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खासम-खास

केरल की चेतावनी - सम्भावित कारण

Submitted by editorial on Sat, 09/15/2018 - 15:16
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
इडुक्की में सूखी पेरियार नदीइडुक्की में सूखी पेरियार नदी (फोटो साभार - फर्स्टपोस्ट)भोपाल से प्रकाशित दैनिक अखबार भास्कर (13 सितम्बर, 2018) में ‘केरल की नई मुसीबत’ के शीर्षक से खबर छपी है। इस खबर के अनुसार जहाँ बाढ़ ने तबाही मचाई थी वहाँ नदियाँ और कुएँ सूखे। अखबार आगे लिखता है कि पिछले माह की 100 साल में सबसे भीषण बाढ़ से गुजरे केरल में अब सूखे का संकट मँडरा रहा है। मात्र तीन सप्ताह के अन्दर बाढ़ग्रस्त इलाकों की नदियों और कुओं का जलस्तर गिरना प्रारम्भ हो चुका है।

Content

सागर-सरिता का संगम

Submitted by Hindi on Tue, 10/19/2010 - 11:11
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
प्याज या कैबेज (पत्तागोभी) हाथ में आने पर फौरन उसकी सब पत्तियां खोलकर देखने की जैसे इच्छा होती है, वैसे ही नदी को देखने पर उसके उद्गम की ओर चलने की इच्छा मनुष्य को होती ही है। उद्गम की खोज सनातन खोज है। गंगोत्री, जमनोत्री और महाबलेश्वर या त्र्यंबक की खोज इसी तरह हुई है।छुटपन में भोज और कालिदास की कहानियां पढ़ने को मिलती थीं। भोज राजा पूछते हैं, “यह नदी इतनी क्यों रोती है?” नदी का पानी पत्थरों को पार करते हुए आवाज करता होगा। राजा को सूझा, कवि के सामने एक कल्पना फेंक दे; इसलिए उसने ऊपर का सवाल पूछा। लोककथाओं का कालिदास लोकमानस को जंचे ऐसा ही जवाब देगा न? उसने कहा, “रोने का कारण क्यों पूछते हैं, महाराज? यह बाला पीहर से ससुराल जा रही है। फिर रोयेगी नहीं तो क्या करेगी?” इस समय मेरे मन में आया, “ससुराल जाना अगर पसन्द नहीं है तो भला जाती क्यों है?” किसी ने जवाब दिया, “लड़की का जीवन ससुराल जाने के लिए ही है।”

मुला-मुठा का संगम

Submitted by Hindi on Tue, 10/19/2010 - 11:05
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
महाराष्ट्र की नदियों में तीन नदियों से मेरी विशेष आत्मीयता है। मार्कण्डी मेरी छुटपन की सखी, मेरे खेतिहर जीवन की साक्षी, और मेरी बहन आक्का की प्रतिनिधि है। कृष्णा के किनारे तो मेरा जन्म ही हुआ। महाबलेश्वर से लेकर बेजबाड़ा और मछलीपट्टम तक का उसका विस्तार अनेक ढंग से मेरे जीवन के साथ बुना हुआ है। नदियां तो हमारी बहुत देखी हुई होती हैं पर दो नदियों का संगम आसानी से देखने को नहीं मिलता। संगम काव्य ही अलग है।

जब दो नदियां मिलती हैं तब अक्सर उनमें से एक अपना नाम छोड़कर दूसरी में मिल जाती है। सभी देशों में इस नियम का पालन होता हुआ दिखाई देता है। किन्तु जिस प्रकार कलंक के बिना चंद्र नहीं शोभता, उसी प्रकार अपवाद के बिना नियम भी नहीं चलते। और कई बार तो नियम की अपेक्षा अपवाद ही ज्यादा ध्यान खींचते हैं। उत्तर अमरीका की मिसिसिपी-मिसोरी अपना लंबा-चौड़ा सप्ताक्षरी नाम द्वंद्व समास से धारण करके संसार की सबसे लंबी नदी के तौर पर मशहूर हुई है। सीता-हरण से लेकर विजयनगर के स्वातंत्र्य-हरण तक के इतिहास को याद करती तुंगभद्रा भी तुंगा और भद्रा के मिलने से अपना नाम और बड़प्पन प्राप्त कर सकी है।

