छोटी झील, कोलार बांध, कलियासोत बांध, हलाली बांध, केरवा बांध, हथाईखेड़ा बांध, शाहपुरा झील, लहारपुर रिजर्वायर, सारंगपानी तालाब, मोतिया तालाब, लेंडिया तालाब, सिद्दीक हुसैन तालाब, मुंशी हुसैन तालाब, चार इमली का तालाब, आयोध्या नगर के पोखर, दामखेड़ा के पोखर, नीलबड़ तालाब।

12 जुलाई 2011


दो जिलों में फैले कैचमेंट एरिया का प्रबंधन जरूरी

लगभग 84 गाँव कैचमेंट क्षेत्र में आते हैं। बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण के कारण तालाब तक पर्याप्त पानी नहीं पहुँच पाता।

कोलांस और उसकी सहायक नदी-नालों पर मकान, ईंट भट्टों और खेतों ने पानी का रास्ता रोकने का कार्य किया है। इस समस्या के हल के लिये सही प्रबंधन होना जरूरी है। कई स्थानों पर ईंट भट्टों के लिये नदी के आस-पास खुदाई कर पानी को रोका गया है, तो कहीं पर मकान बनाकर नदी की चौड़ाई को कम कर दिया गया है।

कोलांस नदी के उद्गम स्थल बमुरिया गाँव में नदी के चौड़ीकरण के लिये खुदाई की योजना थी। नदी के आस-पास बांस के पौधे रोपे गये थे, वे गायब हो गये। प्रशासन ने यह कार्य अवश्य किया है कि कैचमेंट एरिया में किसानों के साथ ही शासकीय जमीन और अतिक्रमण चिन्हित कर दिये। कोलांस नदी के संकरे होने से बमुरिया में बाढ़ आ जाती है।

उलझावन गाँव में नदी के आस-पास ईंट के अवैध भट्टे लगाये जाते हैं। टीलाखेड़ी के पास अतिक्रमण होता रहता है। नदी में मिलने वाले नाले भी उथले और संकरे होते जा रहे हैं। कमला खेड़ी के आस-पास के सहायक नाले भी अतिक्रमण की चपेट में हैं। ईंट खेड़ी के पास कोलांस नदी, बड़े तालाब में मिलती है। यहाँ के सहायक नालों पर भी अतिक्रमण/कब्जा किया गया है।

प्रशासनिक कार्य :


अतिक्रमण रोकने के लिये झील के किनारे मुनारें लगाई गई हैं। नये निर्माण पर रोक लगा दी गई तथा अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही करने की योजना है।

नदी पुनर्जीवन योजना :


नदी का चौड़ीकरण और पौध रोपण करने की योजना के अंतर्गत कहीं-कहीं कार्य हुआ है।

दोनों जिलों में पंचायतों के माध्यम से नदी पुनर्जीवन योजना बनाई गई है। इस योजना की लागत भोपाल में 12 करोड़ रु. और सीहोर में 15 करोड़ रु. आंकी गई है। डी.पी.आर. बनाने का प्रयास भी चल रहा है।

कैचमेंट एरिया दो जिलों में बंटा होने से (जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में आता है) इसका बेहतर प्रबंधन नहीं हो पाता।

अतः इस पूरे क्षेत्र के लिये एक ‘‘अथॉरिटी’’ होना चाहिए।

13 सितम्बर 2011


राज्य सरकार ने भोपाल विकास योजना 2021 को निरस्त कर दिया। राजधानी का मास्टर प्लान वर्ष 2030 की आवश्यकताओं के अनुसार बनाने का आदेश दिया। इसके लिये नया मसौदा बनाने का काम टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग को सौंपा गया।

मसौदा बनाने के लिये नई सैटेलाइट, इमेज, नया ट्रैफिक सर्वे एवं जनसंख्या के आंकड़ों का उपयोग करने की कवायद शुरू की गई।

नया मसौदा इसलिये बनाने का निर्णय लेना पड़ा, क्योंकि 29 अगस्त 2009 का मसौदा विवादों में आ गया था तथा अत्यधिक विरोधों में घिर गया था। अतः 18 अप्रैल 2010 को मुख्यमंत्री के निर्णय के अनुसार नए प्रारूप तैयार करने का काम शुरू करने की योजना बनाई गई। सन 2012 में सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नॉलाजी नामक संस्था का योजना बनाते हेतु चयन किया गया। यह योजना-रपट साधिकार समिति के अनुमोदन हेतु अक्टूबर 2014 में प्रस्तुत की गई जो अनिर्णीत रही।

पुराने मसौदे को तैयार करने में 30 लाख रु. से भी अधिक खर्च होने का अनुमान है। पुराने मसौदे के विरोध के कारण नीचे लिखे अनुसार हैं-

धारा 13 : बेवजह क्षेत्र बढ़ाने की प्लान पर सवाल उठे थे। अतः निवेश क्षेत्र में बदलाव करने तथा छोटा करने पर विचार शुरू हुआ।

धारा 15 (3) : लैंड यूज पर सबसे ज्यादा आपत्ति उठाई गई थी। इसके तहत बड़े तालाब के जल ग्रहण क्षेत्र में आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्र की अनुमति नहीं देने का प्रावधान करने पर विचार किया गया।

धारा 17 (1) : समिति के आकार और सदस्यों के चयन पर भी विवाद था। इसमें फेरबदल करने का विचार किया गया। नयी समिति में आर्किटेक्ट और शहर के बुद्धिजीवियों को शामिल करने की संभावना बनी।

