स्वास्थ्य क्षेत्र में कई नई पहल

Submitted by Hindi on Thu, 03/22/2018 - 17:06
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योजना, मार्च, 2018

स्वास्थ्य का क्षेत्र हमेशा से आम बजट में हाशिए पर रहा है लेकिन मौजूदा केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये कई नई और अपूर्व पहल की गई है। इसमें ‘आयुष्मान भव’ स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़ी योजना है, जिसमें 10 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों को लाभान्वित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी के साथ आइएसवीवाई में बढ़ोतरी से स्वास्थ्य पर होने वाला अत्यधिक खर्च कम होने की सम्भावना है। बजट स्वास्थ्य के कुछ सामाजिक और पर्यावरणीय निर्धारकों को भी सम्बोधित करता है।

बजट स्वास्थ्य के कुछ सामाजिक और पर्यावरणीय निर्धारकों को सम्बोधित करता है। तपेदिक के रोगियों को स्वस्थ आहार मिले, इसके लिये उन्हें 500 रूपए का मासिक स्टाइपेंड देने के लिये 600 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। इससे उनकी प्रतिरक्षा बढ़ेगी और उपचार में सुधार होगा। खुले शौच से जुड़े स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों को कम करने के लिये स्वच्छ भारत मिशन के स्वच्छता घटक को अधिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से बढ़ाया जाएगा। हालिया अनुमानों के अनुसार, वायु प्रदूषण, भारत में बीमारियों का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। इसके लिये घरों के बाहर और भीतर के परिवेश को प्रदूषणमुक्त किया जाएगा। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी ताकि वे फसलों के कचरे को निस्तारण के लिये उन्हें जलाने की बजाय दूसरे तरीके अपनाएँ।

गत एक दशक के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों को केन्द्रीय बजट से सालों साल एक सी निराशा मिलती रहती थी। उन्होंने एक-सी शैली, एक से स्वर में बजट पूर्व और बजट पश्चात के विश्लेषण किए। हमेशा यह उम्मीद जताई कि स्वास्थ्य के लिये कम से कम इस बार के बजट में आवंटन बढ़ेगा लेकिन अफसोस ही हाथ लगा, चूँकि सालों-साल बजट में ऐसा नहीं हुआ। आखिरी बार स्वास्थ्य क्षेत्र में खुशी की लहर तब दौड़ी थी, जब राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की घोषणा हुई। इसके बाद श्रम मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) शुरू की गई। स्वास्थ्य क्षेत्र बजट में हमेशा हाशिए पर पड़ा रहा। इस तरह 2018 का बजट इस लिहाज से अलग है कि इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र में कई पहल की गई है। इससे न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोग प्रसन्न हैं बल्कि मीडिया और आम लोगों में भी उत्साह है। इसने एक नयी बहस को जन्म दिया है कि इस महत्वाकांक्षी पहल से स्वास्थ्य सेवा को कितना लाभ होगा।

बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे महत्वाकांक्षी योजना है, आयुष्मान भव जिसमें दो पहल शामिल हैं। पहली योजना व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (सीपीएचसी) कार्यक्रम के अंतर्गत 1,50,000 स्वास्थ्य उपकेंद्रों को स्वास्थ्य एवं कल्याण (वेलनेस) केंद्रों (एचडब्ल्यूसीज) में रुपांतरित करना है। दूसरी योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना (एनएचपीएस) है। इस योजना के तहत 10 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों को द्वतीयक या तृतीयक देखभल के लिये अस्पताल में भर्ती होने पर 5,00,000 रुपए सालाना का वित्तीय कवरेज प्रदान की जाएगी।

