पानी की जिंदा किंवदंती

Submitted by Hindi on Sat, 01/27/2018 - 16:03
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मध्य प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा ‘पुस्तक’

...असीरगढ़ का किला! फौजियों का ठिकाना!
यह किला फारुखी, मुगल, अंग्रेजों, मराठों आदि शासकों की छावनी रह चुका है।

असीरगढ़ के किले के नीचे की ओर मुख्य दीवार व सुरक्षा की दूसरी दीवार के बीच में अनेक स्थानों पर अभी भी पुरातनकालीन गड्ढे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में देखने को मिलते हैं। इनमें अब मिट्टी भर गई है। ये इस बात का संकेत देते हैं कि छत की दीवार, बाहरी ढलान या ओवर-फ्लो पानी को भी इन कुण्डियों में सहेजा जाता होगा। किले की पूर्वी-दक्षिण दिशा में पानी निकासी की दो छोटी-छोटी नहरें दिखाई देती हैं। स्थानीय लोग इन्हें गंगा-जमुना के नाम से जानते हैं।

...कहते हैं, यह महाभारत काल से वास्ता रखता है… यह किंवदंती मशहूर है कि शंकर भगवान के मन्दिर में पुष्प चढ़ाने अश्वत्थामा यहाँ आते रहे हैं… और कभी-कभी सुबह मन्दिर के दरवाजे खोलने पर ताजा पुष्प चढ़े हुए मिलते रहे हैं!

...अलबत्ता, बरसों पहले पानी संचय की अद्भुत प्रणाली- यहाँ किसी किंवदंती से कम नहीं है। वाकई- जिंदा किंवदंती!

...बुरहानपुर रोड से दूर से ही यह किला ‘रहस्यों का खजाना’ प्रतीत होता है! जब घुमावदार रास्तों से हजारों फीट ऊपर जाते हैं तो जेहन में बार-बार यही सवाल कौंधता है कि इतनी ऊपर पानी का क्या प्रबंध होगा? पत्थरों से बने किले की दीवारें इस सवाल को और गहरा देती हैं।

...भीतर जाने पर जो नजारा दिखता है, वह सैकड़ों साल पहले पानी-प्रबंध की इतनी सुचारू व्यवस्था करने वाले किले के पुरखों को आदाब करने की प्रेरणा देता है…!

...आइये, इतनी ऊँचाई पर, इतनी विशाल पहाड़ी पर पानी रोकने के ऐतिहासिक ज्ञान और आत्मविश्वास के दर्शन करें…!

किले के सबसे ऊपरी हिस्से में मौजूद है - जामा मस्जिद। यह एक विशाल इमारत है। इसके बाहरी हिस्से में ही आपको एक कुण्ड दिख जायेगा। इसे स्थानीय लोग हौज या टैंक भी कहते हैं।

जामा मस्जिद में जल प्रबंधन की अपनी पृथक प्रणाली रही है। यहाँ का पानी संचय नाली-तंत्र पर आधारित है। इन नालियों में वर्षा का पानी एकत्रित किया जाता रहा है। यह पानी छत व अन्य ऊँचाई वाले स्थानों से होकर आता था। आधुनिक नाम वाला रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम यहाँ भी सैकड़ों साल पहले अस्तित्व में आ गया था।

यहाँ मिट्टी के पुरातन कालीन पाइप भी पानी कुण्ड तक ले जाने के लिये इस्तेमाल किये जाते रहे। यह कहा जा सकता है कि उस काल में भी ऐसा प्रबन्ध किया गया था कि जामा मस्जिद में आई पानी की बूँदें बेकार बाहर न जाकर कुण्ड में एकत्रित हो जायें। कुण्ड में जाने के पहले इन्हें फिल्टर किये जाने की भी व्यवस्था थी। सम्भवतया रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता रहा होगा। कुण्ड में भीषण गर्मी में भी पानी मौजूद है। तब की वैज्ञानिक सोच की बेहतर मिसाल प्रस्तुत करता है - जामा मस्जिद में एकत्रित पानी।

असीरगढ़ के किले का जल प्रबंधन तीन तालाबों, कुण्डों, नालियों और गंगा-जमुना नाम की दो नहरों पर आधारित रहा है। रानी महल के बीच में भी एक कुण्ड बना है। इसमें भी वर्षाजल को छत की नालियों के माध्यम से एकत्रित कर डाला जाता था। कहते हैं, वैसे तो यह किला प्रायः फौजियों की छावनी के रूप में ही इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन कभी यहाँ गौंड राजाओं ने भी राज किया है। कोई ऐसी व्यवस्था रही होगी, इसलिये किले के इस जीर्ण-शीर्ण हिस्से को अभी भी रानी महल के नाम से जाना जाता है।

