पर्यावरण अनुकूल जैविक खेती

Submitted by editorial on Thu, 07/26/2018 - 15:20
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कुरुक्षेत्र, अप्रैल 2018

1965-66 कृषि के क्षेत्र में हरित क्रान्ति की शुरुआत के बाद से देश की बेतहाशा बढ़ रही आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल को भारी बढ़ावा मिला है। परिणामस्वरूप हमने अपने लक्ष्यों को पूरा किया है और खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। लेकिन सघन खेती प्रणाली के खतरे बड़े चुनौती भरे हैं क्योंकि इनसे पारिस्थितिकीय सन्तुलन पर भारी असर पड़ता है।

सघन खेती प्रणाली के खतरे बड़े चुनौती भरे हैं क्योंकि इनसे पारिस्थितिकीय सन्तुलन पर भारी असर पड़ता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आर्गेनिक या जैविक खेती पर आधारित प्रणाली की बात सोची गई जिसमें रासायनिक उर्वरकों की बजाय कार्बनिक पदार्थों के सड़ने-गलने से प्राप्त खाद का प्रयोग किया जाता है।

जैविक पदार्थों से बनी खाद के इस्तेमाल पर आधारित यह प्रणाली हमारे समाज में प्राचीनकाल से ही प्रचलित रही है। जैविक खेती में परम्परा नवसृजन और विज्ञान का समन्वय करके परिवेश का साझा लाभ उठाया जाता है और सभी सम्बद्ध पक्षों के बीच समुचित सम्बन्ध और अच्छे जीवन-स्तर को बढ़ावा दिया जाता है।

भारत में 1965-66 कृषि के क्षेत्र में हरित क्रान्ति की शुरुआत के बाद से देश की बेतहाशा बढ़ रही आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये खेती में उर्वरकों के इस्तेमाल को भारी बढ़ावा मिला है। परिणामस्वरूप हमने अपने लक्ष्यों को पूरा किया है और खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की है। लेकिन सघन खेती प्रणाली के खतरे बड़े चुनौती भरे हैं क्योंकि इनसे पारिस्थितिकीय सन्तुलन पर भारी असर पड़ता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए आर्गेनिक या जैविक खेती पर आधारित प्रणाली की बात सोची गई जिसमें रासायनिक उर्वरकों की बजाय कार्बनिक पदार्थों के सड़ने-गलने से प्राप्त खाद का प्रयोग किया जाता है।

जैविक पदार्थों से बनी खाद के इस्तेमाल पर आधारित यह प्रणाली हमारे समाज में प्राचीनकाल से ही प्रचलित रही है। इंटरनेशनल फेडरेशन अॉफ आर्गेनिक एग्रिकल्चर मूवमेंट्स (आर्गेनिक खेती अभियानों का अन्तरराष्ट्रीय परिसंघ-आईएफओएएम) एक ऐसा अन्तरराष्ट्रीय संगठन है जो जैविक खेती के मानकों को विनियमित करता है और दुनिया भर में आर्गेनिक खेती की अवधारणा को बढ़ावा देने के लिये विश्व के 120 से अधिक देशों को एकजुट कर उनकी मदद करता है।

आईएफओएएम के अनुसार जैविक खेती ऐसी उत्पादन प्रणाली है जो जमीन, पारिस्थितिकीय प्रणाली और लोगों के स्वास्थ्य को बनाए रखती है। यह पारिस्थितिकी प्रक्रियाओं, जैवविविधता और स्थानीय स्थितियों पर आधारित ऐसे चक्रों पर निर्भर है जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं और इसमें प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कृषि पदार्थों का उपयोग नहीं किया जाता।

जैविक खेती में परम्परा, नवसृजन और विज्ञान का समन्वय करके परिवेश का साझा लाभ उठाया जाता है और सभी सम्बद्ध पक्षों के बीच समुचित सम्बन्ध और अच्छे जीवन-स्तर को बढ़ावा दिया जाता है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जैविक खेती कृषि उत्पादन में स्थिरता बढ़ाने का एक उपयुक्त उपाय है।