सीपीएचसी एनआरएचएम द्वारा निर्मित प्लेटफार्म पर आधारित है जिसक उद्देश्य प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को मजबूत करना है। जबकि एनआरएचएम मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य सेवाओं पर केंद्रित है। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति एनएचएम को व्यापक, निरन्तर प्राथमिक सेवा का वाहक बनने का आह्वान करती है। इसके लिये सेवाओं का विस्तार उन क्षेत्रों में किया जाना चाहिए जिन पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया। जैसे गैर संचारी रोग (एनसीडीज) और मानसिक स्वास्थ्य विकार। अंतत: एनएचएम को न केवल समुदाय में स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देना होगा, बल्कि मातृत्व एवं बाल स्वास्थ्य, संचारी और गैर संचारी रोगों से सम्बन्धित प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का एकीकृत मंच बनाना होगा।

आम लोगों को निरंतर सेवाएँ उपलब्ध होती रहें, इसके लिये प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा पुरानी बीमारियों का अनुगमन (फॉलोअप) किया जा रहा है। प्राथमिक स्तर पर ऐसे रेफरल और रिटर्न लिंक भी तैयार किए गए हैं, जो मरीजों को द्वितीयक एवं तृतीयक स्तर की उन्नत देखभाल के लिये भेज सकें। हालाँकि प्राथमिक स्तर पर गर्भवती महिलाओं की निरन्तर देखभाल और तपेदिक एवं एचआईवी एड्स के उपचार की तमाम सुविधाएँ उपलब्ध हैं फिर भी प्राथमिक केंद्रों को आपात और एपीसोडिक यानी तुरत-फुरत की सेवा के लिहाज से ही स्थापित किया जाता है। पुरानी बीमारियों जैसे हाइपरटेंशन और मानसिक स्वास्थ्य विकारों को लम्बे समय तक देखभाल की जरूरत होती है। प्राथमिक उपचार केंद्रों को इस लिहाज से भी तैयार किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्तर की देखभाल में अब तक सामुदायिक स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यक्तिगत परामर्श को नजरअंदाज किया जाता रहा है। जिस प्रकार समुदायों में स्वस्थ आहार और नियमित शारीरिक व्यायाम के महत्त्व पर जोर दिया जाना चाहिए, उसी प्रकार तम्बाकू निषेध कार्यक्रमों को भी लगातार संंचालित किया जाना चाहिए।

उपकेन्द्रों को एचडब्ल्यूसीज में रूपान्तिरत करने के प्रस्ताव से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का विस्तार होगा और उसमें निरन्तरता आएगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ आसानी से उपलब्ध होंगी। स्वास्थ्य केंद्र आधारित देखभाल के साथ-साथ सामुदायिक लामबन्दी से स्वास्थ्य सम्बन्धी जागरुकता बढ़ेगी और बीमारियों की रोकथाम होगी। एचडब्ल्यूसी में मौजूदा कर्मचारियों के अतिरिक्त नॉन फिजिशियन स्वास्थ्यकर्मियों जैसे नर्श प्रैक्टिशनर, जरूरी दवाएँ और निदान मुफ्त उपलब्ध कराएँगी। इस स्तर पर विभिन्न रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को शामिल किया जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए एचडब्ल्यूसीज विभिन्न अनुमानों के रियल टाइम डेटा को एकत्र कर सकते हैं और विभिन्न स्वास्थ्य सूचकांकों का निरीक्षण कर सकते हैं। टेलीमेडिसिन और मोबाइल फोन तकनीक से दूर बैठे डॉक्टरों का परामर्श हासिल किया जा सकता है और एचडब्ल्यूसी की स्वास्थ्य सेवा में सुधार हो सकता है।