रानी महल के कुण्ड में नीचे उतरने की व्यवस्था भी है। निमाड़ की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिये भी इस कुण्ड का इस्तेमाल किया जाता रहा होगा। यह भी प्रतीत होता है कि रानियों के लिये बाहर के पानी लाने के बजाये यहीं सदैव पानी की उपलब्धता बनी रहे- इसलिये भी इस कुण्ड की स्वायत्त व्यवस्था की गई होगी। रानी महल के पास में ही एक तालाब भी बना हुआ है। इसके थोड़ी दूर दूसरा तालाब बना हुआ है। जबकि, तीसरा तालाब या बड़ा कुण्ड दूर शिव मन्दिर के पास स्थित है।

पुरातत्व विभाग के श्री घनश्याम कहते हैं- “यहाँ के तालाब कभी सूखते नहीं हैं। बरसात के दिनों में ये लबालब हो जाते हैं, जबकि गर्मी के दिनों में भी इनमें पानी रहता है। एक तालाब में पृथक से बीच में कुण्ड भी बना हुआ है। इसमें भी गर्मी में पानी रहता है। तालाबों की रचना व उनमें जल संचय की पद्धति भी काफी रोचक है।” खण्डवा जिले में विभावरी के साथ जुड़े श्री सुनील बघेल कहते हैं- “असीरगढ़ की समग्र जल संचय पद्धति बताती है कि सैकड़ों साल पहले पानी का प्रबंध पूरी तरह से तकनीकी और विज्ञान सम्मत रहा है। इसकी योजना पूरी तरह से बेहतर रूप से सुनियोजित की गई थी। पूरे पहाड़ पर पानी की एक बूँद को भी बेकार नहीं जाने दिया जाता था। यह जल संचय आज सर्वाधिक प्रासंगिक और सीख देने वाला है।” भारतीय सेवा के सेवानिवृत्त कर्नल एस.डी. पुरोहित हमारे साथ ‘रक्षा’ की दृष्टि से किला देखते हुए कहते हैं- “यहाँ चार स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था थी। यह उस काल की सबसे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था मानी जाती थी। हजारों सैनिक यहाँ रहा करते होंगे। हर स्तर पर नजदीक में पीने के पानी की व्यवस्था होगी। यह बात हमें जीर्ण-शीर्ण कुण्डों और नहरों की नेटवर्किंग से आसानी से समझ में आ जाती है।”

दरअसल, असीरगढ़ ऊँची-नीची पहाड़ियों पर बसा है। पहाड़ियों की ढलान पर पानी संग्रहित करने के लिये नालियाँ बनाई गई हैं। इन्हें आज की तकनीकी शब्दावली में ‘कन्टूर’ भी कहा जा सकता है। इनके बाहरी किनारे ऊँचे व भीतरी किनारे नीचे हैं। इन्हें इस हिसाब से बनाया गया है कि तेज वर्षा व बड़े क्षेत्र का पहाड़ी ढलान होने के बावजूद ऐसा न हो कि पानी इनसे ओवर-फ्लो होकर कहीं बेकार चला जाये। इस निर्माण की सावधानी व विज्ञान सम्मतता की वजह से पानी-तालाबों में ही एकत्रित होता रहा। एक तथ्य और प्रकाश में आता है- सैकड़ों वर्षों से इन तालाबों में पानी एकत्रित होता रहता है, लेकिन उतनी मात्रा में गाद दिखाई नहीं देती, जो प्रायः एकत्रित हो जाती है।

इसका कारण पानी को घुमाकर, एक कुण्ड से दूसरे में ले जाकर फिर इन तालाबों में लाया जाता रहा होगा। पानी के फिल्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी हर स्तर पर तवज्जो दी जाती रही। तालाबों के निर्माण में भी खास शैली नजर आती है। ऐसा लगता है कि जब किला जो कि पूरी तरह से पत्थरों से बना है, बनाया गया होगा तो इन पत्थरों को कुछ खास स्थानों से खोदकर निकाला गया होगा। इन्हीं स्थानों को बाद में तालाब का रूप दिया गया होगा। तालाब की दीवारों की दरारों को भी पुनः दीवार बनाकर भरा गया है ताकि अनावश्यक पानी रिसे नहीं। हालाँकि, उसकी सम्भावना इसलिये भी कम रही, क्योंकि ये संरचनाएँ कठोर चट्टानों से बनी हैं।

