गंगा ही नहीं रही तो तारेगा कौन?

Submitted by admin on Mon, 04/12/2010 - 20:36
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अपने उद्गम से लेकर हरिद्वार के उन घाटों तक गंगा का निर्मल जल वैसे ही कल-कल, छल-छल बहता हुआ, जैसा कभी बचपन में देखता था। गंगा मां की गोद में डुबकी मारकर जाने-अनजाने में किए गए अपने पापों को धोकर मोक्ष की कामना से स्नान करने वालों की भीड़। मैं कई किलोमीटर तक गंगा के किनारे चलता रहा। एक घाट पर अकेला नहाता एक इंसान नजर आया। मैंने उसे पहचान लिया। कई बार उसे दाह संस्कार करते देखा था। गंगा में स्नान करते हुए उसका चेहरा श्रद्धा और भक्ति से चमक रहा था। मैं थोड़ा और आगे गया। एक जगह कुछ ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण स्नान कर रहे थे, जो किसी के हाथ से पानी का छींटा पड़ जाए, तो खुद को अशुद्ध मानकर फिर स्नान करते हैं। उनके साथ ऐसे चेले भी थे, जो लगभग सभी सवर्ण जातियों का प्रतिनिधित्व करते थे। जिस गंगा जल ने दाह संस्कार करने वाले को नहलाया था, वह उन्हें भी स्नान करा रहा था। अरे यह क्या? अब वे अपवित्र नहीं हो रहे थे। यह है गंगा का प्रताप। जाने किस-किसके पापों की गठरी धोते हुए साथ ले जाती है। उसके बाद भी रहती है निष्कलंक।

मैंने उन लोगों को भी गंगा में स्नान करते देखा, जिनके आश्रम गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक हैं। जो गंगा को साफ करने को लेकर बड़े-बड़े मंचों पर लच्छेदार भाषण देते हैं। चंदे जमा करते हैं। कई बार गंगा के नाम पर सफाई अभियान भी चलाते हैं। अपनी फोटो भी छपवाते हैं। लेकिन अपने आश्रमों का मल उसी गंगा में डालते हैं, जिसे वह मां कहते हैं। ऐसे लोगों को मैंने जब गंगा में मल-मलकर नहाते देखा, तो सवाल उठा कि काश, अंदर का मल भी इसी गंगा में प्रवाहित कर देते। नहा तो वे लोग भी रहे थे, जो अपनी फैक्टरियों का विषैला कचरा गंगा सहित तमाम नदियों में प्रवाहित करने से बाज नहीं आते। कई ऐसे लोग तो अपने परिवार को भी कुंभ के शाही स्नान पर डुबकी लगावाकर पापों को धोने के लिए पूजा-पाठ और दान-पुण्य में जुटे थे। अचानक मन में सवाल उठा, क्या ऐसे लोगों को मोक्ष मिलेगा, जो गंगा को मां का दर्जा देते हैं और इसकेजल में अपने क्षुद्र लाभ के लिए मल से लेकर मैला तक छोडऩे से बाज नहीं आते?

तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। असाधारण लंबाई वाला वह व्यक्ति किसी देव पुरुष-सा दिखा। वह बोला, क्या सोच रहे हो। मैंने पूछा, कौन हैं आप? जवाब मिला, भगीरथ ही समझ लो। मैं बोल पड़ा, एक ही सवाल है, मां गंगा अपना पौराणिक स्वरूप कैसे पाएगी? वह हंसने लगा। उसके दूध से चमकते दांतों में अनोखी आभा थी। फिर कहने लगा, देखो, इस भगीरथ ने ही राजा सगर के पुत्रों को तारने के लिए मां गंगा से गुहार लगाई थी। पुरखे जो थे। तब सब को तारने वाली मां इस धरती पर आई थी। वह भी शिव की जटा से निकलकर, क्योंकि शिव ही उस प्रवाह को रोक सकते थे, वरना गंगा तो पाताल में चली जाती। वह बोलता चला जा रहा था। गंगा मां उसे वैसा ही फल देती है, जो उसके साथ जैसा करता है। बहुत देर से तुमको देख रहा हूं। जब वह पहला व्यक्ति स्नान करते तुम्हें दिखा था, तब भी मैं वहीं था। ठीक तुम्हारे पीछे। तुम डूबे थे गंगा में, मैं डूबा था तुममें। मोक्ष की कामना लेकर गंगा में डुबकी लगाने जो लोग आते हैं और उस धन का वैभव दिखाते हैं, जो गंगा में गंदगी डालकर पैदा किया गया हो, क्या मां उसे स्वीकार करेगी? उससे बड़ा सवाल उस भगीरथ ने दाग दिया। जो लोग मठों, मंदिरों और आश्रमों में रहते हैं। सुबह से लेकर रात तक भगवान और गंगा-यमुना की बात करते हैं। गंगाजल का आचमन करते हैं। उनकी कथनी और करनी तो देखो। कभी गंगा मां को साफ रखने के लिए नि:स्वार्थ भाव से एकजुट हुए हैं। नहीं, तो आखिर क्यों? धार्मिक उन्माद के लिए तो एक क्षण नहीं लगता और निकल आते हैं समूहों में।

