मूल्य संवर्धित उत्पादों को प्रोत्साहन

Submitted by Hindi on Thu, 03/29/2018 - 17:30
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योजना, मार्च 2018

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 जन वितरण प्रणाली में मोटे अनाजों और बाकी फसलों को शामिल करने का प्रावधान मुहैया कराता है। मीडिया की एक हालिया रिपोर्ट में संकेत दिये गए हैं कि कनार्टक और कुछ अन्य राज्यों में रबी और मोटे अनाज की बुआई के रकबे में अच्छी बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस तरह की फसलों में दिलचस्पी बहाल करने में वाजिब कीमत और बड़े पैमाने पर खरीद अहम हैं। कर्नाटक सरकार ने 1 लाख टन रागी 200 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा है। अगर इसकी खरीद और खपत में तेजी आती है, तो किसान इसका और उत्पादन करेंगे।

परम्परागत देशी अनाजभारत शायद एक एकमात्र ऐसा देश, जिसने संसदीय कानून के जरिये हर जरूरतमंद घर के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है। वैसे यह इंतजाम घरेलू इकाइयों के लिये पक्का किया गया है, लेकिन भूख से निपटने के लिये सामाजिक सहयोग की जरूरत है।

देश में भूख और कुपोषण व्यापक स्तर पर फैला हुआ है। नतीजतन, हमारे बच्चों, महिलाओं और पुरुषों को अपने शारीरिक और मानसिक विकास की जैविक संभावनाओं को विकसित करने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता है। इस बजट और इसके आगे के घटनाक्रम के आधार पर मैं वैसे उन कुछ क्षेत्रों में काम करने की सिफारिश करता हूँ, जहाँ वित्तीय और वैज्ञानिक दोनों तौर पर अतिरिक्त ध्यान देने की जरूरत है।

कीमतों में स्थिरता


हमारे किसान बड़े पैमाने पर कीमतों में अस्थिरता को झेलते हैं, जिससे उनकी आमदनी और स्थिरता पर असर पड़ता है। खासतौर पर आलू, टमाटर और प्याज जैसी सब्जियों की कीमतों के मामले में ऐसा होता है। कीमतों में उतार-चढ़ाव का मामला सतत समस्या रही है। हमें सिर्फ उपभोक्ताओं को शांत करने के लिये तदर्थ कदमों के बजाय स्थायी समाधान ढूंढना चाहिए। एक व्यावहारिक तरीका शहरी बागवानी को बढ़ावा देना है। शहरों के भीतर और आस-पास के इलाकों में जमीन का पर्याप्त रकबा उपलब्ध है और इनका इस्तेमाल चारों ओर बागवानी आंदोलन को बढ़ावा देकर किया जा सकता है। इसमें छतों पर बागवानी और खाली पड़ी जमीनों पर टमाटर, प्याज, मिर्च और खाने-पीने से जुड़े जरूरी पौधे शामिल कर सकते हैं। इससे दोहरा फायदा होगा-एक तो कीमतों में स्थिरता आएगी और दूसरे टिकाऊ पोषण सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

तटीय इलाकों की समृद्धि के लिये खेती


भारत में तकरीबन 8000 किलोमीटर में तटीय इलाके फैले हुए हैं और समुद्री पानी वाली खेती के बड़े मौके हैं। यह खेती फिलहाल मुख्य रूप से केरल के कुट्टनाद इलाके में की जाती है। दोनों फसलों और मछली पालन दोनों को समुद्री पानी वाले एग्रोफॉरेस्ट सिस्टम में शामिल किया जा सकता है। वैश्विक स्तर पर 97 फीसदी पानी समुद्री जल है और भारत को यह दिखाने में अगवा बनना चाहिये कि किस तरह से कई फसलों की खेती में समुद्री पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे तटीय खेती के किसानों की आय बढ़ेगी और इसे सुनामी जैसी आपदाओं का सामना करने के लिये बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकेगा। समुद्री पानी से जुड़ी खेती और समुद्री स्तर के नीचे वाली खेती के लिये तकनीक एम एस स्वामीनाथन शोध फांउडेशन के पास उपलब्ध है। यह फाउंडेशन इस क्षेत्र में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के काम को अंजाम देगा। इस कार्यक्रम में मैंग्रोव के संरक्षण और नमक बर्दाशत करने वाली बाकी प्रजातियों का संरक्षण शामिल है। इस मकसद के लिये हैलफाइट का जैविक बगीचा किया गया है।