हालाँकि एचडब्ल्यूसी की शुरूआत एक स्वागत योग्य कदम है, फिर भी प्राथमिक तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के प्रयास किए जाने चाहिए। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के बजटीय आवंटन में यह प्रतिबद्धता नजर नहीं आती। पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से इसमें 2.1 प्रतिशत की गिरावट हुई है। यह भी निराशाजनक है कि बजट में एनएचएम के शहरी स्वास्थ्य मिशन को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। शहरों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की पूरी तरह अनदेखी की गई है डिज़ाइनिंग और सेवा उपलब्धता, दोनों लिहाज से। ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में लोगों का प्रवास बढ़ रहा है, साथ ही शहरी मलिन बस्तियों तथा निम्न आय वाले समुदायों की संख्या भी बढ़ रही है। इसके मद्देनजर शहरों और कस्बों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत तत्काल होने वाली है। शहरी आबादी को भी एचडब्ल्यूसीज चाहिए। जैसे-जैसे इस दिशा में प्रयास तेज होंगे, एचडब्ल्यूसीज को आवंटित 1200 करोड़ रुपये की राशि में भी बढ़ोतरी करनी होगी।

एचडब्ल्यूसीज को पूरी तरह से विकसित करने की दिशा में सबसे बड़ी चुनौती मानव संसाधन की कमी है। जबकि पीएचसीज में डॉक्टरों की कमी है, एचडब्ल्यूसीज में केवल नॉन फिजिशियन स्वास्थ्यकर्मी ही कार्यरत होंगे। हालाँकि नर्स प्रैक्टीशनरों और सामुदायिक स्वास्थ्य सहायकों जैसे मध्यम स्तर के स्वास्थ्य सेवाकर्मियों को तैयार किए जाने की आवश्यकता है जिनके पास तीन वर्ष की डिग्री हो और वे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकताओं के अनुरूप हों।

एलोपैथिक चिकित्सा के ब्रिज कोर्स ओरिएंटेशन के साथ आयुष स्नातकों की तैनाती का प्रस्ताव (पारम्परिक चिकित्सा पद्धति में पारंगत) हालाँकि विवादास्पद है। आदर्श रूप से, आयुष चिकित्सकों को एचडब्ल्यूसीज में रखा जाना चाहिए ताकि वे पारम्परिक चिकित्सा उपचार और स्वास्थ्य को बढ़ावा दे सकें, जिनमें उन्हें विशेषज्ञता प्राप्त है। दो सहायक नर्स मिडवाइव्स के अतिरिक्त एक पुरुष मल्टीपर्पज वर्कर की भी आवश्यकता होगी। साथ ही एक प्रयोगशाला तकनीशियन सह ड्रग डिस्पेंसर की भी जरूरत होगी। एचडब्ल्यूसी के लिये आवश्यक मानव संसाधन जुटाने के लिये एक अच्छा परिणाम यह भी होगा लेकिन इसका एक बहुत से युवाओं को रोजगार मिलेगा। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे समुदायों के निकट स्वास्थ्य क्षेत्र का एक मजबूत गढ़ तैयार होगा और स्वास्थ्य सेवाओं के पोर्टलों का निर्माण होगा।

आरएरबीवाई के अनुभवों और शिक्षा से एनएचपीएस की रचना की गई है। आरएसबीवाई के जरिए द्वितीयक स्वास्थ्य देखभाल तक गरीबों की पहुँच बढ़ी थी, लेकिन इसका कवरेज प्रति परिवार प्रति वर्ष 30,000 रुपये ही था। इसे उन राज्यों में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा जो प्रति परिवार को प्रति वर्ष 1 से 3 लाख प्रति तक का कवरेज प्रदान करती हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि इस योजना से महँगी होती स्वास्थ्य सेवा का खर्चा उठाना संभव नहीं था। इस योजना से प्राप्त अनुभवों ने सिखाया कि सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं, दोनों को संलग्न किया जाना चाहिए और मजबूत सूचना प्रौद्योगिकी प्लेटफाॅर्म तैयार किया जाना चाहिए। प्राथमिक देखभाल से विनियोजन ने स्वास्थ्य सूचकांकों पर इन केंद्रीय और राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के प्रभाव को कम किया है।