सतत सघनीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं या जरूरतों को पूरा करने की क्षमता को लेकर कोई समझौता किये बगैर वर्तमान पीढ़ी के लिये प्रति इकाई सुरक्षित और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। जैविक खेती प्रणाली में अन्य फायदों के अलावा स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त आहार के उत्पादन की गारंटी दी जाती है।

यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है क्योंकि खाद्य और कृषि संगठन के 2015 के अनुमानों के अनुसार दुनिया के 79.5 करोड़ लोग यानी हर नौ में से एक व्यक्ति अल्पपोषण की समस्या से ग्रस्त था। इस समय भारत में अल्पपोषण और मोटापा (आहार की अधिकता) पोषाहार सम्बन्धी दो प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

हाल में भारत सरकार ने देश में पौष्टिक आहार सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिये राष्ट्रीय पोषाहार मिशन के गठन की मंजूरी दी है। पारम्परिक कृषि प्रणाली में खाद्य और पर्यावरण सम्बन्धी मुद्दों को लेकर बढ़ती चिन्ता ने पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल तौर-तरीकों वाली कृषि प्रणाली के विकास को बढ़ावा दिया है जिसे आमतौर पर आर्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती कहा जाता है। इसमें ये बातें शामिल हैं;

क) जैव खेती, ख) प्राकृतिक खेती, ग) पुरोत्पादक खेती, घ) क्रमिक खेती, ङ) परमाकल्चर, च) कम आधान वाली सतत खेती।

अवधारणा

यह उत्पादन प्रबन्धन प्रणाली आमतौर जैविक पदार्थों या खेत आधारित संसाधनों फसलों के अवशिष्ट पदार्थों, मवेशियों के गोबर, हरी खाद, खेतों और उनके बाहर के अपशिष्ट, ग्रोथ रेग्युलेटरों, जैव उर्वरकों, बायो पेस्टिसाइड आदि पर आधारित है। इसमें खेतों से बाहर के कृत्रिम पदार्थों (उर्वरकों, कवकनाशकों, खरपतवार नाशकों आदि) के उपयोग को हतोत्साहित किया जाता है ताकि मिट्टी पानी और हवा को प्रदूषित किये बगैर लम्बी अवधि तक प्राकृतिक सन्तुलन को कायम रखा जा सके। इसमें खेती के लिये किसी स्थान विशेष से सम्बन्धित फसल वैज्ञानिक, जैविक और यांत्रिक विधियों का उपयोग किया जाता है ताकि संसाधनों का पुनर्चक्रण हो सके और कृषि-पारिस्थितिकीय तंत्र पर आधारित स्वास्थ्य को बढ़ावा दिया जा सके।

उद्देश्य

1.कृषि रसायनों का उपयोग न करना।
2.प्राकृतिक सन्तुलन को बरकरार रखना।
3.पौष्टिक आहार का उत्पादन।
4.ग्रामीण आजीविका को लाभप्रद जैविक खेती के जरिए बढ़ावा देना।
5.मिट्टी और पानी जैसे संसाधनों का संरक्षण।
6. फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुधन का व्यवस्थिति विकास।
7.जैवविविधता और पारिस्थितिकीय प्रणाली सम्बन्धी सेवाओं का संरक्षण और संवर्धन।
8. प्रदूषण की रोकथाम।
9. खेती में जीवाश्म ईंधन से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग कम करना।
10. अधिक टिकाऊ और उत्पादक कृषि प्रणाली का विकास करना।

जैविक खेती के घटक

(क) फसल और मृदा प्रबन्धन

इस प्रणाली का उद्देश्य मिट्टी के उपजाऊपन को दीर्घकालीन आधार पर बनाए रखने के लिये उसमें जैविक पदार्थों के स्तर में वृद्धि करना है। इस घटक के तहत फसल की विभिन्न किस्मों में से चयन, समय पर बुआई करने, फसलों की अदला-बदली करके बुआई करने हरी खाद के उपयोग और लेग्यूम जैसी फसलों को साथ बोने पर जोर दिया जाता है।