30 नवम्बर 2011


बड़े तालाब का पानी पहले के मुकाबले अब ज्यादा साफ हुआ है। इसमें 2009 के मुकाबले 2010 में प्रदूषण कम हुआ है।

झील संरक्षण प्राधिकरण (LCA- Lake Conservation Authority) ने रिपोर्ट जारी की जिसके अनुसार भदभदा क्षेत्र को सबसे ज्यादा प्रदूषित पाया गया।

LCA ने बड़े तालाब के 18 स्थानों से पानी के नमूनों की जाँच करके रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) डिजाल्वड ऑक्सीजन और अम्लता के आधार पर जाँच की गई।

बी.ओ.डी की स्थिति :


बी.ओ.डी. की स्थितिअधिक प्रदूषित पानी में BOD अर्थात ऑक्सीजन की मांग बढ़ जाती है। मानक के अनुसार स्वच्छ जल की BOD 1-2 मि.ग्रा./लीटर होती है।

ज्ञातव्य है कि कम बारिश के कारण तालाब में कम पानी होने से प्रदूषण की मात्रा अधिक तीव्र हो जाती है। अधिक वर्षा होने पर अधिक पानी होने से तालाब के पानी में प्रदूषण की मात्रा कम हो जाती है। वन संवर्धन, वृक्षा रोपण, सीवर नेटवर्क मजबूत करने और कोलांस से अतिक्रमण हटाने से भी प्रदूषण कम हुआ है।

1. पश्चिमी जोन (कोलांस, भौंरी) : इस क्षेत्र में उर्वरकों के कारण जल में रसायनों की मात्रा ज्यादा है।

समाधान- जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाये। वृक्षारोपण किया जाये तथा कोलांस नदी को चौड़ा किया जाये।

2. उत्तरी जोन (बेहटा, बैरागढ़, खानूगाँव) : कमल और सिंघाड़े की खेती के कारण तथा सीवेज के कारण पानी की अस्वच्छता बढ़ गई है।

समाधन- खेती बंद की जाये तथा सीवेज रोका जाये।

3. अर्बन जोन (शहरी जोन, करबला, मेडिकल कॉलेज) :


-शिरिन नाले के कारण पानी प्रदूषित हो रहा है।
-मानवीय गतिविधियाँ- मल-मूत्र, विसर्जन हो रहा है।

समाधान- सीवेज ट्रीटमेंट प्लान्ट और सीवेज नेटवर्क मजबूत किया जाये।

4. दक्षिण पूर्वी जोन (कमला पार्क, याट क्लब, वन विहार) : धार्मिक गतिविधियाँ, ठोस अपशिष्ट डालने और नहाने से फास्फेट की मात्रा अधिक है।

समाधान- धार्मिक कामों के पदार्थ न फेंके जायें, स्नान पर रोक लगे। बोट क्लब पर कचरा न फेंका जाये। इसके लिये जन-जागरण आवश्यक है।

5. भदभदा जोन (भदभदा, रिपल चैनल) :


- नेहरू नगर आदि से सीधे सीवेज मिल रहा है।
- मूर्ति विसर्जन होता है।

इस कारण पानी में सीसा (लेड) की मात्रा अधिक है।

समाधान- सीवेज नेटवर्क बनाया जाये। विसर्जन के लिये अलग स्थान की आवश्यकता थी जो अब बन गया है। अतिक्रमण हटाये जायें।

6. दक्षिण जोन (स्टड फार्म और बिसन खेड़ी) : उर्वरकों के कारण रसायनों की मात्रा पानी में अधिक है।

समाधान- जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाये। वृक्षारोपण और अधिक किया जाये।

7. डीपर जोन (A,B,C) (तालाब के बीच में) :


यहाँ पानी की गुणवत्ता ठीक है। तली में गाद भराव है।

समाधान- गाद को हटाने का प्रबंध किया जाये। मोटर बोट के संचालन पर भी रोक लगे क्योंकि इससे भी जल में कार्बन के रसायन घुलते हैं।

4 मार्च 2012 सेप्ट (CEPT) का चयन :


मुख्यमंत्री म.प्र. द्वारा बड़े तालाब के कॉन्सेप्ट प्लान के लिये एक समिति का गठन किया गया था। समिति के द्वारा इस हेतु टेंडर बुलाए गये थे। करीब 24 कंपनियों ने इस हेतु अपना आवेदन दिया था। इनमें सेप्ट का चयन उसकी बेहतर प्लान के लिये किया गया। बड़े तालाब के संरक्षण संवर्धन और सौन्दर्यीकरण के लिये कॉनसेप्ट प्लान्ट तैयार करने का कार्य शुरू किया गया।

अहमदाबाद की सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (सेप्ट-CEPT) ने इसके लिये सर्वे प्रारम्भ किया। पूरी प्लान के एक वर्ष के अन्दर तैयार होने की संभावना थी।

सेप्ट द्वारा बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया का भू अभिलेख, पुरानी रिपोर्ट, मास्टर प्लान और अन्य जानकारियाँ ली जा चुकी हैं। लैंड यूज, जमीन का डिमार्केशन इत्यादि का भी सर्वे किया जा रहा था। बड़े तालाब के आस-पास के क्षेत्र की भी मैपिंग की गई है।

कॉन्सेप्ट प्लान के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-


- तालाब में पानी इकट्ठा करने की क्षमता बढ़ाने के उपाय।
- बड़े तालाब को प्रदूषण से बचाने के लिये नीति।
- तालाब के आस-पास के क्षेत्र का लैंड यूज बताना।
- झील के चारो ओर बॉटेनिकल गार्डन किस प्रकार बनाया जाये।
- पानी की गुणवत्ता को सुधारना।
- प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर ढंग से इस्तेमाल।
- तालाब में पर्यटन एवं वाटर स्पोर्ट्स की गतिविधियों को किस तरह बढ़ाया जाये।