कृष्णा के संस्मरण

Submitted by Hindi on Mon, 10/18/2010 - 13:17
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
कृष्णा का कुटुम्ब काफी बड़ा है। कई छोटी-बड़ी नदीयां उससे आ मिलती हैं। गोदावरी के साथ-साथ कृष्णा को भी हम ‘महाराष्ट्र-माता’ कह सकते हैं। जिस समय आज की मराठी भाषा बोली नहीं जाती थी, उस समय का सारा महाराष्ट्र कृष्णा के ही घेरे के अंदर आता था।एकादशी का दिन था। गाड़ी में बैठकर हम माहुली चले। महाराष्ट्र की राजधानी सातारा से माहुली कुछ दूरी पर है। रास्ते में दाहिनी तरफ श्री शाहु महाराज के वफादार कुत्ते की समाधि आती है। रास्ते पर हमारी ही तरह बहुत से लोग माहुली की तरफ गाड़ियां दौड़ा रहे थे। आखिर हम नदी के किनारे पहुंचे। वहां इस पार से उस पार तक लोहे की एक जंजीर ऊंची तनी हुई थी। उसमें रस्सी से एक नाव लटकाई गई थी, जो मेरी बाल-आंखों को बड़ी ही भव्य मालूम होती थी।

प्रयास

पानी की महत्ता का स्मारक बाला तालाब

Submitted by editorial on Sat, 09/22/2018 - 18:38
Author
मनीष वैद्य
बाला तालाबबाला तालाबएक समाज ने अपना तालाब सहेजकर पानी के संकट की आशंका को हमेशा-हमेशा के लिये खत्म कर दिया। इस एक तालाब से आसपास के करीब 25 गाँवों में भूजलस्तर काफी अच्छा है। आज जबकि यह पूरा इलाका पानी के संकट से रूबरू हो रहा है तो ऐसे में यह तालाब और यहाँ का समाज एक मिसाल है, पानी को रोककर जमीनी पानी के स्तर को ऊँचा उठाने में। आसपास पहाड़ियों से घिरे होने की वजह से थोड़ी-सी भी बारिश में यह लबालब भर जाता है और अमूमन यहाँ बरसात से गर्मियों तक पानी भरा रहता है।

नोटिस बोर्ड

हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर एकदिवसीय कार्यशाला

Submitted by editorial on Fri, 09/14/2018 - 18:39
Author
इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
दिनांक- 15 सितम्बर 2018,
स्थान - मसीही ध्यान केन्द्र, राजपुर, देहरादून
समय - 10-05 बजे तक
दिन - शनिवार

विषय - उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर अध्ययन रिपोर्ट के प्रस्तुतिकरण एवं एक दिवसीय कार्यशाला हेतु सादर निमंत्रण


माउंटेन फोरम हिमालय (mountain forum himalayas - MFH) विगत पन्द्रह वर्षों से पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड और हिमाचल में स्थानीय स्वशासन में महिलाओं, वंचित वर्ग और आमजन की भागीदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थानीय समुदाय, ग्राम स्तरीय संगठन, स्वयंसेवी संगठन के साथ ही सरकार के भी सहयोग ले रही है। एम.एफ.एच. द्वारा समय-समय पर पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता का विकास, पंचायतों का सूक्ष्म नियोजन एवं चुनाव पूर्व मतदाता जागरुकता अभियान जैसी गतिविधियों के माध्यम से राज्य की पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने का कार्य पिछले काफी सालों से किया जाता रहा है।

युवा वैज्ञानिकों के लिये विज्ञान संचार से जुड़ने का अवसर

Submitted by editorial on Mon, 08/13/2018 - 17:18
Author
उमाशंकर मिश्र
Source
इंडिया साइंस वायर, 13 अगस्त, 2018
विज्ञान संचारकविज्ञान संचारक (फोटो साभार - अवसर) नई दिल्ली। विज्ञान को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने के लिये अब युवा वैज्ञानिकों का सहारा लिया जाएगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने इस सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता की घोषणा की है।

