रुक जाओ, रेगिस्तान!

Submitted by admin on Mon, 02/15/2010 - 09:10
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बूँदों की मनुहार ‘पुस्तक’


झाबुआ 23 किमी.
इन्दौर-अहमदाबाद मार्ग।

यह एक छोटा सा पत्थर झाबुआ जिला मुख्यालय से दूरी की पहचान का पत्थर हैं। यहीं से तो झाबुआ की अपनी नई पहचान भी शुरू हो जाती है। एक वो भी झाबुआ था। एक ये भी झाबुआ है। कभी यहां घने जंगल आबाद थे। अब यहां रेगिस्तान की आहट सुनाई दे रही है। बस इसी पत्थर के आगे पहाड़ियाँ शुरू हो जाती है। पत्थरों से भरी पड़ी। अपने सीने को खोलकर इबारत पढ़ाती हुई। उसका सब कुछ कैसे लूटा जाता रहा......यहीं से लगने लगता है-पिटोल, थांदला, अलीराजपुर, पेटलावद, बामनिया या कहें लगभग पूरे क्षेत्र का दर्द एक जैसा ही तो है। आँख मीचकर खोलें तो क्षण भर यह लगता है, कहीं रेगिस्तान तो नहीं देख रहे हैं। कुछ दूरी आगे माछलिया घाट की वीरान पहाड़ियों पर तो आंख मीचने का उपक्रम भी नहीं करना पड़ेगा। खुली आँखों से खुला रेगिस्तान। झाबुआ में जो कुछ होता रहा, इन पहाड़ियों की सायं-सायं से समाज के लिए यहीं संदेश हैं-हम अब भी नहीं चेते तो ये वीरानियाँ हमारे समाज को वीरान कर देंगी।

झाबुआ के जंगल दो हिस्सो में आते है। उत्तर पूर्वी हिस्सों में मालवा का पठार तथा दक्षिण में विंध्य पर्वतामाला है। मालवा पठार में थांदला व पेटलावद परिक्षेत्र आते हैं। इनकी ऊँचाई समुद्र तल से औसतन 360 मीटर है। कुछ एक पठारों की ऊँचाई 390 से 420 मीटर के मध्य है। क्षेत्रफल 2064 वर्ग किमी. है। पठार के निचले हिस्सों में बिखरे हुए वन हैं। जंगल का यह हिस्सा हिरन तथा पाट नदी के बीच महत्वपूर्ण जलग्रहण बनाता है।

इसी तरह डक्कन ट्रेप की पहाड़ियों वन मंडल के उत्तर दक्षिण दिशा में फैली हुई हैं। डक्कन ट्रेप का क्षेत्रफल लगभग 722 वर्ग किमी. है. यही जोबट तथा कट्ठीवाड़ा तक फैला हुआ है। इसके तहत आने वाला क्षेत्र उबड़-खाबड़ और पहाड़ी है। इसकी औसत उंचाई 660 मीटर है। मथवाड़ रेंज की उच्चतम चोटी की ऊँचाई 814 मीटर है। वनमंडल के पश्चिम हिस्से में विन्ध्य की चोटियाँ फैली हुई हैं। ये लगभग 64 किमी. लम्बाई एवं चौड़ाई में अलीराजपुर तक फैली हुई हैं। इन्हीं पर्वत मालाओं से अन्य छोटी पर्वत मालाएं भी निकलती हैं जो कट्ठीवाड़ा तक है। दक्षिण पूर्व में विन्ध्यन श्रेणी से मिल जाती है। वन मंडल का पूरा क्षेत्र दक्षिण में नर्मदा नदी और उत्तर में माही नदी के जलग्रहण क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। झाबुआ जिले के उत्तर में राजस्थान राज्य का बांसवाड़ा जिला तथा मध्यप्रदेश का रतलाम जिला, पूर्व में धार जिला, दक्षिण में नर्मदा नदी तथा पश्चिम में गुजरात के बड़ोदा औऱ पंचमहल जिले की सीमाएं आती हैं।