ऊपर लिखे बिन्दुओं में एक बिन्दु और शामिल किया जाना चाहिए। वह है- बड़े तालाब में जल-चरों, जल पक्षियों के आवास, सुरक्षा संवर्धन को सुनिश्चित करना।

28 जुलाई 2012


टाउन एंड कंट्री प्लानिंग ने खुरचनी गाँव की करीब 22 एकड़ जमीन पर निर्माण की सलाह या अनुमति दे दी।

कान्सेप्ट प्लान बनाने तक इस सलाह या अनुमति को न देते तो ज्यादा उचित होता।

बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया में आवासीय एवं शैक्षणिक परमीशन देने का विवरण प्रकार है

9 सितम्बर 2012 तालाब के क्षेत्र में अतिक्रमण :


बोट क्लब से बैरागढ़ तक बडे तालाब का निरीक्षण करने पर पता चला कि तालाब के एफटीएल के पचास मीटर में और कई स्थानों पर तो एफटीएल में ही कब्जा करके मकान बना लिये गये। भारत भवन की लाइन में भी बहुत से अपार्टमेंट बन रहे हैं। यहाँ प्रापर्टी डीलर्स की भी प्रापर्टी है।

कमला नेहरू अस्पताल बड़े तालाब के किनारे पर है। साजिदा नगर पूरा तालाब के किनारे पर है। पूरा खानू गाँव ही तालाब के किनारे पर है।

शालीमार गार्डन, होटल नूर उस सबाह पैलेस का शुरुआती क्षेत्र, होटल इम्पीरियल सेबरे के अलावा लालघाटी के पहले तीन मैरिज गार्डन हैं।

शिल्प इंटरप्राइजेस की मार्बल की दुकान लालघाटी चौराहे, तालाब के किनारे के पास ही सुरभि मार्बल्स है।

ग्रीन सिटी गार्डन, स्वागत पैलेस, सनसिटी गार्डन, लायन सिटी गार्डन, लैंडमार्क गार्डन भी इसी सीमा में है।

9 सितम्बर 2012


भोजवेटलैंड परियोजना के तहत बोरवन में रोपित पौधे अब पेड़ बनकर तालाब की सीमा की रक्षा कर रहे हैं। यहाँ करीब तीन हजार पेड़ हैं। बोरवन नगर विकसित किया हुआ है। बोरवन गाँव में तालाब में FTL में ही नगर निगम ने स्कूल बना दिये। भवन का निर्माण किया जा रहा है। इसी के पार तालाब के किनारे हरिजन बस्ती बसाकर तालाब में ही सीमेंटेड रोड बना दी गई। पूरे क्षेत्र के सीवेज के पानी को तालाब की ओर पक्की नाली बनाकर रास्ता दे दिया। तालाब के पास राधा मंगल भवन शादी हॉल बना हुआ है। तालाब के किनारे हरिजन बस्ती में बनी मीट शॉप से निकला अपशिष्ट तालाब में ही सीधे फेंका जा रहा है।

18 जुलाई 2013


निर्माण करने की तालाब से दूरी 300 मीटर तय कर दी गई। इस सीमा में कोहेफिजा से लालघाटी, बैरागढ़ से लेकर पुराने शहर के गिन्नौरी, रेतघाट, नेहरू नगर, कोटरा, भदभदा, सूरज नगर आदि क्षेत्रों की जमीन शामिल होती है। अतः यहाँ पर भी तालाब से सम्बन्धित प्रबंध होने चाहिए।

तालाब से 50 मीटर सीमा में निर्माण की यह स्थिति है-

1. बोट क्लब पर टॉप एंड टाउन।
2. होटल रंजीत लेक व्यू, किनारे पर मंदिर।
3. मुख्यमंत्री निवास श्यामला हिल।
4. भारत भवन श्यामला रोड।
5. द लिटिल स्कॉलर स्कूल श्यामला रोड।
6. श्यामला हिल भारतीय स्टेट बैंक।
7. होटल विजय श्री।
8. आमना ब्रोकर की प्रापर्टी- वरदान अपार्टमेंट।
9. किनारे पर नया भवन (हाल में बना हुआ)।
10. VIP रोड के किनारे पुराने भोपाल का नवाब के समय का क्षेत्र।
11. कमला नेहरू चिकित्सालय, साजिदा नगर।
12. के.के. हाउस, खानूगाँव, होटल इम्पीरियल सेबरे, नूर उस सबाह पैलेस, शालीमार गार्डन।
13. NRI कॉलोनी का मार्ग।
14. VIP रोड पर लालघाटी से पहले तीन मैरिज गार्डन।
15. शिल्प इंटरप्राइजेस मार्बल, ग्रेनाइट की दुकान, सुरभि मार्बल। (तालाब के किनारे लालघाटी चौराहे के पास)
16. ग्रीन सिटी गार्डन, स्वागत पैलेस, सन सिटी गार्डन, लायन सिटी गार्डन, लैंड मार्ग गार्डन तथा तालाब के पास सीहोर किनारे सिटी वाक के नाम से भवन निर्माण हो रहा है।
17. तालाब के FTL में खेती जमकर की जा रही है।

मिठी गोविन्द राज पब्लिक स्कूल, नवनीत हासीमल लखानी पब्लिक स्कूल, संत हिरदाराम गर्ल्स कॉलेज, संत हिरदाराम मेडीकल कॉलेज ऑफ नेचुरोपैथी।