(ख) पौष्टिक तत्वों का प्रबन्धन

इसमें जैविक पदार्थों जैसे पशुओं के गोबर की खाद के उपयोग, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, फसल अपशिष्ट के उपयोग, हरी खाद और जमीन की उत्पादकता बढ़ाने के लिये कवर क्रॉप को उगाया जाता है। पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए फसलों की अदला-बदली करके बुआई और जैव उर्वरकों को भी शामिल किया जाता है।

(ग) पादप संरक्षण

कीड़े-मकोड़ों, बीमारी फैलाने वाले पैथोजीनों और अन्य महामारियों को नियंत्रित करने के लिये मुख्य रूप से फसलों की अदला-बदली करके बुआई, प्राकृतिक कीट नियंत्रकों, स्थानीय किस्मों, विविधता और जमीन की जोत का सहारा लिया जाता है। इसके बाद वानस्पतिक, तापीय और रासायनिक विकल्पों का इस्तेमाल सीमित स्थितियों में अन्तिम उपाय के तौर पर किया जाता है।

जैविक खेती के फायदेे(घ) पशुधन प्रबन्धन

मवेशियों को पालने के लिये उनके उद्विकास सम्बन्धी अनुकूलन, व्यवहार सम्बन्धी आवश्यकताओं और उनके कल्याण सम्बन्धी मुद्दों (जैसे पोषाहार, आश्रय, प्रजनन आदि) पर पूरा ध्यान दिया जाता है।

(ङ) मृदा और जल-संरक्षण

बारिश के फालतू पानी से जमीन का कटाव होता है। इसे कंटूर खेती, कंटूर बाँधों के निर्माण सीढ़ीदार खेती, पानी के बहाव के मार्ग में घास उगाने जैसे उपायों से रोका जा सकता है। शुष्क इलाकों में क्यारियों के बीच बारिश के पानी को जमा करके, ब्राड बेड और फरो प्रणाली, भूखण्डों के बीच वर्षा जलसंचय,और स्कूपिंग जैसे उपाय अपनाकर पानी का संरक्षण किया जा सकता है।

खेती में फसलों के चयन का बड़ा महत्त्व है क्योंकि बहुत सी फसलें कई तरह से उपयोग में लाई जा सकती हैं। जैसे पीजनपी और मोथ बीन की फसलों में सूखे का प्रतिरोध करने की क्षमता होती है। इन्हें चारे के तौर पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों में उगाकर अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सकता है। इनकी खेती से मिट्टी के कटाव को रोकने और जमीन में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में भी मदद मिलती है।

जैविक खेती का महत्त्व

खेती सम्बन्धी गतिविधियों की चुनौतियाँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। उदाहरण के लिये खेती की लागत बढ़ गई है; पानी की कमी होती जा रही है और खेती के लिये मजदूर मिलना मुश्किल होने लगा है। ऐसे में अगर हम खेती की वर्तमान प्रणाली का उपयोग करते रहे तो इससे सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के और गम्भीर होने के साथ-साथ पारिस्थितिकीय तंत्र के नष्ट होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिये हमें समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा और सघन खेती की तुलना में पारम्परिक खेती के फायदों को ध्यान में रखते हुए अधिक फायदेमन्द तरीके अपनाने होंगे। चित्र-1 में विभिन्न क्षेत्रों में जैविक खेती के बेहतर होने को दर्शाया गया है। देश की विकास प्रक्रिया में कृषि प्रणाली की ज्यादा अहम भूमिका है चाहे यह भूमिका रोजगार के सृजन में हो, जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने की हो या पौष्टिक आहार एवं स्वास्थ्य में सुधार को लेकर हो। यानी आज खेती के स्मार्ट तौर-तरीकों के चयन और उन्हें अपनाने पर बहुत कुछ निर्भर है।

