बाँध बनाकर लाई ग्रामीणों के चेहरों पर मुस्कान

Submitted by Hindi on Fri, 02/23/2018 - 12:18
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अमर उजाला, 23 फरवरी, 2018

बाँध बनाकर मैंने अपने गाँव वालों का दिल जीत लिया है। मेरे प्रति उनकी कृतज्ञता देखकर मुझे जो खुशी मिलती है, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। मेरा बाँध अस्थायी है, लेकिन मैं कोशिश करूँगा कि अगले वर्ष और बेहतर बाँध बनाकर अपने परिवार समेत गाँव के किसानों का भला कर सकूँ।

कर्नाटक के मंगलौर शहर में भले ही मैं एक बड़ी कम्पनी में विपणन अधिकारी के तौर पर नौकरी कर रहा था, लेकिन गाँव में कम होते पानी की समस्या को देखते हुए मेरे दिमाग में इसके समाधान को लेकर कोई न कोई योजना चलती रहती थी। यही वजह थी कि मैंने तय किया कि मैं गाँव में एक कट्टा (चेक डैम) विकसित करूँगा। दरअसल पिछले कई वर्षों से दक्षिण कन्नड़ जिले के मेरे गाँव में पानी की समस्या हर साल बढ़ती जा रही थी। मई में पड़ने वाला जल संकट फरवरी में ही दस्तक देने लगा था। मैं तो शहर में नौकरी कर रहा था, लेकिन गाँव में मेरे परिवार समेत सभी किसान खेती के घाटे से बेहाल हो रहे थे। वहीं, पड़ोस के एक गाँव में वहाँ के निवासियों ने अपने स्तर से एक पारम्परिक बाँध बनाकर पानी की समस्या से काफी हद तक निजात पा ली थी।

मैंने सोचा, क्यों न अपने गाँव में कुछ ऐसा ही किया जाये। लेकिन मेरे सामने समस्या यह थी कि मैं पूरे हफ्ते शहर में रहता था, बस सप्ताह में एक दिन के लिये गाँव आता था। मैं नौकरी छोड़ने की स्थिति में भी नहीं था, इसलिये मैंने छुट्टी के दिन को ही बाँध के काम के लिये चुना। इस काम के लिये मैंने अपनी नौकरी के अनुभवों का प्रयोग किया। जहाँ मैं काम करता हूँ, वहाँ ऐसे बड़े और मजबूत बैग प्रयोग किये जाते हैं, जिनमें कई टन सामान रखा जाता है। मैंने किसी तरह उन्हीं बैगों का प्रबंध करके बाँध के लिये प्रयोग किया। जेसीबी की मदद से इन बैगों में मिट्टी भरकर हमने प्राकृतिक जलस्रोत में पहुँचाया। इसका नतीजा यह निकला कि जलस्रोत का स्तर ऊपर आ गया, जिससे हमारे बनाये चेकडैम में पानी इकट्ठा हो गया और आखिर वह दिन आ ही गया, जब हमने अपने गाँव में एक बाँध का निर्माण कर लिया। हमने बाँध में करीब पचास लाख लीटर पानी इकट्ठा किया। यह गाँव के किसानों को अप्रैल तक की पानी की जरूरतों का निश्चित बंदोबस्त था।

जल संग्रह का यह एक पुराना परम्परागत तरीका है, जिसे समय के साथ भुला दिया गया है। इस पूरे प्रकल्प में करीब चौदह हजार रुपयों का खर्च आया, जिससे पंद्रह परिवारों को फायदा पहुँचा। जब मेरा प्रयास सफल हो गया, तो दूसरे किसानों को भी मुझपर भरोसा हो गया और उन्होंने मेरे साथ हाथ मिला लिया, जिसका यह नतीजा निकला कि प्रति परिवार कई हजारों का खर्च घटकर मात्र आठ सौ रुपये पर आ गया।

जिस तरह मैंने पड़ोस के गाँव को देखकर अपने गाँव के बारे में सोचा, उसी तरह अब हमारे गाँव की तरकीब देखकर हमारे दूसरे पड़ोसी गाँव इस तरीके के बाँध का फायदा उठा रहे हैं। वहाँ के किसान हमारे गाँव में आकर बाँध का निरीक्षण करते हैं। यही नहीं, जिला पंचायत के अधिकारी भी हमारे प्रयासों से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने भी मनरेगा योजना के तहत इसी तरह के एक हजार पारम्परिक कट्टे विकसित करके जिले की पानी की समस्या खत्म करने की दिशा में पहल की है। बाँध बनाकर मैंने अपने गाँव वालों का दिल जीत लिया है। मेरे प्रति उनकी कृतज्ञता देखकर मुझे जो खुशी मिलती है, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। मेरा बाँध अस्थायी है, लेकिन मैं कोशिश करूँगा कि अगले वर्ष और बेहतर बाँध बनाकर अपने परिवार समेत गाँव के किसानों का भला कर सकूँ।

- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित

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