बाईबिल में जल का महत्व

Submitted by admin on Mon, 02/08/2010 - 13:02
जल स्वयं में देवता, देवताओं का अर्पण और पितरों का तर्पण। जिन्दा को जल, जलने पर जल, मरने पर जल, कितना महत्वपूर्ण है जल। तभी तो आज भी प्रथम अनिवार्य आवश्यकता जल ही जीवन है। इस तथ्य को दुनिया की सभी सरकारें एवं सामाजिक संस्थाएँ आत्मसात् किये हुए हैं। आज के उपभोक्तावादी युग में जल का प्रबंधन एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में स्वीकृत हो रहा है। पुरातन युग में विशेष जल का प्रबंध धार्मिक अनुष्ठानों को सफल और पूर्ण करने का एक अनिवार्य कारक था। प्राचीन युग में जीवन यापन में जल की व्याख्या संभवतः जल की अधिकता के कारण अवर्णनीय रह गयी। हिन्दू धर्म ग्रंथों में जल के महत्व और महात्म अनेक व्याख्याएँ एवं कथाएँ उपलब्ध हैं। देखा जाए तो सृष्टि के प्रारम्भ में जल संचालन में, जल फिर सृष्टि के समापन में जल प्लावन। इस सर्वव्यापी तत्व जल की व्युत्पत्ति सम्बन्धी व्याख्या पुरुष सूक्त में इस प्रकार की गई हैं- ‘तेरहवें मन्त्र के अनुसार पृथ्वा के परमाणु कारण स्वरूप से विराट पुरुष ने स्थूल पृथ्वी उत्पन्न की तथा जल को भी उसी कारण से उत्पन्न किया। 17वें मंत्र में कहा गया है कि उस परमेश्वर ने अग्नि के परमाणु के साथ जल के परमाणुओं को मिलाकर जल को रचा।’ (हिन्दू धर्म कोश, पृ. 277, प्रथम संस्करण 1978) यदि ईश्वर, विराट पुरुष की इस गूढ़ संरचना की व्याख्या की जाये तो पृथ्वी, जल और अग्नि एक साथ एक परमाणु के अंश हैं और इन सबका मूल कारक वह विराट पुरुष है जो इन सबके साथ सदा विद्यमान रहता है। परन्तु पाश्चात्य धर्म ग्रंथ बाईबिल में यह विराट पुरुष यानी ईंश्वर जल नहीं, अग्नि नहीं बल्कि शब्द और ध्वनि के साथ था। ‘आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था।’ (नया-नियम प्रथम सं. पृ. सं. 233 प्रकाशन धार्मिक साहित्य समिति रांची) नए नियम के चार सुसमाचार व्याख्याताओं में से एक संत योहन के उपर्युक्त दार्शनिक एवं सूक्ष्म विचारों को यदि छोड़ दें तो पूरा का पूरा नया नियम (न्यू टेस्टामेंट) कहने का तात्पर्य ईसाई धर्म का मूल ग्रन्थ ईश्वर की दार्शनिक व्याख्या में निर्धन है।

संसार के प्राचीन ग्रन्थों में उपलब्ध सृष्टि मूलक कथा जलप्लावन, मनु-सतरूपा, आदम-हौवा से प्रारम्भ होती है। जल प्लावन सम्पूर्ण सृष्टि को कालकवलित करता है। परन्तु प्रकृति हौवा और पुरुष आदम को बख्श देता है। इन्हीं से पूरी सृष्टि आगे बढ़ती है। ऐसा पुराने विधान (ओल्ड टेस्टामेंट) में वर्णित है। ईसाईयत की पूर्व पृष्ठ भूमि वाला यह ग्रन्थ मूलतः यहुदियों का ग्रन्थ है। यह जल प्लावन की घटना ईसाई धर्म से कोसों दूर है। यहूदियों में भी धार्मिक अनुष्ठानों में जल का प्रयोग अधिक नहीं था। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में जल महिमा बहुतायत में सर्वत्र व्याप्त है। बिना जल के धार्मिक अनुष्ठान सम्भव ही नहीं था और आज भी नहीं है। जबकि पुराना विधान जल के स्थान पर अनुष्ठान के लिए रक्त को अधिक उपयोगी मानता है- ‘ज्फा का एक गुच्छा लो और उसे चिलमची के खून में डुबाओं। बेदी पर उसे छिड़को।’ (पुराना विधान) खून से भरी चिलमची और पूजा की बेदी पर ज्फा के गुच्छा से छिड़का जाता खून और फिर खून से अभिसिक्त पूजा की बेदी। पुराना विधान का यह दृश्य ठीक ऐसा ही है जैसे गंगा, यमुना, सरस्वती और नर्मदा आदि पवित्र नदियों के जल से भरा कलश और कुश घास के गुच्छे से पूजा की बेदी पर छिड़का जाता पावन जल फिर जल से अभिसिक्त पूजा की बेदी। पुराने विधान की रक्त भरी व्यवस्थाओं के विरुद्ध बोलने वाले ईसा ने कहा-