24 अगस्त 2013


बड़े तालाब में 24 मैरिज गार्डनों द्वारा फैलाये जा रहे प्रदूषण के बारे में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निर्देश पर नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड की संयुक्त टीम ने जिन 24 मैरिज गार्डन की जाँच की, वे सभी बड़े तालाब में प्रदूषण फैलाने के जिम्मेदार पाये गये हैं।

13 जून 2014


मैरिज गार्डन संचालकों को नोटिस दिये गये। बहुत से मैरिज गार्डन, हेल्थ क्लब के नाम से खोले गये थे किन्तु उनमें विवाह भी हो रहे थे। नए नियम के अनुसार मानक पूरे नहीं किये ऐसे मैरिज गार्डनों को बंद कर दिया जायेगा।

11 जुलाई 2014


बड़े तालाब के संरक्षण हेतु कैचमेंट क्षेत्र में 100 से 500 मीटर की दूरी तक निर्माण पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान विचाराधीन है।

सेप्ट (CEPT) द्वारा तैयार किये गये मास्टर प्लान में यह प्रावधान किया गया है। इसे अभी साधिकार समिति की मंजूरी मिलना है।

पहले 50 मीटर की दूरी का प्रावधान था। तालाब के कैचमेंट में अब 100 से 500 मीटर की दूरी तक निर्माण पर प्रतिबंध लगने से प्रदूषण भी कम होगा।

कैचमेंट के दायरे में आने वाले ग्राम इस प्रकार हैं-

भौंरी, बकनिया, मीरपुर, बरखेड़ा सालम, फंदा आदि।

CEPT द्वारा प्लान का मसौदा तैयार तो हुआ है किन्तु वह प्री ड्राफ्ट की स्थिति में है।

हलालपुर, कोहेफिजा, बहेटा, बोरबंद, बैरागढ़ में भी 100 मीटर तक नो कंस्ट्रक्शन क्षेत्र रखा गया है।

सेप्ट (CEPT) ने कैचमेंट के संरक्षण के लिये इसे तीन भागों में बांटा है- P-1, P-2 और P-3

P-1 क्षेत्र : तालाब के दक्षिण पश्चिम के हिस्से और कोलांस नदी के आस-पास के क्षेत्र को पर्यावरण के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माना है। यहाँ कोई भी निर्माण कार्य नहीं किया जायेगा।

P-2 क्षेत्र : तालाब व कोलांस नदी से 500 मीटर से ज्यादा दूरी वाले रातीबड़, नीलवड़, सेमरी, खुरचनी, चैनपुरा, टीलाखेड़ी में पार्क, फार्म हाउस का निर्माण प्रस्तावित है। कोलांस की सहायक नदियों से 250 मीटर की दूरी तक का क्षेत्र यहाँ पर P -1 क्षेत्र में रखा गया है।

P -3 क्षेत्र : यह क्षेत्र सबसे कम संवेदनशील है। इसमें तालाब से सटे शहरी व उत्तरी क्षेत्र भौंरी, फंदा, बकनिया आदि गाँव को लिया है। यहाँ 40 प्रतिशत स्थान ग्रीनरी के लिये छोड़ने पर निर्माण की अनुमति मिलेगी।

25 जुलाई 2014


निर्माण पर प्रतिबंध : सेप्ट अहमदाबाद के द्वारा बड़े तालाब के मास्टर प्लान के अनुसार कैचमेंट एरिया में कॉलोनियाँ अब नहीं बनेंगी। भौंरी, फंदा आदि क्षेत्रों में हाउसिंग, कॉमर्शियल और अन्य प्रोजेक्ट प्रतिबंधित होंगे। फार्म हाउस की अनुमति भी शर्तों के साथ मिल सकेगी। कैचमेंट के कुछ ही इलाकों में सिर्फ 0.01 फ्लोर एरिया अनुपात (Floor Area Ratio) के साथ फार्म हाउस बन सकेंगे। अर्थात कुल जमीन के एक प्रतिशत हिस्से में ही फार्म हाउस बन सकता है।

कैचमेंट एरिया को चार भागों में बाँटा गया है-

P -1, P -2, P -3 और ग्रामीण आबादी वाला क्षेत्र।

मुख्य प्रावधान :


- VIP रोड पर खानूगाँव से बैरागढ़ तक बॉटेनिकल गार्डन, अर्बन पार्क विकसित करना।
- याट क्लब का पुनर्नवीकरण करके नया बोट क्लब बनाना।
- वन विहार वाले क्षेत्र में गाड़ियाँ प्रतिबंधित करना तथा पर्यटन को बढ़ावा देना।
- सेवनिया गौड़ से बिसन खेड़ी तक वन विकसित करना।

100 मीटर तक निर्माण नहीं :


P -1 क्षेत्र में सेवनिया गौड़ से जामुनिया छीर सहित तालाब के FTL लेबल से 500 मीटर और शहरी क्षेत्र में 100 मीटर तक नो कंस्ट्रक्शन जोन रहेगा। कोलांस नदी के दोनों ओर 500 मीटर, सहायक नदियों के दोनों ओर 250 मीटर व इनकी शाखाओं से दोनों ओर 100 मीटर की दूरी तक निर्माण प्रतिबंधित है।

P - 2 क्षेत्र के कैचमेंट में कोलूखेड़ी से बिलकिस गंज तक का क्षेत्र है। इसमें रातीबड़, नीलवड़, खुरचनी, टीलाखेड़ी, गाँव शामिल हैं। यहाँ सिर्फ फार्म हाउस का निर्माण किया जा सकता है।

