परम्परागत जल प्रणाली का धनी

Submitted by Hindi on Sat, 11/18/2017 - 16:42
Source
डाउन टू अर्थ, नवम्बर 2017

गुजरात के शुष्क और गर्म काठियावाड़ प्रायद्वीप से लेकर केरल के भरपूर बारिश वाले मालाबार तट का इलाका पश्चिमी तटीय मैदान का हिस्सा है। उत्तर में इसकी सीमा गुजरात तक आए थार मरुभूमि क्षेत्र तय करता है, जबकि उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वतमाला, मालवा का पठारी क्षेत्र, विंध्य और सतपुड़ा पहाड़ियाँ। फिर पश्चिम घाट की पूर्वी ढलान गुजरात से शुरू होकर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और केरल तक इसकी पूर्वी सीमा लगती है। गुजरात का जूनागढ़, अमेरली, भावनगर, सूरत और बलसाढ़ जिले पूरा या आंशिक रूप से इसके दायरे में आते हैं। महाराष्ट्र के थाणे, कुलाबा और रत्नागिरी के हिस्से इसमें आते हैं। गोवा का बँटवारा भी ऐसा ही है। कर्नाटक के उत्तर और दक्षिण कनारा जिलों का बड़ा हिस्सा इसमें आता है। केरल के कन्नानोर, कोझिकोड, मल्लपुरम, पालघाट, त्रिचूर, एर्नाकुलम, कोट्टायम, क्वीलोन और तिरुअनंतपुरम जिलों का कुछ-कुछ हिस्सा इस क्षेत्र में आता है; जबकि एल्लेपी लगभग पूरी तरह इसके अन्दर है। इस पूरे मैदानी क्षेत्र में जल संचय की बहुत ही व्यापक और पुरानी परम्परा रही है और पिछली सदी में अंग्रेजों ने उसके बारे में काफी अध्ययन करके लिखा भी है।

काठियावाड़ प्रायद्वीप के निचले जिलों में भूजल खारा है। सो यहाँ के लोगों ने हर गाँव में जलाशय बनाए हैं। गर्मियों में जब यह सूख जाता है तो इसकी तलहटी में बने कुओं से पानी लिया जाता है।काठियावाड़ प्रायद्वीप और गुजरात का मैदानी इलाका एकदम खाली पड़ी थार मरुभूमि और हरे-भरे कोंकण इलाके के बीच स्थित है। प्रायद्वीप को कम ऊँचाई वाली पर्वतमाला जगह-जगह से काटती है और जूनागढ़ की गिरनार पहाड़ियों की तो ऊँचाई भी काफी अच्छी है। भाडर नदी के रास्ते में बहुत ही उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी वाले कुछ हिस्से आते हैं।

काठियावाड़ जिले में भूजल का स्तर काफी ऊँचा है और यहाँ बड़ी संख्या में कुएँ हैं, खासकर इसके दक्षिणी हिस्से में। इस पूरे क्षेत्र में खूब बावड़ियाँ, जिन्हें यहाँ के लोग वाव कहते हैं, भी हैं। इनमें चसक या मोट से पानी ऊपर खींचा जाता था। कुओं के जगत 60 सेमी ऊँचे थे। पर इसके अलावा उन कुओं की बाकी सारी कलाकारी जमीन से अन्दर ही होती थी। कुओं के लिये उचित स्थान का चुनाव पनिकल करते थे। उनका चुनाव कभी गलत नहीं होता था और वे यह भी बता सकते थे कि पानी कितनी गहराई में निकलेगा।

मीठे पानी के स्रोतों से अक्सर दन्तकथाएँ जुड़ी हुई हैं। दांतेतिया गाँव जिस मैदानी इलाके में बसा है उसे माल कहते हैं और वहाँ का पानी खारा है। वहाँ मीठे पानी का एक छोटा विरडा जरूर था जिसे गांगवो कहते थे। प्रचलित कथा के अनुसार, इसी गाँव के बनिए ने अपने बेटे की शादी खूब पानी वाले इलाके की लड़की से कर दी। जब वह लड़की ससुराल आई तो उसे नहाने के लिये खारा पानी दिया गया। उसने नहाने से इनकार कर दिया और अपने मायके से घड़े में भरकर आए पानी से नहाना पसन्द किया। इस पर उसकी सास ने ताना मारा कि अपने बाप से कहकर रोज मीठा पानी लाने का इन्तजाम करा ले। दुल्हन एकदम अड़ गई और कहा कि यह भले ही मर जाए पर खारे पानी से नहीं नहाएगी। अब वह भूखी-प्यासी तीन दिन-तीन रात तक गंगा मइया की आराधना करती रही। तीसरी रात के बाद गंगा प्रकट हुईं और उन्होंने उस खास स्थान तक अपने पूरे परिवार को ले जाने को कहा जहाँ तक उसका पानी आ रहा था। दुल्हन ने काफी मान-मनौवल के बाद अपने ससुराल वालों को उस जगह तक जाने के लिये राजी किया। पहले तो वे लोग उस पर हँसे, पर बाद में साथ जाने को तैयार हो गए। पर उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि विरडा से मीठा पानी बाहर आ रहा था। उन्होंने अपनी बहू को आशीष दिए, सबने स्नान किया और घर लौटे। तभी से यह मीठा पानी आज तक आ रहा है।