एनएचपीएस अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में 10 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों को हर साल 5,00,000 रुपये का कवरेज प्रदान करता है। आरएसबीवाई में बढ़ोतरी से स्वास्थ्य पर होने वाला अत्यधिक खर्च कम होने की संभावना है, साथ ही जेब पर दबाव भी नहीं पड़ेगा-चूँकि आउटपेशेंट देखभाल इसमें कवर ही नहीं है। एचडब्ल्यूसी और दूसरी प्राथमिक देखभाल को मजबूत करने के प्रयास से इस दिशा में राहत मिलेगी। अगर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिलेगी तो द्वितीयक और तृतीयक स्तर की सेवाओं की जरूरत कम होगी, साथ ही इससे उन्नत सेवाओं को रेफर करने की जरूरत भी नहीं होगी। एक प्रभावशाली प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के अभाव में एनएचपीएस की बेकाबू होती माँग को पूरा करने में ही सारा बजट खत्म हो जाएगा जिसकी वजह से प्राथमिक सेवाओं और सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने के लिये धन उपलब्ध ही नहीं होगा।

हालाँकि इस वर्ष केवल 2000 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं, चूँकि योजना अक्टूबर 2018 में शुरू की जाएगी। जब एनएचपीएस पूरी तरह से कार्य करेगा, तो कम से कम पाँच से छह गुना धन की जरूरत होगी। राज्य सरकारों द्वारा 40 प्रतिशत योगदान देने की उम्मीद है और इससे एनएचपीएस के साथ राज्य सरकारों की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को विलय किया जा सकेगा। संसाधन बढ़ाने और लोगों के रिस्क पूल को व्यापक बनाने के अतिरिक्त ऐसे विलय से उन लोगों को कवरेज भी मिलेगा जिनका आवागमन एक से दूसरे राज्य में होता रहता है। हालाँकि इसके लिये देश भर के राजनीतिक दलों के बीच सहमति जरूरी हैं क्योंकि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सरकारें हैं।

रणनीतिगत खरीद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एनएचपीएस एम्पैनल्ड सरकारी और निजी अस्पतालों से सेवाओं की खरीद करना चाहता है। इसके लिये जरूरी है कि कवर की जाने वाली बीमारियों, उनकी जाँच और उपचार को सावधानीपूर्वक चुना जाए। प्रमाण आधारित स्टैंडर्ड क्लिनिकल मैनेजमेंट दिशा-निर्देशों को विकसित किया जाए और अपनाया जाए। लगात और गुणवत्ता मानकों की स्थापना और निरीक्षण किया जाए तथा स्वास्थ्य परिणामों का मूल्यांकन किया जाए। धोखाधड़ी का पता लगाने और शिकायत निवारण तंत्र को भी विकसित किया जाना चाहिए। एनएचपीएस के अंतर्गत प्रदत्त लाभों (बीमा साक्षरता) के संबंध में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि लोग अधिक से अधिक लाभ उठाएँ और उन्हें मार्गदर्शन मिले। अगर सभी सुरक्षात्मक उपाय लागू नहीं होंगे तो माँग बढ़ेगी (गैर जरूरी जाँच और उपचार के चलते) और लागत भी।

एनएचपीएस को ट्रस्ट या बीमा कम्पनी द्वारा प्रशासित किया जाएगा। मध्यस्थ का विकल्प राज्य सरकारों को दिया गया है। सरकार द्वारा स्थापित ट्रस्ट की जिम्मेदारी अधिक होगी और अतिरिक्त खर्च कम। एक बीमा कम्पनी के पास रणनीतिक खरीद और भुगतान सम्बन्धी विशेषज्ञता होती है लेकिन उसका खर्चा अधिक होता है और जैसे-जैसे यूटिलाइजेशन की दरें बढ़ती हैं अधिक प्रीमियम की माँग भी की जाती है। दोनों स्थितियों में सरकार ही प्रीमियम चुकाती है। जबकि यह व्यक्तिगत रूप से खरीदी गई बीमा योजना से अलग होता है, रिस्क पूलिंग का सिद्धांत एक समान ही होता है। रिस्क बढ़ने पर क्राॅस सब्सिडी से प्रीमियम गिरता है। हालाँकि एनएचपीएस गरीबों और कमजोर तबकों के लिये है, जिसे सरकार के कर राजस्व से वित्त पोषित किया जाएगा, दूसरे वर्ग के लोग भी इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। इसके लिये उन्हें एनएचपीएस में तय किए गए प्रीमियम को चुकाना होगा।

