भूजल की लूट पर अंकुश ज़रूरी

Submitted by admin on Sun, 02/07/2010 - 09:01
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इन दिनों भोपाल सहित प्रदेश के कई बड़े-छोटे पेयजल संकट से जूझ रहे हैं राजधानी में एक दिन बीच जलप्रदाय हो रहा है तो कई स्थानों पर दो से लेकर छ: दिन बीच यह प्रदाय संभव हो पा रहा है। दरअसल यह स्थिति अल्पवर्षा या अवर्षा से निर्मित हुई है जिसके पीछे वहीं ग्लोबल वार्मिंग है जो देश सहित पूरे विश्व में अपना रौद्ररूप नित्यप्रति दिखा रहा है। जलसंकट की कोई भी परिस्थिति हमें भूजल पर आश्रित होने को मज़बूर करती है जो इस संपदा का सबसे समृध्द और महत्वपूर्ण स्रोत है। आंकड़े गवाह हैं कि देश की लगभग 10 प्रतिशत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और सिंचाई की लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी भूजल पर ही केंद्रित है। केंद्रीय भूजल बोर्ड बताता है कि देश में हर साल 432 अरब घनमीटर भूजल उपयोग के लिए उपलब्ध हो सकता है और सैध्दांतिक रूप से इस निकासी की भरपाई भी संभव है। पर व्यावहारिक रूप से इस जल की निकासी जिस तीव्र गति से की जा रही है कि उसकी भरपाई लगभग असंभव हो गई है। भूजल दोहन की वर्तमान अंधाधुंध प्रक्रिया ने धारती के जलस्तर को अत्यधिक नीचे गहराई तक पहुंचा दिया है। जिसके कारण जगह-जगह से खोखली हो चुकी जमीन के फटने की घटनाएं सामने आ रही हैं। कुछ माह पूर्व पड़ौसी राज्य उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के डेढ़ सौ किलोमीटर के परिक्षेत्र में तीस से अधिक स्थानों पर जमीन फटने की घटनाएं अंधाधुंधा दोहन को इस आपदा का कारण बताया है।

धरती से पानी उलीचने की परिपाटी देश में यूं तो कुआं, बावड़ियों और रहट इत्यादि के माधयम से काफी प्राचीन है पर क्योंकि देश में आजादी के समय खाद्यान्न संकट का खतरा मंडरा रहा था अत: वर्ष 1954 में पहली बार केंद्रीय प्रायोगिक नलकूप संगठन का गठन भूजल के खुलेआम दोहन का फरमान बन कर आया। वर्ष 1972 में सिंचाई आयोग बन जाने के बाद भी सतही जल और भूजल में कोई अंतर नहीं समझा गया। कारण यह था कि तब देश की अधिकाधिक भूमि को सिंचित कर पैदावार बढ़ाना पहला लक्ष्य था। आजादी के समय जो भूमि 20 प्रतिशत इस प्रकार सिंचित की जाती थी आज वह बढ़ कर लगभग 200 लाख से अधिक हो गई है। इसी तरह पेयजल, घरेलू, कामकाज और उद्योगों के लिए अब एक करोड़ से अधिक नलकूप मौजूद हैं। धरती से पानी खींचने की इस प्रक्रिया में बोतलबंद पानी के देसी और विदेशी उद्योग-धंधे भी बराबरी के जिम्मेदार हैं। इनके सहयोग से ही कई राज्यों का भूजल स्तर घटकर चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया हैं। पंजाब औरा हरियाणा ऐसे राज्य है जहां भूजल के उपयोग की दर 140 प्रतिशत से भी अधिक है। इसके अलावा तमिलनाडु, राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी भूजल का उपयोग काफ़ी अधिक देखा गया है। यही हाल चंडीगढ़ का भी है। एक अध्ययन बताता है कि देश के अनेक क्षेत्रों में भूजल का स्तर गिरने की दर एक मीटर प्रतिवर्ष तक पहुंच गई है। हाल ही में उत्तर गुजरात एवं कच्छ के क्षेत्रों में नये खोदे गए 10 में से 6 कुओं में 1200 फुट की गहराई से कम पर भी पानी नहीं मिला। याद रहे देश में वर्ष 1955 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5227 घनमीटर थी जो सन् 2055 तक घटकर केवल 1500 घनमीटर से भी कम रह जाने की और अग्रसर है।

