सरकारी कर्मचारी के साथ सामाजिक कार्यकर्ता भी हूँ

Submitted by admin on Sun, 02/14/2010 - 11:42
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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


जल संवर्द्धन के प्रयासों की सफलता जन सहभागिता पर निर्भर करती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक संसाधनों को सहेजने उनका संवर्द्घन करने और तर्क संगत ढंग से उपयोग करने की जिम्मेदारी को समुदाय ने ठीक से नहीं निभाया था परिणामतः पर्यावरण में एक असंतुलन उत्पन्न हुआ और उसका प्रभाव सामान्य जन-जीवन पर पड़ा। जल संकट का हाहाकार, मिट्टी की उर्वरा क्षमता का ह्रास स्पष्टतः परिभाषित होने लगा। समुदाय ने अपने विकास के लिए जल का दोहन तो निरंतर किया परन्तु उसको सहेजने, संवर्द्धन करने के लिए भागीदारी नहीं करते हुए इस का जिम्मा सरकार पर छोड़ दिया। सरकार ने भी जल संवर्द्धन करने के लिए कुछ एक योजनाएं पार की और अपने कर्तव्यों की इति श्री कर ली। समस्या के अनुपात में जल संवर्द्धन के सरकारी प्रयास बौने साबित हुए। दुसरी तरफ निरंतर गिरते भूजल स्तर ने इस सदी के उत्तरार्द्ध में इस बात की आवश्यकता प्रतिपादित कर दी कि समुदाय और सरकार को जल सहेजने, उसके संवर्द्धन के लिए बनाई गई रणनीति का पुनरावलोकन कर सोच विकसित करना होगा। पानी को प्रकृति में वापस लौटाने के प्रयास इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

देवास जिले में पानी रोकने के प्रयास 52 स्थानों पर संचालित किये जा रहे हैं। स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकार द्वारा मिले-जुले स्वरूप में इन कार्यों को संचालित किया जा रहा है। प्रारंभिक वर्षों की अपेक्षा बाद के वर्षों में समुदाय की सहभागिता बढ़ी है। आइये, अब चलते हैं टोंकखुर्द विकास खंड के एक गांव संवरसी में जहाँ पानी को सहेजने का सराहनीय कार्य हुआ है और इससे प्राप्त सकारात्मक परिणामों से ग्रामवासियों में भारी उत्साह है। यहां के सरपंच श्री जसमत सिंह जब पानी रोकने संबंधी कार्यों के बारे में बोलना शुरू करते हैं तो अपनी बात पूरी किये बिना थमते ही नहीं है। इस तरह के प्रयासों से क्षेत्र में भू-जल स्तर में हुई वृद्धि को लेकर उनकी आँखों में एक विशेष चमक है। वे कहते हैं ‘शुरू में हम गांव वालों को लगा था कि यह कोई सरकारी योजना है। इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे बात समझ में आने लगी कि यह काम हमारे भले के लिए है तो गाँव के लोग आगे बढ़कर हाथ बंटाने लगे। अब यह स्थिति है कि गांव में पानी रोकने की कोशिशों के तहत क्या काम होने है, यह हम सब गांव वाले बैठकर तय करते हैं। कहाँ स्टाप डेम बनेगा, इसका निर्णय हम गाँव वाले ही करते हैं’।

पूर्व सरपंच सुश्री मीना दुबे बताती हैं कि इन प्रयासों से क्षेत्र के नलकूप एवं कुओं के जल स्तर में वृद्धि हुई है, इससे गाँव में लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधरी है, पहले दो फसल बमुश्किल ले पाते थे लेकिन कहीं-कहीं अब सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने से तीसरी फसल भी ली जा रही है।

गाँव के ही कुंभर कालूसिंह दरबार भी कुछ कहने को उत्सुक नजर आते हैं। मौका मिलते ही बातों का सूत्र वे अपने हाथों में ले लेते हैं। ‘आज से तीन बरस पहले गाँव में राष्ट्रीय सेवा योजना का कैम्प लगा था, लड़कियाँ दस दिन तक गाँव में रहीं। उन्होंने हमको यह बात समझाई कि पानी की बचत व संरक्षण से ही सुखी रहा जा सकता है। दस दिन तक गाँव वाले चौपाल पर इकट्ठा होते रहे और छोटी बच्चियों के मुंह से बड़ी-बड़ी काम की बातें सुनकर सब गाँव वाले आगे आए। बच्चियों ने पानी रोकने संबंधी कार्यों के साथ-साथ महिलाओं के बचत समूह भी गठित करवाने हेतु प्रेरित किया।’