झाबुआ जिले का कुल वन क्षेत्र का कुल वन क्षेत्र 1550.94 वर्ग कि.मी. है। यह जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 22.83 फीसदी भाग है। यह राष्ट्रीय वन नीति में न्यूनतम वन क्षेत्र से भी काफी कम है।

झाबुआ ने इस धारणा को नकार कर रख दिया है कि आम तौर पर आदिवासी बहुल वाले जंगलों से भरे पड़ रहते थे। इस स्थिति को यहां उलटकर रख दिया है। यहां 86 फीसदी आदिवासी तो हैं लेकिन वन नहीं। इसकी एक झलक देखिए – 1908 के झाबुआ राज्य गजेटियर ने जिस क्षेत्र को सघन जंगलों से घिरा एक पहाड़ी क्षेत्र बताया था, वह अब केवल 13.83 फीसदी ही वन क्षेत्र रखता है। इसमें से 76 फीसदी तो अपघटित श्रेणी का है। दूरसंवेदी समकों का इस्तेमाल वनों का अपघटन कुछ यूं दर्शा रहा है- 1990 की आईआरएस. इमेजरी 1:250,000 के पैमाने पर संरक्षित व आरक्षित वन बताती थी। फिर 1993 में 1:50,000 स्केल आया। 1997 में 1:12500 के स्केल पर चित्र लिए जा रहे हैं।

आजादी के पहले झाबुआ जिले के कट्ठीवाड़ा रियासत की आय का मुख्य स्रोत ही वन हुआ करते थे। 1904 में राज्य की कुल आय 7,500 रुपये में से 6100 रुपयो वनों से प्राप्त होती थी। हाँलाकी कट्ठीवाड़ा में बड़े पैमाने पर वन विनाश हुआ, लेकिन घने जंगलों के नाम पर कुछ क्षेत्रों ने यहां झाबुआ की लाज रख रखी है। सागौन और बांस के घने जंगलों के कारण इसे झाबुआ का कश्मीर या चेरापूंजी कहा जाता है। जहां तेंदूपत्ता, लाख, गोंद, महुआ, आम और आयुर्वेदिक औषधियाँ भी बहुत अधिक होती हैं, लेकिन एक सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया है कि आदिवासी अर्थ व्यवस्था में यहां वनोपज का योगदान मात्र भाग 9.3 प्रतिशत है। औसतन पारिवारिक आय का 52 फीसदी गुजरात क्षेत्र में पलायन करने व जिले के भीतर ही अकुशल श्रमिक के रूप में काम करने से आता है। आईआरएस. इमेजरी के अनुसार कट्ठीवाड़ा-सौरवा, फूलमाल क्षेत्र में 7000-6750 और 2000 हेक्टेयर जमीन पर अपघटित वन हैं।

थांदला विकास खंड के काकनवानी क्षेत्र में एक प्रतिशत से भी कम क्षेत्र में वन रहा है। 2500 हेक्टेयर वन भूमि बिगड़ी हालत में है। परवलिया क्षेत्र में जंगल की हालत और खस्ता हैं। जहां पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में इक्का, दुक्का झाड़ियां देखने के मिल जाती हैं। जंगल केवल 0.16 क्षेत्र में ही रह गए हैं। थांदला क्षेत्र में 6750 हेक्टेयर में बिगड़े वन हैं। जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 41% है। पेटलावद विकास खंड में झकनावदा क्षेत्र को छोड़ दिया जाय तो घने जंगल बहुत ही कम बचे हैं। पेटलावद रायपुरिया और झाकनावदा क्षेत्रों में क्रमशः 1500, 2000 और 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में बिगड़े वन हैं। झाबुआ विकास खंड के कल्याणपुरा क्षेत्र में 16.35%, पिटोल में 20.34% और झाबुआ में 23.09% तक वन सरकारी रिकार्ड के मुताबिक बताए जाते हैं। कल्याणपुरा क्षेत्र में 3500 हेक्टेयर और पिटोल में 1000 हेक्टेयर पर जमीन अपघटित वनों के रूप में मौजूद है। रामा विकास खंड के रामा और पारा क्षेत्र में 6000 और 2500 हेक्टेयर जंगल अपघटित श्रेणी में गिने जाते हैं। बोचका आरक्षित वन क्षेत्र के कुठ हिस्सों को छोड़कर अधिकांश स्थानों पर खुली झाड़ियाँ और थोड़े बहुत वृक्ष ही बचे हैं। रानापुर वन विकास खण्ड के रानापुर क्षेत्र में 2200 हेक्टेयर जमीन पर बिगड़े वन है। रानापुर में 13.8 फीसदी और कुंदनपुर में 21.4 फीसदी जमीन पूरी तरह बंजर हो चुकी है।