मैं एकटक उसे निहारे जा रहा था। वह बोलता गया। इसी भारत में एक प्रधानमंत्री हुआ राजीव गांधी। बहुत अच्छा इंसान था। विचार भी उतने ही अच्छे थे। इरादा भी। उन्होंने हजारों करोड़ रुपये गंगा सफाई के नाम पर दिए भी थे। हुआ क्या? गंगा और गंदी होती चली गई। यह बात अलग है कि जो लोग इस अभियान से जुड़े थे, उनके घरों में लक्ष्मी की गंगा बहने लगी। क्या यह धन उन्हें, उनके पुरखों और आने वाली पीढिय़ों को आत्मिक शांति देगा? उसके सवाल सुनकर मैं सिहर उठा। क्योंकि वे बहुत तीखे होते जा रहे थे।

देखो, भीष्म भी तो गंगापुत्र थे! फिर भी अधर्मियों का साथ दिया, तो बिंध गए थे बाणों से। ठीक वैसे ही गंगा की आत्मा भी बिंधी पड़ी है। कर्ण को भी तो कुंती ने गंगा को सौंपा था। कुंती के मन में कहीं न कहीं पाप का भाव था, तभी तो बेटे कर्ण को साथ मिला दुर्योधन का। वह भी अधर्म के साथ खड़ा था, इसलिए अर्जुन के हाथों मारा गया। अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी। मोबाइल ऑन कर बात करने लगा। बात खत्म हुई, तो सिर उठाकर देखा, भगीरथ नाम का वह व्यक्ति कहीं नजर नहीं आया। तड़प बहुत बढ़ चुकी थी। उसे खोजता हुआ दूर तक निकल गया। वह नहीं मिला। थक-हारकर फिर लौट पड़ा अपने साथियों के पास। पूरे मार्ग में मैंने लोगों को गंगा में स्नान करते देखा। मेरे सामने ही अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वरों से लेकर नगा संन्यासियों ने गंगा में डुबकी लगाई। डुबकी लगाने के लिए सबको घुटनों तक बौना होना पड़ा। कई लोग तो डुबकी लगाते समय उस अवस्था में नजर आए, जैसे मां के गर्भ में रहते हैं। धीरे-धीरे बहुत कुछ समझ में आने लगा। गंगा मां क्यों है? जैसे मां गर्भ में बच्चे को अपने खून से सींचती है। श्वास देती है। भोजन देती है। कोख में पल रही अपनी औलाद को वात्सल्य और प्रेम की धारा से सींचती है। वही तो मां गंगा भी कर रही है सदियों से। नहीं तो प्यासे न मर जाते गंगा तट पर बसे करोड़ों प्राणी। गंगा के किनारे उगे जंगल देते हैं प्राण वायु। गंगा के किनारे बसीं सभ्यताएं। गंगा नहीं रहेगी, तो कहां रहेंगे उसके किनारे बसे तीर्थस्थल। फिर क्या होगा ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी, प्रयाग से लेकर गंगा सागर तक का। फिर याद आने लगे राजा सगर के वे पुत्र, जिन्हें मोक्ष के लिए हजारों साल तक इंतजार करना पड़ा था। क्योंकि तारणहार गंगा नहीं थी, तो तारता कौन। अब जो लोग गंगा को खत्म करने पर तुले हैं। ऐसी औलादों को सोचना होगा कि उनके पूर्वजों से लेकर आनेवाली पीढिय़ों को कौन तारेगा।

(लेखक अमर उजाला से जुड़े हैं)
 
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