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खासम-खास

केरल की चेतावनी - सम्भावित कारण

Submitted by editorial on Sat, 09/15/2018 - 15:16
Author
कृष्ण गोपाल 'व्यास’
इडुक्की में सूखी पेरियार नदीइडुक्की में सूखी पेरियार नदी (फोटो साभार - फर्स्टपोस्ट)भोपाल से प्रकाशित दैनिक अखबार भास्कर (13 सितम्बर, 2018) में ‘केरल की नई मुसीबत’ के शीर्षक से खबर छपी है। इस खबर के अनुसार जहाँ बाढ़ ने तबाही मचाई थी वहाँ नदियाँ और कुएँ सूखे। अखबार आगे लिखता है कि पिछले माह की 100 साल में सबसे भीषण बाढ़ से गुजरे केरल में अब सूखे का संकट मँडरा रहा है। मात्र तीन सप्ताह के अन्दर बाढ़ग्रस्त इलाकों की नदियों और कुओं का जलस्तर गिरना प्रारम्भ हो चुका है।

Content

सागर-सरिता का संगम

Submitted by Hindi on Tue, 10/19/2010 - 11:11
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
प्याज या कैबेज (पत्तागोभी) हाथ में आने पर फौरन उसकी सब पत्तियां खोलकर देखने की जैसे इच्छा होती है, वैसे ही नदी को देखने पर उसके उद्गम की ओर चलने की इच्छा मनुष्य को होती ही है। उद्गम की खोज सनातन खोज है। गंगोत्री, जमनोत्री और महाबलेश्वर या त्र्यंबक की खोज इसी तरह हुई है।छुटपन में भोज और कालिदास की कहानियां पढ़ने को मिलती थीं। भोज राजा पूछते हैं, “यह नदी इतनी क्यों रोती है?” नदी का पानी पत्थरों को पार करते हुए आवाज करता होगा। राजा को सूझा, कवि के सामने एक कल्पना फेंक दे; इसलिए उसने ऊपर का सवाल पूछा। लोककथाओं का कालिदास लोकमानस को जंचे ऐसा ही जवाब देगा न? उसने कहा, “रोने का कारण क्यों पूछते हैं, महाराज? यह बाला पीहर से ससुराल जा रही है। फिर रोयेगी नहीं तो क्या करेगी?” इस समय मेरे मन में आया, “ससुराल जाना अगर पसन्द नहीं है तो भला जाती क्यों है?” किसी ने जवाब दिया, “लड़की का जीवन ससुराल जाने के लिए ही है।”

मुला-मुठा का संगम

Submitted by Hindi on Tue, 10/19/2010 - 11:05
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
महाराष्ट्र की नदियों में तीन नदियों से मेरी विशेष आत्मीयता है। मार्कण्डी मेरी छुटपन की सखी, मेरे खेतिहर जीवन की साक्षी, और मेरी बहन आक्का की प्रतिनिधि है। कृष्णा के किनारे तो मेरा जन्म ही हुआ। महाबलेश्वर से लेकर बेजबाड़ा और मछलीपट्टम तक का उसका विस्तार अनेक ढंग से मेरे जीवन के साथ बुना हुआ है। नदियां तो हमारी बहुत देखी हुई होती हैं पर दो नदियों का संगम आसानी से देखने को नहीं मिलता। संगम काव्य ही अलग है।

जब दो नदियां मिलती हैं तब अक्सर उनमें से एक अपना नाम छोड़कर दूसरी में मिल जाती है। सभी देशों में इस नियम का पालन होता हुआ दिखाई देता है। किन्तु जिस प्रकार कलंक के बिना चंद्र नहीं शोभता, उसी प्रकार अपवाद के बिना नियम भी नहीं चलते। और कई बार तो नियम की अपेक्षा अपवाद ही ज्यादा ध्यान खींचते हैं। उत्तर अमरीका की मिसिसिपी-मिसोरी अपना लंबा-चौड़ा सप्ताक्षरी नाम द्वंद्व समास से धारण करके संसार की सबसे लंबी नदी के तौर पर मशहूर हुई है। सीता-हरण से लेकर विजयनगर के स्वातंत्र्य-हरण तक के इतिहास को याद करती तुंगभद्रा भी तुंगा और भद्रा के मिलने से अपना नाम और बड़प्पन प्राप्त कर सकी है।

