जल

Submitted by admin on Tue, 02/09/2010 - 12:11
जलजलजल संपदा के मामले में कुछेक संपन्नतम देशों में गिने जाने के बाद भी हमारे यहां जल संकट बढ़ता जा रहा है। आज गांवों की बात तो छोड़िए, बड़े शहर और राज्यों की राजधानियां तक इससे जूझ रही हैं। अब यह संकट केवल गर्मी के दिनों तक सीमित नहीं है। पानी की कमी अब ठंड में भी सिर उठा लेती है। दिसंबर 86 में जोधपुर शहर में रेलगाड़ी से पानी पहुंचाया गया है।

देश की भूमिगत जल संपदा प्रति वर्ष होने वाली वर्षा से दस गुना ज्यादा है। लेकिन सन् 70 से हर वर्ष करीब एक लाख 70 हजार पंप लगते जाने से कई इलाकों में जल स्तर घटता जा रहा है।

वर्षा के पानी को छोटे-बड़े तालाबों में एकत्र करने की संपन्न परंपरा अंग्रेजी राज के दिनों में खूब उपेक्षित हुई और फिर आजादी के बाद भी इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। कहा जाता है देश की तीन प्रतिशत भूमि पर बने तालाब होने वाली कुल वर्षा का 25 प्रतिशत जमा कर सकते हैं। नए तालाब बनाना तो दूर, पुराने तालाब भी उपेक्षा की गाद से पुरते जा रहे हैं।

एक से एक प्रसिद्ध तालाब, झील और सागर सूखकर गागर में सिमटते जा रहे हैं। लाखों मछुआरों का जीवन अनिश्चित हो गया है। जल के लिए कुप्रबंध ने हमारे जल के स्रोतों को खतरे में डाल दिया है और उन पर सीधे निर्भर समाज को चौपट कर दिया है।

पानी के मामले में हमारे देश की गिनती दुनिया के कुछेक संपन्नतम देशों में है। यहां औसत वर्षा 1,170 मिमी है- अधिकतम 11,400 मिमी उत्तर-पूर्वी कोने चेरापुंजी में और न्यूनतम 210 मिमी उसके बिलकुल विपरीत पश्चिमी छोर पर जैसलमेर में। मध्य-पश्चिमी अमेरिका में, जो आज दुनिया का ‘अन्नदाता’ माना जाता है, सालाना औसत बारिश 200 मिमी है। उससे तुलना करके देखें तो हमारी धरती निश्चित ही बहुत सौभाग्यशाली है।

पर दुर्भाग्य कि हम इस वरदान का सदुपयोग नहीं कर पा रहे हैं। सन् 2025 तक भी हम अपनी कुल सालाना बारिश के एक चौथाई का भी इस्तेमाल कर सकें तो बड़ी बात होगी। तब भी आने वाले बीस सालों में हमें पानी की भयंकर कमी का सामना करना पड़ेगा। इसका सीधा कारण है कि हम इंद्र देवता से मिलने वाले इस प्रसाद को ठीक से ग्रहण तक नहीं कर पा रहे।

इस दुखद परिस्थिति का एक मुख्य कारण वन विनाश ही है। लापरवाही के कारण होने वाला भूक्षरण भी साफ है ही। साथ ही बारिश का बहुत सारा पानी अपने साथ कीमती मिट्टी को भी लेकर समुद्र में चला जाता है। पुरते जा रहे तालाब, झील, पोखर और नदी जैसे सार्वजनिक जलाशयों का निरंतर और बेरोकटोक दुरुपयोग इस समस्या को और भी उग्र बना रहा है। नलकूपों के बढ़ते चलन की वजह से भूमिगत जल भी निजी मालिकी का साधन बन चुका है। देवी स्वरूप नदियां भी आज बस शहरी औद्योगिक कचरे को ठिकाने लगाने का सुलभ साधन बन गई हैं।

एक समय था जब हमारे शहरों और गांवों में तालाब और पोखर बहुत पवित्र सार्वजनिक संपदा की तरह संभाल कर रखे जाते थे। इन जलाशयों की गाद साफ करने का काम लोग खुद किया करते थे। गाद की चिकनी मिट्टी से घर बनाए जाते थे, दीवारें लीपी जाती थीं और उसे खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था क्योंकि उसमें हरे साग-पात के सड़े तत्व और अन्य प्राकृतिक पोषक तत्व होते थे। लेकिन हमारी वर्तमान जल नीति (अगर ऐसी कोई नीति है तो) किसी और ही दिशा में बढ़ चली है। नलकूप, कुएं और तालाब जैसी किफायती छोटी परियोजनाओं की पूरी उपेक्षा की गई है। बस बड़े-बड़े बांध बन रहे हैं। इन बांधों का कितना ही भव्य और सुंदर बखान किया जाता हो, पर वास्तविकता तो यही है कि हर साल बाढ़ और सूखे का जो दौर चलता है और वह जो भारी कहर ढा देता है, उसे ये बांध जरा भी नहीं थाम पाए हैं।

देश में जलप्रबंध की स्थिति का अंदाजा सिर्फ इसी से लग जाएगा कि आज तक ऐसा एक भी विस्तृत सर्वेक्षण नहीं हो सका है कि देश में सचमुच कितना पानी है। ‘केंद्रीय भूजल बोर्ड’ ने हाल में घोषित किया है कि शीघ्र ही पूरे देश के सर्वेक्षण का काम पूरा हो जाने की आशा है। आज जो आसार नजर आ रहे हैं, उन्हें देखते लगता यही है कि उस समय तक तो देश भयंकर सूखे के दौर से जूझ रहा होगा।

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