मोटे अनाज का राष्ट्रीय वर्ष


भारत सरकार ने 2018 को मोटे अनाज का राष्ट्रीय साल घोषित किया है। समई, थिनाई, केजवरागू, कंबू और कुछ अन्य मोटे अनाजों की खेती में तमिलनाडु अगुवा राज्य है। कोल्ली की पहाड़ियों में इस तरह के मोटे अनाजों के लिये पर्याप्त जर्मप्लाज्म हैं। लिहाजा, मोटे अनाजों के संरक्षण के लिये जैव घाटी को तैयार करना उपयोगी होगा। यह न सिर्फ कोल्ली की पहाड़ियों को कवर करेगी बल्कि इससे नमक्कल, सलेम आदि इलाके इसके दायरे में आएँगे। यहाँ फिर से तमिलनाडु मोटे अनाजों के पोषक और पारिस्थिक मूल्यों के प्रदर्शन में अगुवा बनेगा। इस तरह के कार्यक्रम में कई तरह के छोटे खाद्य उद्योग भी होने चाहिए, जो नाश्ते से जुड़े प्रसंस्करित मोटे अनाजों की व्यापक किस्मों पर आधारित हैं।

कृषि के क्षेत्र में महिलाओं का सशक्तिकरण


मैं एक बिल की कॉपी के बारे में बता रहा हूँ, जिसे मैने कृषि में महिलाओं के प्रोद्योगिकी सशक्तीकरण के मकसद से पेश किया था। खेती में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिये इसके कुछ फीचर्स तमिलनाडु कानून में शामिल किए जा सकते हैं। तमिलनाडु फिर से खेती में लैंगिक समानता बढ़ाने में अगुवा राज्य हो जाएगा।

पशुपालन और मछली पालन


किसान क्रेडिट कार्ड न सिर्फ फसलों की खेती से जुड़े लोगों को बल्कि मछली पालन, पोल्ट्री और समुद्री खेती को बढ़ावा देने के लिये भी मुहैया कराए जाने चाहिए। बकरी-भेड़ पालन और पोल्ट्री उत्पादों जैसे कामों से किसानों की अतिरिक्त आमदनी में पर्याप्त बढ़ोतरी हो सकती है। इससे ऐसे सीजन में मछुआरा परिवारों की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है, जब पुनरुत्पादन को बढ़ावा देने के लिये मछली पकड़ने पर रोक है।

चावल जैव पार्क


यह पार्क किसानों को यह दिखाएगा कि बायोामास उपयोग के जरिए किस तरह से उनकी आमदनी में बढ़ोतरी की जाए। लिहाजा, चावल के पुआल, भुस्सी और दानों से मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार किए जाएँगे। दालों के मामले में भी इस तरह के जैवपार्क तैयार किए जा सकते हैं। इससे किसानों को बायोमास के हर हिस्से से आमदनी और रोजगार हासिल करने में मदद मिलेगी।

पर्यावरण के हिसाब से खुद को ढालना


कम से कम हर प्रखंड स्तर पर पर्यावरण जोखिम प्रबन्धन से जुड़े शोध और विकास के केंद्र तैयार करना जरूरी है। इस तरह के केंद्रों को प्रशिक्षित पर्यावरण जोखिम प्रबन्धकों द्वारा मदद दी जानी चाहिए और इसमें हर पंचायत से एक महिला और एक पुरुष होने चाहिए। पर्यावरण में बदलाव बड़ी आपदा का सबब बन सकता है और इसके शमन हिसाब से परिस्थिति तैयार करने के लिये तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। एमएसएसआरएफ के साथ प्रशिक्षण मैन्युअल उपलब्ध है, जो प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण अभियान को अंजाम दे सकता है।

कृषि स्कूलों की स्थापना


किसानों के बेहतरीन खेतों में मौजूद कृषि स्कूलों के जरिए एक किसान से दूसरे किसान के सीखने की प्रक्रिया शुरू हुई है। इसी तरह जमीन से जमीन का अभियान खेती में कौशल से जुड़े काम के फैलाव की प्रक्रिया को तेज कर सकता है।