संवरसी के निकटवर्ती ग्राम कुलाला में जहां पानी रोकने के कार्य संपादित नहीं किये गए, सिंचित क्षेत्र में वृद्धि, पेयजल सिंचाई के स्रोतों में वृद्धि का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पानी रोकने के प्रयासों से सामाजार्थिक बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है।

जल संरक्षण, संवर्द्धन के प्रयासों की शुरुआत (1995-96) के बाद से संवरसी में 66 हेक्टर पड़त भूमि को कृषि भूमि में बदला गया है, वहीं इस अवधि में ग्राम कुलाला में मात्र 7 हेक्टयर पड़त भूमि ही कृषि जोत के काबिल बनाई जा सकी है। इस प्रकार कृषि कार्य के लिए जल संरक्षण कार्यों के बाद संवरसी में 23 ट्रैक्टर आए।

यह आंकड़े इस बात को सही ठहराते हैं कि पानी रोकने व सहेजने संबंधी कार्यों ने कृषि रकबे में वृद्धि के जरिये आय के स्रोत मजबूत किये हैं। ग्रामीणों को प्रत्यक्ष रूप से काम के अवसर मिले हैं।

इसी प्रकार टोंकखुर्द के ही मोहम्मद खेड़ा में पानी सहेजने की गतिविधियों के संचालन के बाद पानी की उपलब्धता ने खरीफ एवं रबी दोनो फसलों में कुल रकबे एवं उत्पादकता में वृद्धि की है। पहले खरीफ का कुल बोया गया क्षेत्र 210 तथा उत्पादन 525 क्विंटल था। है। अब क्रमशः 290 हेक्टेयर तथा उत्पादन 900 क्विंटल है। इसी प्रकार रबी का बोया गया क्षेत्र पहले 175 हेक्टर तथा उत्पादन 1300 क्विंटल था, अब वह क्रमशः 250 हेक्टयर तथा 2400 क्विंटल हो गया है।

जल संवर्द्धन के कार्यों से कृषक ही नही बल्कि गैर कृषक वर्ग भी लाभांवित हुआ है। इन गतिविधियों से रोजगार प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध हो जाने से अब इस गांव से रोजगार की तलाश में लोगों के पलायन पर अंकुश लगा है। मोहम्मद खेड़ा में पहले 35-40 परिवारों को रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर जाना पड़ता था। लेकिन अब इन परिवारों को गाँव में ही रोजगार मिल जाने से पलायन नहीं करना पड़ता है।

पानी रोकने के प्रयासों के अंतर्गत चरागाह विकास के कार्यों से मोहम्म्द खेड़ा के लोगों को उत्पादित 100 मैट्रिक टन चारा प्रतिवर्ष निःशुल्क प्राप्त होता है। इससे गाँव में पशुधन में वृद्धि होने के साथ दूध का उत्पादन भी बढ़ा है जिससे गाँव का आर्थिक उन्नयन संभव हो सका है।

 

पानी आंदोलन व गौरव वर्द्धन


पानी बचाओ आंदोलन से जुड़े संवरसी क्षेत्र में कार्यरत श्री अमर येवले जल संसाधन विभाग में अनुविभागीय अधिकारी के पद पर पदस्थ हैं> श्री येवले अपने अनुभवों को समेटते हुए कहते हैं कि शुरुआती दौर में मेरा मन योजना से स्वयं को दूर करने के लिए प्रेरित करता था, लेकिन कर्तव्य निर्वहन की जवाबदारी मुझे रोके हुए थी। मैंने क्षेत्र का भ्रमण कर कमेटियों का गठन, कार्य योजना का निर्माण तथा सचिवों, अध्यक्षों की नियु्क्ति/मनोनयन प्रक्रिया में सहभागिता की। वर्ष दर वर्ष मैं इस पुण्य कार्य से जुड़ता गया। उत्साहवर्धक परिणामों से लोग भी जुड़ने लगे और मुझे भी आत्मिक संतुष्टि मिलने लगी। अपने कर्तव्यों के निर्वाह के दौरान ग्रामीण विकास के इस महत्वपूर्ण कार्य को करते-करते मैं अब सरकारी कर्मचारी होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता होने का गौरव भी अनुभव करने लगा हूँ। सामाजिक कार्यकर्ता होने का अनुभव मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि है।

प्रारंभिक चरण में ग्रामीणों का सहयोग बहुत कम था। उल्टे कई बार विरोध का सामना करना पड़ा था, परन्तु कार्य के बाद ग्रामीणों का सहयोग उत्तरोत्तर बढ़ता गया। अब बिल्कुल समाप्त हो गया है। जल संवर्द्धन के कार्यों को लेकर लोगों में उत्साह के साथ-साथ सामाजिक रूप से लगातार साथ काम करने से आपसी अंतरंगता भी बढ़ी है।

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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