रख दो भेंट बेदी की
भ्राता से मेल मिलाया करो

(क्रूस, प्र.से.पृ.18)

उनके ऐसा कहने से ही चिलमची सदा से लिए जीवों के रक्त से रिक्त हो गई। उसमें रक्त के स्थान पर जल भरा गया।

नया नियम की अनुष्ठान योजना जल पर आधारित है। इसे नाम दिया गया है- ‘बपतिस्मा’। बपतिस्मा बाईबिल और ईसाई धर्म में प्रचलित एक ऐसी पद्धति है जिसमें गुरू दिक्षा पद्धति, जल से दिया जाने वाला अर्घ्य पद्धति और पवित्रिकरण का रूप समाहित है। यह पद्धति बहुत कुछ हिन्दू पूजा पद्धति का आयातित रूप है। आयातित इसलिए क्योंकि आज कई ईसाई संस्थाएँ जिसमें पूना की ‘विद्या-पथ’ फादर सुभाष आनन्द के नेतृत्व में और जिज्ञासु कल्याण केन्द्र, इलाहाबाद ने स्वर्गीय फॉदर धीरानन्द भट्ट के नेतृत्व में ईसाईयत में हिन्दू पूजा पद्धति थाल, फूल, चावल, दूब आदि का समावेश किया। भारत में भारतीयकरण होगा परन्तु विदेशों में तो इसे आयातित ही कहा जायेगा। संत योहन यर्दन नदी के किनारे रहते थे और लोगों को जल से बपतिस्मा देते थे। संत योहन और प्रभु ईसा की पहली मुलाकात यर्दन नदी के किनारे बपतिस्मा से हुई-

ईसा एक दिन देने बपतिस्मा
पहुँचे यर्दन कूल किनारे
वहीं रूको-रूको योहन बोले
आयेंगे तुम तक हम हाथ पसारे

(क्रूस, पृ.15)

यर्दन नदी के जल से लोगों को बपतिस्मा देने वाले सन्त योहन की यह मान्यता थी कि ईश्वर पुत्र ईसा द्वारा दी गई बपतिस्मा मेरे द्वारा दी गई जल की बपतिस्मा से अधिक पवित्र अग्नि के समान होगी। यहाँ अग्नि को जल से अधिक पवित्र माना गया। यह सत्य है अग्नि से बपतिस्मा नहीं दी जा सकती, न ही प्रभु ईसा ने किसी के हाथ पर अग्नि रखकर बपस्तिमा दिया। अग्नि की बपतिस्मा कहकर योहन ने जल की पवित्रता और तीव्रता और ईसा के महत्व को और अधिक बढ़ा दिया है -

तोय तुल्य मम बपतिस्मा
पाप निवारक धृतिशाली वे
पादुकावान बन जाऊँ मैं
हुतासन बपतिस्मा दानी-वे

(क्रूस, पृ.14)

लबालब जल से भरे सुन्दर सरवरों वाले बेथलहम में ईसा का विचरण और उपदेश ही बाईबिल में अधिक महत्वपूर्ण है। समुद्र, सरोवर, नदियाँ उनके उपदेश का माध्यम नहीं बने। दृष्टाँतों में भी इनसे भिन्न कथाएं आयी हैं। अतः चंगाई में या परोपकार और प्रेम में जल का प्रयोग नहीं था। अतः नया विधान जल की महत्ता को बपतिस्मा से आगे नहीं ले जा पाया। इसका मूल कारण सम्भवतः नया विधान में अनुष्ठानों का प्रतिकार था। एक स्थान पर नये विधान में जल को हत्या के दोष से मुक्त कर देने वाला पवित्र माध्यम का रूप बताया गया। ईसा पर चल रहे मुकदमे में जनता द्वारा फाँसी की सजा माँगे जाने पर और फिर बहुमत की माँग पर फाँसी की सजा सुनाने के पश्चात् गवर्नर पिलातुस ने जल से अपना हाथ न्यायपीठ पर ही धो लिया। पिलातुस निर्दोष को दोषी करार देने पर हत्या का पाप लगने के डर से अपना हाथ जल से धोया था। यहाँ जल के पवित्रता की पराकाष्ठा दिखाई गई है-

मुक्तार्थ निर्दोष मृत्यु दोष से
वारि उठा निज कर धो ली।

(क्रूस, पृ. 30)

इस प्रकार के कुछ उद्धरणों एवं प्रसंगों के अतिरिक्त बाईबिल (न्यू टेस्टामेंट एवं ओल्ड टेस्टामेंट) में जल का वर्णन विशेष रूप से नहीं मिलता है।

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