केंद्रीय जल और ऊर्जा आयोग के आकलन के अनुसार वर्षा के जरिये औसतन प्रतिवर्ष लगभग अस्सी लाख घनमीटर पानी देश की धरती में समा जाता है। पर अब जमीन के नीचे मौजूद पानी के ये सोते सूख रहे हैं और इन्हें दोबारा भरना लगभग असंभव है। सच यह है कि वर्षाजल के संग्रह के पारंपरिक तरीकों की उपेक्षा से ही भूजल का स्तर चिंताजनक स्तर तक गिर गया है। प्राचीन भारत में तालाब, कुएं और बावड़ियां बनाने की समृध्द परंपरा थी जो अब सिर्फ पुस्तकों में संदर्भ के रूप में अंकित है। देखते देखते देश के कई हरे-भरे इलाके बिल्कुल बंजर हो चुके हैं। रामायण काल का सुरम्य चित्रकुट अभी तीन-चार दशक पहले तक रहने के लिए बुरी जगह नहीं था, लेकिन आज इस पूरे इलाके को भू विज्ञानी बाकायदा रेगिस्तानी घोषित कर चुके हैं। यानी यहां की जमीन कंटीली झाड़ियों को छोड़कर और किसी तरह की वनस्पति उपजाने में अक्षम हो चुकी है। जमीन के नीचे का पानी भूजल रिसाव की बहुत लंबी प्रक्रिया में बूंद-बूंद करके जमा होता है। इन भूगर्भीय जलाशयों पर काम करने वाले वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इनके बनने में सात से लेकर पच्चीस हजार साल तक का समय लगा है, लेकिन बड़े-बड़े टयूबवेल इस पानी को यूं फेंकते हैं जैसे नीचे कोई सदानीरा नदी बह रही है।

गौरतलब है कि भूगर्भीय जलाशयों में पानी पहुंचाने का प्राकृतिक तरीका सिर्फ एक है। ताल-पोखरों में भरा पानी ही रिस कर इन तक पहुंचता है लेकिन तालाब, कुएं और पोखर बीते जमाने की बात हैं ? लोगों ने तो इन्हें कब का सुखाकर खेत और अपने मकान में बदल डाला। ऐसे में इकतरफा दोहन देर-सवेर इन भूगर्भीय जलाशयों को सुखा कर इनका चिन्ह भी नहीं छोड़ेगा। यह प्रक्रिया कुछ लंबी खिंचे, इसका अकेला उपाय यही है कि इनसे पानी कम खींचा जाए, ताल पोखरों को दोबारा जिंदा किया जाए और वाटर हार्वेस्टिंग को कानूनी तौर पर अत्यावश्यक घोषित किया जाए। गिरते भूजल स्तर की चुनौती के मद्देनज़र योजना आयोग के उपाधयक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का यह सुझाव काबिलेगौर है कि भूजल को केंद्र और राज्य सरकारों की समवर्ती सूची में लाया जाए और इसकी निकासी पर कुछ टेक्स की व्यवस्था की जाए। हो सकता है कि राज्य सरकारें इस सुझाव को लेकर हल्ला मचाएं और टयूबवेलों पर प्रस्तावित टेक्स को किसानों की कमर तोड़ देने का षणयंत्र बताया जाए। लेकिन सच्चाई का सामना हमें कभी तो करना ही होगा। देश के ज्यादातर खेतिहर इलाकों को अगर रेगिस्तान बनने से बचाना है तो जमीन से पानी की निकासी को हत्सोत्साहित करना होगा, नहरों का उपयोग बढ़ाना होगा, और सबसे जरूरी यह है कि बरसाती पानी को ज्यादा समय तक रोक कर रखने के लिए ताल-पोखरों को पहले जैसी हालत में लाना होगा। ऐसे में बेहतर होगा कि योजना सिर्फ टयूबवेलों पर कर लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री न मान ले। इसके बजाय वह एक दीर्घकालिक नीति पर काम करे, जिसमें तालाबों, कुओं, बावड़ियों को पुनर्जीवित करने वाले गांवों, मोहल्लों के लिए कुछ सामुदायिक फायदे की बात भी शामिल हो।
 

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