P - 3 क्षेत्र में तालाब से सटे शहरी क्षेत्र और उत्तरी क्षेत्र में भौंरी, फंदा बकानिया आते हैं। यहाँ सिर्फ वेयर हाउस, कोल्ड स्टोरेज आदि शर्तों के साथ बनाये जा सकते हैं।

म.प्र. राज्य सरकार ने करीब दो वर्ष पूर्व तालाब का मास्टर प्लान बनाने का काम सौंपा था। छः माह की देरी से इस कार्य को सेप्ट ने पूरा किया है। इस प्लान के अनुसार कैचमेंट क्षेत्र में कम घनत्व वाले क्षेत्र (लो डेंसिटी एरिया) के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। पूरे क्षेत्र पर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट के तहत क्षेत्र विकास प्राधिकरण को अमल में लाने की बात कही गई है। इसका नाम ‘‘बड़ा तालाब संरक्षण एवं योजना प्राधिकरण’’ होगा।

अभी इस मसौदे पर साधिकार समिति एवं शासन की स्वीकृति मिलना शेष है।

6 अगस्त 2014


तालाब का मास्टर प्लान लागू होने में देरी


अहमदाबाद की सेप्ट यूनिवर्सिटी ने बड़े तालाब का मास्टर प्लान तैयार कर लिया है। यह प्लान का प्रारंभिक मसौदा भर है जिस पर साधिकार समिति की बैठक होना है।

जब तक यह मसौदा पास नहीं होता तब तक टाउन एण्ड कन्ट्री प्लानिंग को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करना है।

ये निर्देश हैं-


- तालाब से 300 मीटर दूर तक निर्माण की परमीशन नहीं दी जाये।
- तालाब के आस-पास लैंड यूज के विपरीत गतिविधियों पर कार्यवाही की जाये।

किन्तु अभी भी कैचमेंट में निर्माण की परमीशन दे दी गई। परमीशन के विपरीत निर्माण कार्य हुए हैं। इस ओर अनदेखी की जा रही है।

मुख्यमंत्री द्वारा झील प्रकोष्ठ और प्राधिकरण बनाने की घोषणाओं का क्रियान्वयन नहीं हो सका है।

सेप्ट से मास्टर प्लान तैयार कराने एवं साधिकार समिति की बैठक बुलाने की जिम्मेदारी नगरीय विकास व पर्यावरण विभाग की है। नगरीय विकास व पर्यावरण विभाग को यह जिम्मेदारी भी दी गई है कि वह नगर निगम तथा टी. एण्ड सी.पी. के कामों की निगरानी करे।

नगर निगम को तालाब से 50 मीटर की दूरी में नो कंस्ट्रक्शन जोन में से अतिक्रमण हटाना था। मुनारें लगवानी थीं, सीवेज को तालाब में मिलने से रोकने की योजना का क्रियान्वयन करना था, लेकिन वह खानू गाँव में लेक फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर ही अड़ा रहा।

सेप्ट के अनुसार मौजूद जंगल को नष्ट न किया जाये।

12 अगस्त 2014


भोपाल में लगभग 103 मैरिज गार्डन हैं। इनमें से बहुत से मैरिज गार्डन पर्यावरण सम्बन्धी नियमों का पालन नहीं करते। दो-चार मैरिज गार्डन को छोड़कर किसी को संचालन की अनुमति नहीं है। फिर भी सभी मैरिज गार्डन में शादी की बुकिंग हो रही है। मैरिज गार्डन के संचालकों का कहना है कि बिल्डिंग परमीशन सम्बन्धी एवं अन्य मसलों पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। संचालकों का कहना यह भी है कि वे पर्यावरण नियमों का पालन कर रहे हैं। नगर निगम और मैरिज गार्डन के परस्पर विरोधी कथनों के कारण स्थिति ऊहापोह की बनी हुई है।

नेशनल ग्रीन ट्रिव्यनल (NGT) के आदेशानुसार मैरिज गार्डन से निकलने वाले कचरे को किसी भी तालाब में नहीं जाने दिया जाये। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निरीक्षण करने का आदेश दिया गया है।

नगर निगम ने स्वीकार किया है कि बड़े तालाब के आस-पास 24 मैरिज गार्डन हैं। कुछ मैरिज गार्डन के संचालकों का कथन है कि उनके पास हेल्थ क्लब और आमोद प्रमोद क्लब चलाने की अनुमति है मैरिज गार्डन चलाने की नहीं।

एन.जी.टी. द्वारा नगर निगम से कहा गया है कि वह मामलों के सम्बन्ध में नोटिस देने की कार्यवाही शुरू करें।

अगस्त 2014


बड़े तालाब के कैचमेंट क्षेत्र में आने वाले अनेक ग्रामों के लोगों ने उनके ग्रामों को कैचमेंट क्षेत्र में लिये जाने का विरोध किया। उनका कहना है कि उनके ग्रामों को नगर निगम की सीमा में लिया जाये जिससे कि उन्हें निगम के लाभ और शहरी विकास के अन्य फायदे मिल सकें। इसके विरुद्ध ग्रामीणों का एक वर्ग यह मानता है कि उनके ग्रामों को नगर निगम की सीमा में नहीं लिया जाये। उनका मानना है कि इससे उन्हें अपनी भूमि एवं मकान पर भारी संपत्ति कर देने से छूट मिल जायेगी।