पेरी (चौतरफा) शहरी बागवानी क्रांति


भारत में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है और शहरी इलाकों में खाद्य मुद्रास्फीस्ति की समस्या मुख्य तौर पर मांग-आपूर्ति में अंतर से बढ़ रही है। शहरी इलाकों में सब्जियों और फलों की कीमतों को स्थिर करने का एक तरीका जरूरी प्रोद्योगिकी और मार्केेटिंग सहयोग मुहैया कराकर पेरी (चौतरफा) शहरी बागवानी को बढ़ावा दिया जाए। मिसाल के तौर पर इजराइल की तर्ज पर उत्पादन के विकेंद्रीकरण को कोऑपरेटिव मार्केटिंग के जरिए अंजाम दिया जा सकता है। शहरी और पेरी-शहरी ‘बागवानी क्रांति’ उपभोक्ता के लिये और स्थिर कीमतों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। साथ ही, हमें खाद्य सामग्री की गुणवत्ता ऊँची रखने और इसे कीटनाशकों के अवशेषों से मुक्त रखना भी सुनिश्चित करना चाहिए। ऐसे में हम ऊँची गुणवत्ता वाली और सुरक्षित खाद्य सामग्री के साथ सप्लाई की स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं। तमिलनाडु तेजी से शहरीकृत हो रहा है। शहरी आबादी खासतौर पर फल और सब्जियों की मांग करती है। लिहाजा पेरी-शहरी कृषि कार्यक्रम प्रासंगिक है।

हमें यह पक्का करने की जरूरत है कि खाद्य सुरक्षा कानून और स्कूल भोजन कार्यक्रम दोनों के तहत पोषणकारी मोेटे अनाजों का पर्याप्त उपयोग हो सके। साथ ही, सरकार को इस तरह के फसलों को खराब दाना करार देने का चलन बदलना चाहिए। इन फसलों को पर्यावरण के लिहाज से स्मार्ट पोषणकारी अनाज कहा जाना चाहिए। हमें संयुक्त राष्ट्र में यह भी प्रस्ताव करना चाहिए कि इस दशक के एक साल को कम उपयोग वाला और जैव-सुदृढ़ फसलों का साल घोषित किया जाए।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 जन वितरण प्रणाली में मोटे अनाजों और बाकी फसलों को शामिल करने का प्रावधान मुहैया कराता है। मीडिया की एक हालिया रिपोर्ट में संकेत दिए गए हैं कि कर्नाटक और कुछ अन्य राज्यों में रबी और मोटे अनाज की बुआई के रकबे में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है।

इस तरह की फसलों में दिलचस्पी बहाल करने में वाजिब कीमत और बड़े पैमाने पर खरीद अहम है। कर्नाटक सरकार ने 1 लाख टन रागी 2000 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा है। अगर इसकी खरीद और खपत में तेजी आती है तो किसान इसका और उत्पादन करेंगे। 1992 में एमएसएसआरएफ तमिलनाडु की कोल्ली की पहाड़ियों और औडिशा के कोरापुट में व्यावसायीकरण के और मौकों के जरिए छिटपुट मोटे अनाजों की बड़ी रेंज को बढ़ावा दे रही है।

खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत रागी, ज्वार, बाजरा जैसे मोटे अनाजों को खाद्य बास्केट में शामिल किया गया है। अब यह पूरी तरह से जाना जाता है कि इस तरह के मोटे अनाज न सिर्फ पोषणकारी होते हैं। बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी चुस्त हैं और वे बारिश के बँटवारे के लिहाज से ज्यादा लचीले हैं। सूखी खेती वाले इलाकों में बड़े पैमाने पर इन पोषक और पर्यावरण के लिहाज से लचीले फसलों की बड़े पैमाने पर खेती सुनिश्चित करने के लिये हमें बड़ा बाजार भी पक्का करना पड़ेगा। सौभाग्य से रागी, बाजरा, ज्वार और कई अन्य मोटे अनाजों पर आधारित कई खाद्य प्रसंस्करण कंपनियों का वजूद सामने आ रहा है। हमें यह पक्का करने की जरूरत है कि खाद्य सुरक्षा कानून और स्कूल भोजन कार्यक्रम दोनों के तहत पोषणकारी मोेटे अनाजों का पर्याप्त उपयोग हो सके। साथ ही, सरकार को इस तरह के फसलों को खराब दाना करार देने का चलन बदलना चाहिए। इन फसलों को पर्यावरण के लिहाज से स्मार्ट पोषणकारी अनाज कहा जाना चाहिए। हमें संयुक्त राष्ट्र में यह भी प्रस्ताव करना चाहिए कि इस दशक के एक साल को कम उपयोग वाला और जैव-सुदृढ़ फसलों का साल घोषित किया जाए। अगला साल दालों का अन्तरराष्टीय साल है और दालें पर्यावरण के लिहाज से स्मार्ट और प्रोटीन से भरपूर होती हैं। इस तरह की फसलों की खेती और खपत के लिये उपयुक्त नीतिगत समर्थन के जरिए कुपोषित महिलाओं और बच्चों की सबसे ज्यादा संख्या वाले देश के तौर पर हमारी पहचान को खत्म करना मुमकिन होगा।

एक और तत्काल जरूरत इन ‘अनाथ फसलों’ के शोध पर बड़े निवेश की जरूरत है, ताकि उपज की सम्भावना में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो सके। ऊँची उपज और सुनिश्चित मार्केटिंग से छोटे किसानों के लिये इन फसलों का आकर्षण बढ़ेगा।

चिंता की एक बात कट चुके फसलों की काटाई के बाद प्रबन्धन की है। फिलहाल, उत्पादन और कटाई के बाद तकनीकों के बीच असमानता है, जिससे उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को नुकसान होता है। इसको ध्यान में रखते हुए खाद्य प्रसंस्करित उद्योगों की सख्त जरूरत है। खुशकिस्मती से 2018-19 के बजट में खाद्य सुरक्षा और खाद्य प्रसंस्करण के लिये अहम सहयोग मुहैया कराया गया है। कटाई के बाद की तकनीक में बड़े निवेश को बढ़ावा देने के लिये मूल्य संवर्धित उत्पादों को तैयार करना होगा। कोल्ड स्टोरेज और कोल्ड चेन की जरूरत है। अगर पंजाब और हरियाणा इलाके में कोल्ड स्टोरज उपलब्ध होते तो पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में हालिया आलू संकट को टाला जा सकता था। मुझे उम्मीद है कि जल्दी खराब होने वाले कमोडिटीज के संरक्षण में किसानों की सहभागिता और प्रोद्योगिकी व सरकारी नीति इस असमानता को दूर करेगी।

नेशनल जियो-ग्राफिक मैगजीन (फरवरी 2018) के हालिया अंक में एक सवाल उठा है - ‘चीन को कौन खिलाएगा’ हमें यह भी सवाल पूछना है, ‘भारत को कौन खिलाएगा’। दरअसल, हमें कम से कम जमीन से ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिये भोजन का इंतजाम करना है। मौजूदा बजट ने इस असमानता को दूर करने के लिये प्रक्रिया शुरू कर दी है।

लेखक परिचय
लेखक एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। इन्हें आर्थिक पारिस्थितिकी का जनक कहा जाता है। ये यूएन साइंस एडवाइजरी समिति के अध्यक्ष, एफएओ काउंसिल के स्वतंत्र अध्यक्ष, किसान विषयक राष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष व अन्तरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्था, फिलिपिन्स के महानिदेशक जैसे कई राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय समितियों में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं। इन्हें सामुदायिक नेतृत्व के लिये रैमन मैगसेसे, 1987 में पहला विश्व खान पान पुरस्कार, यूनेस्को का महात्मा गाँधी पुरस्कार सरीखे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। इन्हें पद्मश्री (1967), पद्मभूषण (1972) व पद्म विभूषण (1989) से भी सम्मानित किया जा चुका है। प्रो. स्वामीनाथन रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन और यूएस नेशनल एकैडमी ऑफ साइन्सेज समेत भारत व विश्व के कई सारे प्रमुख वैज्ञानिक अकादमियों के सदस्य हैं। ईमेल : swami@mssrf.res.in

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