ऐसी कोई भी गतिविधि जिससे पर्यावरण में खराबी आती हो, वह फसलों की उत्पादकता और मानव स्वास्थ्य पर भी असर डालती है। जैविक खेती वह प्रणाली है जो स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी, औचित्य और मानव व पारिस्थितिकीय-तंत्र की देखभाल के चार बुनियादी सिद्धान्तों पर आधारित है। फसलों में विविधता लाने, पशुधन प्रबन्धन और फसलों में खाद देने से जहाँ जैवविविधता का संरक्षण होता है वहीं इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी मदद मिलती है। जैविक खेती प्रणाली में नाइट्रेट लीचिंग बहुत कम होती है जिससे भूजल के प्रदूषण की रोकथाम होती है। जैविक सामग्री के उपयोग से मिट्टी में जैव प्रक्रियाएँ बढ़ जाती हैं जिससे उसे लम्बे समय तक उपजाऊ बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

खेती में कीमती बाहरी सामग्री के उपयोग में कमी से उत्पादन लागत घटाई जा सकती है। इससे मुख्य फसल के नष्ट होने की आशंका को कम-से-कम किया जा सकता है और कृषि वानिकी, अदला-बदली से फसल उगाने और एक फसल के साथ दूसरी फसल उगाकर खेती में विविधता लाई जा सकती है। किसानों को जैविक उत्पादों के अधिक दाम मिलते हैं और वे जैविक तरीके से उगाए गए कृषि पदार्थों के विशेष बाजार में भी पहुँच हासिल करते हैं। इससे उनकी क्रय क्षमता बढ़ जाती है।

जब किसानों को ऋण आसानी से उपलब्ध हो जाता है और टेक्नोलॉजी तथा बाजार तक पहुँच की सुविधा मिल जाती है तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगता है। इसके अलावा उन्हें गैर-सरकारी संगठनों, किसान क्लबों, स्वयंसहायता समूहों आदि का सहयोग भी मिलने लगता है। वे पूरे साल ऋण प्राप्त कर सकते हैं।

महिलाएँ कृषि सम्बन्धी गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके योगदान पर विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करने के लिये 15 अक्टूबर को महिला किसान दिवस का आयोजन किया जाता है। महिलाओं को खेती-बाड़ी सम्बन्धी गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने के लिये भारत सरकार ने उन्हें केन्द्र में रखकर नई नीतियाँ और कार्यक्रम तैयार किये हैं। जैविक खेती में विविधता लाकर (फसल, पशुधन आदि) रोजगार के नए अवसर पैदा किये जा सकते हैं जिससे ग्रामीण महिलाओं का सशक्तीकरण होता है।

जैविक खेती में किसान रसायनों के सम्पर्क में कम आते हैं। जैविक खाद्य पदार्थ पौष्टिक, स्वादिष्ट और ताजे होते हैं। ज्यादातर मामलों में इन उत्पादों में विटामिन सी, एंटी अॉक्सीडेंट्स आदि पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहते हैं। इन्हें अपनी गुणवत्ता और स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षा के लिये जाना जाता है। जैविक खेती अपनाने से किसानों का जीवन-स्तर उठाने में मदद मिलती है।

जैविक खेती की सीमाएँ

1. यह अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया पर आधारित है।
2. प्रारम्भ में पैदावार कम होती है।
3. रसायनों की आसान उपलब्धता।
4. बड़े पैमाने पर जैविक आधानों की आवश्यकता।
5. उच्च गुणवत्ता वाली आधानों की कम उपलब्धता।
6. विपणन सुविधाओं की कमी।
7. प्रमाणन प्रक्रिया।
8. अनुसन्धान सुविधाओं की कमी।
9. किसानों के लिये प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी।

जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये संगठन और सरकारी योजनाएँ/पहल

राष्ट्रीय जैविक खेती अनुसन्धान संस्थान, गंगटोक, सिक्किमः हाल ही में स्थापित यह अनुसन्धान संस्थान जैविक खेती पर अनुसन्धान और शिक्षा को बढ़ावा देता है। इसमें जैविक उत्पादन प्रणाली, खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों के पर्वतीय इलाकों में जैविक उत्पादन में प्रशिक्षण दिया जाता है।

राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)

केन्द्र सरकार द्वारा संचालित इस संस्थान और बंगलूरु, भुवनेश्वर, पंचकुला, इम्फाल, जबलपुर और नागपुर में छह क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित किये गए हैं जो केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजना-राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना पर अमल के लिये स्थापित किये गए हैं।