10 अगस्त 2014


बड़े तालाब के कैचमेंट एरिया में इंटीग्रेटेड वॉटरशेड मैंनेजमेंट प्रोग्राम (आईडब्ल्यूएमपी) के तहत 4 वॉटरशेड बनाए जायेँगे। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी (सीएसआर) के जरिए चारों वॉटरशेड प्रोजेक्ट क्रियान्वित किये जायेँगे। इसके क्रियान्वयन के लिये विभाग ने महिन्द्रा एंड महिन्द्रा और आईटीसी को यह काम दिया है। तालाब के कैचमेंट एरिया में आने वाले भोपाल-सीहोर जिलों के सभी मुख्य 65-66 गाँवों की अलग-अलग डीपीआर तैयार की जा रही है। गाँवों का सर्वे किया जा चुका है और डीपीआर अंतिम स्टेज पर है। इसमें भोपाल की 12 हजार 140 हेक्टेयर और सीहोर जिले की 9 हजार हेक्टेयर जमीन शामिल है।

1 हेक्टेयर पर 12 हजार खर्च


सेप्ट यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट और अनुशंसाओं में से एक अहम बिन्दु कैचमेंट एरिया का प्रबंधन था। इससे बड़े तालाब में आने वाली गाद, केमिकल, मल-मूत्र सहित अन्य प्रदूषण घटकों पर नियंत्रण होगा। इसी अनुशंसा के आधार पर कैचमेंट एरिया में वॉटरशेड प्रोजेक्ट विकसित किये जायेंगे। इस प्रोजेक्ट में एक हेक्टेयर जमीन पर 12 हजार रुपये का खर्च आयेगा चारों प्रोजेक्ट पर करीब 25 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होगा। प्रोजेक्ट का पूरा खर्च सरकार वहन करेगी, जबकि प्रोजेक्ट का प्रशासनिक व्यय एजेंसियाँ उठाएँगी। प्रोजेक्ट में मृदा व जल संधारण-संरक्षण पर कुल बजट का 56 प्रतिशत खर्च होगा। वहीं कैचमेंट एरिया की कृषि भूमि के विकास पर 10 प्रतिशत, स्थानीय लोगों के आजीविका विकास पर 9 प्रतिशत और एंट्री प्वाइंट एक्टिविटी पर बजट का 4 प्रतिशत खर्च होगा।

हर गाँव की एक डीपीआर :


कैचमेंट एरिया में स्थित हर गाँव की एक डीपीआर तैयार की जा रही है, कुछ का ड्राफ्ट तैयार भी हो चुका है। इसे शासन के पास मंजूरी के लिये भेजा गया है, यदि शासन से मंजूरी मिल जाती है तो इसी ड्राफ्ट के आधार पर अन्य सभी डीपीआर तैयार की जायेँगी। इसमें हर गाँव के प्रत्येक परिवार और उसकी जीविका व कृषि भूमि के सर्वे नंबरों सहित बारीकी से विश्लेषण किया गया है, ताकि भू-स्वामियों को प्रभावित किये बिना कैचमेंट एरिया से आने वाले प्रदूषण घटकों को नियंत्रित किया जा सके।

भोपाल के इन गाँवों में बनेंगे 2 वॉटरशेड :


बरखेड़ा नाथू, मुगालिया छाप, कलखेड़ा, मालीखेड़ा, रोलूखेड़ी, सिकंदराबाद, रसूलिया गोसाई, सेमरी बजायफ्त, खारपा, नांदनी, खारपी, जमुनियाछीर, भौंरी, कोलूखेड़ी, लखापुर, ईंटखेड़ी छाप काजलस, कोदिया, साइस्ताखेड़ी, पिपलिया धाकड़, हथाईखेड़ी, जाटलखेड़ी, खोखरिया, दुबड़ी, मुंडला, कल्यानपुर, देहरिया कलां, बड़झीर, खुरचनी, टिलाखेड़ी नरेला, झागरिया खुर्द, रसूलिया घाट, खामला खेड़ी, फंदाकलां, फंदा खुर्द, खजूरी सड़क भोपाल के अलावा करीब 28 गाँव सीहोर जिले के हैं।

कमिश्नर, आई डब्ल्यू एम पी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार बारिश के बाद अर्थात अक्टूबर-नवम्बर 2014 से डी पी आर के अनुसार काम शुरू करने की योजना बनाई गई। इस कार्य के परिणाम दो-तीन साल बाद ही दिख सकेंगे।

महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा के मैनेजर, वाटरशेड मैनेजमेंट सस्टेनेबिलिटी के अनुसार वाटरशेड प्रोजेक्ट का कार्य चल रहा है। डीपीआर तैयार करके IWMP (इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम) को भेजा जा चुका है। अभी इसकी मंजूरी मिलना बाकी है। मंजूरी मिलते ही कार्य शुरू कर दिया जायेगा। इसे तीन-चार साल में पूरी करने की जिम्मेदारी महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा और आई टी सी की है।

23 जुलाई 2014


बड़े तालाब पर सेप्ट द्वारा तैयार किये गये मसौदे पर साधिकार समिति की बैठक 23 अगस्त 2014 को आहूत की गई। वीआईपी रोड पर खानू गाँव से बैरागढ़ तक बॉटेनिकल गार्डन, अर्बन पार्क विकसित करने की योजना विचाराधीन है। वन विहार में गाड़ियों का आवागमन प्रतिबंधित रहेगा। पुराने याट क्लब का भी पुनर्निर्माण किया जायेगा।

ज्ञातव्य है कि बड़ी झील की मास्टर प्लान बनाने के लिये अहमदाबाद के (CEPT- Centre for Environmental Planning & Technology University) को कार्य सौंपा गया था।