जोबट विकास खण्ड के तीन क्षेत्रों कनवाटा, जमेरी व चिकापोटी में आरक्षित वन हैं। इसके बावजूद 4000 हेक्टेयर जमीन पर बिगड़े वन हैं। पत्थरों वाली बंजर जमीन 11 और 12.5 प्रतिशत क्रमशः जोबट व बड़ी खट्टाली में हैं। उदयगढ़ विकास खण्ड का अधिकांश हिस्सा वनों के मामले में उजड़ा हुआ है। भाभरा विकास खण्ड के भाभरा और बरझर में क्रमशः 20.57 प्रतिशत व 5.99% क्षेत्र वनों के रूप में दर्शाया गया है। अलीराजपुर विकास खण्ड के आम्बुआ क्षेत्र में ताड़ी के पेड़ों की बहुलता है। यहां 2000 हेक्टेयर में बिगड़े वन हैं। 16 फीसदी जमीन पत्थरों वाली बंजर जमीन है। सोंडवा विकास खण्ड का 56 फीसदी क्षेत्र आरक्षित वनों के तहत आता है। मथवाड़ रेंज के वन घने हैं।

झाबुआ जिले में भ्रमण के दौरान कमोबेश सभी क्षेत्रों में बुजुर्ग आदिवासियों ने एक समान तथ्य बताए हैं :बचपन में उन्होंने घना जंगल देखा है। इन वनों में जंगली जानवर विचरण किया करते थे। इसके बाद बड़े पैमाने पर हुई जंगलों की कटाई के भी वे साक्षी रहे हैं। झाबुआ के अनेक गांवों में पहाड़ियों पर वनों का पुनरोत्पादन इसलिए भी नहीं हो रहा है, क्योंकि वृक्ष काटने के बाद जमीन में बची जड़ें भी खोद कर निकाल ले गए। इन्हें जलाने के कार्य में ले लिया गया। जंगलों के उजड़ने की प्रक्रिया तो काफी पहले से रियासत कालों में ही शुरू हो गई लेकिन सन् 40 व 50 के दशक के बाद इसमें निरंतर तेजी आती रही।

झाबुआ के नंगे और वीरान डूंगरो को देखने के बाद एक सवाल तेजी से कौंधता है कि वन और वनवासियों के बीच ऐसा क्या हुआ कि ‘वासी’ के साथ बन का लोप होता गया। जंगल और आदिवासियों के रिश्ते उस बेहतर प्रबंधन की मिसाल हुआ करते थे जो किसी पाठशाला में न सिखाया जाकर उनके जीवन-संस्कार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। और जैसे-जैसे इनमें संस्कार से जानबूझकर या मजबूरी के तहत जंगल को अपने जीवन की खुशहाली मानने के मायने बदलते गए, वैसे-वैसे ही बदहाली इनको घेरती गई।