सहभागिता पूर्ण गारंटी प्रणाली

जैविक खेती की आर्थिक लाभप्रदताइसके तहत सभी सम्बद्ध पक्षों (उत्पादकों, उपभोक्ताओं, खुदरा व्यापारियों और बड़े व्यापारियों के साथ-साथ एनजीओ, समितियों/ग्राम पंचायतों/राज्यों/केन्द्र सरकार के संगठनों/एजेंसियों/किसानों आदि) के साथ सहभागितापूर्ण रवैया अपनाया जाता है। वे खेतों में जाकर फसलों का जायजा ले सकते हैं और एक-दूसरे के उत्पादन के तौर-तरीकों की जाँच कर सकते हैं और जैविक प्रमाणन के बारे में भी कोई फैसला ले सकते हैं। इस प्रणाली के तहत स्थानीय-स्तर पर गुणवत्ता आश्वासन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। यह प्रतिभागियों के लिये भरोसा हासिल करने, सामाजिक नेटवर्क बनाने का एक मंच है जिसके अन्तर्गत जैविक खेती के आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिये किसानों द्वारा जानकारियों का आदान-प्रदान किया जाता है।

परम्परागत कृषि विकास योजना

यह केन्द्र द्वारा प्रायोजित राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत मृदा स्वास्थ्य प्रबन्धन का विस्तारित घटक है जिसकी शुरुआत 2015 में हुई थी। इसके तहत क्लस्टर विधि और पीजीएस प्रमाणन के जरिए किसानों और युवाओं में जैविक खेती की नवीनतम टेक्नोलॉजी के बारे में जानकारी का प्रचार किया जाता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में जैविक खेती

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की तरह है क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद में इसका हिस्सा 16 प्रतिशत है और यह कुल श्रमशक्ति के 49 प्रतिशत को रोजगार मुहैया कराती है। देश के खेती वाले कुल 14.14 करोड़ हेक्टेयर रकबे में से 7.8 करोड़ हेक्टेयर (64 प्रतिशत) वर्षा पर आधारित है। वर्षा की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमण्डल के तापमान में बढ़ोत्तरी की वजह से कृषि क्षेत्र में अनिश्चितता बनी हुई है। इसलिये इन समस्याओं के समाधान के लिये जैविक खेती में बड़ी सम्भावनाएँ हैं।

सिक्किम भारत का पहला राज्य है जिसने पूरे तौर पर जैविक खेती को अपनाया है। पूर्वोत्तर के राज्य जैविक खेती करते आये हैं। अन्य राज्यों में कुछ विभिन्न एजेंसियाँ प्रमाणीकृत जैविक खेती में संलग्न हैं। कई विकासशील देशों ने अधिक लाभप्रदता को ध्यान में रखते हुए जैविक खेती को अपनाया है जिससे टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिला है। जैविक प्रणाली से किसानों की आर्थिक स्थिति में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सुधार लाया जा सकता है। (चित्र-2)। छोटे किसान भी इसका आर्थिक फायदा उठा सकते हैं।

संसाधनों की दृष्टि से निर्धन होने के कारण छोटे किसान खेती में काम आने वाली विभिन्न वस्तुएँ और ऊर्जा के साधन बाजार से खरीदने में असमर्थ होते हैं इसलिये वे इनके स्थान पर स्थानीय तौर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों का उपयोग करते हैं। छोटे किसानों के परिवारों के अन्य सदस्य भी खेती में हाथ बंटाते हैं जिससे श्रम पर होने वाले खर्च की बचत होती है।

अपने जैविक पदार्थों की बिक्री से उन्हें अच्छा आर्थिक लाभ मिलता है। इससे इन किसानों की आमदनी के स्तर में बढ़ोत्तरी होती है। जैविक खेती किसानों के लिये कृषि का कम जोखिम वाला तरीका भी है क्योंकि इसमें फसलों में विविधता लाकर, उनमें अदला-बदली करके, कई फसलें साथ-साथ उगाकर और कृषि वानिकी जैसे तरीकों को अपनाया जाता है।