मास्टर प्लान में सभी मुद्दे शामिल हैं जैसे- भोजवेटलैंड का संरक्षण, जल प्रदाय, जल की गुणवत्ता में सुधार, सीवेज, कृषि, वन संरक्षण एवं भूमि का उपयोग आदि।

सेप्ट ने इन बिन्दुओं पर भोपाल नगर निगम के समक्ष अपनी जो मास्टर प्लान/रिपोर्ट रखी है, उसका सितम्बर 2014 के अंतिम सप्ताह तक नगर निगम द्वारा अध्ययन किया जा रहा था। नगर-निगम की महापौर एवं भोजवेटलैंड पर बनाई गई साधिकार समिति की तत्कालीन अध्यक्ष श्रीमती कृष्णा गौर के अनुसार रिपोर्ट की प्रतियाँ समिति के सदस्यों को दे दी गईं। वे अध्ययन करके मास्टर प्लान की रिपोर्ट पर अपने विचार आगे कभी बतायेंगे।

7 अक्टूबर 2014


सेप्ट का मास्टर प्लान अभी तक विचाराधीन है।

अहमदाबाद के सेप्ट (CEPT) द्वारा भोपाल के बड़े तालाब के संरक्षण का मास्टर प्लान अगस्त 2014 तक भोपाल नगर निगम के समक्ष रख दिया गया था। नगर निगम की साधिकार समिति को इस मास्टर प्लान पर निर्णय लेना था।

तालाब को बचाने के लिये अगस्त 2014 में नगरीय प्रशासन संचालनालय में बैठक हुई। इसमें साधिकार समिति के सदस्यों के सामने उक्त मास्टर प्लान के मसौदे का प्रजेंटेशन दिया गया। प्लान पर सभी ने सहमति जताई। सरकार ने कहा कि सम्बन्धित विभाग इस बारे में पंद्रह दिन के अंदर सुझाव दें, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। जिन विभागों से सुझाव मांगे गये थे किन्तु सुझाव नहीं दिये, उनके नाम इस प्रकार हैं-

नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग, वन विभाग, खेल एवं युवक कल्याण विभाग, किसान कल्याण तथा कृषि विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, भोपाल संभागायुक्त, आई.जी. पुलिस, ईको पर्यटन बोर्ड तथा अन्य एजेंसियाँ।

साधिकार समिति की अध्यक्ष ने कहा है कि 15 दिन का वक्त तय किया था लेकिन सुझाव नहीं आये। अफसरों से रिपोर्ट मांगी है। अब जल्दी ही समिति की बैठक बुलाई जायेगी और मास्टर प्लान की मंजूरी से सम्बन्धित निर्णय ले लिया जायेगा।

पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा गणेश पूजा उत्सव के दौरान मूर्ति विसर्जन के लिये नीचे लिखे दिशा निर्देश दिये गये-


- स्थानीय निकाय/जिला प्राधिकारी समन्वय समिति बना सकते हैं, जिसमें पुलिस, गैर-सरकारी संगठन, स्थानीय प्राधिकारी एसपीसीबी, पूजा कमेटी के प्रतिनिधि तथा स्टेक-होल्डर शामिल हैं जो जल निकायों पर न्यूनतम प्रभाव के साथ विसर्जन करने में जनता को मार्गदर्शन कर सकें।

विसर्जन स्थलों पर इस्तेमाल किये फूल, कपड़ों, सजावटी सामग्री आदि के ठोस अपशिष्टों को जलाना पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाये।

मूर्ति विसर्जन के 48 घंटों के भीतर, नदियों, झीलों, समुद्र तटों आदि के किनारों पर मूर्ति विसर्जन स्थलों पर छोड़ी हुई सामग्री निपटारे के लिये स्थानीय निकायों द्वारा एकत्र की जाये।

नदी व तालाबों में विसर्जन के मामले में, मूर्ति विसर्जन हेतु मिट्टी के बंध सहित अस्थायी तौर पर सीमित तालाबों के निर्माण की व्यवस्था की जाये।

विसर्जन पूरा होने के बाद सतह पर तैरने वाले पानी को रंग और गंदगी की जाँच के बाद नदी, तालाब व झील में बहने दिया जा सकता है।

पूजा कमेटी कलरिंग सामग्री के विषैले तत्वों के दुष्प्रभावों के बारे में श्रद्धालुओं के बीच जागरुकता पैदा करने के लिये पोस्टर व लीफलेट प्रिंट कर सकते हैं जो मूर्तियों सहित त्यौहारी सीजन के दौरान अन्य सजावटी चीजों को रंगने के काम आते हैं।

यह अपील की गई कि :


‘‘हम गणेश उत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाएँ किन्तु इसी के साथ यह प्रतिज्ञा करें कि हम अपने पर्यावरण विशेष तौर पर नदियों, झीलों व अन्य जल निकायों को स्वच्छ बनाए रखेंगे।’’