प्रायद्वीप उत्तर और उत्तर-पश्चिम के कुछ निचले जिलों में भूजल खारा है, इसलिये हर गाँव में कम-से-कम एक तालाब या जलाशय तो है ही। गर्मियों में इनका पानी सूख जाता है। फिर इनकी तलहटी में खुदे कुएँ से पानी लिया जाता है। भावनगर शहर के बीच स्थित 8 किमी के घेरे वाली झील गडेली नदी का पानी लेकर भरी जाती है।

काठियावाड़ के मैदानी इलाके में भी जहाँ-जहाँ पर्वत श्रृंखला से अलग-थलग निकली पहाड़ियाँ आ जाती हैं। जिले के बड़े मैदानी हिस्से को साबरमती, माही ताप्ती, बनास, रूपेण, सरस्वती और नर्मदा जगह-जगह से काटती हैं।

गुजरात के मैदानी इलाके के एकदम उत्तर में पालनपुर जिला है जो मुख्यतः रेतीली जमीन वाला है और भुरभुरे पत्थर वाली कुछ पहाड़ियाँ भी यहाँ हैं। इस जिले का पूर्वी हिस्सा हरा-भरा है।

काठियावाड़ प्रायद्वीप और गुजरात का मैदानी हिस्सा शुष्क थार मरुभूमि और आर्द्र कोंकण क्षेत्र के बीच स्थित हैपालनपुर में कोई प्राकृतिक झील नहीं है, पर राधनपुर इलाके में काफी संख्या में तालाब हैं, जिनमें से कुछ तो पूरे साल पानी रहता है। बनास नदी यहाँ से गुजरती जरूर है, पर उसका पानी इतना खारा है कि लोग उसका इस्तेमाल नहीं करते। वे तालाबों पर ही निर्भर हैं। चारों तरफ से सीढ़ियों वाले वाघेल तालाबों की शुरुआत वाघेला राजपूतों ने की थी और गुजरात में इनसे ज्यादा सुन्दर तालाब कम ही होंगे।

सूरत, भड़ौच और अहमदाबाद जिलों तथा पूर्व वड़ोदरा राज वाले इलाकों में कुएँ, तालाब और झील ही पानी के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। पीने और खेती, दोनों के लिये इन्हीं का पानी प्रयोग में आता है।

अहमदाबाद में पानी को जमा रखने के लिये अनेक जलाशय और झील बने थे। 34 बराबर किनारों वाले कांकरिया तालाब का निर्माण सन 1451 में सुल्तान कुतुबुद्दीन ने कराया था। इसके फाटकों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है। मानसर झील में सालभर पानी रहता है और यह 6 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है। इसकी आकृति बहुत अजीबोगरीब है और इसमें जगह-जगह सीढ़ियाँ व पूजा-पाठ के स्थान बने हुए हैं। आस-पास कई इलाकों से जमा पानी को एक कुंड से होकर झील में गिराते थे। कुंड पानी की गन्दगी को काफी हद तक कम कर देता था। चंदोला झील के बाँध मिट्टी के ही हैं, पर इसका क्षेत्रफल 73 हेक्टेयर है। अन्य महत्त्वपूर्ण झीलें थीं-मलिक शबान, सरखेज मालव, खान, मुल्तान और सोनारिया।

खेड़ा जिले में असंख्य तालाब, जलाशय और कुएँ हैं। खारी नदी पर जगह-जगह मिट्टी के बाँध डालकर पानी लिया जाता था और उससे धान के खेतों की सिंचाई होती थी। पर इन बाँधों का निर्माण और रख-रखाव तथा पानी के बँटवारे के सवाल पर काफी विवाद होता था। 1850 में अंग्रेजों ने फाटक लगे पक्के बाँधों का निर्माण करवा दिया।

वड़ोदरा में भी मुख्यतः कुएँ और तालाबों से ही सिंचाई होती थी। छोटी झीलें और तालाब बहुत बड़ी संख्या में थे, पर गर्मियों में इनमें से कुछ कम में ही पानी रह पाता था। वड़ोदरा जिले में कई खूबसूरत बावड़ियाँ हैं। मलवाल, सामलिया, कारावन, सावली, दुमाड, आनंदी, ताइन, वासो, सोजित्रा और करिसा में बड़े तालाब थे।

कारावन तालाब के बारे में एक किस्सा बहुत प्रसिद्ध है। बृंगुक्षत्र में एक ब्राह्मण दम्पती रहा करता था। उनका एक आठ साल का बेटा था। यह लड़का नर्मदा में डूब गया। माँ-बाप उसे ढूँढ-ढूँढकर बेहाल हो गए, तब भगवान शिव को उन पर दया आई और वे उनके साथ हो गए। वे उन्हें कायरकुन तक ले आए, जिसे अब करावन कहा जाता है। पूरी रात वे लोग बच्चे की तलाश करते रहे। दम्पती को सांत्वना देने के लिये भगवान शिव ने उनके साथ वहीं रहने का फैसला किया। तब से यह तालाब एक तीर्थ स्थल बन गया।

(बूँदों की संस्कृति पुस्तक से साभार)

Disqus Comment

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा