लिफ्ट से पहले

Submitted by admin on Mon, 02/15/2010 - 08:46
Source
बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


25 सितम्बर 1988।
ग्राम छकतला।
विकासखंड सोण्डवा।

एक प्रशासनीक शिविर में झाबुआ जिले के सोण्डवा के जनपद अध्यक्ष श्री डेढू भाई ने एक प्रस्ताव रखाः ‘पास ही के गांव गेदा में स्टापडेम पर गुजरात राज्य की तरह यहां भी उद्वहन सिंचाई योजना शुरू की जाए।’

डेढू भाई की इस पहल से झाबुआ के कृषि परिदृश्य ने बदलाव की एक करवट ली। लंबे अरसे से तत्कालीन कलेक्टर श्री एस मिंजe पानी के माध्यम से झाबुआ के आदिवासियों की बदहाली दूर करने की दिशा में सोच रहे थे। लगातार चार साल से भीषणतम सूखा झेल रहा झाबुआ बुरी तरह से चरमरा गया था। फिर भी यहां के आदिवासी समाज के धैर्य की सराहना करना पड़ेगा। इसके पूर्व श्री मिंज समीपस्थ गुजरात के पंचमहल जिले में उद्वहन सिंचाई योजनाओं के प्रयोग देख चुके थे। यहां ये योजनाएं सरकारी धनराशि से क्रियान्वित की जा रही थी। गुजरात से लगे झाबुआ के अनेक आदिवासी इस योजना को अपने गांवों में भी क्रियान्वित करने की सोचते रहे। जिला प्रशासन भी राज्य शासन के पास इस तरह के प्रस्ताव भेजता रहा था। इस साल भी 18 लाख की लागत वाली दो योजनाओं का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन धनराशि की व्यस्था और वित्तीय मंजूरी नहीं मिल सकी।

छलकता की बैठक में डेढू भाई का प्रस्ताव इन्हीं हालत के बीच आया था। लेकिन इस बार कलेक्टर श्री मिंज ने समाज को पानी ऊपर चढ़ाने के लिए आगे करने की ठानी।

जैसे-तैसे कलेक्टर गांव वालों के साथ गेंदा स्टापडेम के पास पहुंचे। उन्होंने आदिवासी समाज से अनुरोध किया कि यदि आप सब एक होकर पानी लेने की बात करें तो हम कुछ आगे बढ़ सकते हैं। पानी के लिए समाज ने तुरंत हामी भरी। गांव वाले इस बात के लिए राजी हुए की पाइप लाइन बिछाने एवं अन्य मजदूरी कार्य में हमारा सहयोग रहेगा।

जहां चाह, वहां राह। श्री मिंज ने नया रास्ता निकाला। एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले 10 से 15 आदिवासियों का एक समूह बनाया। बजाए गाय, बैल या किराना दुकान के लिए लोने देने के लक्ष्यपूर्ति अभियान में उन्होंने पानी के लिए कर्ज देने हेतु बैंकों को एप्रोच किया। बैंकें एकदम राजी नहीं हुई। उनकी ओर से दस्तावेज तैयार करने में कठिनाई दर्शाई जाने लगी। सामूहिक जिम्मेदारी के कारण योजना की सफलता पर शंकाओं के बादल मंडराते दिख रहे थे। लेकिन जनहित में जोखिम लेने की सलाह पर उद्वहन सिंचाई योजना के लिए एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत ऋण मंजूर किए गए। 16 नवंबर 1988 को इस तरह से जिले में सामूहिक उद्वहन सिंचाई योजना की शुरूआत हुई, जो अभी तक जारी है।

उद्वहन सिंचाई के मायने हैं नदी, नाले, स्टापडेम, तालाब आदि में एकत्रित पानी को पंप लगाकर लाइन के सहारे पानी उद्वहन कर उबड़-खाबड़ पठारी और सामान्य क्षेत्रों की जमीन को संचित करना। इस सिंचाई पद्धति से वर्षा पर निर्भरता कम रहने, पानी का सदुपयोग, ऊंची-नीची और पहाड़ी जमीन पर सिंचाई की उत्तम व्यवस्था, सिंचाई सुविधा होने से एक के बजाय दो फसलों की सुविधा, सरकार से 50 से 75 फीसदी तक अनुदान राशि का उपयोग, बैंकों से सात वर्षीय आसान किश्तों पर मध्यम अवधि ऋण, मात्र दो या पांच हजार रुपए के सहयोग से लाखों रुपए की सिंचाई सुविधा का लाभ, आपसी भाईचारा व सहयोग में वृद्धि जैसे अनेक लाभ उस समय सामने आने लगे थे।