कृष्णा के संस्मरण

Submitted by Hindi on Mon, 10/18/2010 - 13:17
Author
काका कालेलकर
Source
गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
कृष्णा का कुटुम्ब काफी बड़ा है। कई छोटी-बड़ी नदीयां उससे आ मिलती हैं। गोदावरी के साथ-साथ कृष्णा को भी हम ‘महाराष्ट्र-माता’ कह सकते हैं। जिस समय आज की मराठी भाषा बोली नहीं जाती थी, उस समय का सारा महाराष्ट्र कृष्णा के ही घेरे के अंदर आता था।एकादशी का दिन था। गाड़ी में बैठकर हम माहुली चले। महाराष्ट्र की राजधानी सातारा से माहुली कुछ दूरी पर है। रास्ते में दाहिनी तरफ श्री शाहु महाराज के वफादार कुत्ते की समाधि आती है। रास्ते पर हमारी ही तरह बहुत से लोग माहुली की तरफ गाड़ियां दौड़ा रहे थे। आखिर हम नदी के किनारे पहुंचे। वहां इस पार से उस पार तक लोहे की एक जंजीर ऊंची तनी हुई थी। उसमें रस्सी से एक नाव लटकाई गई थी, जो मेरी बाल-आंखों को बड़ी ही भव्य मालूम होती थी।

प्रयास

पानी की महत्ता का स्मारक बाला तालाब

Submitted by editorial on Sat, 09/22/2018 - 18:38
Author
मनीष वैद्य
बाला तालाबबाला तालाबएक समाज ने अपना तालाब सहेजकर पानी के संकट की आशंका को हमेशा-हमेशा के लिये खत्म कर दिया। इस एक तालाब से आसपास के करीब 25 गाँवों में भूजलस्तर काफी अच्छा है। आज जबकि यह पूरा इलाका पानी के संकट से रूबरू हो रहा है तो ऐसे में यह तालाब और यहाँ का समाज एक मिसाल है, पानी को रोककर जमीनी पानी के स्तर को ऊँचा उठाने में। आसपास पहाड़ियों से घिरे होने की वजह से थोड़ी-सी भी बारिश में यह लबालब भर जाता है और अमूमन यहाँ बरसात से गर्मियों तक पानी भरा रहता है।

नोटिस बोर्ड

हिमालय में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर एकदिवसीय कार्यशाला

Submitted by editorial on Fri, 09/14/2018 - 18:39
Author
इण्डिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)
दिनांक- 15 सितम्बर 2018,
स्थान - मसीही ध्यान केन्द्र, राजपुर, देहरादून
समय - 10-05 बजे तक
दिन - शनिवार

विषय - उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर अध्ययन रिपोर्ट के प्रस्तुतिकरण एवं एक दिवसीय कार्यशाला हेतु सादर निमंत्रण


माउंटेन फोरम हिमालय (mountain forum himalayas - MFH) विगत पन्द्रह वर्षों से पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड और हिमाचल में स्थानीय स्वशासन में महिलाओं, वंचित वर्ग और आमजन की भागीदारी को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थानीय समुदाय, ग्राम स्तरीय संगठन, स्वयंसेवी संगठन के साथ ही सरकार के भी सहयोग ले रही है। एम.एफ.एच. द्वारा समय-समय पर पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता का विकास, पंचायतों का सूक्ष्म नियोजन एवं चुनाव पूर्व मतदाता जागरुकता अभियान जैसी गतिविधियों के माध्यम से राज्य की पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने का कार्य पिछले काफी सालों से किया जाता रहा है।

युवा वैज्ञानिकों के लिये विज्ञान संचार से जुड़ने का अवसर

Submitted by editorial on Mon, 08/13/2018 - 17:18
Author
उमाशंकर मिश्र
Source
इंडिया साइंस वायर, 13 अगस्त, 2018
विज्ञान संचारकविज्ञान संचारक (फोटो साभार - अवसर) नई दिल्ली। विज्ञान को सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाने के लिये अब युवा वैज्ञानिकों का सहारा लिया जाएगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने इस सम्बन्ध में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता की घोषणा की है।

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