अधिक से अधिक डॉक्टरों और विशेषज्ञों को तैयार करने की जरूरत भी समझी जा रही है ताकि जिला अस्पतालों की जरूरतों को पूरा किया जा सके। बजट में 24 नए मेडिकल कॉलेजों को शुरू करने का प्रस्ताव है जो उन्नत जिला अस्पतालों से सम्बद्ध होंगे। प्रत्येक तीन संसदीय क्षेत्रों में एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की परिकल्पना की गई है। इसके लिये भी उच्च स्तरीय सरकारी वित्त पोषण की जरूरत है, चूँकि निजी क्षेत्र का निवेश केवल कुछ राज्यों तक सीमित है। स्वास्थ्य बजट में कुल वृद्धि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान के आवंटन से केवल 2.8 प्रतिशत अधिक है। नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना के लिये आवंटन 12.5 प्रतिशत कम हुआ है। जब तक आने वाले वर्षों के बजट को बढ़ाया नहीं जाएगा, तब तक 2025 तक एनएचपी के लिये जीडीपी के 2.5 प्रतिशत वित्त पोषण को लक्ष्य हासिल होना सम्भव नहीं है।

बजट स्वास्थ्य के कुछ सामाजिक और पर्यावरणीय निर्धारकों को सम्बोधित करता है। तपेदिक के रोगियों को स्वस्थ आहार मिले, इसके लिये उन्हें 500 रूपए का मासिक स्टाइपेंड देने के लिये 600 करोड़ रूपए आवंटित किए गए हैं। इससे उनकी प्रतिरक्षा बढ़ेगी और उपचार में सुधार होगा। खुले शौच से जुड़े स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों को कम करने के लिये स्वच्छ भारत मिशन के स्वच्छता घटक को अधिक शौचालयों के निर्माण के माध्यम से बढ़ाया जाएगा। हालिया अनुमानों के अनुसार, वायु प्रदूषण, भारत में बीमारियों का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। इसके लिये घरों के बाहर और भीतर के परिवेश को प्रदूषणमुक्त किया जाएगा। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी ताकि वे फसलों के कचरे को निस्तारण के लिये उन्हें जलाने की बजाय दूसरे तरीके अपनाएँ। गरीब महिलाओं को रसोई गैस कनेक्शन प्रदान करने के लिये उज्ज्वला योजना का विस्तार किया जाएगा ताकि वे और उनके छोटे बच्चे ठोस बायोमास ईंधन को जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण से बच सकें। सांस सम्बन्धी रोगों, हृदय विकार, कैंसर, बच्चों में अस्थमा और सांस सम्बन्धी संक्रमण और यहाँ तक कि मधुमेह के खतरों को भी वायु प्रदूषण के नियंत्रण से कम किया जाएगा।

2018 के केंद्रीय बजट ने स्वास्थ्य को सार्वजनिक बह का विषय बनाया है। हालाँकि इस महत्वाकांक्षी पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि अब से केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर कितने वित्तीय संसाधन दिए जाते हैं। साथ ही यह स्वास्थ्य प्रणाली को क्षमतापूर्ण बनाने की दिशा में किए गए ठोस प्रयासों पर भी आधारित है। एनएचपी राज्यों से अपेक्षा करता है कि वे 2020 तक अपने स्वास्थ्य बजट को 8 प्रतिशत से अधिक करें। राज्यों के लिये ऐसा करना आवश्यक है ताकि वे स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी वित्त पोषण का अपना वादा पूरा कर सकें। बहुस्तरीय, बहु-कुशल कार्यबल में निवेश, जो स्वास्थ्य देखभाल के सभी स्तरों पर उच्च गुणवत्ता वाली सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम हो, आवश्यक है। इसके साथ ही, मजबूत विनियामक और निगरानी प्रणालियाँ भी होनी चाहिए। जब ठोस और समयबद्ध तरीके से इस दिशा में कम बढ़ाया जाएगा, तभी भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज का मार्ग प्रशस्त होगा। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बिगुल बज चुका है लेकिन कूच करना अभी बाकी है।

सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिये आवंटन


सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के लिये केंद्रीय बजट, 2018-19 में वर्ष 2017-18 की तुलना में बजट आवंटन में 1210 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2017-18 में यह 6908.00 करोड़ रुपये था जोकि वर्ष 2018-19 में बढ़कर 7750.00 करोड़ रुपये हो गया है। साथ ही योजनाओं के लिये बजट आवंटन में 2017-18 की तुलना में 2018-19 में बजट आवंटन में11.57 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके अतिरिक्त बजट आवंटन में ओबीसी के कल्याण के लिये वर्ष 2018-19 में 2017-18 की तुलना में 41.03 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

अनुसूचित जाति के लिये उद्यम पूँजी निधि की तर्ज पर ही ओबीसी के लिये एक नई उद्यम पूँजी निधि योजना 200 करोड़ रुपये की आरम्भिक कायिक निधि के साथ आरम्भ की जानी है। वर्ष 2018-19 में इसके लिये 140 करोड़ निधि प्रदान की गई है। 13587 मैन्यूअल स्कैवेंजर्स (हाथ से मैला ढोने वाले) और उनके आश्रितों को कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। 809 मैन्युअल स्कैवेंजर्स और उनके आश्रितों को बैंक लोग प्रदान किए गए हैं।

ओबीसी के लिये प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति हेतु, आय पात्रता को 44,500 रुपये प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया है। अनुसूचित जाति के लिये प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति हेतु आय पात्रता को 2.00 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये कर दिया गया है। दिवा छात्रों के लिये वजीफे की राशि को 150 रुपये से बढ़ाकर 225 रुपये कर दिया गया है और आवासीय छात्रों के लिये इसे 350 रुपये से बढ़ाकर 525 रुपये कर दिया है। अनुसूचित जाति के लिये सर्वोच्च स्तरीय शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति राशि को 4.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 6 लाख रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया है। अनुसूचित जाति और ओबीसी छात्रों के लिये आय पात्रता को 4.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 6 लाख लाख रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया है। स्थानीय छात्रों के लिये वजीफे की राशि को 1500 रूपये से बढ़ाकर 2500 रुपये और बाहरी छात्रों के लिये 3000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये कर दिया गया है। ओबीसी के लिये प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति हेतु, छात्रवृत्ति की दरों को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ाया गया है।

कक्षा पहली से पाँचवी, कक्षा छठी से आठवीं और कक्षा नौंवी से दसवीं के दिवा छात्रों की छात्रवृत्ति को 10 माह के लिये क्रमश: 25 रुपये, 40 रुपये, 50 रुपये की पूर्वोक्त दरों को संशोधित कर कक्षा पहली से दसवीं को 10 महीने के लिये 100 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है। कक्षा तीसरी से आठवीं और कक्षा नौंवी से दसवीं के आवासीय छात्रों की पूर्वोक्त छात्रवृत्ति दरों को 10 माह के लिये क्रमश: 200 रुपये और 250 रूपये से संशोधित कर कक्षा तीसरी से दसवीं को 10 महीने के लिये 500 रूपये प्रति माह कर दिया गया है। योजना के तहत सभी छात्रों को तदर्थ अनुदान 500 रुपये प्रति वर्ष है। अनुसूचित जाति के लिये राष्ट्रीय अध्येतावृत्ति के तहत इस सहायता को बढ़ाकर 25,000 रुपये से बढ़ाकर 28,000 रुपये प्रति छात्र कर दिया गया है।

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