अस्सी के दशक के जाते-जाते लेखक को अपनी झाबुआ जिले के भ्रमण के दौरान उद्वहन सिंचाई योजना वाले अनेक गांवों के आदिवासियों से रूबरू होने का अवसर मिला था। गांव वाले इसे ‘पीयत नो हल्मो’ कहते हैं। पीयत याने सिंचाई। औऱ हल्मों याने आदिवासी समाज की एक महत्वपूर्ण परम्परा। इसका आधार जीवन और सहकारिता की भावना है। इसमें कई आदिवासी मिलकर एक साथ कृषि या कोई और कार्य करते हैं। पूरा समाज तब एक घर या परिवार का रूप धारण कर लेता है। ऐसी ही एक पीयत नो हल्मों हमने तत्कालीन समय में पिटोल के पास कालाखुंट की पहाड़ियों पर देखी थी। मुझे अच्छी तरह याद है, कालाखुंट के अपने ‘पहाड़ी खेत’ पर आदिवासी कालिया सवेरिया और मोकमसिंह पारगी ने हमें बताया था, किस तरह वे कालाखुंट तालाब क्रमांक एक से पानी मोटर के माध्यम से ऊपर लाते थे। पहले इसे एक वाटर टैंक में एकत्रित किया जाता। अलग-अलग दिशाओं में तीन सब टैंक बनाए गये थे। वहां से फिर पानी का वितरण पाइपों के माध्यम से खेतों तक होता। तब इस तालाब से करीब 60 आदिवासियों के 150 एकड़ क्षेत्र में सिंचाई हो रही थी। कालिया और मोकमसिंह बता रहे थेः पहले हम इस पहाड़ी जमीन पर केवल मक्का ही बोते थे। अब चने की फसल भी ले रहे हैं। तालाब तो कई दिनों से बना पड़ा है, लेकिन खेती-किसानी के लिए इसका सही उपयोग तो अब उद्वहन सिंचाई योजना के बाद ही हो रहा है।

झाबुआ के सामाजिक, आर्थिक और कृषि जीवन में पानी के माध्यम से बदलाव लाने की यह कोशिश रही. लेखक ने अनेक गांवों के भ्रमण के बाद यह महसूस किया था कि यहां की ‘जीवन रेखा’ मक्का के अलावा भी ‘जीवन’ हो सकता हैः अनेक आदिवासियों ने पहली बार रबी की फसल लेकर जाना था। अस्सी के दशक के जाते-जाते झाबुआ की फीजा में कुछ स्वर यूं भी सुनाई दे रहे थेः उद्वहन सिंचाई से लाभान्वित क्षेत्रों में पलायन में कमी आई। पलायन रुकने के बाद राजस्थान से साथ आने वाले नारू जैसे रोगों पर भी नियंत्रण हुआ है। योजना के लाभान्वित 48 आदिवासी परिवारों के सर्वे में यह तथ्य पता चला कि इन परिवारों की कुल आय में 2 लाख 6 हजार 570 रुपए का इजाफा हुआ।

लेकिन कुछ विसंगतियां भी बताई गई थीं। मसलन-कई आदिवासी कर्ज के बोझ से तो लद गए, लेकिन उन्हें लाभ कुछ नहीं हुआ। समूह के जिन सदस्यों तक पानी ले जाना था, वहां तक पानी चढ़ाव या अन्य तकनीकी कारणों की वजह से नहीं पहुँच पाया। कई बार वितरण से लगाकर बिजली के बिल आदि भरने को लेकर भी विवाद के किस्से सामने आए। स्पष्ट नियमावली या दंडात्मक बाध्यता का अभाव भी इस तरह की परेशानियों का कारण था। लेकिन झाबुआ के कृषि परिदृश्य में बदलाव लाने के सामने ये विसंगतियां ज्यादा मायने नहीं रखती हैं।

करीब पांच-छह साल बाद 1996 में मैं फिर पिटोल की पहाड़ी पर खड़ा हूं। कालाखूंट से दूर हूं। दृश्य बदला सा है। लोग भी दूसरे हैं। लेकिन यहां भी जद्दोजहद पानी की है। एक फर्क है। कालाखुंट में रूके हुए पानी को ऊपर आने की सफलता पर तलियां बजाई जा रही थीं। तो यहां बड़ी अदब के साथ बरसात की बूंदों को रुकने की मनुहार की जा रही थी। वहां बस वाटर टैंक से पानी लेने की उपभोक्ता संस्कृति थी तो यहां विशाल पहाड़ को ही वाटर टैंक बनाने की कोशिश थी। कालाखुंट में मेरे साथ थे, अन्त्यावसायी विकास निगम के अधिकारी तथा कालिया और मोकमसिंह तो पिटोल की पहाड़ी पर मुझे ले गए थे- झाबुआ में बरसात की बूंदों को रोकने के अभियान की टीम के नेतृत्वकर्ताओं में से एक श्री एबी. गुप्ता (जिला वन मंडलाधिकारी, झाबुआ) । उस समय वाटरशेड योजना की शुरुआत ही थी।

और.....झाबुआ के आदिवासी समाज ने एक करवट और बदली। उद्वहन सिंचाई योजनाएं तो अनेक गांवों में अभी भी जारी है। लेकिन इससे भी दो कदम आगे बढ़ते हुए समाज ने अब पानी रोकने की दिशा में भी चिंतन-मनन और प्रयास शुरू कर दिए हैं। क्योंकि समाज भी यह समझ रहा है कि रुके हुए पानी को कब तक लिफ्ट करते रहेंगे? पानी ही नहीं रहेगा तो किसको लिफ्ट करेंगे? मध्यप्रदेश की सरकार को भी साधुवाद कि उसने समाज को सोचने के लिए विवश कियाः फल तोड़ लोगे-तने पर पानी छिड़क लोगे। इससे कुछ नया नहीं होगा। इसमें झिरी या अनवरत का भाव भी नहीं है। ये तो विराम की कहानियां हैं। सतत के लिए तो जड़ो में पानी डालिए......।

........पानी की बूंदों को पहले रोकिए, फिर लिफ्ट कीजिए.......।

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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