अश्वत्थामा की किंवदंती से जुड़े शिव मन्दिर के पास भी एक तालाब है। हालाँकि, यह बावड़ी या कुण्ड जैसा प्रतीत होता है। लोग इसे तालाब के नाम से ही जानते हैं। यहाँ नीचे उतरने का रास्ता भी बना हुआ है। यहाँ ‘सात दरवाजे’ भी हैं। ये बाहर निकलते हैं। कहते हैं कि रियासतकाल में युद्ध के दौरान किसी विपत्ति में फँसने पर इन गुप्त दरवाजों से मुख्य द्वार के अलावा भी बाहर निकला जा सकता था।

शंकर मन्दिर के पास परकोटे के नीचे छोटी दीवार मौजूद है। ये दीवारें भी पानी के बहाव को तालाबों की ओर मोड़ती हैं। शंकर मन्दिर वाली पहाड़ी का पानी भी सबसे बड़े तालाब तक इनके माध्यम से जाता है। अंग्रेजों द्वारा बनाई बैरक के पास से भी एक नाली गई है, जो एक अन्य तालाब में पानी पहुँचाती है। मस्जिद के पास वाला और बड़े तालाब के बीच मैदान में भी एक नाली बनी हुई है। पश्चिमी दिशा की ढलान का पानी मस्जिद के पास वाले तालाब में जाता है। पूर्वी व दक्षिण दिशा की ढलान का पानी बड़े वाले तालाब में जाता है। उत्तर-पूर्वी दिशा का पानी शंकर मन्दिर वाले तालाब में जाता है। तीनों तालाबों के किनारों को पक्का किया गया है।

असीरगढ़ के किले के नीचे की ओर मुख्य दीवार व सुरक्षा की दूसरी दीवार के बीच में अनेक स्थानों पर अभी भी पुरातनकालीन गड्ढे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में देखने को मिलते हैं। इनमें अब मिट्टी भर गई है। ये इस बात का संकेत देते हैं कि छत की दीवार, बाहरी ढलान या ओवर-फ्लो पानी को भी इन कुण्डियों में सहेजा जाता होगा। किले की पूर्वी-दक्षिण दिशा में पानी निकासी की दो छोटी-छोटी नहरें दिखाई देती हैं। स्थानीय लोग इन्हें गंगा-जमुना के नाम से जानते हैं। निकासी के दौरान यह पानी भी कुण्डों में एकत्रित होता है। अलग-अलग स्तरों पर इस पानी का उपयोग किया जाता रहा होगा। इन नहरों की प्रणाली घुमावदार रही है। पानी में कचरा या गाद को रोकने के लिये ऐसा किया गया था।

...असीरगढ़ के बेहतर पानी प्रबंधन के साक्ष्य इस मिसाल से भी मिलते हैं- बुरहानपुर के इतिहासवेत्ता डॉ. मोहम्मद शफी कहते हैं- कहा जाता है कि सन 1396 में बादशाहअकबर छह माह तक यहाँ रहे थे और इस दरमियान किला बन्द रहा था...। असीरगढ़ के बीच में एक खम्भा है जिस पर अकबर ने शिलालेख भी खुदवाये थे...।

...अकबर अपनी विशाल सेना के साथ जब इतने समय तक यहाँ रहा, तब पानी की व्यवस्था कैसे होती होगी? जाहिर है, आज भी मौजूद जल प्रबंधन तब तो पूरे लवाजमे के साथ बादशाह अकबर का इस्तकबाल कर रहा होगा...।

...इसलिये तो कहते हैं- असीरगढ़ याने पानी की जिन्दा किंवदंती- तब भी… और अब भी…!!

 

मध्य  प्रदेश में जल संरक्षण की परम्परा

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

जहाज महल सार्थक

2

बूँदों का भूमिगत ‘ताजमहल’

3

पानी की जिंदा किंवदंती

4

महल में नदी

5

पाट का परचम

6

चौपड़ों की छावनी

7

माता टेकरी का प्रसाद

8

मोरी वाले तालाब

9

कुण्डियों का गढ़

10

पानी के छिपे खजाने

11

पानी के बड़ले

12

9 नदियाँ, 99 नाले और पाल 56

13

किले के डोयले

14

रामभजलो और कृत्रिम नदी

15

बूँदों की बौद्ध परम्परा

16

डग-डग डबरी

17

नालों की मनुहार

18

बावड़ियों का शहर

18

जल सुरंगों की नगरी

20

पानी की हवेलियाँ

21

बाँध, बँधिया और चूड़ी

22

बूँदों का अद्भुत आतिथ्य

23

मोघा से झरता जीवन

24

छह हजार जल खजाने

25

बावन किले, बावन बावड़ियाँ

26

गट्टा, ओटा और ‘डॉक्टर साहब’

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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