वनवासियों की जीवन रेखा जंगल, जमीन और पानी ही रहती आई है। कहा जाता हैं कि झाबुआ के जंगल आदिवासियों ने काट डाले। इस वाक्य की भावना की दादा-दादी, पीढ़ी को टटोले तो पाते है कि आदिवासी जंगल से उतना ही लेते थे जितने से उनमें जीवन का गुजर बसर हो जाए। वे वनों के संवर्धन की ओर भी चिंतीत रहते रहे हैं। उन्हें पता था कि जंगल नहीं रहेंगे तो सही मायने में हमारा जीवन नहीं रहेगा। लेकिन समय की सतह पर समय के प्रदूषण से भला बड़े पैमाने पर कौन बचता रहा है। जनसंख्या विस्फोट के साथ ही आजीविका की तलाश में वन तेजी से कटने लगे। कहा जाता है कि कुछ एक क्षेत्रों में तो बड़े ठेकेदारों का हाथ था। आदिवासी तो सब चंद रुपयों की मजदूरी में एक तरह से अपने जीवन की जड़ों को ही काट रहे थे। हमारे झाबुआ प्रवास के दौरान अनेक आदिवासियों ने यह स्वीकारा है कि ये रेल के डिब्बे के डिब्बे भरकर यहां से इमारती लकड़ी पहुंचाया करते थे। इन लोगों का कहना था – मरते क्या न करते। उस समय तो दो फायदे तुरंत नजर आ रहे थे। एक तो इन वृक्षों की लकड़ी का पैसा मिलेगा, दूसरा जंगल कटने के बाद हम इस जमीन पर खेती करने लगेगें। इसके मूल में जनसंख्या दबाव ही प्रमुख कारण माना जा सकता है। झाबुआ की जनसंख्या वृद्धि पर एक नजर इस सारणी के माध्यम से-

 

जनगणना वर्ष

 

जनसंख्या (लाखों में)

 

दशक में वृद्धि का प्रतिशत

 

1901

1911

1921

1931

1941

1951

1961

1971

1981

1991

 

1.54

2.15

2.50

2.92

3.43

3.82

5.14

6.68

7.95

11.29

 

-

39.56

15.98

16.90

17.40

11.49

34.42

29.83

19.07

42.03

 


इस सारणी से यह प्रतीत होता है कि 1951 से 1991 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर सर्वाधिक रही। झाबुआ के बुजुर्ग आदिवासी भी यह तथ्य बता रहे हैं कि पांच दशक पहले के घने जंगल वाली पहाड़ियां अब वीरान हैं।

लेकिन झाबुआ के खत्म होते जंगल का एकमात्र कारण जनसंख्या वृद्धि को नहीं माना जा सकता। बदलते वक्त के साथ अच्छी परम्पराओं व संस्कारों पर संकट के बादलों का मंडराना व स्वार्थी प्रवृत्ति का कतिपय लोगों में हावी होना भी बड़ा आधार रहा है।

 

बूँदों की मनुहार

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

आदाब, गौतम

2

बूँदों का सरताज : भानपुरा

3

फुलजी बा की दूसरी लड़ाई

4

डेढ़ हजार में जिंदा नदी

5

बालोदा लक्खा का जिन्दा समाज

6

दसवीं पास ‘इंजीनियर’

7

हजारों आत्माओं का पुनर्जन्म

8

नेगड़िया की संत बूँदें

9

बूँद-बूँद में नर्मदे हर

10

आधी करोड़पति बूँदें

11

पानी के मन्दिर

12

घर-घर के आगे डॉक्टर

13

बूँदों की अड़जी-पड़जी

14

धन्यवाद, मवड़ी नाला

15

वह यादगार रसीद

16

पुनोबा : एक विश्वविद्यालय

17

बूँदों की रियासत

18

खुश हो गये खेत

18

लक्ष्य पूर्ति की हांडी के चावल

20

बूँदें, नर्मदा घाटी और विस्थापन

21

बूँदों का रुकना, गुल्लक का भरना

22

लिफ्ट से पहले

23

रुक जाओ, रेगिस्तान

24

जीवन दायिनी

25

सुरंगी रुत आई म्हारा देस

26

बूँदों की पूजा

 

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About the author

.पत्रकार और लेखक क्रांति चतुर्वेदी का जल पर लेखन से गहरा नाता है। पानी पर आज कई अध्ययन यात्राएँ कर चुके हैं। जल, जंगल और प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन पर पाँच पुस्तकें भी लिख चुके हैं। मध्य प्रदेश के सन्दर्भ ग्रन्थ ‘हार्ट ऑफ इण्डिया’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। पानी की पत्रकारिता के लिये भारतीय पत्रकारिता जगत की प्रतिष्ठित के.के.

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