प्रमाणीकृत कृषि उत्पाद जैसे बासमती चावल, दलहन, अनाज, तिलहन, फल, चाय, कॉफी, मसाले, शहद, जड़ी-बूटियों से बनी दवाएँ और उनके मूल्य संवर्धित उत्पादों को भारत में उत्पादन होने लगा है और वे बाजार में उपलब्ध हैं। अखाद्य जैव कृषि उत्पादों में कपास, कपड़े, सौन्दर्य प्रसाधन और शरीर की देखभाल में काम आने वाले उत्पाद आदि शामिल हैं। विदेश में जैव खाद्य-पदार्थों और उत्पादों की बड़ी माँग है इसलिये इनका निर्यात कर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।

अप्रत्यक्ष रूप से जैव उत्पाद प्रणाली कुछ आर्थिक फायदे उपलब्ध करा सकती है। किसानों की आमदनी के स्तर में बढ़ोत्तरी से उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। उनकी सामाजिक क्षमता भी बढ़ जाती है और वे अपने बच्चों के लिय बेहतर शिक्षा उपलब्ध करा सकते हैं। स्वयं-सहायता समूहों के गठन और एनजीओ आदि की वजह से ऋण और प्रमाणन प्रक्रिया आदि में बड़ी मदद मिली है। इस तरह सामाजिक पूँजी बढ़ी है और प्रणाली से भी ग्रामीण युवाओं और महिलाओं का सशक्तीकरण हुआ है जिससे उन्हें रोजगार के अधिक अवसर मिले हैं। आज महिलाओं के पास अपने उत्पादों के विपणन के लिये मोलभाव करने की बेहतर क्षमता है।

जैविक खेती का उद्देश्य प्राकृतिक प्रणालियों के साथ कार्य करना है जिससे स्वदेशी तकनीकी ज्ञान को बढ़ावा मिलता है और एक पीढ़ी से जानकारी दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है। इससे सांस्कृतिक तौर-तरीकों के संरक्षण के साथ-साथ फसलों की किस्मों के संरक्षण में भी मदद मिलती है। जर्मप्लाज्म की सूची में वन्य प्रजातियाँ धरोहर की श्रेणी में रखी गई हैं क्योंकि ये बड़ी तेजी से नष्ट होती जा रही हैं। अगर किसानों को पौष्टिक आहार मिलता रहे और जैविक खेती को अपनाना जारी रखें तो उनके स्वास्थ्य का भी संरक्षण किया जा सकता है। इस तरह किसानों का जीवन-स्तर जैविक खेती के तौर-तरीके अपनाने से ऊँचा उठाया जा सकता है।

निष्कर्ष

कृषि की चुनौतियों से निपटने के लिये जैविक खाद का इस्तेमाल आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस तरह की खेती के प्रारम्भिक चरणों में आर्थिक लाभ कम होने से किसान जैविक खेती के तौर-तरीके अपनाने से बचते हैं। लेकिन यह इस तरह की खेती के फायदों के बारे में किसानों की जानकारी की कमी दर्शाता है। सरकारी एजेेंसियों और योजनाओं में इस कमी को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके लिये कृषक समुदाय को जैविक खेती की तकनीकों के बारे में मिसाल देकर जानकारी दी जानी चाहिए जिससे वे पारम्परिक खेती के वैकल्पिक तरीकों के बारे में विशेषज्ञता हासिल कर सकें।

जैविक प्रणाली में सभी घटकों के सही मात्रा में उपयोग करते हुए अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिये अच्छे प्रबन्धकीय कौशल की आवश्यकता होती है। इसलिए खेती के प्रबन्धकों यानी किसानों को संसाधनों का उचित मात्रा में लगातार उपयोग सुनिश्चित करने के लिये प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। भारत में जैविक खेती की अपार सम्भावनाएँ हैं इसलिये खेती की जैविक विधियों के प्रमाणन के लिये और अधिक अनुसन्धान की आवश्यकता है।

(लेखक क्रमशः बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के कृषि विज्ञान संस्थान; गांगुली बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान और कृषि जन्तुविज्ञान विभाग और वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय में विषयवस्तु विशेषज्ञ हैं।)

ई-मेलःdeep.gogreen@gmail.com

 

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