श्रद्धालुओं के लिये दिशा-निर्देश


- मूर्तियाँ प्राकृतिक सामग्री से बनाई जायें जैसा पवित्र शास्त्रों में उल्लेखित है। मूर्ति निर्माण के लिये पकाई हुई मिट्टी प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि की जगह पारम्परिक मिट्टी के प्रयोग को बढ़ावा, अनुमति देकर प्रसारित किया जाये।
- मूर्तियों की पेंटिंग को बढ़ावा नहीं दिया जाये। यदि मूर्तियों को रंगना है तो जल में घुलने वाले तथा बिना विष के प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाये।
- मूर्तियाँ रंगने के लिये विषैले तथा गैर विघटनकारी रासायनिक रंगों के प्रयोग पर सख्ती से रोक लगाई जाये।
- मूर्तियाँ विसर्जन से पहले पूजन सामग्री जैसे फूल, वस्त्र, सजावटी सामग्री (पेपर व प्लास्टिक से बनी) आदि को हटा दी जाये।
- विघटनकारी सामग्रियों को रिसाइकिल या कम्पोस्टिंग के लिये अलग से एकत्र किया जाये।
- गैर विघटनकारी सामग्रियों को अलग से निपटारे के लिये सेनिटरी गड्डों में एकत्र किया जाये।
- कपड़ों को स्थानीय अनाथालयों में भेजा जाये।

मूर्ति विसर्जन हेतु निर्देश :


भारत सरकार एवं प्रादेशिक सरकार प्रत्येक वर्ष में गणेशोत्सव में गणेशजी की मूर्तियों के विसर्जन के लिये दिशा-निर्देश जारी करती है। स्थानीय निकायों एवं अधिकारियों के लिये तथा श्रद्धालुओं के लिये अलग-अलग अपील होती है। इस अपील को प्रेस विज्ञप्ति के रूप में शहर के सभी अखबारों में प्रकाशित किया जाता है।

- मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गणेशजी मूर्ति विसर्जन के अवसर पर अपने सभी क्षेत्रीय कार्यालयों को निर्देशित किया है कि प्रत्येक प्रतिमा विसर्जन स्थल (जलस्रोत) पर विसर्जन के पहले, विसर्जन के दौरान विसर्जन के एक सप्ताह बाद जल गुणवत्ता की जाँच करें। इस जाँच में पी.एच., डी.ओ., बी.ओ.डी., सी.ओ.डी. कन्डेक्टविटी, टरविडिटी, टोटल डिजॉल्ड सॉलिड, टोटल सॉलिड तथा मेटल्स (क्रोमियम, लेड,) जिंक तथा कॉपर) पैरामीटर की जाँच किया जाना शामिल है तथा क्षेत्रीय अधिकारी को जलस्रोत के क्षेत्रानुसार सैम्पलिंग प्वाइंट निश्चित करने के निर्देश दिये गये। यह उल्लेखनीय है कि जलस्रोतों में प्रतिमाओं के विसर्जन के फलस्वरूप जल की गुणवत्ता प्रभावित होने की संभावना होती है क्योंकि मूर्ति निर्माण में उपयोग किये जाने वाले अप्राकृतिक रंग में विषैले रसायन व साथ ही प्रतिमाओं के साथ फूल, वस्त्र एवं सजावटी सामान (रंगीन कागज एवं प्लास्टिक) इत्यादि के साथ विसर्जित किये जाने से जल गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ने की संभावना होती है।

- नगरीय प्रशासन से अनुरोध किया जाता है कि जल की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़े इसलिये जल प्रदाय वाले स्रोतों पर मूर्तियों का विसर्जन नहीं किया जाये।

- नगरीय प्रशासन को सुझाव दिया गया कि प्रतिमाओं के विसर्जन हेतु आवश्यकतानुसार सुरक्षित स्थलों को चिन्हित किया जाये जिससे नदियों/तालाबों को प्रदूषण से बचाया जा सके।

- प्रतिमाओं के साथ लाये गये उनके वस्त्र, पूजन सामग्री, प्लास्टिक का सामान, पॉलीथीन बैग्स एवं अनावश्यक सामग्री को तालाब/नदियों में नहीं डाला जाये तथा विसर्जन के पूर्व उनको प्रतिमाओं से पृथक किया जाये।

- जिला प्रशासन से भी अपील की जाती है कि प्रतिमा विसर्जन करने वाली जनता को दिशा-निर्देश हेतु एक समन्वय समिति का संगठन किया जाये जिसमें पुलिस, अशासकीय संगठन एवं धार्मिक समूहों को शामिल किया जाये।

- प्रतिमा विसर्जन हेतु अस्थाई तालाब का निर्माण कर उसमें सिन्थेटिक लाइनर केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा निर्देशों के अनुसार स्थापित कर मूर्ति विसर्जन कराया जाये।

- मूर्ति विसर्जन के पश्चात सतही जल की गुणवत्ता की जाँच के उपरांत ही अन्य जलस्रोतों को छोड़ा जाये।

- मूर्ति विसर्जन के बाद 24 घंटे के अंदर स्रोतों में विसर्जित मूर्ति, विसर्जन सामग्री को निकाला जाये तथा केन्द्रीय नियंत्रण बोर्ड की मार्गदर्शिका के अनुरूप उसका अपवहन किया जाये।

- मूर्ति विसर्जन स्थलों के पास ठोस अपशिष्ट को नहीं जलाया जाये व आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की जाये।

 

भोजवेटलैंड : भोपाल ताल, 2015


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जल और जल-संकट (Water and Water Crisis)

2

वेटलैंड (आर्द्रभूमि) (Wetland)

3

भोजवेटलैंड : इतिहास एवं निर्माण

4

भोजवेटलैंड (भोपाल ताल) की विशेषताएँ

5

भोजवेटलैंड : प्रदूषण एवं समस्याएँ

6

भोजवेटलैंड : संरक्षण, प्रबंधन एवं सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल प्लानिंग एण्ड टेक्नोलॉजी (CEPT) का मास्टर प्लान

7    

जल संरक्षण एवं पर्यावरण विधि

8

जन भागीदारी एवं सुझाव

 

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